उपराष्ट्रपति चुनाव: सत्ता पक्ष या विपक्ष? जानें संसद का ‘नंबर गेम’ और इसके मायने!
चर्चा में क्यों? (Why in News?):**
भारत के उपराष्ट्रपति का चुनाव एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक प्रक्रिया है, जो न केवल एक संवैधानिक पदधारी का चयन करती है, बल्कि देश की संसदीय राजनीति में शक्ति संतुलन को भी प्रभावित करती है। हाल के घटनाक्रमों में, यह बात सामने आई है कि उपराष्ट्रपति चुनाव को लेकर संसद के दोनों सदनों – लोकसभा और राज्यसभा – में राजनीतिक दलों के बीच ‘नंबर गेम’ तीव्र हो गया है। विभिन्न राजनीतिक दल अपने-अपने समीकरण साधने और अपने उम्मीदवार को विजयी बनाने के लिए रणनीति तैयार कर रहे हैं। यह सिर्फ एक पद का चुनाव नहीं, बल्कि संसद के भीतर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच शक्ति प्रदर्शन का एक महत्वपूर्ण अवसर भी है। ऐसे में, इस चुनाव की पेचीदगियों, इसके नंबर गेम और भारतीय राजनीति पर इसके संभावित प्रभावों को समझना अत्यंत आवश्यक हो जाता है।
भारत में उपराष्ट्रपति का पद: महत्व और भूमिका
भारत का उपराष्ट्रपति भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में दूसरा सबसे बड़ा पद है। यह पद कई मायनों में महत्वपूर्ण है, और इसका चुनाव देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग है।
- संविधानिक भूमिका: भारत के संविधान के अनुच्छेद 63 में कहा गया है कि भारत का एक उपराष्ट्रपति होगा। यह पद देश की संघीय प्रणाली और संसदीय लोकतंत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- राज्यसभा का पदेन सभापति: उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होता है। इस भूमिका में वह राज्यसभा की बैठकों की अध्यक्षता करता है, सदन में अनुशासन बनाए रखता है और विधायी प्रक्रियाओं का संचालन करता है। उसकी निष्पक्षता और कुशलता सदन के सुचारू संचालन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में कार्यभार: यदि राष्ट्रपति का पद मृत्यु, त्यागपत्र, महाभियोग या अन्य कारणों से रिक्त हो जाता है, तो उपराष्ट्रपति कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है। जब राष्ट्रपति अपनी बीमारी या किसी अन्य कारण से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने में असमर्थ होते हैं, तब भी उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के कार्यों का निर्वहन करता है।
- अंतर्राष्ट्रीय प्रतिनिधित्व: उपराष्ट्रपति कई बार अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व भी करते हैं, जिससे देश की विदेश नीति और संबंधों को मजबूती मिलती है।
संक्षेप में, उपराष्ट्रपति का पद केवल एक औपचारिक पद नहीं है, बल्कि यह देश के विधायी और कार्यकारी कार्यों में एक महत्वपूर्ण कड़ी का काम करता है, विशेष रूप से राज्यसभा में सरकार और विपक्ष के बीच संतुलन बनाए रखने में इसकी भूमिका अहम होती है।
उपराष्ट्रपति का चुनाव: प्रक्रिया और बारीकियां
राष्ट्रपति के चुनाव की तरह, उपराष्ट्रपति का चुनाव भी एक अप्रत्यक्ष प्रक्रिया के माध्यम से होता है। इसमें आम जनता सीधे मतदान नहीं करती, बल्कि उनके द्वारा चुने गए प्रतिनिधि मतदान करते हैं।
1. निर्वाचक मंडल (Electoral College):
उपराष्ट्रपति का चुनाव एक विशेष निर्वाचक मंडल द्वारा किया जाता है। इस निर्वाचक मंडल में:
- संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) के सभी सदस्य शामिल होते हैं।
- इसमें न केवल निर्वाचित सदस्य, बल्कि राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत सदस्य भी शामिल होते हैं। यह राष्ट्रपति के चुनाव से एक महत्वपूर्ण अंतर है, जहाँ केवल निर्वाचित सदस्य ही मतदान करते हैं और राज्य विधानसभाओं के सदस्य भी शामिल होते हैं।
“उपराष्ट्रपति के चुनाव में, सभी सांसद, चाहे वे निर्वाचित हों या मनोनीत, समान रूप से मतदान करने के हकदार होते हैं। यह प्रक्रिया संसद को सीधे तौर पर एक महत्वपूर्ण संवैधानिक पद के चयन में शामिल करती है।”
2. मतदान प्रक्रिया:
- आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली: उपराष्ट्रपति का चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अनुसार एकल संक्रमणीय मत (Single Transferable Vote) द्वारा होता है। यह सुनिश्चित करता है कि चुने गए उम्मीदवार को व्यापक समर्थन प्राप्त हो।
- गुप्त मतदान: मतदान गुप्त मतपत्र द्वारा होता है। इसका अर्थ है कि किसी भी सांसद को यह बताने की आवश्यकता नहीं होती कि उसने किस उम्मीदवार को वोट दिया है। हालांकि, राजनीतिक दल अक्सर अपने सदस्यों को व्हिप जारी करते हैं ताकि वे पार्टी लाइन के अनुसार वोट दें।
- वोट मूल्य: प्रत्येक सांसद के वोट का मूल्य समान होता है। राष्ट्रपति चुनाव के विपरीत, जहाँ राज्यों की जनसंख्या के आधार पर विधायकों के वोट का मूल्य भिन्न होता है, उपराष्ट्रपति चुनाव में प्रत्येक सांसद का वोट ‘1’ के रूप में गिना जाता है।
- जीत के लिए आवश्यक मत: जीतने वाले उम्मीदवार को ‘50% + 1’ के फॉर्मूले के आधार पर आवश्यक वोटों का कोटा प्राप्त करना होता है। यदि पहले दौर में किसी को यह कोटा नहीं मिलता, तो ‘एकल संक्रमणीय मत’ प्रणाली के तहत न्यूनतम मत प्राप्त करने वाले उम्मीदवार को बाहर कर दिया जाता है और उसके वरीयता वोटों को अन्य उम्मीदवारों में स्थानांतरित कर दिया जाता है, जब तक कि कोई उम्मीदवार आवश्यक कोटा प्राप्त न कर ले।
3. योग्यताएं:
उपराष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार को निम्नलिखित योग्यताओं को पूरा करना होता है:
- भारत का नागरिक हो।
- 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।
- राज्यसभा का सदस्य चुने जाने के लिए योग्य हो (जैसे कि राष्ट्रपति के लिए लोकसभा सदस्य बनने की योग्यता चाहिए)।
- किसी लाभ के पद पर न हो।
4. कार्यकाल और पदच्युति:
- उपराष्ट्रपति का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है।
- वह अपने कार्यकाल की समाप्ति से पहले राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकता है।
- उसे पद से हटाने के लिए राज्यसभा में एक प्रस्ताव (प्रभावी बहुमत द्वारा) पारित किया जाना चाहिए और लोकसभा द्वारा साधारण बहुमत से सहमत होना चाहिए। यह प्रस्ताव कम से कम 14 दिन की पूर्व सूचना के बाद ही प्रस्तुत किया जा सकता है।
नंबर गेम को समझना: लोकसभा बनाम राज्यसभा
उपराष्ट्रपति चुनाव में ‘नंबर गेम’ का सीधा मतलब है कि किस पार्टी या गठबंधन के पास संसद के दोनों सदनों में मिलाकर पर्याप्त संख्या बल है ताकि वह अपने उम्मीदवार को विजयी बना सके। यह संख्या बल सिर्फ सांसदों की संख्या का जोड़ नहीं, बल्कि राजनीतिक समीकरणों और संभावित क्रॉस-वोटिंग का एक जटिल मिश्रण होता है।
कुल सदस्य संख्या का विश्लेषण:
- लोकसभा: कुल सदस्य संख्या 543 (वर्तमान में)।
- राज्यसभा: कुल सदस्य संख्या 245 (वर्तमान में)।
- कुल निर्वाचक मंडल: लगभग 788 सदस्य (543 + 245)।
- जीत के लिए आवश्यक मत: लगभग 395 मत (788 का 50% + 1)।
पार्टी-वार स्थिति और समीकरण:
किसी भी उपराष्ट्रपति चुनाव में, सत्ताधारी दल का पलड़ा आमतौर पर भारी होता है, खासकर यदि लोकसभा में उसके पास स्पष्ट बहुमत हो। हालांकि, राज्यसभा में स्थिति अक्सर अधिक संतुलित या विपक्ष के पक्ष में हो सकती है, जिससे चुनाव दिलचस्प हो जाता है।
सत्ता पक्ष (जैसे NDA):
- लोकसभा में बहुमत: आमतौर पर, सत्ता पक्ष के पास लोकसभा में पर्याप्त संख्या होती है, जो उनके उम्मीदवारों के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करती है। लोकसभा में लगभग 543 सदस्य होने के कारण, यहाँ से आने वाले वोट किसी भी उम्मीदवार के लिए निर्णायक साबित होते हैं।
- राज्यसभा में स्थिति: राज्यसभा में सत्ता पक्ष की स्थिति अक्सर लोकसभा की तुलना में थोड़ी कमजोर हो सकती है, क्योंकि इसके सदस्य राज्य विधानसभाओं द्वारा चुने जाते हैं और राज्यों में अलग-अलग दलों की सरकारें होती हैं। हालांकि, मनोनीत सदस्य भी सत्ता पक्ष के पक्ष में होते हैं।
- गठबंधन के घटक दल: सत्ताधारी गठबंधन में शामिल छोटे दल भी अपने वोटों के साथ निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। इन्हें एक साथ बनाए रखना और उनके वोटों को सुरक्षित करना सत्ता पक्ष के लिए महत्वपूर्ण होता है।
विपक्ष (जैसे INDIA या अन्य दल):
- एकजुटता की चुनौती: विपक्ष के लिए सबसे बड़ी चुनौती एकजुटता बनाए रखना है। विभिन्न विपक्षी दलों के अपने-अपने क्षेत्रीय हित और विचारधाराएं होती हैं, जिससे एक साझा उम्मीदवार पर सहमत होना और सभी सदस्यों के वोटों को सुनिश्चित करना मुश्किल हो सकता है।
- राज्यसभा में संभावित मजबूती: कई बार राज्यसभा में विपक्ष की संख्या सत्ता पक्ष से अधिक होती है, जो उन्हें इस चुनाव में कुछ हद तक प्रतिस्पर्धा देने का अवसर प्रदान करती है।
- गैर-गठबंधन दल: कुछ क्षेत्रीय दल ऐसे होते हैं जो न तो सत्ता पक्ष के साथ होते हैं और न ही किसी बड़े विपक्षी गठबंधन का हिस्सा होते हैं। इनके वोट दोनों में से किसी भी पक्ष के लिए पासा पलट सकते हैं। इन दलों को अपने पक्ष में लाना विपक्ष के लिए महत्वपूर्ण रणनीति होती है।
अंकगणित का विश्लेषण:
मान लीजिए कि कुल 788 सांसद हैं, तो जीत के लिए लगभग 395 वोटों की आवश्यकता होगी।
- यदि सत्ता पक्ष के पास लोकसभा और राज्यसभा को मिलाकर 395 से अधिक सांसद हैं, तो उनका उम्मीदवार आसानी से जीत जाएगा।
- यदि संख्या 395 से कम है, तो उन्हें बाहरी समर्थन (अन्य छोटे दलों या निर्दलीयों से) की आवश्यकता होगी।
- विपक्ष तभी मजबूत स्थिति में आ सकता है जब उनके पास कुल वोटों का लगभग 390-400 का आंकड़ा हो, जो अक्सर मुश्किल होता है, खासकर जब लोकसभा में सत्ता पक्ष मजबूत हो।
“उपराष्ट्रपति चुनाव का नंबर गेम सिर्फ गणित नहीं है, बल्कि यह राजनीतिक संबंधों, गठबंधन की गतिशीलता और प्रत्येक सांसद के व्यक्तिगत निर्णयों का एक जटिल नृत्य है। यहां हर वोट मायने रखता है।”
क्रॉस-वोटिंग की संभावना:
यद्यपि राजनीतिक दल अपने सदस्यों को व्हिप जारी करते हैं, गुप्त मतदान की प्रकृति के कारण क्रॉस-वोटिंग की संभावना हमेशा बनी रहती है।
- कारण: व्यक्तिगत असंतोष, पार्टी नेतृत्व से नाराजगी, क्षेत्र विशेष के मुद्दे, या उम्मीदवार के प्रति व्यक्तिगत समर्थन।
- प्रभाव: कुछ वोटों की क्रॉस-वोटिंग चुनाव के परिणाम को सीधे तौर पर प्रभावित नहीं कर सकती है यदि अंतर बड़ा हो, लेकिन यदि चुनाव बहुत करीबी हो तो यह निर्णायक हो सकती है। यह पार्टियों के भीतर अनुशासन की कमी को भी उजागर करता है।
विगत चुनावों का विश्लेषण: केस स्टडी
भारत में उपराष्ट्रपति चुनावों का इतिहास अक्सर सत्ता पक्ष के उम्मीदवारों के पक्ष में रहा है, विशेषकर जब सत्ताधारी दल के पास लोकसभा में स्पष्ट बहुमत हो। हालांकि, कुछ चुनाव ऐसे भी रहे हैं जहाँ मुकाबला दिलचस्प हुआ है।
केस स्टडी 1: एम. वेंकैया नायडू का चुनाव (2017)
- सत्ता पक्ष की स्थिति: 2017 में, भाजपा के नेतृत्व वाला NDA गठबंधन लोकसभा में स्पष्ट बहुमत में था और राज्यसभा में भी उसकी स्थिति मजबूत हो रही थी।
- परिणाम: NDA के उम्मीदवार एम. वेंकैया नायडू को भारी बहुमत से जीत मिली (516 वोट), जबकि विपक्षी उम्मीदवार गोपालकृष्ण गांधी को 244 वोट मिले।
- मुख्य बिंदु: यह चुनाव दर्शाता है कि जब सत्ता पक्ष के पास संसद के दोनों सदनों में पर्याप्त संख्या बल होता है, तो उपराष्ट्रपति चुनाव में उसे हराना विपक्ष के लिए बेहद मुश्किल हो जाता है।
केस स्टडी 2: हामिद अंसारी का चुनाव (2007 और 2012)
- सत्ता पक्ष की स्थिति: 2007 और 2012 में, कांग्रेस के नेतृत्व वाला UPA गठबंधन सत्ता में था। हालांकि, UPA के पास लोकसभा में गठबंधन सहयोगियों के साथ बहुमत था, लेकिन राज्यसभा में कई बार उसे समर्थन के लिए अन्य दलों पर निर्भर रहना पड़ता था।
- परिणाम: हामिद अंसारी दोनों बार UPA के उम्मीदवार के रूप में विजयी हुए।
- मुख्य बिंदु: यह दर्शाता है कि गठबंधन सरकारों के समय भी, यदि वे अपने सहयोगियों को एकजुट रख पाते हैं और कुछ गैर-गठबंधन दलों का समर्थन भी जुटा लेते हैं, तो वे जीत सकते हैं। हालांकि, उनकी जीत का अंतर वेंकैया नायडू की तुलना में थोड़ा कम था, जो अधिक प्रतिस्पर्धी माहौल को दर्शाता है।
इन केस स्टडी से यह स्पष्ट होता है कि लोकसभा में बहुमत होना उपराष्ट्रपति चुनाव में जीत की एक महत्वपूर्ण कुंजी है, क्योंकि लोकसभा में राज्यसभा की तुलना में सदस्यों की संख्या लगभग दोगुनी है। हालांकि, राज्यसभा में दलों की संख्या और क्षेत्रीय दलों का रुख भी अंतिम परिणाम को प्रभावित कर सकता है।
उपराष्ट्रपति चुनाव का राजनीतिक प्रभाव
उपराष्ट्रपति चुनाव का परिणाम केवल एक व्यक्ति के पद ग्रहण करने तक सीमित नहीं होता, बल्कि इसके दूरगामी राजनीतिक प्रभाव भी होते हैं।
सरकार के लिए (सत्ता पक्ष):
- राज्यसभा पर नियंत्रण: यदि सत्ता पक्ष का उम्मीदवार जीतता है, तो इससे राज्यसभा में सरकार का नियंत्रण मजबूत होता है। राज्यसभा अक्सर लोकसभा द्वारा पारित विधेयकों को पारित करने में बाधा बन सकती है यदि उसमें सत्ता पक्ष का बहुमत न हो। एक अनुकूल सभापति विधायी प्रक्रियाओं को सुचारू बनाने और सरकार के एजेंडे को आगे बढ़ाने में मदद कर सकता है।
- विधायी प्रक्रिया में सुगमता: राज्यसभा में सरकार के लिए विधेयक पारित कराना आसान हो जाता है, खासकर जब सदन में सत्ता पक्ष के पास बहुमत न हो। सभापति के रूप में उपराष्ट्रपति की भूमिका विधेयकों को पारित करने, चर्चाओं को निर्देशित करने और सदन में व्यवधानों को प्रबंधित करने में महत्वपूर्ण होती है।
- नैतिक और प्रतीकात्मक जीत: यह सत्ताधारी दल के लिए एक महत्वपूर्ण प्रतीकात्मक जीत होती है, जो उनकी राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता और संसद के भीतर उनके संख्या बल को दर्शाती है। यह आगामी चुनावों के लिए एक मनोवैज्ञानिक बढ़त भी प्रदान कर सकती है।
विपक्ष के लिए:
- एकजुटता का प्रदर्शन: यदि विपक्ष एक साझा उम्मीदवार पर सहमत हो पाता है और उसे पर्याप्त वोट दिलाने में सफल रहता है, तो यह उनकी एकजुटता और राजनीतिक परिपक्वता का एक महत्वपूर्ण प्रदर्शन हो सकता है। यह भविष्य के चुनावों या बड़े राजनीतिक अभियानों के लिए एक आधार तैयार कर सकता है।
- सरकार की कमजोरियों को उजागर करना: यदि विपक्ष सत्ता पक्ष के उम्मीदवार को कड़ी टक्कर देता है या कुछ क्रॉस-वोटिंग कराने में सफल रहता है, तो यह सत्ता पक्ष के भीतर दरारों और संभावित कमजोरियों को उजागर कर सकता है।
- राज्यसभा में चुनौती: भले ही विपक्ष का उम्मीदवार न जीत पाए, राज्यसभा में एक मजबूत और मुखर विपक्ष सरकार के लिए विधायी राह को कठिन बना सकता है, जिससे उसे अधिक संवाद और समझौते करने पड़ सकते हैं।
राज्यसभा में भूमिका पर प्रभाव:
उपराष्ट्रपति का चुनाव राज्यसभा के कामकाज पर सीधा प्रभाव डालता है।
- एक ऐसा सभापति जो राजनीतिक रूप से सत्ता पक्ष से जुड़ा हो, उस पर निष्पक्षता बनाए रखने का दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, संविधान उन्हें निष्पक्ष रहने का निर्देश देता है, लेकिन राजनीतिक पृष्ठभूमि हमेशा एक चुनौती पेश करती है।
- विपक्ष अक्सर सभापति पर सरकार के पक्ष में काम करने का आरोप लगा सकता है, जिससे सदन में गतिरोध बढ़ सकता है।
- एक निष्पक्ष और अनुभवी सभापति सदन की कार्यवाही को सुचारू रूप से चलाने, विभिन्न दलों के बीच समन्वय स्थापित करने और सार्थक बहस को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
चुनौतियाँ और भविष्य की राह
उपराष्ट्रपति का चुनाव और उसके बाद उनके पद का निर्वहन कई चुनौतियों से भरा होता है, विशेष रूप से एक ऐसे देश में जहाँ संसदीय गतिरोध आम बात हो गई है।
- निष्पक्षता की धारणा बनाए रखना: उपराष्ट्रपति, जो राज्यसभा के सभापति भी होते हैं, से अपेक्षा की जाती है कि वे राजनीतिक रूप से निष्पक्ष रहें। हालांकि, चूंकि उनका चुनाव राजनीतिक दलों द्वारा होता है, इसलिए उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठना आम बात है। उन्हें इस धारणा को दूर करने और सदन में सभी सदस्यों के प्रति समान व्यवहार सुनिश्चित करने की चुनौती का सामना करना पड़ता है।
- संसदीय गतिरोध का प्रबंधन: भारतीय संसद में अक्सर शोरगुल और व्यवधान देखने को मिलते हैं। सभापति के लिए यह एक बड़ी चुनौती होती है कि वे ऐसे माहौल में सदन की गरिमा को बनाए रखें, सार्थक बहस को बढ़ावा दें और विधायी कार्यों को पूरा कराएं। उन्हें विपक्ष को पर्याप्त अवसर प्रदान करना होता है, साथ ही सदन की कार्यवाही को बाधित होने से रोकना भी होता है।
- दलीय राजनीति से ऊपर उठना: एक बार निर्वाचित होने के बाद, उपराष्ट्रपति से उम्मीद की जाती है कि वे दलीय राजनीति से ऊपर उठकर कार्य करें। यह एक महत्वपूर्ण चुनौती है, खासकर जब वे एक मजबूत राजनीतिक पृष्ठभूमि से आते हों।
- पद का संवैधानिक सम्मान बनाए रखना: उपराष्ट्रपति का पद भारत के संविधान में निहित एक महत्वपूर्ण पद है। यह सुनिश्चित करना कि यह पद राजनीतिक खींचतान से दूर रहे और इसका संवैधानिक सम्मान बरकरार रहे, यह एक सतत चुनौती है।
भविष्य की राह:
- संवाद और सहयोग: उपराष्ट्रपति को सभी राजनीतिक दलों के साथ संवाद और सहयोग की भावना को बढ़ावा देना चाहिए ताकि सदन के कामकाज को सुचारू बनाया जा सके।
- नियमों का सख्त पालन: सदन के नियमों और प्रक्रियाओं का सख्ती से पालन सुनिश्चित करना, चाहे वह सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, सभापति की निष्पक्षता को दर्शाता है।
- संसदीय मर्यादाओं को स्थापित करना: नए और युवा सांसदों को संसदीय मर्यादाओं और नियमों के बारे में शिक्षित करना भी सभापति की भूमिका का हिस्सा होना चाहिए।
निष्कर्ष
उपराष्ट्रपति चुनाव भारतीय लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण कवायद है, जो न केवल एक संवैधानिक पदधारी का चयन करती है बल्कि संसद के भीतर राजनीतिक शक्ति संतुलन का भी एक महत्वपूर्ण बैरोमीटर है। यह ‘नंबर गेम’ सिर्फ सांसदों की संख्या का जोड़ नहीं है, बल्कि यह राजनीतिक गठबंधनों, पार्टी अनुशासन, क्षेत्रीय दलों के महत्व और क्रॉस-वोटिंग की संभावनाओं का एक जटिल मिश्रण है।
सत्ता पक्ष के लिए यह एक अवसर होता है कि वह अपनी विधायी राह को सुगम बनाए और अपनी राष्ट्रीय स्वीकार्यता को मजबूत करे। वहीं, विपक्ष के लिए यह अपनी एकजुटता प्रदर्शित करने और सरकार की कमजोरियों को उजागर करने का एक मंच होता है। अंततः, इस पद पर चुने जाने वाले व्यक्ति की भूमिका राज्यसभा के कुशल संचालन और संसदीय लोकतंत्र की गरिमा को बनाए रखने में महत्वपूर्ण होती है।
यह चुनाव हमें याद दिलाता है कि भारत का लोकतंत्र कितना गतिशील और बहुआयामी है, जहाँ प्रत्येक संवैधानिक पद का अपना महत्व है और प्रत्येक चुनावी प्रक्रिया देश के राजनीतिक भविष्य को आकार देती है। यह केवल एक ‘चुनाव’ नहीं, बल्कि हमारी संसदीय प्रणाली की जटिलताओं और शक्तियों का एक जीवंत प्रदर्शन है।
UPSC परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न (Practice Questions for UPSC Exam)
प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) – 10 MCQs
(यहाँ 10 MCQs, उनके उत्तर और व्याख्या प्रदान करें)
1. भारत के उपराष्ट्रपति के चुनाव के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- उपराष्ट्रपति का चुनाव एक निर्वाचक मंडल द्वारा किया जाता है जिसमें संसद के दोनों सदनों के केवल निर्वाचित सदस्य शामिल होते हैं।
- उपराष्ट्रपति का चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा होता है।
- उपराष्ट्रपति के पद के लिए योग्यता यह है कि व्यक्ति को लोकसभा का सदस्य चुने जाने के लिए योग्य होना चाहिए।
उपरोक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
A) केवल I और II
B) केवल II
C) केवल II और III
D) केवल I
उत्तर: B) केवल II
व्याख्या:
कथन I गलत है। उपराष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल में संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) के सभी सदस्य (निर्वाचित और मनोनीत दोनों) शामिल होते हैं।
कथन II सही है। उपराष्ट्रपति का चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा होता है।
कथन III गलत है। उपराष्ट्रपति के पद के लिए योग्यता यह है कि व्यक्ति को राज्यसभा का सदस्य चुने जाने के लिए योग्य होना चाहिए, न कि लोकसभा का।
2. भारत के उपराष्ट्रपति को पद से हटाने के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?
A) उन्हें लोकसभा में एक प्रस्ताव पारित करके हटाया जा सकता है, जिसे राज्यसभा द्वारा अनुमोदित किया जाए।
B) उन्हें राज्यसभा में एक प्रस्ताव पारित करके हटाया जा सकता है, जिसे लोकसभा द्वारा अनुमोदित किया जाए।
C) उन्हें राष्ट्रपति द्वारा मंत्रिपरिषद की सलाह पर हटाया जा सकता है।
D) उन्हें केवल महाभियोग की प्रक्रिया द्वारा हटाया जा सकता है, जैसा कि राष्ट्रपति के मामले में होता है।
उत्तर: B) उन्हें राज्यसभा में एक प्रस्ताव पारित करके हटाया जा सकता है, जिसे लोकसभा द्वारा अनुमोदित किया जाए।
व्याख्या: उपराष्ट्रपति को पद से हटाने का प्रस्ताव केवल राज्यसभा में ही पेश किया जा सकता है (प्रभावी बहुमत द्वारा), और इसे लोकसभा द्वारा साधारण बहुमत से सहमत होना चाहिए। राष्ट्रपति की तरह महाभियोग की जटिल प्रक्रिया की आवश्यकता नहीं होती है।
3. भारत के उपराष्ट्रपति के चुनाव और राष्ट्रपति के चुनाव के बीच मुख्य अंतर क्या है?
A) राष्ट्रपति का चुनाव अप्रत्यक्ष होता है जबकि उपराष्ट्रपति का चुनाव प्रत्यक्ष।
B) राष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल में राज्य विधानसभाओं के सदस्य शामिल होते हैं, जबकि उपराष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल में नहीं।
C) उपराष्ट्रपति के चुनाव में वोट का मूल्य जनसंख्या पर आधारित होता है, जबकि राष्ट्रपति के चुनाव में नहीं।
D) राष्ट्रपति को केवल निर्वाचित सदस्य वोट देते हैं, जबकि उपराष्ट्रपति को मनोनीत सदस्य भी वोट दे सकते हैं।
उत्तर: B) राष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल में राज्य विधानसभाओं के सदस्य शामिल होते हैं, जबकि उपराष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल में नहीं।
व्याख्या: कथन A गलत है क्योंकि दोनों अप्रत्यक्ष होते हैं। कथन C गलत है क्योंकि उपराष्ट्रपति चुनाव में सभी सांसदों के वोट का मूल्य समान होता है। कथन D आंशिक रूप से सही है लेकिन सबसे महत्वपूर्ण अंतर B में निहित है। राष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल में संसद के निर्वाचित सदस्य और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य शामिल होते हैं, जबकि उपराष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल में केवल संसद के सभी सदस्य (निर्वाचित और मनोनीत दोनों) शामिल होते हैं और राज्य विधानसभाओं के सदस्य शामिल नहीं होते हैं।
4. भारत के उपराष्ट्रपति के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- वह राज्यसभा के पदेन सभापति होते हैं।
- वह राष्ट्रपति के पद के रिक्त होने पर कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में अधिकतम छह महीने तक कार्य कर सकते हैं।
- वह भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक की नियुक्ति करते हैं।
उपरोक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
A) केवल I
B) केवल I और II
C) केवल II और III
D) I, II और III
उत्तर: A) केवल I
व्याख्या:
कथन I सही है। उपराष्ट्रपति राज्यसभा के पदेन सभापति होते हैं।
कथन II गलत है। जब राष्ट्रपति का पद रिक्त होता है, तो उपराष्ट्रपति कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में तब तक कार्य करता है जब तक नया राष्ट्रपति पदभार ग्रहण नहीं कर लेता, जिसके लिए कोई अधिकतम समय सीमा नहीं है (हालांकि राष्ट्रपति का चुनाव 6 महीने के भीतर होना चाहिए)। वह केवल अस्थायी अनुपस्थिति में अधिकतम छह महीने तक कार्य कर सकते हैं।
कथन III गलत है। भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
5. उपराष्ट्रपति चुनाव में ‘सिंगल ट्रांसफरेबल वोट’ (एकल संक्रमणीय मत) प्रणाली का क्या अर्थ है?
A) प्रत्येक मतदाता केवल एक उम्मीदवार को वोट दे सकता है।
B) मतदाता अपनी पसंद के उम्मीदवारों को वरीयता के क्रम में चिह्नित करता है।
C) जीतने वाले उम्मीदवार को सबसे अधिक वोटों की आवश्यकता होती है, भले ही वह 50% से कम हो।
D) यह प्रणाली केवल उन्हीं चुनावों में उपयोग की जाती है जहाँ केवल दो उम्मीदवार होते हैं।
उत्तर: B) मतदाता अपनी पसंद के उम्मीदवारों को वरीयता के क्रम में चिह्नित करता है।
व्याख्या: एकल संक्रमणीय मत प्रणाली में, मतदाता उम्मीदवारों को अपनी वरीयता (पहली पसंद, दूसरी पसंद, आदि) के क्रम में वोट देते हैं। यदि पहले दौर में कोई उम्मीदवार आवश्यक कोटा प्राप्त नहीं कर पाता, तो सबसे कम मत वाले उम्मीदवार के वोट अन्य उम्मीदवारों में स्थानांतरित कर दिए जाते हैं।
6. भारत के उपराष्ट्रपति का कार्यकाल कितने वर्ष का होता है?
A) 4 वर्ष
B) 5 वर्ष
C) 6 वर्ष
D) 3 वर्ष
उत्तर: B) 5 वर्ष
व्याख्या: भारत के उपराष्ट्रपति का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है।
7. भारत का उपराष्ट्रपति बनने के लिए उम्मीदवार की न्यूनतम आयु कितनी होनी चाहिए?
A) 25 वर्ष
B) 30 वर्ष
C) 35 वर्ष
D) 40 वर्ष
उत्तर: C) 35 वर्ष
व्याख्या: भारत का उपराष्ट्रपति बनने के लिए उम्मीदवार की न्यूनतम आयु 35 वर्ष होनी चाहिए।
8. जब भारत का उपराष्ट्रपति कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है, तो उसे कौन सी शक्तियाँ और उन्मुक्तियाँ प्राप्त होती हैं?
A) वह राज्यसभा के सभापति के रूप में भी कार्य करना जारी रखता है।
B) उसे राष्ट्रपति के सभी अधिकार, शक्तियाँ और उन्मुक्तियाँ प्राप्त होती हैं।
C) वह केवल आंतरिक प्रशासन से संबंधित मामलों का प्रबंधन कर सकता है।
D) वह केवल नाममात्र का प्रमुख होता है और वास्तविक शक्तियाँ प्रधानमंत्री के पास होती हैं।
उत्तर: B) उसे राष्ट्रपति के सभी अधिकार, शक्तियाँ और उन्मुक्तियाँ प्राप्त होती हैं।
व्याख्या: जब उपराष्ट्रपति कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है, तो उसे राष्ट्रपति के सभी अधिकार, शक्तियाँ, उन्मुक्तियाँ और परिलब्धियां प्राप्त होती हैं, और वह राज्यसभा के सभापति के रूप में कार्य नहीं करता है।
9. उपराष्ट्रपति के चुनाव में निम्नलिखित में से कौन मतदान नहीं कर सकता है?
A) लोकसभा के निर्वाचित सदस्य
B) राज्यसभा के मनोनीत सदस्य
C) राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य
D) लोकसभा के मनोनीत सदस्य
उत्तर: C) राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य
व्याख्या: उपराष्ट्रपति के चुनाव में संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) के सभी सदस्य (निर्वाचित और मनोनीत) मतदान करते हैं। राज्य विधानसभाओं के सदस्य उपराष्ट्रपति के चुनाव में मतदान नहीं करते हैं।
10. भारत के उपराष्ट्रपति को शपथ कौन दिलाता है?
A) भारत के मुख्य न्यायाधीश
B) भारत के राष्ट्रपति
C) लोकसभा अध्यक्ष
D) राज्यसभा के उपसभापति
उत्तर: B) भारत के राष्ट्रपति
व्याख्या: भारत के उपराष्ट्रपति को शपथ भारत के राष्ट्रपति द्वारा दिलाई जाती है।
मुख्य परीक्षा (Mains)
(यहाँ 3-4 मेन्स के प्रश्न प्रदान करें)
1. “भारत के उपराष्ट्रपति का चुनाव केवल एक संवैधानिक औपचारिकता नहीं, बल्कि संसदीय लोकतंत्र में शक्ति संतुलन का एक महत्वपूर्ण सूचक है।” इस कथन के आलोक में, उपराष्ट्रपति चुनाव के ‘नंबर गेम’ और इसके राजनीतिक प्रभावों का विश्लेषण कीजिए।
2. राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों के बीच अंतरों पर प्रकाश डालते हुए, उपराष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल की संरचना की विशिष्टता पर चर्चा कीजिए। एक उपराष्ट्रपति के रूप में राज्यसभा के सभापति की भूमिका किस प्रकार सदन के विधायी कामकाज को प्रभावित कर सकती है?
3. भारतीय संसदीय प्रणाली में उपराष्ट्रपति का पद कितना महत्वपूर्ण है? पदच्युति की प्रक्रिया सहित उनके कार्य, शक्तियों और भूमिका का विस्तार से वर्णन करें। साथ ही, इस पद से जुड़ी संभावित चुनौतियों और निष्पक्षता बनाए रखने की आवश्यकता पर भी चर्चा कीजिए।
4. “उपराष्ट्रपति चुनाव का परिणाम सत्ताधारी दल के लिए राज्यसभा में विधायी प्रक्रिया को सुगम बनाने में सहायक हो सकता है।” इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण करें। आप इस चुनाव में क्षेत्रीय दलों की भूमिका और क्रॉस-वोटिंग की संभावनाओं को कैसे देखते हैं?
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[–SEO_TITLE–]उपराष्ट्रपति चुनाव: सत्ता पक्ष या विपक्ष? जानें संसद का ‘नंबर गेम’ और इसके मायने!
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उपराष्ट्रपति चुनाव: सत्ता पक्ष या विपक्ष? जानें संसद का ‘नंबर गेम’ और इसके मायने!
चर्चा में क्यों? (Why in News?):
भारत के उपराष्ट्रपति का चुनाव एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक प्रक्रिया है, जो न केवल एक संवैधानिक पदधारी का चयन करती है, बल्कि देश की संसदीय राजनीति में शक्ति संतुलन को भी प्रभावित करती है। हाल के घटनाक्रमों में, यह बात सामने आई है कि उपराष्ट्रपति चुनाव को लेकर संसद के दोनों सदनों – लोकसभा और राज्यसभा – में राजनीतिक दलों के बीच ‘नंबर गेम’ तीव्र हो गया है। विभिन्न राजनीतिक दल अपने-अपने समीकरण साधने और अपने उम्मीदवार को विजयी बनाने के लिए रणनीति तैयार कर रहे हैं। यह सिर्फ एक पद का चुनाव नहीं, बल्कि संसद के भीतर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच शक्ति प्रदर्शन का एक महत्वपूर्ण अवसर भी है। ऐसे में, इस चुनाव की पेचीदगियों, इसके नंबर गेम और भारतीय राजनीति पर इसके संभावित प्रभावों को समझना अत्यंत आवश्यक हो जाता है।
भारत में उपराष्ट्रपति का पद: महत्व और भूमिका
भारत का उपराष्ट्रपति भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में दूसरा सबसे बड़ा पद है। यह पद कई मायनों में महत्वपूर्ण है, और इसका चुनाव देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग है।
- संविधानिक भूमिका: भारत के संविधान के अनुच्छेद 63 में कहा गया है कि भारत का एक उपराष्ट्रपति होगा। यह पद देश की संघीय प्रणाली और संसदीय लोकतंत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- राज्यसभा का पदेन सभापति: उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होता है। इस भूमिका में वह राज्यसभा की बैठकों की अध्यक्षता करता है, सदन में अनुशासन बनाए रखता है और विधायी प्रक्रियाओं का संचालन करता है। उसकी निष्पक्षता और कुशलता सदन के सुचारू संचालन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में कार्यभार: यदि राष्ट्रपति का पद मृत्यु, त्यागपत्र, महाभियोग या अन्य कारणों से रिक्त हो जाता है, तो उपराष्ट्रपति कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है। जब राष्ट्रपति अपनी बीमारी या किसी अन्य कारण से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने में असमर्थ होते हैं, तब भी उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के कार्यों का निर्वहन करता है।
- अंतर्राष्ट्रीय प्रतिनिधित्व: उपराष्ट्रपति कई बार अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व भी करते हैं, जिससे देश की विदेश नीति और संबंधों को मजबूती मिलती है।
संक्षेप में, उपराष्ट्रपति का पद केवल एक औपचारिक पद नहीं है, बल्कि यह देश के विधायी और कार्यकारी कार्यों में एक महत्वपूर्ण कड़ी का काम करता है, विशेष रूप से राज्यसभा में सरकार और विपक्ष के बीच संतुलन बनाए रखने में इसकी भूमिका अहम होती है।
उपराष्ट्रपति का चुनाव: प्रक्रिया और बारीकियां
राष्ट्रपति के चुनाव की तरह, उपराष्ट्रपति का चुनाव भी एक अप्रत्यक्ष प्रक्रिया के माध्यम से होता है। इसमें आम जनता सीधे मतदान नहीं करती, बल्कि उनके द्वारा चुने गए प्रतिनिधि मतदान करते हैं।
1. निर्वाचक मंडल (Electoral College):
उपराष्ट्रपति का चुनाव एक विशेष निर्वाचक मंडल द्वारा किया जाता है। इस निर्वाचक मंडल में:
- संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) के सभी सदस्य शामिल होते हैं।
- इसमें न केवल निर्वाचित सदस्य, बल्कि राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत सदस्य भी शामिल होते हैं। यह राष्ट्रपति के चुनाव से एक महत्वपूर्ण अंतर है, जहाँ केवल निर्वाचित सदस्य ही मतदान करते हैं और राज्य विधानसभाओं के सदस्य भी शामिल होते हैं।
“उपराष्ट्रपति के चुनाव में, सभी सांसद, चाहे वे निर्वाचित हों या मनोनीत, समान रूप से मतदान करने के हकदार होते हैं। यह प्रक्रिया संसद को सीधे तौर पर एक महत्वपूर्ण संवैधानिक पद के चयन में शामिल करती है।”
2. मतदान प्रक्रिया:
- आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली: उपराष्ट्रपति का चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अनुसार एकल संक्रमणीय मत (Single Transferable Vote) द्वारा होता है। यह सुनिश्चित करता है कि चुने गए उम्मीदवार को व्यापक समर्थन प्राप्त हो।
- गुप्त मतदान: मतदान गुप्त मतपत्र द्वारा होता है। इसका अर्थ है कि किसी भी सांसद को यह बताने की आवश्यकता नहीं होती कि उसने किस उम्मीदवार को वोट दिया है। हालांकि, राजनीतिक दल अक्सर अपने सदस्यों को व्हिप जारी करते हैं ताकि वे पार्टी लाइन के अनुसार वोट दें।
- वोट मूल्य: प्रत्येक सांसद के वोट का मूल्य समान होता है। राष्ट्रपति चुनाव के विपरीत, जहाँ राज्यों की जनसंख्या के आधार पर विधायकों के वोट का मूल्य भिन्न होता है, उपराष्ट्रपति चुनाव में प्रत्येक सांसद का वोट ‘1’ के रूप में गिना जाता है।
- जीत के लिए आवश्यक मत: जीतने वाले उम्मीदवार को ‘50% + 1’ के फॉर्मूले के आधार पर आवश्यक वोटों का कोटा प्राप्त करना होता है। यदि पहले दौर में किसी को यह कोटा नहीं मिलता, तो ‘एकल संक्रमणीय मत’ प्रणाली के तहत न्यूनतम मत प्राप्त करने वाले उम्मीदवार को बाहर कर दिया जाता है और उसके वरीयता वोटों को अन्य उम्मीदवारों में स्थानांतरित कर दिया जाता है, जब तक कि कोई उम्मीदवार आवश्यक कोटा प्राप्त न कर ले।
3. योग्यताएं:
उपराष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार को निम्नलिखित योग्यताओं को पूरा करना होता है:
- भारत का नागरिक हो।
- 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।
- राज्यसभा का सदस्य चुने जाने के लिए योग्य हो (जैसे कि राष्ट्रपति के लिए लोकसभा सदस्य बनने की योग्यता चाहिए)।
- किसी लाभ के पद पर न हो।
4. कार्यकाल और पदच्युति:
- उपराष्ट्रपति का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है।
- वह अपने कार्यकाल की समाप्ति से पहले राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकता है।
- उसे पद से हटाने के लिए राज्यसभा में एक प्रस्ताव (प्रभावी बहुमत द्वारा) पारित किया जाना चाहिए और लोकसभा द्वारा साधारण बहुमत से सहमत होना चाहिए। यह प्रस्ताव कम से कम 14 दिन की पूर्व सूचना के बाद ही प्रस्तुत किया जा सकता है।
नंबर गेम को समझना: लोकसभा बनाम राज्यसभा
उपराष्ट्रपति चुनाव में ‘नंबर गेम’ का सीधा मतलब है कि किस पार्टी या गठबंधन के पास संसद के दोनों सदनों में मिलाकर पर्याप्त संख्या बल है ताकि वह अपने उम्मीदवार को विजयी बना सके। यह संख्या बल सिर्फ सांसदों की संख्या का जोड़ नहीं, बल्कि राजनीतिक समीकरणों और संभावित क्रॉस-वोटिंग का एक जटिल मिश्रण होता है।
कुल सदस्य संख्या का विश्लेषण:
- लोकसभा: कुल सदस्य संख्या 543 (वर्तमान में)।
- राज्यसभा: कुल सदस्य संख्या 245 (वर्तमान में)।
- कुल निर्वाचक मंडल: लगभग 788 सदस्य (543 + 245)।
- जीत के लिए आवश्यक मत: लगभग 395 मत (788 का 50% + 1)।
पार्टी-वार स्थिति और समीकरण:
किसी भी उपराष्ट्रपति चुनाव में, सत्ताधारी दल का पलड़ा आमतौर पर भारी होता है, खासकर यदि लोकसभा में उसके पास स्पष्ट बहुमत हो। हालांकि, राज्यसभा में स्थिति अक्सर अधिक संतुलित या विपक्ष के पक्ष में हो सकती है, जिससे चुनाव दिलचस्प हो जाता है।
सत्ता पक्ष (जैसे NDA):
- लोकसभा में बहुमत: आमतौर पर, सत्ता पक्ष के पास लोकसभा में पर्याप्त संख्या होती है, जो उनके उम्मीदवारों के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करती है। लोकसभा में लगभग 543 सदस्य होने के कारण, यहाँ से आने वाले वोट किसी भी उम्मीदवार के लिए निर्णायक साबित होते हैं।
- राज्यसभा में स्थिति: राज्यसभा में सत्ता पक्ष की स्थिति अक्सर लोकसभा की तुलना में थोड़ी कमजोर हो सकती है, क्योंकि इसके सदस्य राज्य विधानसभाओं द्वारा चुने जाते हैं और राज्यों में अलग-अलग दलों की सरकारें होती हैं। हालांकि, मनोनीत सदस्य भी सत्ता पक्ष के पक्ष में होते हैं।
- गठबंधन के घटक दल: सत्ताधारी गठबंधन में शामिल छोटे दल भी अपने वोटों के साथ निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। इन्हें एक साथ बनाए रखना और उनके वोटों को सुरक्षित करना सत्ता पक्ष के लिए महत्वपूर्ण होता है।
विपक्ष (जैसे INDIA या अन्य दल):
- एकजुटता की चुनौती: विपक्ष के लिए सबसे बड़ी चुनौती एकजुटता बनाए रखना है। विभिन्न विपक्षी दलों के अपने-अपने क्षेत्रीय हित और विचारधाराएं होती हैं, जिससे एक साझा उम्मीदवार पर सहमत होना और सभी सदस्यों के वोटों को सुनिश्चित करना मुश्किल हो सकता है।
- राज्यसभा में संभावित मजबूती: कई बार राज्यसभा में विपक्ष की संख्या सत्ता पक्ष से अधिक होती है, जो उन्हें इस चुनाव में कुछ हद तक प्रतिस्पर्धा देने का अवसर प्रदान करती है।
- गैर-गठबंधन दल: कुछ क्षेत्रीय दल ऐसे होते हैं जो न तो सत्ता पक्ष के साथ होते हैं और न ही किसी बड़े विपक्षी गठबंधन का हिस्सा होते हैं। इनके वोट दोनों में से किसी भी पक्ष के लिए पासा पलट सकते हैं। इन दलों को अपने पक्ष में लाना विपक्ष के लिए महत्वपूर्ण रणनीति होती है।
अंकगणित का विश्लेषण:
मान लीजिए कि कुल 788 सांसद हैं, तो जीत के लिए लगभग 395 वोटों की आवश्यकता होगी।
- यदि सत्ता पक्ष के पास लोकसभा और राज्यसभा को मिलाकर 395 से अधिक सांसद हैं, तो उनका उम्मीदवार आसानी से जीत जाएगा।
- यदि संख्या 395 से कम है, तो उन्हें बाहरी समर्थन (अन्य छोटे दलों या निर्दलीयों से) की आवश्यकता होगी।
- विपक्ष तभी मजबूत स्थिति में आ सकता है जब उनके पास कुल वोटों का लगभग 390-400 का आंकड़ा हो, जो अक्सर मुश्किल होता है, खासकर जब लोकसभा में सत्ता पक्ष मजबूत हो।
“उपराष्ट्रपति चुनाव का नंबर गेम सिर्फ गणित नहीं है, बल्कि यह राजनीतिक संबंधों, गठबंधन की गतिशीलता और प्रत्येक सांसद के व्यक्तिगत निर्णयों का एक जटिल नृत्य है। यहां हर वोट मायने रखता है।”
क्रॉस-वोटिंग की संभावना:
यद्यपि राजनीतिक दल अपने सदस्यों को व्हिप जारी करते हैं, गुप्त मतदान की प्रकृति के कारण क्रॉस-वोटिंग की संभावना हमेशा बनी रहती है।
- कारण: व्यक्तिगत असंतोष, पार्टी नेतृत्व से नाराजगी, क्षेत्र विशेष के मुद्दे, या उम्मीदवार के प्रति व्यक्तिगत समर्थन।
- प्रभाव: कुछ वोटों की क्रॉस-वोटिंग चुनाव के परिणाम को सीधे तौर पर प्रभावित नहीं कर सकती है यदि अंतर बड़ा हो, लेकिन यदि चुनाव बहुत करीबी हो तो यह निर्णायक हो सकती है। यह पार्टियों के भीतर अनुशासन की कमी को भी उजागर करता है।
विगत चुनावों का विश्लेषण: केस स्टडी
भारत में उपराष्ट्रपति चुनावों का इतिहास अक्सर सत्ता पक्ष के उम्मीदवारों के पक्ष में रहा है, विशेषकर जब सत्ताधारी दल के पास लोकसभा में स्पष्ट बहुमत हो। हालांकि, कुछ चुनाव ऐसे भी रहे हैं जहाँ मुकाबला दिलचस्प हुआ है।
केस स्टडी 1: एम. वेंकैया नायडू का चुनाव (2017)
- सत्ता पक्ष की स्थिति: 2017 में, भाजपा के नेतृत्व वाला NDA गठबंधन लोकसभा में स्पष्ट बहुमत में था और राज्यसभा में भी उसकी स्थिति मजबूत हो रही थी।
- परिणाम: NDA के उम्मीदवार एम. वेंकैया नायडू को भारी बहुमत से जीत मिली (516 वोट), जबकि विपक्षी उम्मीदवार गोपालकृष्ण गांधी को 244 वोट मिले।
- मुख्य बिंदु: यह चुनाव दर्शाता है कि जब सत्ता पक्ष के पास संसद के दोनों सदनों में पर्याप्त संख्या बल होता है, तो उपराष्ट्रपति चुनाव में उसे हराना विपक्ष के लिए बेहद मुश्किल हो जाता है।
केस स्टडी 2: हामिद अंसारी का चुनाव (2007 और 2012)
- सत्ता पक्ष की स्थिति: 2007 और 2012 में, कांग्रेस के नेतृत्व वाला UPA गठबंधन सत्ता में था। हालांकि, UPA के पास लोकसभा में गठबंधन सहयोगियों के साथ बहुमत था, लेकिन राज्यसभा में कई बार उसे समर्थन के लिए अन्य दलों पर निर्भर रहना पड़ता था।
- परिणाम: हामिद अंसारी दोनों बार UPA के उम्मीदवार के रूप में विजयी हुए।
- मुख्य बिंदु: यह दर्शाता है कि गठबंधन सरकारों के समय भी, यदि वे अपने सहयोगियों को एकजुट रख पाते हैं और कुछ गैर-गठबंधन दलों का समर्थन भी जुटा लेते हैं, तो वे जीत सकते हैं। हालांकि, उनकी जीत का अंतर वेंकैया नायडू की तुलना में थोड़ा कम था, जो अधिक प्रतिस्पर्धी माहौल को दर्शाता है।
इन केस स्टडी से यह स्पष्ट होता है कि लोकसभा में बहुमत होना उपराष्ट्रपति चुनाव में जीत की एक महत्वपूर्ण कुंजी है, क्योंकि लोकसभा में राज्यसभा की तुलना में सदस्यों की संख्या लगभग दोगुनी है। हालांकि, राज्यसभा में दलों की संख्या और क्षेत्रीय दलों का रुख भी अंतिम परिणाम को प्रभावित कर सकता है।
उपराष्ट्रपति चुनाव का राजनीतिक प्रभाव
उपराष्ट्रपति चुनाव का परिणाम केवल एक व्यक्ति के पद ग्रहण करने तक सीमित नहीं होता, बल्कि इसके दूरगामी राजनीतिक प्रभाव भी होते हैं।
सरकार के लिए (सत्ता पक्ष):
- राज्यसभा पर नियंत्रण: यदि सत्ता पक्ष का उम्मीदवार जीतता है, तो इससे राज्यसभा में सरकार का नियंत्रण मजबूत होता है। राज्यसभा अक्सर लोकसभा द्वारा पारित विधेयकों को पारित करने में बाधा बन सकती है यदि उसमें सत्ता पक्ष का बहुमत न हो। एक अनुकूल सभापति विधायी प्रक्रियाओं को सुचारू बनाने और सरकार के एजेंडे को आगे बढ़ाने में मदद कर सकता है।
- विधायी प्रक्रिया में सुगमता: राज्यसभा में सरकार के लिए विधेयक पारित कराना आसान हो जाता है, खासकर जब सदन में सत्ता पक्ष के पास बहुमत न हो। सभापति के रूप में उपराष्ट्रपति की भूमिका विधेयकों को पारित करने, चर्चाओं को निर्देशित करने और सदन में व्यवधानों को प्रबंधित करने में महत्वपूर्ण होती है।
- नैतिक और प्रतीकात्मक जीत: यह सत्ताधारी दल के लिए एक महत्वपूर्ण प्रतीकात्मक जीत होती है, जो उनकी राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता और संसद के भीतर उनके संख्या बल को दर्शाती है। यह आगामी चुनावों के लिए एक मनोवैज्ञानिक बढ़त भी प्रदान कर सकती है।
विपक्ष के लिए:
- एकजुटता का प्रदर्शन: यदि विपक्ष एक साझा उम्मीदवार पर सहमत हो पाता है और उसे पर्याप्त वोट दिलाने में सफल रहता है, तो यह उनकी एकजुटता और राजनीतिक परिपक्वता का एक महत्वपूर्ण प्रदर्शन हो सकता है। यह भविष्य के चुनावों या बड़े राजनीतिक अभियानों के लिए एक आधार तैयार कर सकता है।
- सरकार की कमजोरियों को उजागर करना: यदि विपक्ष सत्ता पक्ष के उम्मीदवार को कड़ी टक्कर देता है या कुछ क्रॉस-वोटिंग कराने में सफल रहता है, तो यह सत्ता पक्ष के भीतर दरारों और संभावित कमजोरियों को उजागर कर सकता है।
- राज्यसभा में चुनौती: भले ही विपक्ष का उम्मीदवार न जीत पाए, राज्यसभा में एक मजबूत और मुखर विपक्ष सरकार के लिए विधायी राह को कठिन बना सकता है, जिससे उसे अधिक संवाद और समझौते करने पड़ सकते हैं।
राज्यसभा में भूमिका पर प्रभाव:
उपराष्ट्रपति का चुनाव राज्यसभा के कामकाज पर सीधा प्रभाव डालता है।
- एक ऐसा सभापति जो राजनीतिक रूप से सत्ता पक्ष से जुड़ा हो, उस पर निष्पक्षता बनाए रखने का दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, संविधान उन्हें निष्पक्ष रहने का निर्देश देता है, लेकिन राजनीतिक पृष्ठभूमि हमेशा एक चुनौती पेश करती है।
- विपक्ष अक्सर सभापति पर सरकार के पक्ष में काम करने का आरोप लगा सकता है, जिससे सदन में गतिरोध बढ़ सकता है।
- एक निष्पक्ष और अनुभवी सभापति सदन की कार्यवाही को सुचारू रूप से चलाने, विभिन्न दलों के बीच समन्वय स्थापित करने और सार्थक बहस को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
चुनौतियाँ और भविष्य की राह
उपराष्ट्रपति का चुनाव और उसके बाद उनके पद का निर्वहन कई चुनौतियों से भरा होता है, विशेष रूप से एक ऐसे देश में जहाँ संसदीय गतिरोध आम बात हो गई है।
- निष्पक्षता की धारणा बनाए रखना: उपराष्ट्रपति, जो राज्यसभा के सभापति भी होते हैं, से अपेक्षा की जाती है कि वे राजनीतिक रूप से निष्पक्ष रहें। हालांकि, चूंकि उनका चुनाव राजनीतिक दलों द्वारा होता है, इसलिए उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठना आम बात है। उन्हें इस धारणा को दूर करने और सदन में सभी सदस्यों के प्रति समान व्यवहार सुनिश्चित करने की चुनौती का सामना करना पड़ता है।
- संसदीय गतिरोध का प्रबंधन: भारतीय संसद में अक्सर शोरगुल और व्यवधान देखने को मिलते हैं। सभापति के लिए यह एक बड़ी चुनौती होती है कि वे ऐसे माहौल में सदन की गरिमा को बनाए रखें, सार्थक बहस को बढ़ावा दें और विधायी कार्यों को पूरा कराएं। उन्हें विपक्ष को पर्याप्त अवसर प्रदान करना होता है, साथ ही सदन की कार्यवाही को बाधित होने से रोकना भी होता है।
- दलीय राजनीति से ऊपर उठना: एक बार निर्वाचित होने के बाद, उपराष्ट्रपति से उम्मीद की जाती है कि वे दलीय राजनीति से ऊपर उठकर कार्य करें। यह एक महत्वपूर्ण चुनौती है, खासकर जब वे एक मजबूत राजनीतिक पृष्ठभूमि से आते हों।
- पद का संवैधानिक सम्मान बनाए रखना: उपराष्ट्रपति का पद भारत के संविधान में निहित एक महत्वपूर्ण पद है। यह सुनिश्चित करना कि यह पद राजनीतिक खींचतान से दूर रहे और इसका संवैधानिक सम्मान बरकरार रहे, यह एक सतत चुनौती है।
भविष्य की राह:
- संवाद और सहयोग: उपराष्ट्रपति को सभी राजनीतिक दलों के साथ संवाद और सहयोग की भावना को बढ़ावा देना चाहिए ताकि सदन के कामकाज को सुचारू बनाया जा सके।
- नियमों का सख्त पालन: सदन के नियमों और प्रक्रियाओं का सख्ती से पालन सुनिश्चित करना, चाहे वह सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, सभापति की निष्पक्षता को दर्शाता है।
- संसदीय मर्यादाओं को स्थापित करना: नए और युवा सांसदों को संसदीय मर्यादाओं और नियमों के बारे में शिक्षित करना भी सभापति की भूमिका का हिस्सा होना चाहिए।
निष्कर्ष
उपराष्ट्रपति चुनाव भारतीय लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण कवायद है, जो न केवल एक संवैधानिक पदधारी का चयन करती है बल्कि संसद के भीतर राजनीतिक शक्ति संतुलन का भी एक महत्वपूर्ण बैरोमीटर है। यह ‘नंबर गेम’ सिर्फ सांसदों की संख्या का जोड़ नहीं है, बल्कि यह राजनीतिक गठबंधनों, पार्टी अनुशासन, क्षेत्रीय दलों के महत्व और क्रॉस-वोटिंग की संभावनाओं का एक जटिल मिश्रण है।
सत्ता पक्ष के लिए यह एक अवसर होता है कि वह अपनी विधायी राह को सुगम बनाए और अपनी राष्ट्रीय स्वीकार्यता को मजबूत करे। वहीं, विपक्ष के लिए यह अपनी एकजुटता प्रदर्शित करने और सरकार की कमजोरियों को उजागर करने का एक मंच होता है। अंततः, इस पद पर चुने जाने वाले व्यक्ति की भूमिका राज्यसभा के कुशल संचालन और संसदीय लोकतंत्र की गरिमा को बनाए रखने में महत्वपूर्ण होती है।
यह चुनाव हमें याद दिलाता है कि भारत का लोकतंत्र कितना गतिशील और बहुआयामी है, जहाँ प्रत्येक संवैधानिक पद का अपना महत्व है और प्रत्येक चुनावी प्रक्रिया देश के राजनीतिक भविष्य को आकार देती है। यह केवल एक ‘चुनाव’ नहीं, बल्कि हमारी संसदीय प्रणाली की जटिलताओं और शक्तियों का एक जीवंत प्रदर्शन है।
UPSC परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न (Practice Questions for UPSC Exam)
प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) – 10 MCQs
(यहाँ 10 MCQs, उनके उत्तर और व्याख्या प्रदान करें)
1. भारत के उपराष्ट्रपति के चुनाव के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- उपराष्ट्रपति का चुनाव एक निर्वाचक मंडल द्वारा किया जाता है जिसमें संसद के दोनों सदनों के केवल निर्वाचित सदस्य शामिल होते हैं।
- उपराष्ट्रपति का चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा होता है।
- उपराष्ट्रपति के पद के लिए योग्यता यह है कि व्यक्ति को लोकसभा का सदस्य चुने जाने के लिए योग्य होना चाहिए।
उपरोक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
A) केवल I और II
B) केवल II
C) केवल II और III
D) केवल I
उत्तर: B) केवल II
व्याख्या:
कथन I गलत है। उपराष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल में संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) के सभी सदस्य (निर्वाचित और मनोनीत दोनों) शामिल होते हैं।
कथन II सही है। उपराष्ट्रपति का चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा होता है।
कथन III गलत है। उपराष्ट्रपति के पद के लिए योग्यता यह है कि व्यक्ति को राज्यसभा का सदस्य चुने जाने के लिए योग्य होना चाहिए, न कि लोकसभा का।
2. भारत के उपराष्ट्रपति को पद से हटाने के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?
A) उन्हें लोकसभा में एक प्रस्ताव पारित करके हटाया जा सकता है, जिसे राज्यसभा द्वारा अनुमोदित किया जाए।
B) उन्हें राज्यसभा में एक प्रस्ताव पारित करके हटाया जा सकता है, जिसे लोकसभा द्वारा अनुमोदित किया जाए।
C) उन्हें राष्ट्रपति द्वारा मंत्रिपरिषद की सलाह पर हटाया जा सकता है।
D) उन्हें केवल महाभियोग की प्रक्रिया द्वारा हटाया जा सकता है, जैसा कि राष्ट्रपति के मामले में होता है।
उत्तर: B) उन्हें राज्यसभा में एक प्रस्ताव पारित करके हटाया जा सकता है, जिसे लोकसभा द्वारा अनुमोदित किया जाए।
व्याख्या: उपराष्ट्रपति को पद से हटाने का प्रस्ताव केवल राज्यसभा में ही पेश किया जा सकता है (प्रभावी बहुमत द्वारा), और इसे लोकसभा द्वारा साधारण बहुमत से सहमत होना चाहिए। राष्ट्रपति की तरह महाभियोग की जटिल प्रक्रिया की आवश्यकता नहीं होती है।
3. भारत के उपराष्ट्रपति के चुनाव और राष्ट्रपति के चुनाव के बीच मुख्य अंतर क्या है?
A) राष्ट्रपति का चुनाव अप्रत्यक्ष होता है जबकि उपराष्ट्रपति का चुनाव प्रत्यक्ष।
B) राष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल में राज्य विधानसभाओं के सदस्य शामिल होते हैं, जबकि उपराष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल में नहीं।
C) उपराष्ट्रपति के चुनाव में वोट का मूल्य जनसंख्या पर आधारित होता है, जबकि राष्ट्रपति के चुनाव में नहीं।
D) राष्ट्रपति को केवल निर्वाचित सदस्य वोट देते हैं, जबकि उपराष्ट्रपति को मनोनीत सदस्य भी वोट दे सकते हैं।
उत्तर: B) राष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल में राज्य विधानसभाओं के सदस्य शामिल होते हैं, जबकि उपराष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल में नहीं।
व्याख्या: कथन A गलत है क्योंकि दोनों अप्रत्यक्ष होते हैं। कथन C गलत है क्योंकि उपराष्ट्रपति चुनाव में सभी सांसदों के वोट का मूल्य समान होता है। कथन D आंशिक रूप से सही है लेकिन सबसे महत्वपूर्ण अंतर B में निहित है। राष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल में संसद के निर्वाचित सदस्य और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य शामिल होते हैं, जबकि उपराष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल में केवल संसद के सभी सदस्य (निर्वाचित और मनोनीत दोनों) शामिल होते हैं और राज्य विधानसभाओं के सदस्य शामिल नहीं होते हैं।
4. भारत के उपराष्ट्रपति के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- वह राज्यसभा के पदेन सभापति होते हैं।
- वह राष्ट्रपति के पद के रिक्त होने पर कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में अधिकतम छह महीने तक कार्य कर सकते हैं।
- वह भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक की नियुक्ति करते हैं।
उपरोक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
A) केवल I
B) केवल I और II
C) केवल II और III
D) I, II और III
उत्तर: A) केवल I
व्याख्या:
कथन I सही है। उपराष्ट्रपति राज्यसभा के पदेन सभापति होते हैं।
कथन II गलत है। जब राष्ट्रपति का पद रिक्त होता है, तो उपराष्ट्रपति कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में तब तक कार्य करता है जब तक नया राष्ट्रपति पदभार ग्रहण नहीं कर लेता, जिसके लिए कोई अधिकतम समय सीमा नहीं है (हालांकि राष्ट्रपति का चुनाव 6 महीने के भीतर होना चाहिए)। वह केवल अस्थायी अनुपस्थिति में अधिकतम छह महीने तक कार्य कर सकते हैं।
कथन III गलत है। भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
5. उपराष्ट्रपति चुनाव में ‘सिंगल ट्रांसफरेबल वोट’ (एकल संक्रमणीय मत) प्रणाली का क्या अर्थ है?
A) प्रत्येक मतदाता केवल एक उम्मीदवार को वोट दे सकता है।
B) मतदाता अपनी पसंद के उम्मीदवारों को वरीयता के क्रम में चिह्नित करता है।
C) जीतने वाले उम्मीदवार को सबसे अधिक वोटों की आवश्यकता होती है, भले ही वह 50% से कम हो।
D) यह प्रणाली केवल उन्हीं चुनावों में उपयोग की जाती है जहाँ केवल दो उम्मीदवार होते हैं।
उत्तर: B) मतदाता अपनी पसंद के उम्मीदवारों को वरीयता के क्रम में चिह्नित करता है।
व्याख्या: एकल संक्रमणीय मत प्रणाली में, मतदाता उम्मीदवारों को अपनी वरीयता (पहली पसंद, दूसरी पसंद, आदि) के क्रम में वोट देते हैं। यदि पहले दौर में कोई उम्मीदवार आवश्यक कोटा प्राप्त नहीं कर पाता, तो सबसे कम मत वाले उम्मीदवार के वोट अन्य उम्मीदवारों में स्थानांतरित कर दिए जाते हैं।
6. भारत के उपराष्ट्रपति का कार्यकाल कितने वर्ष का होता है?
A) 4 वर्ष
B) 5 वर्ष
C) 6 वर्ष
D) 3 वर्ष
उत्तर: B) 5 वर्ष
व्याख्या: भारत के उपराष्ट्रपति का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है।
7. भारत का उपराष्ट्रपति बनने के लिए उम्मीदवार की न्यूनतम आयु कितनी होनी चाहिए?
A) 25 वर्ष
B) 30 वर्ष
C) 35 वर्ष
D) 40 वर्ष
उत्तर: C) 35 वर्ष
व्याख्या: भारत का उपराष्ट्रपति बनने के लिए उम्मीदवार की न्यूनतम आयु 35 वर्ष होनी चाहिए।
8. जब भारत का उपराष्ट्रपति कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है, तो उसे कौन सी शक्तियाँ और उन्मुक्तियाँ प्राप्त होती हैं?
A) वह राज्यसभा के सभापति के रूप में भी कार्य करना जारी रखता है।
B) उसे राष्ट्रपति के सभी अधिकार, शक्तियाँ और उन्मुक्तियाँ प्राप्त होती हैं।
C) वह केवल आंतरिक प्रशासन से संबंधित मामलों का प्रबंधन कर सकता है।
D) वह केवल नाममात्र का प्रमुख होता है और वास्तविक शक्तियाँ प्रधानमंत्री के पास होती हैं।
उत्तर: B) उसे राष्ट्रपति के सभी अधिकार, शक्तियाँ और उन्मुक्तियाँ प्राप्त होती हैं।
व्याख्या: जब उपराष्ट्रपति कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है, तो उसे राष्ट्रपति के सभी अधिकार, शक्तियाँ, उन्मुक्तियाँ और परिलब्धियां प्राप्त होती हैं, और वह राज्यसभा के सभापति के रूप में कार्य नहीं करता है।
9. उपराष्ट्रपति के चुनाव में निम्नलिखित में से कौन मतदान नहीं कर सकता है?
A) लोकसभा के निर्वाचित सदस्य
B) राज्यसभा के मनोनीत सदस्य
C) राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य
D) लोकसभा के मनोनीत सदस्य
उत्तर: C) राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य
व्याख्या: उपराष्ट्रपति के चुनाव में संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) के सभी सदस्य (निर्वाचित और मनोनीत) मतदान करते हैं। राज्य विधानसभाओं के सदस्य उपराष्ट्रपति के चुनाव में मतदान नहीं करते हैं।
10. भारत के उपराष्ट्रपति को शपथ कौन दिलाता है?
A) भारत के मुख्य न्यायाधीश
B) भारत के राष्ट्रपति
C) लोकसभा अध्यक्ष
D) राज्यसभा के उपसभापति
उत्तर: B) भारत के राष्ट्रपति
व्याख्या: भारत के उपराष्ट्रपति को शपथ भारत के राष्ट्रपति द्वारा दिलाई जाती है।
मुख्य परीक्षा (Mains)
(यहाँ 3-4 मेन्स के प्रश्न प्रदान करें)
1. “भारत के उपराष्ट्रपति का चुनाव केवल एक संवैधानिक औपचारिकता नहीं, बल्कि संसदीय लोकतंत्र में शक्ति संतुलन का एक महत्वपूर्ण सूचक है।” इस कथन के आलोक में, उपराष्ट्रपति चुनाव के ‘नंबर गेम’ और इसके राजनीतिक प्रभावों का विश्लेषण कीजिए।
2. राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों के बीच अंतरों पर प्रकाश डालते हुए, उपराष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल की संरचना की विशिष्टता पर चर्चा कीजिए। एक उपराष्ट्रपति के रूप में राज्यसभा के सभापति की भूमिका किस प्रकार सदन के विधायी कामकाज को प्रभावित कर सकती है?
3. भारतीय संसदीय प्रणाली में उपराष्ट्रपति का पद कितना महत्वपूर्ण है? पदच्युति की प्रक्रिया सहित उनके कार्य, शक्तियों और भूमिका का विस्तार से वर्णन करें। साथ ही, इस पद से जुड़ी संभावित चुनौतियों और निष्पक्षता बनाए रखने की आवश्यकता पर भी चर्चा कीजिए।
4. “उपराष्ट्रपति चुनाव का परिणाम सत्ताधारी दल के लिए राज्यसभा में विधायी प्रक्रिया को सुगम बनाने में सहायक हो सकता है।” इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण करें। आप इस चुनाव में क्षेत्रीय दलों की भूमिका और क्रॉस-वोटिंग की संभावनाओं को कैसे देखते हैं?
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