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Justice Denied or Prosecutorial Failure? The 2006 Mumbai Train Blasts Verdict Explained

Justice Denied or Prosecutorial Failure? The 2006 Mumbai Train Blasts Verdict Explained

चर्चा में क्यों? (Why in News?):

हाल ही में बॉम्बे हाई कोर्ट ने 2006 के मुंबई लोकल ट्रेन बम धमाकों से जुड़े मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने मामले में गिरफ्तार किए गए सभी 12 आरोपियों को बरी कर दिया, जिसमें निचली अदालत द्वारा दोषी ठहराए गए 10 लोग और दो अन्य शामिल थे। हाई कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि अभियोजन पक्ष इन धमाकों में आरोपियों की संलिप्तता को उचित संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। यह फैसला 18 साल पुराने इस जघन्य आतंकी हमले के पीड़ितों और पूरे देश के लिए कई गंभीर सवाल खड़े करता है, खासकर हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली और आतंकवाद के मामलों में अभियोजन की क्षमता को लेकर।

2006 मुंबई ट्रेन धमाके: एक दर्दनाक अतीत (The 2006 Mumbai Train Blasts: A Painful Past)

7 जुलाई 2006 की शाम मुंबई की लोकल ट्रेनें हमेशा की तरह यात्रियों से खचाखच भरी थीं। यह शाम मुंबई के इतिहास की सबसे काली शामों में से एक बन गई, जब महज 11 मिनट के भीतर पश्चिमी रेलवे लाइन पर सात सिलसिलेवार बम धमाके हुए। ये धमाके माहिम, बांद्रा, खार रोड, जोगेश्वरी, बोरीवली, मीरा रोड और भायंदर जैसे व्यस्त रेलवे स्टेशनों के पास हुए। इस भयावह हमले में 188 बेकसूर लोगों की जान चली गई और 800 से अधिक लोग घायल हुए। इन धमाकों का मकसद मुंबई की जीवन रेखा मानी जाने वाली लोकल ट्रेनों को निशाना बनाकर अधिकतम हताहतों को अंजाम देना था और मुंबई को उसकी रफ़्तार से रोकना था।

“मुंबई की लोकल ट्रेनें सिर्फ आवागमन का साधन नहीं, बल्कि इस शहर की आत्मा हैं। उन पर किया गया हमला सीधे तौर पर मुंबई की आत्मा पर किया गया हमला था।”

इन धमाकों ने न केवल मुंबई को, बल्कि पूरे देश को सदमे में डाल दिया था। प्रारंभिक जांच में इंडियन मुजाहिदीन (IM) और प्रतिबंधित सिमी (SIMI) जैसे आतंकवादी संगठनों की संभावित संलिप्तता सामने आई थी, जिसके पीछे पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैयबा (LeT) का हाथ होने का भी संदेह था। महाराष्ट्र एंटी-टेररिज्म स्क्वॉड (ATS) ने मामले की जांच की और कुल 13 लोगों को गिरफ्तार किया। लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद, सितंबर 2015 में विशेष मकोका (MCOCA) अदालत ने 13 में से 12 आरोपियों को दोषी ठहराया था, जिसमें से 5 को मौत की सजा और 7 को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। एक आरोपी को बरी कर दिया गया था।

बॉम्बे हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला और उसके तर्क (Bombay High Court’s Landmark Verdict and Its Rationale)

बॉम्बे हाई कोर्ट का हालिया फैसला न केवल निचली अदालत के फैसले को पलटता है, बल्कि भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली के मूलभूत सिद्धांतों पर प्रकाश डालता है। उच्च न्यायालय ने सभी 12 आरोपियों को बरी करने के लिए कई महत्वपूर्ण आधार बताए।

अभियोजन की विफलता के मुख्य बिंदु (Key Points of Prosecution Failure):

  1. संदिग्ध कबूलनामे (Dubious Confessions): अभियोजन पक्ष ने कई आरोपियों के कबूलनामों (confessions) को अपने मामले का आधार बनाया था। हाई कोर्ट ने पाया कि ये कबूलनामे, विशेष रूप से महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (MCOCA) के तहत दर्ज किए गए, स्वतंत्र और स्वैच्छिक नहीं थे। अदालत ने इन कबूलनामों में कई विसंगतियां और विडंबनाएं पाईं, जिससे इनकी विश्वसनीयता पर गंभीर संदेह पैदा हुआ। यह एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत है कि बलपूर्वक या अनुचित तरीके से प्राप्त किए गए कबूलनामे को सबूत के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
  2. विश्वसनीय साक्ष्य का अभाव (Lack of Reliable Evidence): कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष ठोस, स्वतंत्र और पुष्ट साक्ष्य पेश करने में विफल रहा जो आरोपियों को सीधे तौर पर धमाकों से जोड़ता हो। डीएनए साक्ष्य, फिंगरप्रिंट और अन्य फोरेंसिक साक्ष्य की कमी या उनकी अपर्याप्तता एक बड़ा मुद्दा था।
  3. गवाहों की अविश्वसनीयता (Unreliable Witnesses): कुछ प्रमुख गवाहों की गवाही में विरोधाभास पाए गए, और कुछ गवाह बाद में अपने बयानों से पलट गए (hostile witnesses)। कोर्ट ने गवाहों की सत्यनिष्ठा और उनके बयानों की निरंतरता पर सवाल उठाए।
  4. अधूरा और कमजोर जांच (Incomplete and Weak Investigation): अदालत ने जांच एजेंसी की कार्यप्रणाली में कमियां पाईं। सबूतों को इकट्ठा करने, सुरक्षित रखने और पेश करने में कई खामियां थीं, जिससे “संदिग्धता की श्रृंखला” (chain of suspicion) पूरी नहीं हो पाई। आतंकवादी मामलों में अक्सर जटिलता होती है, लेकिन जांच एजेंसियों को अत्यंत सावधानी और व्यावसायिकता से काम करना होता है।
  5. ‘उचित संदेह से परे’ साबित करने में विफलता (Failure to Prove Beyond Reasonable Doubt): भारतीय कानून प्रणाली का एक मौलिक सिद्धांत है कि किसी भी व्यक्ति को तब तक दोषी नहीं ठहराया जा सकता जब तक कि अभियोजन पक्ष उसे “उचित संदेह से परे” (beyond reasonable doubt) दोषी साबित न कर दे। यदि अभियुक्त के पक्ष में संदेह की थोड़ी सी भी गुंजाइश रहती है, तो उसे बरी करने का प्रावधान है। हाई कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष इस उच्च मानक को पूरा करने में विफल रहा।

“किसी भी व्यक्ति को तब तक दोषी नहीं माना जा सकता, जब तक कि उसका दोष उचित संदेह से परे साबित न हो जाए। यही हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली की रीढ़ है, भले ही यह कितना भी कठिन क्यों न हो।”

निहितार्थ और परिणाम (Implications and Ramifications)

इस फैसले के दूरगामी निहितार्थ हैं, जो केवल इस विशेष मामले तक सीमित नहीं हैं बल्कि हमारी पूरी आपराधिक न्याय प्रणाली और आतंकवाद विरोधी रणनीति पर सवाल उठाते हैं।

1. पीड़ितों और परिवारों के लिए (For Victims and Families):

  • न्याय से वंचित होने का एहसास: इस फैसले ने उन सैकड़ों पीड़ितों और उनके परिवारों को गहरा सदमा पहुंचाया है, जिन्होंने 18 साल तक न्याय की उम्मीद में लंबी लड़ाई लड़ी। हमलावरों को सजा न मिलना उनके घावों को फिर से कुरेदने जैसा है।
  • बंद न हो पाने की भावना (Lack of Closure): न्याय प्रणाली से अपेक्षा की जाती है कि वह अपराधों के दोषियों को सजा देकर पीड़ितों को एक प्रकार का “बंद” (closure) प्रदान करे। इस मामले में, यह भावना पूरी तरह से गायब है, जिससे निराशा और हताशा बढ़ रही है।

2. कानून प्रवर्तन और जांच एजेंसियों के लिए (For Law Enforcement and Investigating Agencies):

  • विश्वसनीयता पर सवाल: एटीएस (ATS), जिसने इस मामले की जांच की थी, की कार्यप्रणाली और व्यावसायिकता पर गंभीर सवाल उठे हैं। यह फैसला अन्य आतंकवाद विरोधी जांचों की विश्वसनीयता को भी प्रभावित कर सकता है।
  • सुधार की आवश्यकता: यह फैसला जांच एजेंसियों के लिए एक वेक-अप कॉल है कि उन्हें अपनी जांच की गुणवत्ता, सबूत इकट्ठा करने के तरीकों और फोरेंसिक क्षमताओं में तत्काल सुधार करने की आवश्यकता है।
  • प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण: आतंकवाद जैसे जटिल मामलों से निपटने के लिए जांच अधिकारियों को उन्नत प्रशिक्षण और पर्याप्त संसाधनों की आवश्यकता है।

3. आपराधिक न्याय प्रणाली के लिए (For the Criminal Justice System):

  • न्याय का सिद्धांत: यह फैसला इस बात पर जोर देता है कि अदालतें साक्ष्यों के आधार पर ही फैसला लेती हैं, न कि भावना या जनमत के आधार पर। यह “कानून के शासन” (Rule of Law) और “निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार” (Right to Fair Trial) के सिद्धांतों को कायम रखता है, भले ही इसका परिणाम कितना भी विवादास्पद क्यों न हो।
  • मानवाधिकारों का संरक्षण: यह दर्शाता है कि कैसे उच्च अदालतें नागरिक अधिकारों और कानून की उचित प्रक्रिया को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, यहां तक कि आतंकवाद के मामलों में भी, जहां अक्सर भावनाएं हावी हो जाती हैं।
  • अपीलीय अदालत की भूमिका: यह फैसला निचली अदालत के फैसलों की समीक्षा और सुधार में अपीलीय अदालतों की महत्वपूर्ण भूमिका को उजागर करता है।

4. राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए (For National Security):

  • दोषियों का न पकड़ा जाना: यदि गिरफ्तार किए गए व्यक्ति दोषी नहीं थे, तो वास्तविक दोषी अभी भी खुले घूम रहे होंगे, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा बना रहेगा। यह एक बड़ी चिंता का विषय है।
  • आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई: यह फैसला आतंकवाद के खिलाफ भारत की लड़ाई में एक चुनौती प्रस्तुत करता है। कमजोर अभियोजन भविष्य में भी आतंकवादियों को दंडित करने की देश की क्षमता को बाधित कर सकता है।

भारत में आतंकवादी मामलों के अभियोजन में चुनौतियाँ (Challenges in Prosecuting Terrorism Cases in India)

आतंकवादी मामलों में सफल अभियोजन कई अनूठी चुनौतियों का सामना करता है:

  1. साक्ष्य संग्रह की जटिलता:
    • सीमा पार संबंध: अक्सर आतंकवादी हमलों के तार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैले होते हैं, जिससे सबूत इकट्ठा करना और विदेशी एजेंसियों से सहयोग प्राप्त करना मुश्किल हो जाता है।
    • डिजिटल साक्ष्य: डिजिटल फोरेंसिक, साइबर सबूत, एन्क्रिप्टेड संचार आदि को इकट्ठा करना, उनका विश्लेषण करना और उन्हें अदालत में स्वीकार्य बनाना एक जटिल प्रक्रिया है।
    • प्रौद्योगिकी का उपयोग: आतंकवादी अत्याधुनिक तकनीक का उपयोग करते हैं, जिससे उनके संचार और गतिविधियों का पता लगाना और उन्हें ट्रैक करना कठिन हो जाता है।
  2. गवाह संरक्षण का अभाव:
    • आतंकवादी मामलों में गवाहों को अक्सर गंभीर खतरों का सामना करना पड़ता है। भारत में एक व्यापक और प्रभावी गवाह संरक्षण कार्यक्रम की कमी उन्हें अपने बयानों पर टिके रहने से हतोत्साहित करती है।
  3. कबूलनामे पर निर्भरता:
    • कई जांच एजेंसियां “कबूलनामों” पर अत्यधिक निर्भर करती हैं, खासकर विशेष कानूनों (जैसे MCOCA) के तहत, जहां पुलिस अधिकारियों के समक्ष दिए गए कबूलनामे स्वीकार्य होते हैं। हालांकि, इन कबूलनामों की वैधता और स्वैच्छिकता पर अक्सर सवाल उठते हैं।
  4. जांच एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी:
    • स्थानीय पुलिस, राज्य एटीएस, केंद्रीय एजेंसियां (एनआईए, आईबी, रॉ) और अन्य सुरक्षा एजेंसियों के बीच अक्सर प्रभावी समन्वय की कमी होती है, जिससे जांच खंडित और अक्षम हो जाती है।
  5. फोरेंसिक विज्ञान की सीमाएं और क्षमता:
    • देश में फोरेंसिक प्रयोगशालाओं की संख्या और क्षमता अपर्याप्त है। नमूनों के प्रसंस्करण में देरी और विशेषज्ञ फोरेंसिक कर्मियों की कमी अक्सर गुणवत्तापूर्ण सबूत पेश करने में बाधा डालती है।
  6. कानूनी ढांचा और मानवाधिकार:
    • आतंकवाद विरोधी कानूनों को आतंकवादियों को दंडित करने की आवश्यकता और अभियुक्तों के मानवाधिकारों की रक्षा के बीच संतुलन बनाए रखना होता है। कभी-कभी, इन कानूनों की कठोरता के कारण जांच में प्रक्रियात्मक खामियां आ जाती हैं।
  7. मीडिया का दबाव और “मीडिया ट्रायल”:
    • उच्च-प्रोफ़ाइल आतंकी मामलों में मीडिया का अत्यधिक कवरेज अक्सर “मीडिया ट्रायल” की ओर ले जाता है, जिससे जांच और न्यायिक प्रक्रिया पर अनुचित दबाव पड़ सकता है।

न्यायपालिका की भूमिका (Role of the Judiciary)

इस मामले में उच्च न्यायालय का निर्णय भारतीय न्यायपालिका की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करता है:

  • स्वतंत्रता और निष्पक्षता: न्यायपालिका, विशेषकर उच्च अदालतें, कार्यकारी दबाव से स्वतंत्र होकर कानून और सबूतों के आधार पर निर्णय लेती हैं। यह निर्णय इसकी स्वतंत्रता का प्रमाण है।
  • चेक एंड बैलेंस: न्यायपालिका सरकार और उसकी एजेंसियों द्वारा किए गए कार्यों पर “चेक एंड बैलेंस” के रूप में कार्य करती है, यह सुनिश्चित करती है कि कानून के शासन का पालन किया जाए और किसी भी नागरिक के अधिकारों का उल्लंघन न हो।
  • संविधान का संरक्षक: न्यायपालिका संविधान की व्याख्या और रक्षा करती है, यह सुनिश्चित करती है कि सभी नागरिक, यहां तक कि आरोपी भी, निष्पक्ष सुनवाई और उचित प्रक्रिया के अपने मौलिक अधिकारों का प्रयोग कर सकें।
  • साक्ष्य का मूल्यांकन: न्यायपालिका का प्राथमिक कार्य प्रस्तुत किए गए साक्ष्यों का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन करना और यह सुनिश्चित करना है कि दोष “उचित संदेह से परे” साबित हो।

आगे की राह और सुधार (Way Forward and Reforms)

2006 मुंबई ट्रेन धमाकों के मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट का फैसला हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली में तत्काल और व्यापक सुधारों की आवश्यकता को उजागर करता है, खासकर आतंकवाद से संबंधित मामलों में।

1. जांच एजेंसियों का आधुनिकीकरण और सशक्तिकरण:

  • वैज्ञानिक जांच पर जोर: फोरेंसिक विज्ञान, साइबर फोरेंसिक और डीएनए प्रोफाइलिंग में निवेश बढ़ाना। हर जिले में आधुनिक फोरेंसिक लैब स्थापित करना और मौजूदा लैब की क्षमता बढ़ाना।
  • विशेषज्ञता का विकास: आतंकवाद, वित्तीय अपराध और साइबर अपराध जैसे विशिष्ट क्षेत्रों के लिए विशेष जांच दल (SITs) और विशेषज्ञों का प्रशिक्षण।
  • अंतर-एजेंसी समन्वय: केंद्र और राज्य की विभिन्न जांच और खुफिया एजेंसियों (जैसे NIA, IB, RAW, ATS, स्थानीय पुलिस) के बीच निर्बाध सूचना साझाकरण और समन्वय के लिए एक मजबूत तंत्र स्थापित करना।
  • प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण: जांच अधिकारियों को नए अपराध पैटर्न, सबूत इकट्ठा करने की नवीनतम तकनीकों और कानूनी प्रक्रियाओं में नियमित और उन्नत प्रशिक्षण प्रदान करना।

2. साक्ष्य की गुणवत्ता में सुधार:

  • कन्फेशनल स्टेटमेंट से परे: केवल कन्फेशनल स्टेटमेंट पर अत्यधिक निर्भरता कम करना और ठोस परिस्थितिजन्य और फोरेंसिक साक्ष्य पर अधिक ध्यान केंद्रित करना।
  • साक्ष्य संरक्षण: अपराध स्थल से साक्ष्य इकट्ठा करने, उन्हें संरक्षित करने और उन्हें अदालत में पेश करने की प्रक्रियाओं को मानकीकृत और मजबूत करना (Chain of Custody)।

3. गवाह संरक्षण कार्यक्रम:

  • गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक मजबूत और प्रभावी गवाह संरक्षण कानून लागू करना, जिसमें पहचान छिपाना, स्थान बदलना और पुलिस सुरक्षा शामिल हो। यह गवाहों को अदालत में निडर होकर गवाही देने के लिए प्रोत्साहित करेगा।

4. कानूनी और न्यायिक सुधार:

  • फास्ट-ट्रैक अदालतें: आतंकवाद से संबंधित मामलों के शीघ्र निपटान के लिए विशेष फास्ट-ट्रैक अदालतों की स्थापना करना, जो सुनवाई को समयबद्ध तरीके से पूरा करें।
  • कानूनी ढांचा: मौजूदा कानूनों (जैसे UAPA) की समीक्षा करना ताकि वे आधुनिक आतंकी खतरों से प्रभावी ढंग से निपट सकें, लेकिन साथ ही मानवाधिकारों का भी पूरा ध्यान रखा जाए।
  • अभियोजन पक्ष की क्षमता: अभियोजन अधिकारियों की विशेषज्ञता और क्षमता बढ़ाना, ताकि वे जटिल मामलों को प्रभावी ढंग से अदालत में पेश कर सकें। इसके लिए उन्हें बेहतर प्रशिक्षण और संसाधन उपलब्ध कराए जाएं।

5. पीड़ित सहायता और पुनर्वास:

  • न्याय प्रक्रिया के असफल होने की स्थिति में, पीड़ितों और उनके परिवारों के लिए पर्याप्त मुआवजा, मनोवैज्ञानिक सहायता और पुनर्वास सुनिश्चित करना।

6. जनता का विश्वास:

  • न्यायिक प्रणाली में जनता के विश्वास को बनाए रखना महत्वपूर्ण है। पारदर्शिता और जवाबदेही के माध्यम से यह सुनिश्चित करना कि न्याय होता हुआ दिखे।

यह आवश्यक है कि हम इस फैसले को एक विफलता के रूप में नहीं, बल्कि हमारी प्रणाली में सुधार के अवसर के रूप में देखें। 188 बेकसूरों की मौत के लिए जिम्मेदार असली अपराधियों को पकड़ना और उन्हें न्याय के कटघरे में लाना भारत की संप्रभुता और सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह सुनिश्चित करना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है कि भविष्य में ऐसी भयावह घटनाओं के दोषियों को कभी भी कानून की पकड़ से बचने का मौका न मिले, और इसके लिए हमें अपनी जांच और अभियोजन की नींव को मजबूत करना होगा।

UPSC परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न (Practice Questions for UPSC Exam)

प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) – 10 MCQs

(यहां 10 MCQs, उनके उत्तर और व्याख्या प्रदान करें)

1. बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा 2006 मुंबई ट्रेन धमाकों के मामले में सभी आरोपियों को बरी करने का प्राथमिक कारण क्या बताया गया है?
(a) आरोपियों की बेगुनाही साबित होना
(b) अभियोजन पक्ष का उचित संदेह से परे मामला साबित करने में विफल रहना
(c) सबूतों के अभाव में समझौता होना
(d) नए सबूतों का सामने आना जो निर्दोषता साबित करते हैं

उत्तर: (b)
व्याख्या: बॉम्बे हाई कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से कहा कि अभियोजन पक्ष मामले को ‘उचित संदेह से परे’ (beyond reasonable doubt) साबित करने में विफल रहा, जो आपराधिक न्याय प्रणाली का एक मूलभूत सिद्धांत है।

2. ‘उचित संदेह से परे’ (Beyond Reasonable Doubt) का सिद्धांत भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में क्या दर्शाता है?
(a) अभियुक्त को दोषी साबित करने के लिए किसी भी प्रकार का संदेह नहीं होना चाहिए।
(b) अभियुक्त को दोषी साबित करने के लिए केवल कुछ संदेह होना चाहिए।
(c) अभियुक्त को दोषी साबित करने के लिए 50% से अधिक संभावना होनी चाहिए।
(d) अभियुक्त को तब तक निर्दोष माना जाना चाहिए जब तक कि उस पर लगाए गए आरोप पूरी तरह से साबित न हो जाएं।

उत्तर: (d)
व्याख्या: ‘उचित संदेह से परे’ का अर्थ है कि अभियोजन पक्ष को अपराध के प्रत्येक आवश्यक तत्व को इतनी दृढ़ता से स्थापित करना चाहिए कि जूरी या न्यायाधीश के मन में अभियुक्त की संलिप्तता के बारे में कोई उचित संदेह न रहे। यदि कोई भी उचित संदेह मौजूद है, तो अभियुक्त को बरी कर दिया जाना चाहिए।

3. 2006 मुंबई ट्रेन धमाके किस रेलवे लाइन पर हुए थे?
(a) सेंट्रल रेलवे लाइन
(b) वेस्टर्न रेलवे लाइन
(c) हार्बर रेलवे लाइन
(d) कोंकण रेलवे लाइन

उत्तर: (b)
व्याख्या: 2006 के बम धमाके मुंबई की वेस्टर्न रेलवे लाइन पर हुए थे, जिसमें माहिम, बांद्रा, खार रोड आदि स्टेशन शामिल थे।

4. महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (MCOCA) के तहत दिए गए कबूलनामे की क्या विशेषता है जिसके कारण वे अक्सर न्यायिक जांच के दायरे में आते हैं?
(a) ये केवल न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने दिए जा सकते हैं।
(b) ये पुलिस अधिकारी के समक्ष दिए गए हों तो भी स्वीकार्य होते हैं, बशर्ते कुछ शर्तें पूरी हों।
(c) इन्हें कभी भी साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
(d) ये केवल आरोपियों द्वारा लिखित रूप में दिए जा सकते हैं।

उत्तर: (b)
व्याख्या: सामान्य आपराधिक कानूनों (CrPC) के तहत पुलिस के सामने दिए गए कबूलनामे स्वीकार्य नहीं होते, लेकिन MCOCA जैसे विशेष कानूनों में, कुछ शर्तों के तहत (जैसे कि वह एक पुलिस अधीक्षक या उससे ऊपर के अधिकारी द्वारा दर्ज किया गया हो और स्वेच्छिक हो) इन्हें साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। हालाँकि, इनकी स्वैच्छिकता पर अक्सर सवाल उठते हैं।

5. आपराधिक न्याय प्रणाली में “गवाहों का मुकर जाना” (Hostile Witness) क्या दर्शाता है?
(a) एक गवाह जो अभियोजन या बचाव पक्ष के लिए शत्रुतापूर्ण होता है।
(b) एक गवाह जो अपनी पिछली गवाही या बयान से मुकर जाता है और अदालत में उसे बदलना चाहता है।
(c) एक गवाह जिसे अदालत द्वारा दोषी ठहराया गया हो।
(d) एक गवाह जो अदालत में पेश होने से इनकार करता है।

उत्तर: (b)
व्याख्या: एक ‘मुकर जाने वाला गवाह’ वह होता है जो अपनी पिछली गवाही या पुलिस को दिए गए बयान से अदालत में पलट जाता है, जिससे अभियोजन पक्ष के मामले को कमजोर कर देता है।

6. भारतीय संविधान का कौन सा अनुच्छेद ‘निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार’ (Right to Fair Trial) को सुनिश्चित करता है?
(a) अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार)
(b) अनुच्छेद 20 (अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण)
(c) अनुच्छेद 21 (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण)
(d) उपरोक्त सभी

उत्तर: (d)
व्याख्या: निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता), अनुच्छेद 20 (दोहरे दंड से संरक्षण, आत्म-अभिशंसा के विरुद्ध संरक्षण) और अनुच्छेद 21 (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता) के तहत निहित है। यह न्याय के एक मूलभूत सिद्धांत के रूप में माना जाता है।

7. भारत में आतंकवाद से संबंधित मामलों की जांच के लिए स्थापित एक प्रमुख केंद्रीय एजेंसी कौन सी है?
(a) केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI)
(b) राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA)
(c) इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB)
(d) रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (RAW)

उत्तर: (b)
व्याख्या: राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) को भारत में आतंकवाद से संबंधित अपराधों की जांच के लिए 2008 के मुंबई हमलों के बाद स्थापित किया गया था।

8. आपराधिक न्याय प्रणाली में ‘चेक एंड बैलेंस’ (Checks and Balances) का सिद्धांत क्यों महत्वपूर्ण है?
(a) यह सरकार की सभी शाखाओं को एक ही अधिकार देता है।
(b) यह यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी एक शाखा (जैसे कार्यपालिका या विधायिका) अपनी शक्ति का दुरुपयोग न करे।
(c) यह न्यायपालिका को विधायिका के कानूनों को रद्द करने की शक्ति देता है।
(d) यह सुनिश्चित करता है कि केवल सरकार ही कानून बना सकती है।

उत्तर: (b)
व्याख्या: ‘चेक एंड बैलेंस’ का सिद्धांत सुनिश्चित करता है कि सरकार की कोई भी एक शाखा (कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका) अपनी शक्ति का दुरुपयोग न करे और सभी शाखाएं एक-दूसरे पर निगरानी रखती रहें, जिससे सत्ता का संतुलन बना रहे।

9. भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act), 1872 की धारा 25 किससे संबंधित है?
(a) न्यायिक घोषणा की वैधता
(b) पुलिस अधिकारी के समक्ष की गई स्वीकारोक्ति की अस्वीकार्यता
(c) विशेषज्ञों की राय की स्वीकार्यता
(d) दस्तावेज साक्ष्य की परिभाषा

उत्तर: (b)
व्याख्या: भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 25 स्पष्ट रूप से कहती है कि किसी पुलिस अधिकारी से की गई स्वीकारोक्ति, उस व्यक्ति के विरुद्ध साबित नहीं की जा सकती, जो उस पर किसी अपराध का अभियुक्त है। यही कारण है कि MCOCA जैसे विशेष कानूनों में पुलिस के सामने की गई स्वीकारोक्ति को स्वीकार्य बनाने के लिए अलग प्रावधान हैं, जिन पर अक्सर बहस होती है।

10. ‘बिक्री या बरी’ (Acquit or Convict) के सिद्धांत में, अदालत का क्या कर्तव्य होता है यदि अभियोजन पक्ष उचित संदेह से परे मामला साबित करने में विफल रहता है?
(a) अभियुक्त को नए सिरे से मुकदमा चलाने का आदेश देना।
(b) अभियुक्त को तुरंत दोषी ठहराना।
(c) अभियुक्त को बरी कर देना।
(d) अभियुक्त को सामुदायिक सेवा का आदेश देना।

उत्तर: (c)
व्याख्या: भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली के मूल सिद्धांतों में से एक है कि यदि अभियोजन पक्ष अभियुक्त के अपराध को उचित संदेह से परे साबित करने में विफल रहता है, तो अदालत को अभियुक्त को बरी कर देना चाहिए, चाहे अपराध कितना भी गंभीर क्यों न हो।

मुख्य परीक्षा (Mains)

(यहां 3-4 मेन्स के प्रश्न प्रदान करें)

1. 2006 मुंबई ट्रेन धमाकों के मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले को ध्यान में रखते हुए, भारत में आतंकवाद से संबंधित मामलों के अभियोजन में आने वाली प्रमुख चुनौतियों का विश्लेषण करें। इन चुनौतियों का समाधान करने के लिए क्या सुधारात्मक कदम उठाए जा सकते हैं? (15 अंक, 250 शब्द)

2. “न्याय में देरी न्याय से इनकार के बराबर है, लेकिन अनुचित सजा भी अन्याय है।” 2006 मुंबई ट्रेन धमाकों के मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले के आलोक में इस कथन का आलोचनात्मक परीक्षण करें और भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में ‘उचित संदेह से परे’ (Beyond Reasonable Doubt) सिद्धांत के महत्व पर प्रकाश डालें। (15 अंक, 250 शब्द)

3. एक स्वतंत्र न्यायपालिका की भूमिका किसी भी लोकतांत्रिक देश में क्यों महत्वपूर्ण है? 2006 मुंबई ट्रेन धमाकों के मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले का उदाहरण देते हुए बताएं कि न्यायपालिका कैसे कानून के शासन और नागरिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करती है। (10 अंक, 150 शब्द)

4. भारत में आतंकवाद विरोधी जांच और अभियोजन की दक्षता और प्रभावशीलता बढ़ाने के लिए आप क्या विशिष्ट उपाय सुझाएंगे? गवाह संरक्षण, फोरेंसिक विज्ञान और अंतर-एजेंसी समन्वय के संदर्भ में अपने उत्तर की पुष्टि करें। (15 अंक, 250 शब्द)

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