महाशक्तियों का संगम: शी जिनपिंग ने ट्रंप को बुलाया चीन, आगे क्या?
चर्चा में क्यों? (Why in News?):
हाल ही में, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस बात की पुष्टि की है कि उन्हें चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने चीन आने का न्योता दिया है और जल्द ही दोनों नेताओं के बीच मुलाकात संभव हो सकती है। यह खबर ऐसे समय में आई है जब अमेरिका और चीन के संबंध, व्यापार युद्ध, प्रौद्योगिकी प्रतिस्पर्धा और भू-राजनीतिक वर्चस्व को लेकर दशकों के सबसे निचले स्तर पर देखे जा रहे हैं। इस आमंत्रण को एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक पहल के तौर पर देखा जा रहा है, जो दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं और सैन्य शक्तियों के बीच तनाव कम करने और एक नई दिशा तय करने की संभावना रखता है।
अमेरिका-चीन संबंधों का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: उतार-चढ़ाव भरी साझेदारी
अमेरिका और चीन के संबंध हमेशा से जटिल और बहुआयामी रहे हैं। इन्हें अक्सर ‘सहयोग और प्रतिस्पर्धा’ के संतुलन पर आधारित बताया जाता है।
- निक्सन का चीन दौरा (1972): शीत युद्ध के दौरान, अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन का चीन दौरा एक ऐतिहासिक घटना थी, जिसने दोनों देशों के बीच संबंधों के नए अध्याय की शुरुआत की। यह दौरा सोवियत संघ के खिलाफ एक संयुक्त मोर्चा बनाने की कूटनीतिक चाल थी, जिसने भू-राजनीतिक समीकरणों को बदल दिया।
- राजनयिक संबंधों की स्थापना (1979): जिमी कार्टर प्रशासन के तहत अमेरिका ने ताइवान की बजाय चीन को मान्यता दी, जिससे पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित हुए। यह अमेरिकी ‘वन चाइना’ नीति की नींव का महत्वपूर्ण कदम था।
- आर्थिक एकीकरण: 1980 और 90 के दशक में, चीन ने आर्थिक सुधारों को अपनाया और 2001 में विश्व व्यापार संगठन (WTO) में शामिल होने के बाद, वह वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का एक अभिन्न अंग बन गया। इस दौरान अमेरिका और चीन के बीच व्यापार तेजी से बढ़ा, जिससे दोनों देश आर्थिक रूप से एक-दूसरे पर अत्यधिक निर्भर हो गए। अमेरिका चीन के लिए सबसे बड़ा निर्यात बाजार बन गया, जबकि चीन अमेरिकी कंपनियों के लिए एक विशाल विनिर्माण केंद्र।
- ओबामा प्रशासन और ‘एशिया का धुरी’ (Pivot to Asia): ओबामा प्रशासन ने चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए ‘एशिया का धुरी’ नीति अपनाई। इस नीति ने दक्षिण चीन सागर में नौवहन की स्वतंत्रता, मानवाधिकार, साइबर सुरक्षा और बौद्धिक संपदा अधिकारों जैसे मुद्दों पर चीन के साथ तनाव को बढ़ाया। यह एक तरह से चीन के “बढ़ते कदमों” को रोकने का प्रयास था।
ट्रंप-शी युग: टकराव और प्रतिस्पर्धा का नया अध्याय
डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद, अमेरिका-चीन संबंध एक नए और अधिक टकराव वाले दौर में प्रवेश कर गए। ट्रंप प्रशासन ने ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति के तहत चीन को मुख्य रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखा और दशकों पुरानी अमेरिकी विदेश नीति के मानदंडों को चुनौती दी।
मुख्य विशेषताएँ:
- व्यापार युद्ध (Trade War): ट्रंप ने चीन पर अनुचित व्यापारिक प्रथाओं, बौद्धिक संपदा की चोरी, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के लिए दबाव डालने और अमेरिकी नौकरियों के नुकसान का आरोप लगाते हुए चीनी उत्पादों पर भारी टैरिफ लगाए। चीन ने भी जवाबी कार्रवाई की, जिससे वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता बढ़ी और दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। यह एक ‘आर्थिक मुक्केबाजी’ मैच जैसा था, जहाँ दोनों पक्ष एक-दूसरे को आर्थिक रूप से कमजोर करने की कोशिश कर रहे थे, जिसका असर वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं और बाजारों पर पड़ा।
- प्रौद्योगिकी प्रतिस्पर्धा: हुआवेई, ज़ेडटीई और टिक-टॉक जैसी चीनी प्रौद्योगिकी कंपनियों पर राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए प्रतिबंध लगाए गए और उन्हें अमेरिकी बाजारों से बाहर करने का प्रयास किया गया। अमेरिका ने चीन की 5G तकनीक के वैश्विक प्रभुत्व को चुनौती देने के लिए अपने सहयोगियों पर भी दबाव डाला। यह एक “तकनीकी शीत युद्ध” की शुरुआत थी।
- भू-राजनीतिक वर्चस्व: दक्षिण चीन सागर में चीन के कृत्रिम द्वीपों के सैन्यीकरण, ताइवान के मुद्दे पर चीन की संप्रभुता के दावे, हांगकांग में लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनों पर कार्रवाई और शिनजियांग में उइगर मुसलमानों के मानवाधिकार उल्लंघन को लेकर अमेरिका ने मुखर विरोध दर्ज कराया। इन मुद्दों पर अमेरिका ने चीन पर कूटनीतिक और आर्थिक दबाव डाला।
- कोविड-19 की उत्पत्ति: महामारी की शुरुआत के बाद, ट्रंप प्रशासन ने कोविड-19 की उत्पत्ति को लेकर चीन पर सीधे आरोप लगाए और पारदर्शी जांच की मांग की, जिससे संबंधों में और खटास आई।
“ट्रंप प्रशासन के तहत, अमेरिका-चीन संबंध सिर्फ व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता से कहीं आगे बढ़कर, एक व्यापक भू-रणनीतिक प्रतिस्पर्धा में बदल गए। यह एक ऐसी शतरंज की बिसात थी, जिस पर हर चाल का वैश्विक प्रभाव था।”
शी जिनपिंग के आमंत्रण का महत्व: क्या है इसके पीछे का गणित?
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग द्वारा अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को दिया गया न्योता कई मायनों में महत्वपूर्ण है और इसके पीछे कई रणनीतिक गणनाएँ हो सकती हैं:
- तनाव कम करने की पहल: यह दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव को कम करने और संबंधों को स्थिर करने की चीन की इच्छा का संकेत हो सकता है। व्यापार युद्ध और भू-राजनीतिक टकराव ने दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर नकारात्मक प्रभाव डाला है और वैश्विक अनिश्चितता को बढ़ाया है। चीन जानता है कि दीर्घकालिक टकराव उसके आर्थिक विकास और वैश्विक महत्वाकांक्षाओं के लिए हानिकारक है।
- वैश्विक नेतृत्व की पुनः पुष्टि: चीन खुद को एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है। अमेरिका के साथ बातचीत करके, चीन यह संदेश देना चाहता है कि वह अंतरराष्ट्रीय स्थिरता में योगदान देने और वैश्विक शासन में एक रचनात्मक भूमिका निभाने के लिए तैयार है। यह उसकी ‘शांतिपूर्ण उदय’ की छवि को मजबूत करेगा।
- घरेलू दबाव: चीन में भी व्यापार युद्ध के कारण आर्थिक मंदी, बेरोजगारी का दबाव और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के विखंडन का खतरा था। अमेरिकी टैरिफ से चीनी निर्यातकों को नुकसान हो रहा था और कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ चीन से बाहर निकलने पर विचार कर रही थीं। ऐसे में, एक कूटनीतिक समाधान से घरेलू अर्थव्यवस्था को राहत मिल सकती है।
- चुनावों का समय: अमेरिका में आगामी चुनाव (यदि यह समाचार चुनाव के करीब आया है) से पहले ट्रंप के लिए यह एक कूटनीतिक जीत हो सकती है, जो उन्हें मतदाताओं के सामने एक मजबूत नेता और ‘डीलमेकर’ के रूप में पेश कर सके। चीन इस अवसर का लाभ उठाकर ट्रंप प्रशासन से कुछ रियायतें हासिल करने का प्रयास कर सकता है।
- बढ़ी हुई बातचीत की आवश्यकता: कई वैश्विक चुनौतियाँ, जैसे जलवायु परिवर्तन, परमाणु अप्रसार, वैश्विक स्वास्थ्य (विशेषकर भविष्य की महामारियों की तैयारी) और आतंकवाद-विरोधी अभियान, के लिए अमेरिका और चीन के बीच सहयोग अनिवार्य है। यह मुलाकात इन मुद्दों पर संवाद के लिए एक मंच प्रदान कर सकती है, जहाँ दोनों देश साझा हितों की पहचान कर सकें।
चीन के लिए निहितार्थ: ड्रैगन की चाल
यह मुलाकात चीन के लिए कई रणनीतिक लाभ ला सकती है, जिससे वह अपनी दीर्घकालिक महत्वाकांक्षाओं को साध सके:
- आर्थिक स्थिरता: व्यापार युद्ध से उपजे आर्थिक दबाव को कम करने में मदद मिलेगी। टैरिफ में कमी या हटाना चीनी निर्यात को बढ़ावा देगा और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में स्थिरता लाएगा। यह विदेशी निवेश को आकर्षित करने में भी मदद करेगा।
- वैश्विक प्रतिष्ठा: अमेरिका के साथ सीधे संवाद से चीन की वैश्विक छवि सुधरेगी, खासकर ऐसे समय में जब उसकी बेल्ट एंड रोड पहल (BRI), दक्षिण चीन सागर में गतिविधियों और मानवाधिकार रिकॉर्ड पर पश्चिमी देशों द्वारा संदेह व्यक्त किया जा रहा है। यह चीन को एक विश्वसनीय और जिम्मेदार वैश्विक साझेदार के रूप में प्रस्तुत करने में मदद करेगा।
- तकनीकी विकास: हुआवेई जैसे तकनीकी दिग्गजों पर लगे प्रतिबंधों में संभावित ढील या प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर कम दबाव से चीन के महत्वाकांक्षी तकनीकी क्षेत्र को बढ़ावा मिलेगा। यह चीन के ‘मेक इन चाइना 2025’ जैसे कार्यक्रमों के लिए महत्वपूर्ण है।
- बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था: चीन एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का प्रबल समर्थक रहा है। अमेरिका के साथ संतुलित संबंध स्थापित करके, चीन यह सुनिश्चित करना चाहता है कि वह वैश्विक पटल पर एक प्रमुख खिलाड़ी बना रहे और अमेरिकी प्रभुत्व को चुनौती दे सके। यह उसे अपने क्षेत्रीय प्रभाव (जैसे आसियान में) को मजबूत करने का अवसर भी देगा।
अमेरिका के लिए निहितार्थ: ईगल का दृष्टिकोण
अमेरिकी दृष्टिकोण से, यह मुलाकात विभिन्न रणनीतिक लाभ और विचार ला सकती है, जो उसकी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के अनुरूप हो सकते हैं या उसे नया आकार दे सकते हैं:
- आर्थिक लाभ: व्यापार समझौते (जैसे ‘चरण-एक’ समझौता) को आगे बढ़ाने या नए समझौते पर बातचीत करने से अमेरिकी किसानों, व्यवसायों और उपभोक्ताओं को लाभ हो सकता है। चीन के विशाल बाजार तक अधिक पहुंच अमेरिकी निर्यात को बढ़ावा दे सकती है।
- भू-राजनीतिक लाभ: चीन के साथ सीधे संवाद से अमेरिका को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत करने और अपने सहयोगियों को आश्वस्त करने का अवसर मिल सकता है। यह चीन को कुछ मुद्दों पर अपनी स्थिति बदलने या व्यवहार में अधिक पारदर्शिता लाने के लिए प्रेरित कर सकता है, खासकर दक्षिण चीन सागर में।
- घरेलू राजनीति: ट्रंप के लिए, यह मुलाकात एक बड़ी कूटनीतिक जीत हो सकती है, जो उनकी ‘डीलमेकर’ छवि को मजबूत करेगी और उन्हें मतदाताओं के सामने एक ऐसे नेता के रूप में पेश करेगी जो जटिल अंतरराष्ट्रीय समस्याओं को हल कर सकता है, खासकर आगामी चुनावों से पहले।
- राष्ट्रीय सुरक्षा: चीन की सैन्य क्षमताओं, साइबर गतिविधियों और उभरती प्रौद्योगिकियों पर सीधे चर्चा करने का अवसर मिलेगा, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं को दूर करने और भविष्य के जोखिमों को प्रबंधित करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, अमेरिका को चीन की दीर्घकालिक रणनीतिक महत्वाकांक्षाओं और अमेरिकी प्रभुत्व को चुनौती देने की चीन की इच्छा के प्रति सतर्क रहना होगा। यह एक “सहयोग का नृत्य” है, जिसमें प्रत्येक पक्ष अपने राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने की कोशिश करेगा, जबकि दूसरे के हितों को भी ध्यान में रखेगा।
वैश्विक कूटनीति पर प्रभाव: क्या बदलेगा विश्व समीकरण?
अमेरिका-चीन संबंधों में किसी भी बड़े बदलाव का वैश्विक कूटनीति पर गहरा असर पड़ता है, क्योंकि ये दो देश वैश्विक जीडीपी का एक बड़ा हिस्सा और दुनिया की दो सबसे बड़ी सेनाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।
- बहुपक्षीय संस्थाओं पर प्रभाव: यदि दोनों महाशक्तियाँ सहयोग करती हैं, तो संयुक्त राष्ट्र, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और विश्व व्यापार संगठन (WTO) जैसी बहुपक्षीय संस्थाएँ मजबूत हो सकती हैं, क्योंकि उनके पास वैश्विक समस्याओं को हल करने के लिए अधिक सहमति और संसाधन होंगे। अन्यथा, वे कमजोर पड़ सकती हैं और वैश्विक शासन को खतरा हो सकता है।
- छोटे और मध्यम शक्तियों पर प्रभाव: भारत, जापान, यूरोपीय संघ और आसियान जैसे देश, जो अक्सर अमेरिका-चीन तनाव से प्रभावित होते हैं, को राहत मिल सकती है। तनाव कम होने से वे अपनी विदेश नीति में अधिक लचीलापन अपना सकते हैं और किसी एक पक्ष का चयन करने के दबाव से बच सकते हैं। हालांकि, उन्हें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वे दोनों शक्तियों के बीच फंस न जाएं।
- क्षेत्रीय स्थिरता: इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की बढ़ती आक्रामकता के कारण पैदा हुए तनाव कम हो सकते हैं, जिससे क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा मिलेगा। दक्षिण चीन सागर, ताइवान जलडमरूमध्य और पूर्वी चीन सागर में तनाव कम हो सकता है, जिससे सभी के लिए व्यापार और नौवहन की स्वतंत्रता सुनिश्चित होगी।
- जलवायु परिवर्तन और वैश्विक स्वास्थ्य: ये ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ अमेरिका और चीन के सहयोग के बिना वैश्विक प्रगति संभव नहीं है। अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा ऐतिहासिक उत्सर्जक है, जबकि चीन वर्तमान में सबसे बड़ा उत्सर्जक है। मुलाकात इन महत्वपूर्ण वैश्विक चुनौतियों पर संयुक्त कार्रवाई का मार्ग प्रशस्त कर सकती है, जैसे पेरिस समझौते को मजबूत करना या भविष्य की महामारियों के लिए वैश्विक प्रतिक्रिया का समन्वय करना।
यह स्थिति एक ऐसे “भू-राजनीतिक थर्मोस्टेट” की तरह है; जब अमेरिका-चीन संबंध स्थिर होते हैं, तो दुनिया का तापमान भी नियंत्रित रहता है और वैश्विक सहयोग के लिए अधिक अनुकूल माहौल बनता है।
चुनौतियाँ और अड़चनें: राह आसान नहीं
हालांकि मुलाकात की संभावना आशाजनक लगती है, लेकिन राह में कई अड़चनें और चुनौतियाँ मौजूद हैं, जो इस रिश्ते को हमेशा जटिल बनाए रखेंगी:
- गहरे संरचनात्मक मुद्दे: मानवाधिकार (शिनजियांग में उइगरों का दमन, हांगकांग में लोकतंत्र की कमी), ताइवान की संप्रभुता का मुद्दा (जिसे चीन अपना अविभाज्य हिस्सा मानता है), दक्षिण चीन सागर में चीन की सैन्य उपस्थिति, साइबर जासूसी और बौद्धिक संपदा की चोरी जैसे मुद्दे गहरे हैं और इन्हें आसानी से हल नहीं किया जा सकता, क्योंकि ये चीन के मूल हितों और संप्रभुता के दावे से जुड़े हैं।
- विश्वास की कमी: दशकों के आरोप-प्रत्यारोप और प्रतिद्वंद्विता ने दोनों पक्षों के बीच विश्वास की गहरी खाई खोद दी है। इसे भरना समय लेने वाला होगा और केवल एक या दो मुलाकातों से संभव नहीं होगा। दोनों देश एक-दूसरे के इरादों पर संदेह करते हैं।
- घरेलू राजनीतिक दबाव: दोनों देशों में घरेलू राजनीतिक दबाव, विशेष रूप से अमेरिका में चुनाव के दौरान, किसी भी बड़ी रियायत देने में बाधा बन सकते हैं। ट्रंप प्रशासन के लिए चीन पर ‘कठोर’ दिखना एक चुनावी रणनीति हो सकती है, जबकि शी जिनपिंग को चीन के अंदर राष्ट्रवाद और चीन के ‘महान पुनरुत्थान’ के सपने को बनाए रखना है।
- ‘डी-कपलिंग’ की अवधारणा: कुछ अमेरिकी नीति निर्माताओं ने चीन से आर्थिक और तकनीकी रूप से ‘डी-कपलिंग’ (अलग होने) की वकालत की है ताकि चीन पर निर्भरता कम की जा सके। यह प्रवृत्ति संबंधों को और जटिल बना सकती है और वैश्विक अर्थव्यवस्था को खंडित कर सकती है।
- रणनीतिक प्रतिस्पर्धा: अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, मध्य पूर्व और प्रशांत द्वीप समूह जैसे क्षेत्रों में प्रभाव के लिए चल रही रणनीतिक प्रतिस्पर्धा लगातार तनाव का स्रोत बनी रहेगी। चीन की बेल्ट एंड रोड पहल और अमेरिका की ‘ब्लू डॉट नेटवर्क’ जैसी पहलें इन क्षेत्रों में प्रभाव के लिए प्रतिस्पर्धा के उदाहरण हैं।
यह एक जटिल पहेली है, जिसके हर टुकड़े को सावधानी से बिठाना होगा। कोई भी त्वरित समाधान की उम्मीद करना अवास्तविक होगा।
आगे की राह: संतुलन और सहयोग की आवश्यकता
अमेरिका-चीन संबंधों का भविष्य केवल एक बैठक पर निर्भर नहीं करता, बल्कि निरंतर संवाद, आपसी समझ और साझा हितों की पहचान पर आधारित है। एक ऐसे मॉडल की आवश्यकता है जो प्रतिस्पर्धा को प्रबंधित कर सके और सहयोग के क्षेत्रों को बढ़ावा दे सके।
- सतत संवाद: दोनों देशों को नियमित उच्च-स्तरीय वार्ताओं के लिए एक स्थायी तंत्र स्थापित करना चाहिए ताकि गलतफहमी को दूर किया जा सके और संकट को बढ़ने से रोका जा सके। ‘हॉटलाइन’ और नियमित मंत्रिस्तरीय बैठकें महत्वपूर्ण हैं।
- सहयोग के क्षेत्रों की पहचान: जलवायु परिवर्तन, महामारी की तैयारी, आतंकवाद-विरोधी अभियान, साइबर सुरक्षा के कुछ पहलू और परमाणु अप्रसार जैसे क्षेत्रों में सहयोग जारी रखना महत्वपूर्ण है, जहाँ दोनों देशों के साझा हित हैं और जिनके बिना वैश्विक समस्याओं का समाधान असंभव है।
- प्रबंधित प्रतिस्पर्धा: जिन क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा अपरिहार्य है (जैसे प्रौद्योगिकी, सैन्य विकास और भू-राजनीतिक प्रभाव), वहाँ ‘प्रबंधित प्रतिस्पर्धा’ का दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। इसका अर्थ है स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना, नियमों का पालन करना और सीधे टकराव से बचना। एक ‘गारड्रेल्स’ (Guardrails) प्रणाली विकसित करने की आवश्यकता है।
- अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का पालन: दोनों देशों को अंतर्राष्ट्रीय कानूनों और मानदंडों का सम्मान करना चाहिए, जिससे वैश्विक व्यवस्था में स्थिरता बनी रहे। यह विशेष रूप से समुद्री कानून (जैसे यूएनसीएलओएस) और व्यापार नियमों पर लागू होता है।
- छोटी जीत पर ध्यान: बड़े मुद्दों को हल करने के बजाय, छोटे, प्राप्त करने योग्य समझौतों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, जो विश्वास बनाने में मदद कर सकते हैं और भविष्य में बड़े समझौतों के लिए आधार तैयार कर सकते हैं।
यह एक ‘युगल नृत्य’ जैसा है, जहाँ दोनों भागीदारों को एक साथ कदम ताल करने और एक-दूसरे के संकेतों को समझने की आवश्यकता है, भले ही वे अलग-अलग संगीत पर नाच रहे हों। संतुलन और धैर्य इस रिश्ते की कुंजी होगी।
निष्कर्ष
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच संभावित मुलाकात वैश्विक कूटनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकती है। यह न केवल दोनों महाशक्तियों के बीच तनाव को कम करने का अवसर प्रदान करती है, बल्कि दुनिया को स्थिरता और सहयोग का संदेश भी दे सकती है। हालांकि, संबंधों में गहरी जड़ें जमा चुकी चुनौतियां और अड़चनें अभी भी मौजूद हैं, जो दशकों की भिन्न विचारधाराओं, आर्थिक मॉडलों और भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का परिणाम हैं। भविष्य में अमेरिका-चीन संबंध किस दिशा में जाएंगे, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि दोनों देश अपने साझा हितों को कितना प्राथमिकता देते हैं और मतभेदों को प्रबंधित करने में कितनी परिपक्वता दिखाते हैं। दुनिया उम्मीद कर रही है कि ड्रैगन और ईगल एक ऐसे रास्ते पर चलेंगे जो न केवल उनके अपने देशों के लिए, बल्कि पूरे विश्व के लिए शांति, समृद्धि और स्थिरता का मार्ग प्रशस्त करे, क्योंकि उनके संबंधों की धुरी पर ही 21वीं सदी की वैश्विक व्यवस्था टिकी हुई है।
UPSC परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न (Practice Questions for UPSC Exam)
प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) – 10 MCQs
(निम्नलिखित कथनों पर विचार करें और सही विकल्प चुनें)
- अमेरिका-चीन संबंधों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
- रिचर्ड निक्सन पहले अमेरिकी राष्ट्रपति थे जिन्होंने चीन का दौरा किया और पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित किए।
- चीन के विश्व व्यापार संगठन (WTO) में शामिल होने के बाद अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक संबंध तेजी से बढ़े।
- ओबामा प्रशासन ने चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए ‘एशिया का धुरी’ (Pivot to Asia) नीति अपनाई।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(A) केवल a और b
(B) केवल b और c
(C) केवल c
(D) a, b और c
उत्तर: (B)
व्याख्या: निक्सन ने चीन का दौरा किया लेकिन पूर्ण राजनयिक संबंध जिमी कार्टर प्रशासन (1979) में स्थापित हुए। चीन के WTO में शामिल होने के बाद व्यापार में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। ओबामा प्रशासन ने ‘एशिया का धुरी’ नीति अपनाई।
- डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति काल में अमेरिका-चीन संबंधों की प्रमुख विशेषताओं में शामिल हैं:
- एक व्यापक व्यापार युद्ध की शुरुआत।
- प्रौद्योगिकी क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा का बढ़ना, विशेषकर 5G पर।
- मानवाधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों पर चीन का अमेरिकी समर्थन।
- कोविड-19 की उत्पत्ति को लेकर चीन पर सीधे आरोप।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(A) केवल a और b
(B) केवल a, b और c
(C) केवल a, b और d
(D) a, b, c और d
उत्तर: (C)
व्याख्या: ट्रंप प्रशासन के तहत व्यापार युद्ध, प्रौद्योगिकी प्रतिस्पर्धा और कोविड-19 की उत्पत्ति प्रमुख मुद्दे थे। मानवाधिकारों पर चीन का समर्थन नहीं, बल्कि चीन पर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगाए गए।
- शी जिनपिंग द्वारा डोनाल्ड ट्रंप को चीन आने का न्योता देने के संभावित कारणों में शामिल हो सकते हैं:
- दोनों देशों के बीच बढ़ते व्यापारिक तनाव को कम करना।
- चीन की वैश्विक नेतृत्व की स्थिति को पुनः मजबूत करना।
- घरेलू आर्थिक दबावों से राहत पाना।
- कोविड-19 की उत्पत्ति को लेकर संयुक्त जाँच पर सहमति बनाना।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(A) केवल a और b
(B) केवल b, c और d
(C) केवल a, b और c
(D) a, b, c और d
उत्तर: (C)
व्याख्या: व्यापारिक तनाव कम करना, वैश्विक नेतृत्व मजबूत करना और घरेलू दबावों से राहत पाना प्रमुख कारण हो सकते हैं। कोविड-19 की उत्पत्ति पर चीन संयुक्त जाँच के लिए तैयार नहीं था, बल्कि इस मुद्दे पर संबंध और बिगड़े थे।
- ‘डी-कपलिंग’ शब्द का प्रयोग अक्सर अमेरिका-चीन संबंधों के संदर्भ में किया जाता है। इसका अर्थ है:
(A) दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों को मजबूत करना।
(B) आर्थिक और तकनीकी रूप से एक-दूसरे से पूरी तरह अलग होने का प्रयास।
(C) केवल सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देना।
(D) सैन्य गठबंधनों को तोड़ना।
उत्तर: (B)
व्याख्या: ‘डी-कपलिंग’ का अर्थ है विशेष रूप से आर्थिक और तकनीकी क्षेत्रों में, चीन और पश्चिमी देशों के बीच निर्भरता को कम करना या समाप्त करना।
- अमेरिका और चीन के बीच मतभेद के प्रमुख बिन्दुओं में शामिल हैं:
- दक्षिण चीन सागर में चीन का सैन्यीकरण।
- ताइवान की संप्रभुता का मुद्दा।
- शिनजियांग में उइगरों के मानवाधिकारों की स्थिति।
- जलवायु परिवर्तन पर सहयोग।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(A) केवल a, b और c
(B) केवल b, c और d
(C) केवल a, c और d
(D) a, b, c और d
उत्तर: (A)
व्याख्या: दक्षिण चीन सागर, ताइवान और शिनजियांग मानवाधिकारों पर मतभेद हैं। जलवायु परिवर्तन आमतौर पर सहयोग का एक क्षेत्र है, मतभेद का नहीं।
- ‘बेल्ट एंड रोड पहल’ (BRI) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
- यह चीन की एक महत्वाकांक्षी बुनियादी ढांचा विकास और निवेश पहल है।
- इसे ‘वन बेल्ट, वन रोड’ के नाम से भी जाना जाता है।
- भारत ने इस पहल का समर्थन किया है क्योंकि यह क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को बढ़ावा देती है।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(A) केवल a और b
(B) केवल b और c
(C) केवल a
(D) a, b और c
उत्तर: (A)
व्याख्या: BRI चीन की एक महत्वाकांक्षी पहल है जिसे ‘वन बेल्ट, वन रोड’ भी कहा जाता है। हालांकि, भारत ने इसका विरोध किया है, खासकर चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के कारण, जो पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) से होकर गुजरता है।
- ‘क्वाड’ (QUAD) समूह के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
- यह भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया का एक रणनीतिक संवाद मंच है।
- इसका मुख्य उद्देश्य इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करना है।
- यह एक औपचारिक सैन्य गठबंधन है जिसे ‘एशिया का नाटो’ भी कहा जाता है।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(A) केवल a और b
(B) केवल b और c
(C) केवल a
(D) a, b और c
उत्तर: (A)
व्याख्या: क्वाड भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया का रणनीतिक मंच है, जिसका उद्देश्य इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करना है। हालांकि, यह एक अनौपचारिक रणनीतिक संवाद है, न कि औपचारिक सैन्य गठबंधन या ‘एशिया का नाटो’।
- संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा चीनी कंपनी हुआवेई पर प्रतिबंध लगाने के पीछे प्राथमिक चिंता क्या थी?
(A) बौद्धिक संपदा का उल्लंघन
(B) अनुचित व्यापारिक प्रथाएँ
(C) राष्ट्रीय सुरक्षा और जासूसी की चिंताएँ
(D) पर्यावरण मानकों का उल्लंघन
उत्तर: (C)
व्याख्या: हुआवेई पर प्रतिबंध लगाने का प्राथमिक कारण अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए संभावित खतरा और चीनी सरकार द्वारा जासूसी का आरोप था, खासकर 5G तकनीक के संदर्भ में।
- अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध के संदर्भ में ‘चरण-एक’ (Phase One) समझौते का प्राथमिक उद्देश्य क्या था?
(A) चीन को अपनी सैन्य क्षमताओं को कम करने के लिए सहमत करना।
(B) अमेरिकी कृषि उत्पादों की चीन की खरीद में वृद्धि करना और बौद्धिक संपदा सुरक्षा में सुधार करना।
(C) दक्षिण चीन सागर में चीन के सैन्यीकरण को रोकना।
(D) दोनों देशों के बीच सभी टैरिफ को तुरंत समाप्त करना।
उत्तर: (B)
व्याख्या: ‘चरण-एक’ व्यापार समझौता मुख्य रूप से अमेरिकी कृषि, ऊर्जा और विनिर्मित वस्तुओं की चीन की खरीद बढ़ाने और बौद्धिक संपदा संरक्षण को मजबूत करने पर केंद्रित था, जबकि कुछ टैरिफ को बरकरार रखा गया था।
- निम्नलिखित में से कौन-सा कथन ‘प्रबंधित प्रतिस्पर्धा’ (Managed Competition) की अवधारणा को सर्वोत्तम रूप से परिभाषित करता है, जैसा कि अमेरिका-चीन संबंधों के संदर्भ में देखा जाता है?
(A) दोनों देशों के बीच पूर्ण आर्थिक ‘डी-कपलिंग’ की प्रक्रिया।
(B) उन क्षेत्रों में खुले संघर्ष से बचना जहाँ प्रतिस्पर्धा अपरिहार्य है, और स्वस्थ प्रतिद्वंद्विता को बढ़ावा देना।
(C) एक देश द्वारा दूसरे पर पूर्ण प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयास।
(D) सभी प्रमुख वैश्विक मुद्दों पर दोनों देशों के बीच पूर्ण सहयोग।
उत्तर: (B)
व्याख्या: प्रबंधित प्रतिस्पर्धा का अर्थ है कि जहाँ प्रतिस्पर्धा अनिवार्य है, वहाँ भी सीधे टकराव से बचना और नियमों के तहत स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना। यह डी-कपलिंग या पूर्ण सहयोग से भिन्न है।
मुख्य परीक्षा (Mains)
- “अमेरिका और चीन के बीच गहरे संरचनात्मक मतभेद मौजूद होने के बावजूद, दोनों महाशक्तियों के लिए सहयोग अपरिहार्य है।” इस कथन का आलोचनात्मक विश्लेषण करें और वैश्विक स्थिरता के लिए उनके संबंधों के महत्व पर प्रकाश डालें।
- ट्रंप प्रशासन के तहत अमेरिका-चीन संबंधों में आए बदलावों का विस्तृत विश्लेषण करें। व्यापार युद्ध, प्रौद्योगिकी प्रतिस्पर्धा और भू-राजनीतिक वर्चस्व के संदर्भ में इन बदलावों के वैश्विक कूटनीति पर क्या प्रभाव पड़े हैं?
- शी जिनपिंग द्वारा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को चीन आने का न्योता देने के पीछे के संभावित कारणों और दोनों देशों के लिए इसके निहितार्थों की विस्तार से चर्चा करें। भारत जैसे क्षेत्रीय खिलाड़ियों पर इस संभावित मुलाकात का क्या प्रभाव पड़ सकता है?
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