समाजशास्त्र के महत्वपूर्ण प्रश्न: अपनी वैचारिक स्पष्टता को परखें
प्रिय उम्मीदवारों, “The Sociology Scholar” के रूप में, मैं आपके लिए समाजशास्त्र का एक चुनौतीपूर्ण और ज्ञानवर्धक दैनिक क्विज़ प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह अभ्यास सेट प्रमुख प्रतियोगी परीक्षाओं (UGC-NET, UPSC, State PSCs आदि) के लिए आपकी वैचारिक स्पष्टता और विश्लेषणात्मक कौशल का परीक्षण करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। प्रत्येक प्रश्न को गहनता से समझें और अपनी तैयारी को एक नए स्तर पर ले जाएं।
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कार्ल मार्क्स के अनुसार, “अलगाव” (Alienation) की अवधारणा का मुख्य कारण क्या है?
- (A) धार्मिक रूढ़िवादिता
- (B) पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली
- (C) सामाजिक अनुबंध का अभाव
- (D) शिक्षा का अभाव
सही उत्तर: (B) पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली
विस्तृत व्याख्या:
कार्ल मार्क्स ने अपनी कृति “इकोनॉमिक एंड फिलोसोफिकल मैन्यूस्क्रिप्ट्स ऑफ 1844” में ‘अलगाव’ (Alienation) की अवधारणा का विस्तृत विश्लेषण किया है। मार्क्स के अनुसार, पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली में श्रमिक अपने श्रम के उत्पाद, उत्पादन की प्रक्रिया, अपनी प्रजाति-सत्ता (species-being) और अन्य मनुष्यों से अलगाव का अनुभव करता है। यह अलगाव मुख्य रूप से निजी संपत्ति और पूंजी के प्रभुत्व के कारण होता है, जहाँ श्रमिक अपने काम पर नियंत्रण खो देता है और केवल एक वस्तु के रूप में देखा जाता है।
- (A) धार्मिक रूढ़िवादिता: दुर्खीम जैसे समाजशास्त्रियों ने धर्म को सामाजिक एकजुटता से जोड़ा, लेकिन मार्क्स के लिए यह सीधे तौर पर अलगाव का प्राथमिक कारण नहीं था, बल्कि एक ‘अफीम’ थी जो अलगाव को छिपाती थी।
- (C) सामाजिक अनुबंध का अभाव: यह अवधारणा मुख्य रूप से जॉन लॉक और रूसो जैसे विचारकों द्वारा प्रतिपादित की गई है, जो राजनीतिक दर्शन से संबंधित है, न कि मार्क्स के अलगाव से।
- (D) शिक्षा का अभाव: यद्यपि शिक्षा का अभाव सामाजिक समस्याओं का कारण बन सकता है, यह मार्क्स के अलगाव की अवधारणा का केंद्रीय कारण नहीं है।
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मैक्स वेबर द्वारा प्रतिपादित ‘आदर्श प्रारूप’ (Ideal Type) की अवधारणा क्या है?
- (A) एक सामाजिक समूह का आदर्श मॉडल
- (B) एक नैतिक रूप से वांछनीय सामाजिक संरचना
- (C) सामाजिक घटनाओं को समझने के लिए एक विश्लेषणात्मक उपकरण
- (D) एक काल्पनिक समाज जहां कोई संघर्ष नहीं है
सही उत्तर: (C) सामाजिक घटनाओं को समझने के लिए एक विश्लेषणात्मक उपकरण
विस्तृत व्याख्या:
मैक्स वेबर ने ‘आदर्श प्रारूप’ (Ideal Type) को सामाजिक यथार्थ का अध्ययन करने के लिए एक पद्धतिगत उपकरण के रूप में प्रस्तुत किया। यह किसी भी सामाजिक घटना के सबसे महत्वपूर्ण और विशिष्ट गुणों का एक वैचारिक निर्माण है, जो पूरी तरह से वास्तविक नहीं होता बल्कि विश्लेषणात्मक तुलना के लिए एक बेंचमार्क के रूप में कार्य करता है। इसका उपयोग सामाजिक घटनाओं की जटिलता को सरल बनाने और उनकी तुलना करने के लिए किया जाता है, जैसे कि नौकरशाही या पूंजीवाद का अध्ययन।
- (A) एक सामाजिक समूह का आदर्श मॉडल: आदर्श प्रारूप ‘आदर्श’ नहीं है जिसका अनुकरण किया जाना चाहिए, बल्कि एक विश्लेषणात्मक उपकरण है।
- (B) एक नैतिक रूप से वांछनीय सामाजिक संरचना: यह नैतिक निर्णय नहीं है, बल्कि एक मूल्य-मुक्त विश्लेषणात्मक अवधारणा है।
- (D) एक काल्पनिक समाज जहां कोई संघर्ष नहीं है: यह एक यूटोपियन विचार है, जो वेबर के आदर्श प्रारूप से भिन्न है।
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एमिल दुर्खीम के अनुसार, समाज में ‘एनोमी’ (Anomie) की स्थिति कब उत्पन्न होती है?
- (A) जब सामाजिक नियम और मानदंड स्पष्ट और मजबूत होते हैं
- (B) जब व्यक्ति स्वयं को समाज से पूरी तरह जुड़ा हुआ महसूस करता है
- (C) जब सामाजिक मानदंड कमजोर हो जाते हैं या अनुपस्थित होते हैं
- (D) जब आर्थिक समृद्धि बहुत अधिक होती है
सही उत्तर: (C) जब सामाजिक मानदंड कमजोर हो जाते हैं या अनुपस्थित होते हैं
विस्तृत व्याख्या:
एमिल दुर्खीम ने अपनी प्रसिद्ध कृति “सुसाइड” (1897) में ‘एनोमी’ (Anomie) की अवधारणा का विस्तार से वर्णन किया है। उनके अनुसार, एनोमी एक ऐसी स्थिति है जब समाज में नैतिक नियम और मानदंड (नॉर्म्स) कमजोर पड़ जाते हैं, अस्पष्ट हो जाते हैं या अनुपस्थित हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को यह नहीं पता होता कि उससे क्या अपेक्षा की जाती है, जिससे भ्रम, निराशा और सामाजिक विघटन बढ़ता है। दुर्खीम ने एनोमी को कुछ प्रकार की आत्महत्याओं का कारण भी बताया।
- (A) जब सामाजिक नियम और मानदंड स्पष्ट और मजबूत होते हैं: यह सामाजिक एकजुटता की स्थिति है, एनोमी की नहीं।
- (B) जब व्यक्ति स्वयं को समाज से पूरी तरह जुड़ा हुआ महसूस करता है: यह भी सामाजिक एकजुटता को दर्शाता है, एनोमी के विपरीत।
- (D) जब आर्थिक समृद्धि बहुत अधिक होती है: दुर्खीम ने तर्क दिया कि अत्यधिक आर्थिक परिवर्तन (समृद्धि या मंदी) भी एनोमी पैदा कर सकता है क्योंकि मौजूदा मानदंड नई परिस्थितियों के अनुकूल नहीं हो पाते। हालांकि, इसका मुख्य कारण मानदंडो का कमजोर होना ही है।
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‘प्रकार्यवादी परिप्रेक्ष्य’ (Functionalist Perspective) समाज को कैसे देखता है?
- (A) संघर्ष और असमानता का क्षेत्र
- (B) एक जटिल प्रणाली जिसके भाग एक साथ मिलकर स्थिरता बनाए रखते हैं
- (C) प्रतीकों और अर्थों का संग्रह
- (D) शक्ति संबंधों का जाल
सही उत्तर: (B) एक जटिल प्रणाली जिसके भाग एक साथ मिलकर स्थिरता बनाए रखते हैं
विस्तृत व्याख्या:
प्रकार्यवादी परिप्रेक्ष्य, जिसके प्रमुख समर्थक एमिल दुर्खीम और तालकॉट पार्सन्स हैं, समाज को एक जैविक शरीर के समान देखता है। जिस प्रकार शरीर के विभिन्न अंग (जैसे हृदय, फेफड़े) एक साथ काम करके शरीर को स्वस्थ रखते हैं, उसी प्रकार समाज के विभिन्न भाग या संस्थाएँ (जैसे परिवार, शिक्षा, धर्म, अर्थव्यवस्था) एक साथ मिलकर सामाजिक व्यवस्था और स्थिरता बनाए रखती हैं। प्रत्येक भाग का एक विशिष्ट प्रकार्य (Function) होता है जो पूरे समाज के अस्तित्व और निरंतरता में योगदान देता है।
- (A) संघर्ष और असमानता का क्षेत्र: यह ‘संघर्ष परिप्रेक्ष्य’ (Conflict Perspective) का मुख्य विचार है।
- (C) प्रतीकों और अर्थों का संग्रह: यह ‘प्रतीकात्मक अंतःक्रियावाद’ (Symbolic Interactionism) का केंद्रीय विचार है।
- (D) शक्ति संबंधों का जाल: यह भी संघर्ष सिद्धांत और फ्रेडरिक एंगेल्स, मिशेल फूको जैसे विचारकों से संबंधित है।
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रॉबर्ट के. मर्टन द्वारा प्रस्तुत ‘संदर्भ समूह’ (Reference Group) की अवधारणा क्या है?
- (A) एक समूह जिसके सदस्य हमेशा एक-दूसरे का समर्थन करते हैं
- (B) एक समूह जो व्यक्ति के व्यवहार और दृष्टिकोण के लिए एक मानक के रूप में कार्य करता है
- (C) एक प्राथमिक समूह जिसका व्यक्ति एक हिस्सा है
- (D) एक अनौपचारिक सामाजिक नेटवर्क
सही उत्तर: (B) एक समूह जो व्यक्ति के व्यवहार और दृष्टिकोण के लिए एक मानक के रूप में कार्य करता है
विस्तृत व्याख्या:
रॉबर्ट के. मर्टन ने अपनी पुस्तक “सोशल थ्योरी एंड सोशल स्ट्रक्चर” में ‘संदर्भ समूह’ (Reference Group) की अवधारणा को लोकप्रिय बनाया। संदर्भ समूह वह समूह होता है जिससे व्यक्ति अपना व्यवहार, दृष्टिकोण और आत्म-मूल्यांकन करने के लिए खुद की तुलना करता है, भले ही वह उस समूह का सदस्य हो या न हो। यह समूह व्यक्ति के लिए आकांक्षाओं और मानकों का निर्धारण करता है, और सामाजिकीकरण (Socialization) तथा प्रत्याशित समाजीकरण (Anticipatory Socialization) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- (A) एक समूह जिसके सदस्य हमेशा एक-दूसरे का समर्थन करते हैं: यह ‘प्राथमिक समूह’ या ‘इन-ग्रुप’ की विशेषता हो सकती है, लेकिन संदर्भ समूह की नहीं।
- (C) एक प्राथमिक समूह जिसका व्यक्ति एक हिस्सा है: एक संदर्भ समूह प्राथमिक या द्वितीयक हो सकता है, और व्यक्ति उसका सदस्य होना अनिवार्य नहीं है।
- (D) एक अनौपचारिक सामाजिक नेटवर्क: संदर्भ समूह एक नेटवर्क हो सकता है, लेकिन इसकी मुख्य विशेषता मानक के रूप में कार्य करना है।
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‘घोषणात्मक प्रकार्य’ (Manifest Function) और ‘अघोषणात्मक प्रकार्य’ (Latent Function) की अवधारणा किसने दी?
- (A) एमिल दुर्खीम
- (B) कार्ल मार्क्स
- (C) रॉबर्ट के. मर्टन
- (D) मैक्स वेबर
सही उत्तर: (C) रॉबर्ट के. मर्टन
विस्तृत व्याख्या:
रॉबर्ट के. मर्टन ने प्रकार्यवाद (Functionalism) में संशोधन करते हुए ‘घोषणात्मक प्रकार्य’ (Manifest Function) और ‘अघोषणात्मक प्रकार्य’ (Latent Function) के बीच अंतर किया। घोषणात्मक प्रकार्य वे उद्देश्यपूर्ण और इच्छित परिणाम होते हैं जो किसी सामाजिक पैटर्न या संस्था से स्पष्ट रूप से पहचाने जाते हैं। अघोषणात्मक प्रकार्य वे अनपेक्षित और अक्सर अनजाने परिणाम होते हैं जो सामाजिक व्यवस्था में योगदान करते हैं। उदाहरण के लिए, शिक्षा का घोषणात्मक प्रकार्य ज्ञान प्रदान करना है, जबकि अघोषणात्मक प्रकार्य डेटिंग के अवसर प्रदान करना या शिशु देखभाल प्रदान करना हो सकता है।
- (A) एमिल दुर्खीम: दुर्खीम प्रकार्यवाद के अग्रदूत थे, लेकिन इन विशिष्ट अवधारणाओं को मर्टन ने विकसित किया।
- (B) कार्ल मार्क्स: मार्क्स संघर्ष सिद्धांत से जुड़े हैं, प्रकार्यवाद से नहीं।
- (D) मैक्स वेबर: वेबर ने सामाजिक क्रिया और नौकरशाही पर काम किया, इन अवधारणाओं पर नहीं।
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‘सामाजिक तथ्य’ (Social Fact) की अवधारणा किससे संबंधित है?
- (A) मैक्स वेबर
- (B) एमिल दुर्खीम
- (C) कार्ल मार्क्स
- (D) जॉर्ज हर्बर्ट मीड
सही उत्तर: (B) एमिल दुर्खीम
विस्तृत व्याख्या:
एमिल दुर्खीम ने अपनी पुस्तक “द रूल्स ऑफ सोशियोलॉजिकल मेथड” (1895) में ‘सामाजिक तथ्य’ (Social Fact) की अवधारणा प्रस्तुत की। उनके अनुसार, सामाजिक तथ्य सोचने, महसूस करने और कार्य करने के ऐसे तरीके हैं जो व्यक्ति के बाहर मौजूद होते हैं, व्यक्तियों पर बाध्यकारी शक्ति रखते हैं, और उनके व्यवहार को नियंत्रित करते हैं। ये व्यक्ति की इच्छा से स्वतंत्र होते हैं और समाज द्वारा पूर्व-निर्धारित होते हैं, जैसे कानून, नैतिकता, रीति-रिवाज और धार्मिक विश्वास। दुर्खीम का मानना था कि समाजशास्त्र का विषय सामाजिक तथ्यों का अध्ययन करना है।
- (A) मैक्स वेबर: वेबर ने सामाजिक क्रिया (Social Action) पर ध्यान केंद्रित किया।
- (C) कार्ल मार्क्स: मार्क्स ने भौतिकवाद और वर्ग संघर्ष पर ध्यान दिया।
- (D) जॉर्ज हर्बर्ट मीड: मीड प्रतीकात्मक अंतःक्रियावाद और ‘स्व’ (Self) की अवधारणा से जुड़े हैं।
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भारत में जाति व्यवस्था की ‘संस्कृतिकरण’ (Sanskritization) की अवधारणा किसने दी?
- (A) एम.एन. श्रीनिवास
- (B) जी.एस. घुरिये
- (C) आंद्रे बेतेई
- (D) योगेंद्र सिंह
सही उत्तर: (A) एम.एन. श्रीनिवास
विस्तृत व्याख्या:
एम.एन. श्रीनिवास ने ‘संस्कृतिकरण’ (Sanskritization) की अवधारणा अपनी पुस्तक “रिलीजन एंड सोसाइटी अमंग द कूर्ग्स ऑफ साउथ इंडिया” (1952) में प्रस्तुत की। संस्कृतिकरण वह प्रक्रिया है जिसमें एक निम्न जाति, जनजाति या अन्य समूह अपनी स्थिति को ऊपर उठाने के लिए किसी ‘उच्च’ या ‘द्विज’ जाति के रीति-रिवाजों, अनुष्ठानों, विचारधारा और जीवन शैली को अपनाता है। यह सामाजिक गतिशीलता (Social Mobility) का एक रूप है जो मुख्य रूप से सांस्कृतिक परिवर्तन पर केंद्रित है।
- (B) जी.एस. घुरिये: घुरिये ने जाति व्यवस्था का विस्तृत अध्ययन किया, लेकिन संस्कृतिकरण की अवधारणा श्रीनिवास ने दी।
- (C) आंद्रे बेतेई: बेतेई ने भारत में जाति, वर्ग और शक्ति पर महत्वपूर्ण कार्य किया है।
- (D) योगेंद्र सिंह: सिंह ने भारत में आधुनिकीकरण और सामाजिक परिवर्तन पर ध्यान केंद्रित किया।
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‘संरचनात्मक-प्रकार्यवादी’ (Structural-Functionalist) परिप्रेक्ष्य के अनुसार, परिवार का मुख्य प्रकार्य क्या है?
- (A) सामाजिक संघर्षों को बढ़ाना
- (B) बच्चों का समाजीकरण और भावनात्मक समर्थन प्रदान करना
- (C) उत्पादन के साधनों का नियंत्रण
- (D) व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सीमित करना
सही उत्तर: (B) बच्चों का समाजीकरण और भावनात्मक समर्थन प्रदान करना
विस्तृत व्याख्या:
संरचनात्मक-प्रकार्यवादी सिद्धांतकार, जैसे तालकॉट पार्सन्स, परिवार को समाज की एक मूलभूत संस्था मानते हैं जो कई महत्वपूर्ण प्रकार्य करती है। इनमें बच्चों का समाजीकरण (सामाजिक मानदंडों और मूल्यों को सिखाना), भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक समर्थन प्रदान करना, यौन संबंधों को विनियमित करना, प्रजनन और आर्थिक सहयोग शामिल हैं। परिवार इन प्रकार्यों के माध्यम से सामाजिक व्यवस्था और स्थिरता बनाए रखने में मदद करता है।
- (A) सामाजिक संघर्षों को बढ़ाना: यह संघर्ष सिद्धांत का विचार हो सकता है, प्रकार्यवाद का नहीं।
- (C) उत्पादन के साधनों का नियंत्रण: यह मार्क्सवादी विचार है, जो परिवार को आर्थिक संरचना से जोड़ता है।
- (D) व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सीमित करना: जबकि परिवार कुछ मानदंडों को लागू करता है, इसका प्राथमिक प्रकार्य स्वतंत्रता को सीमित करना नहीं है।
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‘जनसंख्या वृद्धि का सिद्धांत’ (Theory of Population Growth) थॉमस माल्थस ने किस पुस्तक में प्रस्तुत किया?
- (A) दास कैपिटल
- (B) द डिवीजन ऑफ लेबर इन सोसाइटी
- (C) एन एस्से ऑन द प्रिंसिपल ऑफ पापुलेशन
- (D) द प्रोटेस्टेंट एथिक एंड द स्पिरिट ऑफ कैपिटलिज्म
सही उत्तर: (C) एन एस्से ऑन द प्रिंसिपल ऑफ पापुलेशन
विस्तृत व्याख्या:
थॉमस माल्थस ने 1798 में अपनी पुस्तक “एन एस्से ऑन द प्रिंसिपल ऑफ पापुलेशन” में अपना प्रसिद्ध जनसंख्या सिद्धांत प्रस्तुत किया। उन्होंने तर्क दिया कि जनसंख्या ज्यामितीय दर (geometric progression) से बढ़ती है (जैसे 1, 2, 4, 8…), जबकि खाद्य आपूर्ति अंकगणितीय दर (arithmetic progression) से बढ़ती है (जैसे 1, 2, 3, 4…)। इस असंतुलन के कारण गरीबी, अकाल और बीमारी जैसी आपदाएँ आती हैं, जो जनसंख्या को नियंत्रित करती हैं।
- (A) दास कैपिटल: कार्ल मार्क्स द्वारा लिखित।
- (B) द डिवीजन ऑफ लेबर इन सोसाइटी: एमिल दुर्खीम द्वारा लिखित।
- (D) द प्रोटेस्टेंट एथिक एंड द स्पिरिट ऑफ कैपिटलिज्म: मैक्स वेबर द्वारा लिखित।
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‘प्रतीकात्मक अंतःक्रियावाद’ (Symbolic Interactionism) का मुख्य ध्यान किस पर है?
- (A) सामाजिक संरचनाएं और उनके प्रकार्य
- (B) व्यक्तिपरक अर्थ और सामाजिक अंतःक्रिया में प्रतीक
- (C) आर्थिक वर्ग संघर्ष
- (D) समाज में शक्ति का वितरण
सही उत्तर: (B) व्यक्तिपरक अर्थ और सामाजिक अंतःक्रिया में प्रतीक
विस्तृत व्याख्या:
प्रतीकात्मक अंतःक्रियावाद एक सूक्ष्म-स्तरीय परिप्रेक्ष्य है जो जॉर्ज हर्बर्ट मीड और हर्बर्ट ब्लूमर जैसे विचारकों से जुड़ा है। यह इस बात पर केंद्रित है कि व्यक्ति सामाजिक अंतःक्रिया में प्रतीकों (जैसे भाषा, हावभाव, वस्तुएं) के माध्यम से अर्थ कैसे बनाते हैं और इन अर्थों के आधार पर कैसे कार्य करते हैं। यह मानता है कि समाज व्यक्तियों की दिन-प्रतिदिन की अंतःक्रियाओं और साझा अर्थों के माध्यम से निर्मित होता है।
- (A) सामाजिक संरचनाएं और उनके प्रकार्य: यह प्रकार्यवाद का विषय है।
- (C) आर्थिक वर्ग संघर्ष: यह मार्क्सवाद और संघर्ष सिद्धांत का विषय है।
- (D) समाज में शक्ति का वितरण: यह संघर्ष सिद्धांत का विषय है।
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‘भूमिहीनता’ (Landlessness) भारत के ग्रामीण समाज की एक प्रमुख समस्या क्यों है?
- (A) सांस्कृतिक परंपराओं का अभाव
- (B) कृषि पर निर्भरता और आजीविका की असुरक्षा
- (C) शहरीकरण की कमी
- (D) आधुनिक तकनीक का अत्यधिक उपयोग
सही उत्तर: (B) कृषि पर निर्भरता और आजीविका की असुरक्षा
विस्तृत व्याख्या:
भारत में ग्रामीण समाज मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर है। भूमिहीनता का अर्थ है कि ग्रामीण आबादी का एक बड़ा हिस्सा, विशेषकर हाशिए पर रहने वाले समूह, के पास कृषि भूमि नहीं है। इससे उन्हें कृषि मजदूर के रूप में काम करना पड़ता है, जिससे वे मौसम की अनिश्चितताओं, कम मजदूरी और ज़मींदारों पर निर्भरता के कारण आर्थिक रूप से असुरक्षित हो जाते हैं। यह गरीबी, पलायन और सामाजिक असमानता को बढ़ावा देता है।
- (A) सांस्कृतिक परंपराओं का अभाव: यह भूमिहीनता का प्रत्यक्ष कारण नहीं है।
- (C) शहरीकरण की कमी: जबकि शहरीकरण ग्रामीण समस्याओं को कम कर सकता है, यह भूमिहीनता का सीधा कारण नहीं है।
- (D) आधुनिक तकनीक का अत्यधिक उपयोग: यह कुछ हद तक रोजगार को प्रभावित कर सकता है, लेकिन भूमिहीनता का मूल कारण भूमि स्वामित्व की संरचना है।
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मिशेल फूको की ‘शक्ति/ज्ञान’ (Power/Knowledge) की अवधारणा का क्या अर्थ है?
- (A) ज्ञान हमेशा शक्तिहीन होता है
- (B) शक्ति केवल ज्ञान के बिना ही मौजूद होती है
- (C) शक्ति और ज्ञान एक दूसरे से अविभाज्य रूप से जुड़े हुए हैं और एक दूसरे को उत्पन्न करते हैं
- (D) ज्ञान शक्ति से श्रेष्ठ है
सही उत्तर: (C) शक्ति और ज्ञान एक दूसरे से अविभाज्य रूप से जुड़े हुए हैं और एक दूसरे को उत्पन्न करते हैं
विस्तृत व्याख्या:
मिशेल फूको (Michel Foucault) ने ‘शक्ति/ज्ञान’ (Power/Knowledge) की अवधारणा को यह समझाने के लिए विकसित किया कि ज्ञान कभी भी तटस्थ नहीं होता और शक्ति संबंध हमेशा ज्ञान के उत्पादन और प्रसार में शामिल होते हैं। उनके अनुसार, ज्ञान और शक्ति एक दूसरे को सुदृढ़ करते हैं; कोई भी ज्ञान बिना शक्ति के मौजूद नहीं हो सकता और कोई भी शक्ति ज्ञान के माध्यम से खुद को स्थापित नहीं कर सकती। उदाहरण के लिए, चिकित्सा ज्ञान शरीर पर नियंत्रण की शक्ति प्रदान करता है। यह अवधारणा उनकी कृति “अनुशासन और दंड” (Discipline and Punish) में प्रमुखता से दिखाई देती है।
- (A) ज्ञान हमेशा शक्तिहीन होता है: फूको के अनुसार, ज्ञान में शक्ति होती है।
- (B) शक्ति केवल ज्ञान के बिना ही मौजूद होती है: फूको तर्क देते हैं कि शक्ति ज्ञान के साथ मिलकर काम करती है।
- (D) ज्ञान शक्ति से श्रेष्ठ है: फूको के लिए, ज्ञान और शक्ति समान रूप से महत्वपूर्ण और परस्पर निर्भर हैं, न कि एक दूसरे से श्रेष्ठ।
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‘स्वयं को देखने वाले अन्य’ (Looking-Glass Self) की अवधारणा किसने विकसित की?
- (A) जॉर्ज हर्बर्ट मीड
- (B) चार्ल्स हॉरटन कूले
- (C) एरविंग गॉफमैन
- (D) हरबर्ट ब्लूमर
सही उत्तर: (B) चार्ल्स हॉरटन कूले
विस्तृत व्याख्या:
चार्ल्स हॉरटन कूले ने अपनी पुस्तक “ह्यूमन नेचर एंड द सोशल ऑर्डर” (1902) में ‘स्वयं को देखने वाले अन्य’ (Looking-Glass Self) की अवधारणा प्रस्तुत की। इस अवधारणा के अनुसार, हमारी आत्म-छवि (self-image) या ‘स्व’ (self) दूसरों के साथ हमारी अंतःक्रियाओं के माध्यम से विकसित होता है। हम कल्पना करते हैं कि दूसरे हमें कैसे देखते हैं, हम उनकी प्रतिक्रियाओं की कल्पना करते हैं, और फिर उन कल्पनाओं के आधार पर हम अपने बारे में एक भावना विकसित करते हैं (जैसे गर्व या शर्म)।
- (A) जॉर्ज हर्बर्ट मीड: मीड ने ‘मी’ और ‘आई’ की अवधारणा दी, जो ‘स्व’ के विकास से संबंधित है, लेकिन ‘लुकिंग-ग्लास सेल्फ’ कूले का विचार है।
- (C) एरविंग गॉफमैन: गॉफमैन ने ‘नाटकीयता’ (Dramaturgy) और ‘चेहरे की प्रस्तुति’ (Presentation of Self in Everyday Life) पर काम किया।
- (D) हरबर्ट ब्लूमर: ब्लूमर ने ‘प्रतीकात्मक अंतःक्रियावाद’ शब्द गढ़ा और मीड के विचारों को आगे बढ़ाया।
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‘उत्तर-आधुनिकतावाद’ (Postmodernism) की मुख्य विशेषता क्या है?
- (A) तर्क और विज्ञान में पूर्ण विश्वास
- (B) सार्वभौमिक सत्य और भव्य आख्यानों (grand narratives) का खंडन
- (C) आधुनिकता के सिद्धांतों का पालन
- (D) सामाजिक स्थिरता और व्यवस्था पर जोर
सही उत्तर: (B) सार्वभौमिक सत्य और भव्य आख्यानों (grand narratives) का खंडन
विस्तृत व्याख्या:
उत्तर-आधुनिकतावाद 20वीं सदी के उत्तरार्ध में उभरी एक बौद्धिक और सांस्कृतिक प्रवृत्ति है, जो तर्क, विज्ञान और सार्वभौमिक सत्य में आधुनिकतावादी विश्वासों को चुनौती देती है। जीन-फ्रांकोइस ल्योटार्ड और जैक्स डेरिडा जैसे विचारकों ने ‘भव्य आख्यानों’ (जैसे प्रगति, मुक्ति, तर्कसंगतता) को खारिज किया, यह तर्क देते हुए कि कोई एकल, उद्देश्यपूर्ण सत्य नहीं है, बल्कि सत्य बहुआयामी, खंडित और संदर्भ-निर्भर है। यह विविधता, सापेक्षता और शक्ति संबंधों पर जोर देता है।
- (A) तर्क और विज्ञान में पूर्ण विश्वास: यह आधुनिकतावाद की विशेषता है, उत्तर-आधुनिकतावाद की नहीं।
- (C) आधुनिकता के सिद्धांतों का पालन: उत्तर-आधुनिकतावाद आधुनिकता के सिद्धांतों की आलोचना और अस्वीकृति है।
- (D) सामाजिक स्थिरता और व्यवस्था पर जोर: यह प्रकार्यवाद का विषय है, उत्तर-आधुनिकतावाद का नहीं।
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सामाजिक अनुसंधान में ‘साक्षात्कार’ (Interview) एक _________ विधि है।
- (A) मात्रात्मक (Quantitative)
- (B) गुणात्मक (Qualitative)
- (C) प्रयोगात्मक (Experimental)
- (D) द्वितीयक (Secondary)
सही उत्तर: (B) गुणात्मक (Qualitative)
विस्तृत व्याख्या:
सामाजिक अनुसंधान में ‘साक्षात्कार’ (Interview) प्राथमिक रूप से एक गुणात्मक विधि है। इसमें शोधकर्ता और उत्तरदाता के बीच मौखिक अंतःक्रिया होती है, जिसका उद्देश्य गहन जानकारी, अनुभव, दृष्टिकोण और भावनाओं को समझना होता है। यह विधि उत्तरदाताओं के व्यक्तिपरक अनुभवों और अर्थों को सामने लाने में मदद करती है, जो संख्यात्मक डेटा से प्राप्त नहीं किए जा सकते। हालांकि संरचित साक्षात्कार में कुछ मात्रात्मक तत्व हो सकते हैं, इसका मूल उद्देश्य गुणात्मक ही होता है।
- (A) मात्रात्मक: मात्रात्मक विधियाँ संख्यात्मक डेटा और सांख्यिकीय विश्लेषण पर ध्यान केंद्रित करती हैं (जैसे सर्वेक्षण, प्रयोग)।
- (C) प्रयोगात्मक: प्रयोगात्मक विधि में स्वतंत्र चर को नियंत्रित करके निर्भर चर पर उसके प्रभाव का अध्ययन किया जाता है।
- (D) द्वितीयक: द्वितीयक डेटा में पहले से एकत्र किए गए डेटा का उपयोग किया जाता है (जैसे सरकारी रिपोर्ट, पुस्तकें)।
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भारत में ‘डिजिटल जाति व्यवस्था’ (Digital Caste System) की अवधारणा क्या दर्शाती है?
- (A) डिजिटल उपकरणों के उपयोग के माध्यम से जातिगत भेदभाव का उन्मूलन
- (B) ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर जातिगत पहचान का प्रसार
- (C) डिजिटल पहुँच और साक्षरता के आधार पर सामाजिक स्तरीकरण
- (D) केवल ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल विभाजन
सही उत्तर: (C) डिजिटल पहुँच और साक्षरता के आधार पर सामाजिक स्तरीकरण
विस्तृत व्याख्या:
‘डिजिटल जाति व्यवस्था’ एक समकालीन अवधारणा है जो भारत में डिजिटल प्रौद्योगिकी तक पहुँच और उपयोग में मौजूदा सामाजिक असमानताओं को संदर्भित करती है। इसका अर्थ यह है कि समाज के वे वर्ग जिनके पास डिजिटल उपकरण (स्मार्टफोन, इंटरनेट) और डिजिटल साक्षरता है, उन्हें अवसरों और सूचनाओं तक बेहतर पहुँच मिलती है, जबकि वंचित वर्ग (मुख्यतः निम्न जाति, ग्रामीण और गरीब) डिजिटल रूप से हाशिए पर रह जाते हैं। यह मौजूदा जातिगत और आर्थिक विभाजन को डिजिटल क्षेत्र में भी दोहराता है और बढ़ाता है, जिससे एक नया स्तरीकरण पैदा होता है।
- (A) डिजिटल उपकरणों के उपयोग के माध्यम से जातिगत भेदभाव का उन्मूलन: यह एक आदर्श स्थिति है, जो ‘डिजिटल जाति व्यवस्था’ की अवधारणा के विपरीत है।
- (B) ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर जातिगत पहचान का प्रसार: यह एक पहलू हो सकता है, लेकिन ‘डिजिटल जाति व्यवस्था’ मुख्य रूप से पहुँच और असमानता से संबंधित है।
- (D) केवल ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल विभाजन: यह शहरी क्षेत्रों में भी मौजूद है, हालांकि ग्रामीण-शहरी विभाजन एक महत्वपूर्ण कारक है।
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‘धर्मनिरपेक्षता’ (Secularism) के भारतीय मॉडल की मुख्य विशेषता क्या है?
- (A) राज्य और धर्म का पूर्ण अलगाव
- (B) राज्य द्वारा सभी धर्मों को समान सम्मान देना और उनसे समान दूरी बनाए रखना
- (C) राज्य द्वारा किसी विशेष धर्म को बढ़ावा देना
- (D) धर्म का निजी मामला होना और सार्वजनिक जीवन से उसका बहिष्करण
सही उत्तर: (B) राज्य द्वारा सभी धर्मों को समान सम्मान देना और उनसे समान दूरी बनाए रखना
विस्तृत व्याख्या:
धर्मनिरपेक्षता का भारतीय मॉडल पश्चिमी मॉडल से भिन्न है। पश्चिमी मॉडल (जैसे फ़्रांस) में राज्य और धर्म के बीच पूर्ण अलगाव (Strict Separation) पर जोर दिया जाता है, जहाँ राज्य धार्मिक मामलों में कोई हस्तक्षेप नहीं करता। भारतीय मॉडल ‘सर्वधर्म समभाव’ के सिद्धांत पर आधारित है, जिसका अर्थ है कि राज्य सभी धर्मों को समान सम्मान देता है और उनसे एक निश्चित दूरी बनाए रखता है, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर धर्म के आंतरिक मामलों में सुधार के लिए सकारात्मक हस्तक्षेप भी कर सकता है (जैसे अस्पृश्यता उन्मूलन)। राज्य का कोई आधिकारिक धर्म नहीं होता।
- (A) राज्य और धर्म का पूर्ण अलगाव: यह पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता की विशेषता है, भारतीय मॉडल की नहीं।
- (C) राज्य द्वारा किसी विशेष धर्म को बढ़ावा देना: यह धर्मनिरपेक्षता के किसी भी मॉडल के विपरीत है।
- (D) धर्म का निजी मामला होना और सार्वजनिक जीवन से उसका बहिष्करण: यह पश्चिमी मॉडल के करीब है, लेकिन भारतीय मॉडल सार्वजनिक जीवन में धार्मिक विविधता को स्वीकार करता है।
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‘आधुनिकता का प्रोजेक्ट’ (The Project of Modernity) के आलोचक कौन से विचारक थे?
- (A) मैक्स वेबर
- (B) एमिल दुर्खीम
- (C) जर्गेन हैबरमास
- (D) मिशेल फूको
सही उत्तर: (D) मिशेल फूको
विस्तृत व्याख्या:
‘आधुनिकता का प्रोजेक्ट’ तर्क, प्रगति और सार्वभौमिक ज्ञान पर आधारित एक वैचारिक ढांचा है। मिशेल फूको, उत्तर-संरचनावादी और उत्तर-आधुनिकतावादी विचारक के रूप में, आधुनिकता के आलोचक थे। उन्होंने आधुनिक संस्थाओं (जैसे जेल, अस्पताल, विद्यालय) में निहित शक्ति संबंधों और ज्ञान के उत्पादन की प्रक्रियाओं का विश्लेषण किया। उन्होंने तर्क दिया कि आधुनिकता ने नए प्रकार के नियंत्रण और अनुशासन को जन्म दिया है, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सीमित करता है। जर्गेन हैबरमास आधुनिकता के प्रोजेक्ट को अधूरा मानते थे लेकिन उसके तर्क और संवाद की क्षमता में विश्वास रखते थे, जबकि वेबर और दुर्खीम आधुनिकता के विभिन्न पहलुओं का विश्लेषण कर रहे थे।
- (A) मैक्स वेबर: वेबर ने आधुनिकता के ‘तर्कसंगतता’ (rationalization) के पहलुओं का विश्लेषण किया लेकिन उसे पूरी तरह से खारिज नहीं किया।
- (B) एमिल दुर्खीम: दुर्खीम ने आधुनिक समाज में सामाजिक एकजुटता के रूपों का अध्ययन किया।
- (C) जर्गेन हैबरमास: हैबरमास ने आधुनिकता के प्रोजेक्ट की रक्षा की, हालांकि उन्होंने उसकी कमियों को स्वीकार किया।
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‘साहित्यिक चोरी’ (Plagiarism) सामाजिक अनुसंधान में किस प्रकार की अनैतिक प्रथा है?
- (A) डेटा के साथ छेड़छाड़ करना
- (B) शोधकर्ताओं के बीच गोपनीयता भंग करना
- (C) दूसरों के विचारों या शब्दों को अपने रूप में प्रस्तुत करना
- (D) बिना अनुमति के व्यक्तिगत डेटा एकत्र करना
सही उत्तर: (C) दूसरों के विचारों या शब्दों को अपने रूप में प्रस्तुत करना
विस्तृत व्याख्या:
सामाजिक अनुसंधान में ‘साहित्यिक चोरी’ (Plagiarism) एक गंभीर अनैतिक प्रथा है। इसमें किसी अन्य व्यक्ति के विचारों, शब्दों, अवधारणाओं या डेटा को बिना उचित श्रेय दिए या उद्धृत किए अपने मूल कार्य के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह अकादमिक ईमानदारी का उल्लंघन है और शोधकर्ता की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाता है।
- (A) डेटा के साथ छेड़छाड़ करना: यह भी एक अनैतिक प्रथा है जिसे ‘डेटा फैब्रिकेशन’ या ‘डेटा फाल्सिफिकेशन’ कहते हैं।
- (B) शोधकर्ताओं के बीच गोपनीयता भंग करना: यह ‘गोपनीयता के उल्लंघन’ से संबंधित है।
- (D) बिना अनुमति के व्यक्तिगत डेटा एकत्र करना: यह ‘सूचित सहमति’ (Informed Consent) के सिद्धांत का उल्लंघन है।
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‘आदिवासी’ (Tribal) समुदायों के अध्ययन के लिए कौन सी अनुसंधान पद्धति सबसे उपयुक्त मानी जाती है?
- (A) सर्वेक्षण (Survey)
- (B) प्रयोगात्मक अनुसंधान (Experimental Research)
- (C) नृजातिविज्ञान (Ethnography)
- (D) सामग्री विश्लेषण (Content Analysis)
सही उत्तर: (C) नृजातिविज्ञान (Ethnography)
विस्तृत व्याख्या:
‘नृजातिविज्ञान’ (Ethnography) एक गुणात्मक अनुसंधान पद्धति है जिसमें शोधकर्ता एक विशेष सामाजिक समूह या समुदाय (जैसे आदिवासी समुदाय) के साथ लंबे समय तक रहकर, उनकी संस्कृति, व्यवहार, विश्वासों और सामाजिक संरचनाओं का गहन अध्ययन करता है। यह प्रतिभागियों के दृष्टिकोण से दुनिया को समझने पर जोर देता है, जो आदिवासी समुदायों की जटिल जीवन शैली और विशिष्ट संस्कृति को समझने के लिए अत्यंत प्रभावी है। इसमें प्रतिभागी अवलोकन और गहन साक्षात्कार शामिल हैं।
- (A) सर्वेक्षण: सर्वेक्षण बड़ी आबादी से संख्यात्मक डेटा एकत्र करने के लिए उपयोगी है, लेकिन गहन सांस्कृतिक समझ के लिए कम प्रभावी है।
- (B) प्रयोगात्मक अनुसंधान: यह कारण-प्रभाव संबंधों का अध्ययन करने के लिए है और सामाजिक-सांस्कृतिक अध्ययन के लिए आमतौर पर उपयुक्त नहीं है।
- (D) सामग्री विश्लेषण: सामग्री विश्लेषण लिखित या दृश्य सामग्री का विश्लेषण करता है, सीधे समुदायों के जीवन का नहीं।
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तालकॉट पार्सन्स के अनुसार, सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए समाज को किन चार कार्यात्मक अनिवार्यताओं को पूरा करना चाहिए (AGIL मॉडल)?
- (A) अनुकूलन, लक्ष्य-प्राप्ति, एकीकरण, प्रतिरूप-अनुरक्षण
- (B) आधुनिकीकरण, वैश्वीकरण, औद्योगिकीकरण, शिक्षा
- (C) कृषि, उद्योग, सरकार, कानून
- (D) अलगाव, संघर्ष, असमानता, न्याय
सही उत्तर: (A) अनुकूलन, लक्ष्य-प्राप्ति, एकीकरण, प्रतिरूप-अनुरक्षण
विस्तृत व्याख्या:
तालकॉट पार्सन्स, एक प्रमुख प्रकार्यवादी विचारक, ने ‘AGIL मॉडल’ प्रस्तुत किया, जिसमें उन्होंने तर्क दिया कि किसी भी सामाजिक व्यवस्था को जीवित रहने और कार्य करने के लिए चार कार्यात्मक अनिवार्यताओं को पूरा करना होगा:
- A – Adaptation (अनुकूलन): भौतिक वातावरण के साथ तालमेल बिठाना और संसाधनों को प्राप्त करना।
- G – Goal Attainment (लक्ष्य-प्राप्ति): समाज के लक्ष्यों को परिभाषित करना और उन्हें प्राप्त करने के लिए संसाधनों को जुटाना।
- I – Integration (एकीकरण): समाज के विभिन्न भागों को सुसंगत और एकीकृत रखना, संघर्षों को कम करना।
- L – Latency or Pattern Maintenance (प्रतिरूप-अनुरक्षण या प्रतिरूप-रखरखाव): समाज के बुनियादी मूल्यों, मानदंडों और प्रेरणाओं को बनाए रखना और उनका नवीनीकरण करना।
यह मॉडल सामाजिक व्यवस्था के विश्लेषण के लिए एक व्यापक ढांचा प्रदान करता है।
- (B) आधुनिकीकरण, वैश्वीकरण, औद्योगिकीकरण, शिक्षा: ये सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रियाएँ हैं, पार्सन्स के AGIL मॉडल के कार्यात्मक अनिवार्यताओं नहीं।
- (C) कृषि, उद्योग, सरकार, कानून: ये सामाजिक संरचना के तत्व हैं, कार्यात्मक अनिवार्यताएँ नहीं।
- (D) अलगाव, संघर्ष, असमानता, न्याय: ये सामाजिक समस्याओं या अवधारणाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं, पार्सन्स के मॉडल के अंग नहीं।
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कोविड-19 महामारी के दौरान दूरस्थ शिक्षा (Remote Learning) ने किस प्रकार की असमानताओं को उजागर किया?
- (A) केवल शहरी-ग्रामीण विभाजन
- (B) लिंग आधारित असमानताएँ
- (C) डिजिटल पहुँच, संसाधनों और शैक्षणिक सहायता में मौजूदा सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ
- (D) भावनात्मक असमानताएँ
सही उत्तर: (C) डिजिटल पहुँच, संसाधनों और शैक्षणिक सहायता में मौजूदा सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ
विस्तृत व्याख्या:
कोविड-19 महामारी के दौरान दूरस्थ शिक्षा (Remote Learning) के व्यापक पैमाने पर अपनाने से समाज में पहले से मौजूद कई असमानताएँ स्पष्ट रूप से सामने आईं। विशेष रूप से, डिजिटल पहुँच (इंटरनेट कनेक्टिविटी, उपकरणों की उपलब्धता), सीखने के लिए अनुकूल माहौल (घर में स्थान, शांति), माता-पिता का शैक्षणिक समर्थन और संसाधनों (किताबें, ट्यूटर) तक पहुँच में सामाजिक-आर्थिक असमानताओं ने छात्रों के सीखने के परिणामों पर गहरा प्रभाव डाला। जिन परिवारों के पास पर्याप्त डिजिटल संसाधन और समर्थन नहीं था, उनके बच्चे शैक्षणिक रूप से पिछड़ गए, जिससे मौजूदा सामाजिक स्तरीकरण और गहरा हो गया।
- (A) केवल शहरी-ग्रामीण विभाजन: यह एक महत्वपूर्ण पहलू था, लेकिन केवल यही एकमात्र असमानता नहीं थी; आय, जाति और लिंग आधारित असमानताएँ भी थीं।
- (B) लिंग आधारित असमानताएँ: जबकि लिंग आधारित असमानताएँ भी मौजूद थीं (जैसे लड़कियों पर घर के काम का बोझ), ‘डिजिटल पहुँच और संसाधनों’ में असमानता अधिक व्यापक और प्रत्यक्ष थी।
- (D) भावनात्मक असमानताएँ: यह एक मनोवैज्ञानिक पहलू है, जबकि प्रश्न ‘दूरस्थ शिक्षा’ के सामाजिक-आर्थिक प्रभावों पर केंद्रित है।
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‘नगरीकरण’ (Urbanization) के सामाजिक-आर्थिक परिणामों में से एक नहीं है?
- (A) सामाजिक गतिशीलता में वृद्धि
- (B) गुमनामी और अलगाव
- (C) प्राथमिक संबंधों की प्रबलता
- (D) अपराध दर में वृद्धि
सही उत्तर: (C) प्राथमिक संबंधों की प्रबलता
विस्तृत व्याख्या:
नगरीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें जनसंख्या का ग्रामीण से शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन होता है और शहरी क्षेत्रों का विस्तार होता है। इसके कई सामाजिक-आर्थिक परिणाम होते हैं:
- (A) सामाजिक गतिशीलता में वृद्धि: शहर अक्सर अवसर प्रदान करते हैं, जिससे लोग अपनी सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार कर पाते हैं।
- (B) गुमनामी और अलगाव: बड़े शहरों में व्यक्ति अक्सर गुमनाम महसूस करते हैं और प्राथमिक संबंधों के बजाय द्वितीयक संबंधों पर अधिक निर्भर रहते हैं।
- (D) अपराध दर में वृद्धि: शहरीकरण के साथ अक्सर अपराध दर में वृद्धि देखी जाती है।
- (C) प्राथमिक संबंधों की प्रबलता: यह ग्रामीण समाजों की विशेषता है। शहरी समाजों में द्वितीयक संबंधों (औपचारिक, अवैयक्तिक) की प्रबलता होती है, जबकि प्राथमिक संबंध (घनिष्ठ, व्यक्तिगत) कमजोर पड़ जाते हैं या छोटे दायरे तक सीमित हो जाते हैं।
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ग्रामीण समाजशास्त्र (Rural Sociology) का मुख्य अध्ययन क्षेत्र क्या है?
- (A) औद्योगिक संबंधों का विश्लेषण
- (B) शहरी नियोजन और विकास
- (C) ग्रामीण जीवन शैली, कृषि संरचनाएँ और ग्रामीण सामाजिक परिवर्तन
- (D) अंतर्राष्ट्रीय संबंध
सही उत्तर: (C) ग्रामीण जीवन शैली, कृषि संरचनाएँ और ग्रामीण सामाजिक परिवर्तन
विस्तृत व्याख्या:
ग्रामीण समाजशास्त्र समाजशास्त्र की एक शाखा है जो ग्रामीण समुदायों, उनकी संरचनाओं, जीवन शैली, कृषि से संबंधित मुद्दों, ग्रामीण विकास, सामाजिक परिवर्तन और ग्रामीण आबादी के सामने आने वाली समस्याओं का व्यवस्थित अध्ययन करती है। इसका फोकस ग्रामीण सामाजिक संबंधों, मानदंडों और मूल्यों को समझना है।
- (A) औद्योगिक संबंधों का विश्लेषण: यह औद्योगिक समाजशास्त्र या श्रम समाजशास्त्र का विषय है।
- (B) शहरी नियोजन और विकास: यह शहरी समाजशास्त्र का विषय है।
- (D) अंतर्राष्ट्रीय संबंध: यह राजनीति विज्ञान या अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन का विषय है।
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‘द सोशियोलॉजिकल इमेजिनेशन’ (The Sociological Imagination) की अवधारणा किसने प्रस्तुत की?
- (A) मैक्स वेबर
- (B) सी. राइट मिल्स
- (C) एमिल दुर्खीम
- (D) हर्बर्ट स्पेंसर
सही उत्तर: (B) सी. राइट मिल्स
विस्तृत व्याख्या:
सी. राइट मिल्स ने 1959 में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “द सोशियोलॉजिकल इमेजिनेशन” में इस अवधारणा को प्रस्तुत किया। ‘समाजशास्त्रीय कल्पना’ व्यक्तियों को यह समझने की क्षमता प्रदान करती है कि उनके व्यक्तिगत अनुभव (personal troubles) किस प्रकार व्यापक सामाजिक, ऐतिहासिक और संरचनात्मक शक्तियों (public issues) से जुड़े हुए हैं। यह व्यक्ति को अपने निजी मुद्दों को बड़े सामाजिक संदर्भ में देखने में मदद करती है, जिससे वे केवल व्यक्तिगत समस्याओं के बजाय सामाजिक समस्याओं के रूप में देखे जा सकें।
- (A) मैक्स वेबर: वेबर ने सामाजिक क्रिया और नौकरशाही पर काम किया।
- (C) एमिल दुर्खीम: दुर्खीम ने सामाजिक तथ्य और एकजुटता पर काम किया।
- (D) हर्बर्ट स्पेंसर: स्पेंसर ने सामाजिक डार्विनवाद और जैविक सादृश्य पर काम किया।
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किस विचारक ने तर्क दिया कि ‘धर्म’ केवल एक सामाजिक संरचना है जो समाज की नैतिक सहमति को बनाए रखने में मदद करती है?
- (A) कार्ल मार्क्स
- (B) एमिल दुर्खीम
- (C) मैक्स वेबर
- (D) जॉर्ज सिमेल
सही उत्तर: (B) एमिल दुर्खीम
विस्तृत व्याख्या:
एमिल दुर्खीम ने अपनी पुस्तक “द एलिमेंट्री फॉर्म्स ऑफ द रिलीजियस लाइफ” में तर्क दिया कि धर्म समाज की एक आवश्यक संस्था है, जो ‘पवित्र’ (sacred) और ‘अपवित्र’ (profane) के बीच अंतर करके सामाजिक एकजुटता और नैतिक सहमति को मजबूत करता है। उनके लिए, धर्म मूलतः समाज का ही प्रक्षेपण है, और सामूहिक अनुष्ठानों के माध्यम से लोग समाज की शक्ति को महसूस करते हैं। उन्होंने धर्म के कार्यात्मक महत्व पर जोर दिया, यह मानते हुए कि यह व्यक्तियों को एक साझा नैतिक समुदाय में बांधता है।
- (A) कार्ल मार्क्स: मार्क्स ने धर्म को “जनता की अफीम” कहा और इसे पूंजीवाद को बनाए रखने वाले एक उपकरण के रूप में देखा।
- (C) मैक्स वेबर: वेबर ने धर्म और आर्थिक जीवन के बीच संबंध का अध्ययन किया (जैसे प्रोटेस्टेंट एथिक)।
- (D) जॉर्ज सिमेल: सिमेल ने सामाजिक अंतःक्रिया के स्वरूपों और शहरी जीवन पर ध्यान केंद्रित किया।
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‘सामाजिक स्तरीकरण’ (Social Stratification) से क्या तात्पर्य है?
- (A) समाज में व्यक्तियों की समान स्थिति
- (B) समाज का क्षैतिज विभाजन
- (C) समाज में व्यक्तियों और समूहों का पदानुक्रमित व्यवस्थापन
- (D) सामाजिक संघर्ष का अभाव
सही उत्तर: (C) समाज में व्यक्तियों और समूहों का पदानुक्रमित व्यवस्थापन
विस्तृत व्याख्या:
‘सामाजिक स्तरीकरण’ समाजशास्त्र की एक मौलिक अवधारणा है। यह समाज में व्यक्तियों और समूहों के पदानुक्रमित व्यवस्थापन को संदर्भित करता है, जिसके परिणामस्वरूप संसाधनों, अवसरों, शक्ति और प्रतिष्ठा का असमान वितरण होता है। यह व्यवस्था विभिन्न आधारों पर हो सकती है, जैसे जाति, वर्ग, लिंग, आयु या जातीयता। यह समाज को ‘स्तरों’ या ‘पर्तो’ में विभाजित करता है, जैसे कि भूवैज्ञानिक परतों में चट्टानों की परतें।
- (A) समाज में व्यक्तियों की समान स्थिति: यह सामाजिक समानता को दर्शाता है, स्तरीकरण को नहीं।
- (B) समाज का क्षैतिज विभाजन: स्तरीकरण ऊर्ध्वाधर (पदानुक्रमित) विभाजन है, क्षैतिज नहीं।
- (D) सामाजिक संघर्ष का अभाव: स्तरीकरण अक्सर संघर्षों को जन्म देता है, उनका अभाव नहीं।
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‘सामाजिक परिवर्तन’ (Social Change) की चक्रीय (Cyclical) अवधारणा से कौन से विचारक जुड़े हैं?
- (A) कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स
- (B) ऑगस्ट कॉम्ते और हर्बर्ट स्पेंसर
- (C) विल्फ्रेडो पारेटो और पी.ए. सोरोकिन
- (D) मैक्स वेबर और एमिल दुर्खीम
सही उत्तर: (C) विल्फ्रेडो पारेटो और पी.ए. सोरोकिन
विस्तृत व्याख्या:
सामाजिक परिवर्तन की चक्रीय अवधारणा मानती है कि समाज एक निश्चित पैटर्न में बदलता है, जहाँ चरण बार-बार दोहराए जाते हैं, जैसे कि मौसमों का चक्र। प्रमुख चक्रीय सिद्धांतकार विल्फ्रेडो पारेटो (एलीट के संचलन का सिद्धांत) और पी.ए. सोरोकिन (सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तन का सिद्धांत – वैचारिक, आदर्शवादी, संवेदी संस्कृतियों के बीच दोलन) हैं। इनके अनुसार, समाज रैखिक रूप से आगे नहीं बढ़ता, बल्कि उदय, गिरावट और नवीनीकरण के चरणों से गुजरता है।
- (A) कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स: ये संघर्ष सिद्धांत और रैखिक सामाजिक परिवर्तन (साम्यवाद की ओर) से जुड़े हैं।
- (B) ऑगस्ट कॉम्ते और हर्बर्ट स्पेंसर: ये रैखिक विकासवादी सिद्धांत (Evolutionary Theories) से जुड़े हैं।
- (D) मैक्स वेबर और एमिल दुर्खीम: इन्होंने सामाजिक परिवर्तन के विभिन्न पहलुओं का विश्लेषण किया लेकिन चक्रीय मॉडल के मुख्य प्रस्तावक नहीं थे।
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‘वैश्विक ग्राम’ (Global Village) की अवधारणा किसने प्रतिपादित की?
- (A) मैनुअल कैसटेल्स
- (B) मार्शल मैकलुहान
- (C) एंथनी गिडेंस
- (D) उल्लरिच बेक
सही उत्तर: (B) मार्शल मैकलुहान
विस्तृत व्याख्या:
मार्शल मैकलुहान, एक कनाडाई दार्शनिक और मीडिया सिद्धांतकार, ने 1960 के दशक में ‘वैश्विक ग्राम’ (Global Village) की अवधारणा को लोकप्रिय बनाया। उन्होंने तर्क दिया कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया (जैसे टेलीविजन, और बाद में इंटरनेट) ने दुनिया को इतना परस्पर जुड़ा हुआ बना दिया है कि यह एक छोटे से ‘ग्राम’ जैसा प्रतीत होता है, जहाँ हर कोई एक-दूसरे की खबर रखता है और वैश्विक घटनाएँ तुरंत हर जगह महसूस की जाती हैं। यह अवधारणा वैश्वीकरण और सूचना प्रौद्योगिकी के प्रभाव को दर्शाती है।
- (A) मैनुअल कैसटेल्स: कैसटेल्स ने ‘नेटवर्क सोसाइटी’ पर काम किया है।
- (C) एंथनी गिडेंस: गिडेंस ने ‘संरचनाकरण सिद्धांत’ और ‘आधुनिकता के परिणाम’ पर काम किया है।
- (D) उल्लरिच बेक: बेक ने ‘जोखिम समाज’ (Risk Society) की अवधारणा दी है।
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‘पितृसत्ता’ (Patriarchy) से क्या तात्पर्य है?
- (A) एक समाज जहाँ पुरुषों और महिलाओं को समान अधिकार प्राप्त हैं
- (B) पुरुषों द्वारा महिलाओं पर शक्ति और नियंत्रण का एक सामाजिक ढाँचा
- (C) एक परिवार व्यवस्था जहाँ निर्णय परिवार के सबसे बड़े सदस्य द्वारा लिए जाते हैं
- (D) महिलाओं द्वारा पुरुषों पर नियंत्रण
सही उत्तर: (B) पुरुषों द्वारा महिलाओं पर शक्ति और नियंत्रण का एक सामाजिक ढाँचा
विस्तृत व्याख्या:
‘पितृसत्ता’ एक सामाजिक व्यवस्था है जहाँ पुरुष प्राथमिक शक्ति रखते हैं और प्रभुत्वशाली भूमिकाएँ निभाते हैं, चाहे वह राजनीतिक नेतृत्व, नैतिक अधिकार, सामाजिक विशेषाधिकार, या संपत्ति का नियंत्रण हो। यह एक ऐसी प्रणाली है जो समाज में पुरुषों की प्रधानता और महिलाओं के अधीनस्थ स्थान को बनाए रखती है, अक्सर विभिन्न संस्थाओं (जैसे परिवार, अर्थव्यवस्था, धर्म, राज्य) के माध्यम से। नारीवादी सिद्धांतकारों ने पितृसत्ता को महिलाओं के उत्पीड़न का मूल कारण माना है।
- (A) एक समाज जहाँ पुरुषों और महिलाओं को समान अधिकार प्राप्त हैं: यह लैंगिक समानता को दर्शाता है, पितृसत्ता को नहीं।
- (C) एक परिवार व्यवस्था जहाँ निर्णय परिवार के सबसे बड़े सदस्य द्वारा लिए जाते हैं: यह ‘ज्येष्ठाधिकार’ (primogeniture) या ‘वृद्ध नेतृत्व’ से संबंधित हो सकता है, लेकिन पितृसत्ता व्यापक सामाजिक व्यवस्था है।
- (D) महिलाओं द्वारा पुरुषों पर नियंत्रण: यह ‘मातृसत्ता’ (Matriarchy) होगा, जो पितृसत्ता के विपरीत है।
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