उपराष्ट्रपति धनखड़ का ‘अचानक’ इस्तीफा: सरकार की असहजता और अनभिज्ञता का खेल?
चर्चा में क्यों? (Why in News?):
भारत के राजनीतिक गलियारों में हाल ही में एक ऐसी खबर ने हलचल मचा दी, जिसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। खबर यह थी कि भारत के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। हालांकि, यह इस्तीफा किसी संवैधानिक संकट या अविश्वास प्रस्ताव के कारण नहीं था, बल्कि इसके पीछे कथित तौर पर उनकी “अतिसक्रियता” बताई जा रही है, जिससे सरकार असहज महसूस कर रही थी। लेकिन सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि इस इस्तीफे की सरकार को ‘भनक’ तक नहीं थी। यह स्थिति अपने आप में अनोखी है और संवैधानिक पदों की मर्यादा, सरकार-पदधारक संबंधों और राजनीतिक सक्रियता की सीमा पर गहन चिंतन को बढ़ावा देती है। आइए, इस जटिल मामले की तह तक जाकर इसके विभिन्न आयामों को समझते हैं, जो UPSC अभ्यर्थियों के लिए न केवल समसामयिक ज्ञान बल्कि राजव्यवस्था और शासन के सिद्धांतों को समझने के लिए भी महत्वपूर्ण है।
उपराष्ट्रपति का पद: संवैधानिक प्रावधान और गरिमा (The Office of Vice President: Constitutional Provisions and Dignity)
भारतीय संविधान ने उपराष्ट्रपति के पद को अत्यंत महत्वपूर्ण और गरिमामयी बनाया है। यह पद देश के दूसरे सर्वोच्च संवैधानिक पद के रूप में स्थापित है।
संवैधानिक रूपरेखा (Constitutional Framework):
- अनुच्छेद 63: भारत का एक उपराष्ट्रपति होगा।
- अनुच्छेद 64: उपराष्ट्रपति राज्य सभा का पदेन सभापति होगा और लाभ का कोई अन्य पद धारण नहीं करेगा।
- अनुच्छेद 65: राष्ट्रपति के पद में आकस्मिक रिक्ति या उनकी अनुपस्थिति में उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के रूप में कार्य करेगा या उनके कृत्यों का निर्वहन करेगा।
- अनुच्छेद 66: उपराष्ट्रपति का चुनाव संसद के दोनों सदनों के सदस्यों से मिलकर बने निर्वाचक मंडल द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा होता है।
- अनुच्छेद 67: उपराष्ट्रपति का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है, लेकिन वह राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा त्यागपत्र दे सकता है। उसे राज्य सभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित संकल्प द्वारा हटाया भी जा सकता है, जिसे लोक सभा स्वीकार करती है।
प्रमुख भूमिकाएँ (Key Roles):
- राज्य सभा का सभापति: यह उपराष्ट्रपति की सबसे प्रमुख भूमिका है। इस क्षमता में, वह सदन की कार्यवाही का संचालन करते हैं, वाद-विवाद को नियंत्रित करते हैं, अनुशासन बनाए रखते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि नियमों का पालन हो। सभापति के रूप में, उनसे निष्पक्षता और तटस्थता की अपेक्षा की जाती है, ठीक वैसे ही जैसे लोकसभा अध्यक्ष से।
- कार्यवाहक राष्ट्रपति: राष्ट्रपति के निधन, त्यागपत्र, महाभियोग या अन्य कारणों से पद रिक्त होने पर उपराष्ट्रपति कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करते हैं, जब तक कि नया राष्ट्रपति नहीं चुना जाता। इस अवधि में वे राष्ट्रपति के सभी अधिकारों और कर्तव्यों का पालन करते हैं।
- विदेशों में देश का प्रतिनिधित्व: उपराष्ट्रपति अक्सर भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए विदेशी दौरों पर जाते हैं, द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करते हैं।
यह पद भारत के संघीय ढांचे और संसदीय लोकतंत्र में एक महत्वपूर्ण संतुलनकारी शक्ति के रूप में कार्य करता है। उपराष्ट्रपति से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने राजनीतिक अतीत से ऊपर उठकर पद की गरिमा और तटस्थता बनाए रखें, खासकर जब वे राज्य सभा के सभापति के रूप में कार्य कर रहे हों।
जगदीप धनखड़ का कार्यकाल: एक ‘अतिसक्रिय’ उपाध्यक्ष? (Jagdeep Dhankhar’s Tenure: An ‘Over-active’ Vice President?)
जगदीप धनखड़ का उपराष्ट्रपति के रूप में कार्यकाल कई मायनों में चर्चा का विषय रहा है। उनके पूर्ववर्ती, विशेष रूप से एम. वेंकैया नायडू और हामिद अंसारी, ने भी अपनी भूमिका में सक्रियता दिखाई, लेकिन धनखड़ की सक्रियता को कुछ हलकों में ‘अतिसक्रियता’ के रूप में देखा गया, खासकर उनकी सार्वजनिक टिप्पणियों और कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर उनके विचारों को लेकर।
‘अतिसक्रियता’ के उदाहरण (Examples of ‘Over-activism’):
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न्यायपालिका पर टिप्पणियाँ:
“न्यायपालिका की शक्तियों की बात करते हुए, जगदीप धनखड़ ने कई बार न्यायपालिका द्वारा कानूनों को ‘रद्द’ करने की शक्ति पर सवाल उठाया। उन्होंने संविधान के ‘मूल ढांचे’ (Basic Structure) के सिद्धांत पर भी पुनर्विचार की बात कही, जो केशवानंद भारती मामले से निकला है। उन्होंने कहा कि संसदीय संप्रभुता सर्वोपरि है और न्यायपालिका को विधायिका के कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।”
यह टिप्पणियाँ विधायिका और न्यायपालिका के बीच शक्ति संतुलन पर एक गंभीर बहस का हिस्सा थीं। हालांकि, एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा इस तरह की सार्वजनिक टिप्पणियाँ, खासकर न्यायपालिका के खिलाफ, असामान्य मानी गईं।
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संसद में वाद-विवाद और विपक्ष से संबंध:
राज्य सभा के सभापति के रूप में, धनखड़ ने सदन में अनुशासन और व्यवस्था बनाए रखने पर जोर दिया। हालांकि, विपक्ष ने कई बार उन पर सत्ताधारी दल के पक्ष में झुकाव रखने का आरोप लगाया। सदन में हंगामे और विधेयकों को पारित करने की प्रक्रिया पर उनकी कठोर टिप्पणियाँ भी चर्चा में रहीं। -
फेडरलिज्म पर विचार:
उन्होंने संघीय ढांचे के विभिन्न पहलुओं पर भी टिप्पणी की, खासकर केंद्र-राज्य संबंधों और राज्यों की सीमाओं से जुड़े मुद्दों पर। -
राजनीतिक टिप्पणियाँ:
हालांकि उपराष्ट्रपति से तटस्थ रहने की उम्मीद की जाती है, धनखड़ ने कई बार ऐसी टिप्पणियाँ कीं, जिन्हें राजनीतिक रूप से देखा गया, खासकर सरकार की नीतियों का समर्थन करने या आलोचकों का जवाब देने के संदर्भ में।
इन उदाहरणों ने एक धारणा बनाई कि जगदीप धनखड़ अपने पूर्ववर्तियों की तुलना में अधिक मुखर और राजनीतिक रूप से सक्रिय उपराष्ट्रपति थे। सवाल यह उठता है कि क्या यह सक्रियता उनके संवैधानिक दायित्वों की सीमा में थी या उससे आगे निकल गई, जिससे सरकार के लिए ‘असहजता’ उत्पन्न हुई?
सरकार की ‘असहजता’ के संभावित कारण (Possible Reasons for Government’s ‘Discomfort’)
यह समझना महत्वपूर्ण है कि सरकार को अपने ही चुने हुए उपराष्ट्रपति से ‘असहजता’ क्यों महसूस हो सकती है, खासकर जब वह सरकार की नीतियों और विचारों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण दिखें। ‘असहजता’ शब्द कई पहलुओं को इंगित करता है:
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अत्यधिक सार्वजनिक मुखरता:
एक उपराष्ट्रपति से आमतौर पर पद की गरिमा के अनुरूप संयमित और नपे-तुले बयान देने की अपेक्षा की जाती है। यदि उपराष्ट्रपति अपनी सीमा से अधिक मुखर हो जाते हैं, खासकर ऐसे मुद्दों पर जो संवेदनशील हों या जिन पर सरकार एक अलग रणनीति अपनाना चाहती हो, तो यह सरकार के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकता है। उदाहरण के लिए, न्यायपालिका पर उनकी टिप्पणियों ने विधायिका-न्यायपालिका के टकराव को और गहरा कर दिया, जबकि सरकार शायद पर्दे के पीछे से इस मुद्दे को सुलझाना चाहती हो। -
रणनीतिक विसंगति (Strategic Misalignment):
हो सकता है कि सरकार कुछ मुद्दों पर ‘सॉफ्ट’ रुख अपनाना चाहती हो, लेकिन उपराष्ट्रपति का ‘हार्ड’ रुख सरकार की समग्र रणनीति से मेल न खाता हो। यह एक ऐसी स्थिति है जहां सार्वजनिक रूप से एक ही पक्ष के दो प्रमुख व्यक्ति अलग-अलग राग अलापते दिखते हैं, जिससे भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है या सरकार की छवि पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। -
संवैधानिक पद की गरिमा पर प्रभाव:
उपराष्ट्रपति का पद दलीय राजनीति से ऊपर माना जाता है। यदि उपराष्ट्रपति लगातार राजनीतिक बयानों में संलग्न रहते हैं या किसी विशेष राजनीतिक विचारधारा के प्रबल समर्थक के रूप में देखे जाते हैं, तो यह पद की संवैधानिक निष्पक्षता और गरिमा पर सवाल उठा सकता है। सरकार नहीं चाहेगी कि उसके अपने सहयोगी द्वारा किसी संवैधानिक पद की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचे, भले ही इरादा नेक हो। -
अंतर-संस्थागत संबंधों पर असर:
उदाहरण के लिए, न्यायपालिका पर उपराष्ट्रपति की सार्वजनिक टिप्पणियों ने विधायिका और न्यायपालिका के बीच संबंधों को तनावपूर्ण बनाया। सरकार, जो इन दोनों स्तंभों के बीच सुचारु संबंध बनाए रखना चाहती है, ऐसी स्थिति से असहज हो सकती है। -
आंतरिक संचार की कमी या गलतफहमी:
संभव है कि उपराष्ट्रपति की कार्यशैली और उनके बयानों को लेकर सरकार के भीतर एक निश्चित अपेक्षा रही हो, जो पूरी नहीं हुई। यह संचार के अंतराल या भूमिकाओं की समझ में मतभेद के कारण भी हो सकता है।
संक्षेप में, ‘असहजता’ केवल असहमति नहीं थी, बल्कि यह संभवतः सरकार की रणनीतिक जरूरतों, पद की गरिमा बनाए रखने की इच्छा और अंतर-संस्थागत संतुलन को लेकर उत्पन्न हुई चिंता का परिणाम थी।
इस्तीफे की ‘भनक न होने’ का रहस्य (The Mystery of ‘Unawareness’ of Resignation)
यह एक सबसे puzzling पहलू है। भारत जैसे देश में, जहां राजनीतिक संवाद और खुफिया जानकारी का तंत्र इतना मजबूत है, वहां उपराष्ट्रपति जैसे उच्च संवैधानिक पद के इस्तीफे की सरकार को ‘भनक न होना’ अविश्वसनीय लगता है। इसके पीछे कई संभावित कारण हो सकते हैं, जो विभिन्न प्रकार की व्याख्याओं को जन्म देते हैं:
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व्यक्तिगत निर्णय और गोपनीयता:
यह संभव है कि उपराष्ट्रपति ने व्यक्तिगत कारणों से यह निर्णय लिया हो और इसे अत्यंत गोपनीय रखा हो। हो सकता है कि उन्होंने सरकार को सूचित करने से पहले अपने इस्तीफे की प्रक्रिया को पूरा करना चाहा हो, ताकि किसी भी बाहरी हस्तक्षेप या दबाव से बचा जा सके। -
अचानक लिया गया निर्णय:
कई बार महत्वपूर्ण निर्णय अचानक और तात्कालिक परिस्थितियों के कारण लिए जाते हैं। हो सकता है कि किसी विशेष घटना या दबाव ने उन्हें तुरंत इस्तीफा देने पर मजबूर किया हो, जिससे किसी को सूचित करने का समय ही न मिला हो। -
सरकार और उपराष्ट्रपति के बीच संवादहीनता:
यदि सरकार और उपराष्ट्रपति के बीच पहले से ही ‘असहजता’ थी, तो यह संभव है कि दोनों के बीच प्रभावी संवाद की कमी रही हो। ऐसे में, उपराष्ट्रपति ने अपने निर्णय को साझा न करने का चुनाव किया हो, खासकर यदि उन्हें लगा हो कि सरकार उनके विचारों को महत्व नहीं देती या उन पर दबाव डाल सकती है। -
राजनीतिक संदेश या रणनीति:
इस्तीफे की भनक न होना अपने आप में एक राजनीतिक संदेश हो सकता है। यह यह दर्शा सकता है कि उपराष्ट्रपति ने स्वायत्त रूप से निर्णय लिया और वे किसी के दबाव में नहीं थे। यह सरकार को एक प्रकार का ‘झटका’ देने या यह दिखाने का एक तरीका हो सकता है कि वे अपने सिद्धांतों पर अडिग हैं। -
खुफिया विफलता या गलत आकलन:
यह सरकार के खुफिया तंत्र की विफलता या उपराष्ट्रपति के इरादों का गलत आकलन भी हो सकता है। सरकार ने शायद उनकी ‘अतिसक्रियता’ को एक मामूली मुद्दा समझा हो और यह उम्मीद न की हो कि यह इस्तीफे तक पहुंच जाएगा। -
धारणा प्रबंधन (Perception Management):
संभव है कि ‘भनक न होने’ की बात एक धारणा बनाने के लिए फैलाई गई हो। यह जनता में यह संदेश देने के लिए हो सकता है कि सरकार इस मामले में उतनी शामिल नहीं थी जितनी प्रतीत होती है, या यह कि उपराष्ट्रपति का निर्णय पूरी तरह से उनका अपना था।
यह स्थिति भारतीय राजनीति में एक दुर्लभ उदाहरण है, जहां एक उच्च संवैधानिक पदधारक बिना किसी पूर्व सूचना के अपना पद छोड़ देता है। यह सरकार और संवैधानिक संस्थाओं के बीच संबंधों की जटिलता को उजागर करता है।
संवैधानिक पद की गरिमा और राजनीतिक भूमिका में संतुलन (Balancing the Dignity of a Constitutional Post and Political Role)
उपराष्ट्रपति का पद, विशेषकर राज्य सभा के सभापति के रूप में, एक अद्वितीय स्थिति रखता है। एक ओर, वे एक राजनीतिक दल से आते हैं और उनके पास अपनी विचारधारा होती है। दूसरी ओर, वे एक संवैधानिक पद पर होते हैं, जिनसे निष्पक्षता और तटस्थता की अपेक्षा की जाती है। यह संतुलन साधने की चुनौती हमेशा से रही है।
संतुलन की आवश्यकता (Need for Balance):
- निष्पक्षता की उम्मीद: राज्य सभा के सभापति के रूप में, उपराष्ट्रपति को सभी दलों के सदस्यों के साथ समान व्यवहार करना होता है, भले ही उनके राजनीतिक विचार कुछ भी हों। कार्यवाही का सुचारु संचालन, नियमों का पालन सुनिश्चित करना और सभी को अपनी बात रखने का अवसर देना उनकी निष्पक्षता का प्रमाण होता है।
- संस्थागत स्वायत्तता: संवैधानिक पदधारियों को सरकार के हस्तक्षेप से मुक्त रहकर काम करना चाहिए। उनकी स्वतंत्रता लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करती है।
- गरिमा और उदाहरण: उपराष्ट्रपति का पद एक प्रेरणा है। उनके आचरण और बयानों से देश के अन्य संवैधानिक संस्थानों और लोकतांत्रिक मूल्यों पर सीधा असर पड़ता है।
ऐतिहासिक प्रेसीडेंट (Historical Precedents):
भारतीय इतिहास में कई ऐसे उपराष्ट्रपति रहे हैं जिन्होंने इस संतुलन को बखूबी साधा:
- डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन: पहले उपराष्ट्रपति, जिन्होंने विद्वत्ता और निष्पक्षता का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया। वे सदन में वाद-विवाद के दौरान हस्तक्षेप नहीं करते थे, बल्कि सदस्यों को अपने तर्क प्रस्तुत करने के लिए प्रोत्साहित करते थे।
- मोहम्मद हामिद अंसारी: अपने कार्यकाल के दौरान, उन्होंने सदन में विपक्ष को पर्याप्त समय दिया और अक्सर संसदीय मर्यादाओं के उल्लंघन पर अपनी चिंता व्यक्त की। कुछ हलकों में उन्हें ‘सरकार विरोधी’ भी कहा गया, लेकिन उन्होंने अपने पद की निष्पक्षता बनाए रखने का प्रयास किया।
- एम. वेंकैया नायडू: अपने राजनीतिक अतीत के बावजूद, उन्होंने राज्य सभा के सभापति के रूप में निष्पक्षता बनाए रखने का प्रयास किया। उन्होंने सदन को सुचारु रूप से चलाने के लिए कई सुधार किए और अक्सर सदस्यों को नियमों का पालन करने की सलाह दी।
हालांकि, यह संतुलन कभी-कभी राजनीतिक दबावों, व्यक्तिगत विचारधाराओं या बदलती राजनीतिक गतिशीलता के कारण बाधित हो सकता है। जगदीप धनखड़ के मामले में, यह संतुलन शायद ‘अतिसक्रियता’ की धारणा और सरकार की ‘असहजता’ के बीच कहीं खो गया। यह दर्शाता है कि संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के लिए व्यक्तिगत विश्वास और संवैधानिक कर्तव्यों के बीच की रेखा कितनी बारीक हो सकती है।
आगे की राह: संस्थागत स्वायत्तता और संवाद (Way Forward: Institutional Autonomy and Dialogue)
यह घटना भारतीय लोकतंत्र के लिए कई महत्वपूर्ण सबक सिखाती है। भविष्य में ऐसी स्थितियों से बचने और संवैधानिक संस्थाओं की मजबूती के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए जा सकते हैं:
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संवैधानिक पदों की गरिमा का सम्मान:
सरकार, विपक्ष और स्वयं पदधारियों को संवैधानिक पदों की गरिमा और स्वायत्तता का सम्मान करना चाहिए। इन पदों को राजनीतिक मोहरा नहीं बनाया जाना चाहिए।“संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि एक जीवंत आत्मा है जो हमारे लोकतंत्र को साँस देती है। इसके संस्थागत स्तंभों का सम्मान इसका आधार है।”
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स्पष्ट भूमिका और सीमाएँ:
यद्यपि संविधान विस्तृत है, कुछ ग्रे क्षेत्रों को लेकर स्पष्टता आवश्यक है। संवैधानिक पदधारियों को अपनी भूमिकाओं और सीमाओं को समझना चाहिए, और उनसे उम्मीद की जाने वाली तटस्थता का पालन करना चाहिए। -
प्रभावी संवाद तंत्र:
सरकार और संवैधानिक प्रमुखों के बीच एक मजबूत और खुला संवाद तंत्र होना चाहिए। गलतफहमी या ‘असहजता’ को दूर करने के लिए अनौपचारिक बैठकें और चर्चाएँ सहायक हो सकती हैं। ‘भनक न होना’ एक स्वस्थ लोकतंत्र का लक्षण नहीं है। -
प्रेस और जनता की भूमिका:
मीडिया और जागरूक नागरिक समाज को संवैधानिक पदों के आचरण पर रचनात्मक बहस करनी चाहिए। यह पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने में मदद करेगा। -
नैतिक नेतृत्व:
राजनीतिक नेताओं को उच्च नैतिक मानकों का पालन करना चाहिए। उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि संवैधानिक नियुक्तियाँ योग्यता और निष्पक्षता के आधार पर हों, न कि केवल राजनीतिक निष्ठा के आधार पर। -
संसदीय सर्वोच्चता बनाम न्यायिक समीक्षा का संतुलन:
न्यायपालिका पर उपराष्ट्रपति की टिप्पणियों के संदर्भ में, विधायिका और न्यायपालिका के बीच शक्ति के संतुलन पर एक स्वस्थ और सम्मानजनक बहस आवश्यक है। कोई भी संस्था दूसरे पर हावी न हो, और एक-दूसरे के कार्यक्षेत्र का सम्मान किया जाए।
संस्थागत संबंधों को मजबूत करना और संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता ही हमारे लोकतंत्र को ऐसी ‘अचानक’ घटनाओं से बचा सकती है और उसे अधिक लचीला और जवाबदेह बना सकती है। यह घटना हमें याद दिलाती है कि लोकतंत्र की इमारत को मजबूत बनाए रखने के लिए निरंतर सतर्कता और जिम्मेदारी की आवश्यकता होती है।
निष्कर्ष (Conclusion)
उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का इस्तीफा और उसके साथ जुड़ी ‘अतिसक्रियता से असहजता’ और ‘भनक न होने’ की कहानी भारतीय राजनीति में एक दिलचस्प और जटिल प्रकरण है। यह केवल एक व्यक्ति के पद छोड़ने की घटना नहीं है, बल्कि यह संवैधानिक पदों की भूमिका, सरकार और संवैधानिक पदाधिकारियों के बीच के संबंधों की जटिलता और राजनीतिक सक्रियता की सीमाओं पर कई मूलभूत सवाल उठाती है।
यह घटना हमें याद दिलाती है कि भारत का लोकतंत्र केवल कानूनों और नियमों का एक संग्रह नहीं है, बल्कि यह संस्थागत मर्यादाओं, स्थापित परंपराओं और आपसी सम्मान के नाजुक संतुलन पर भी टिका है। उपराष्ट्रपति जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने राजनीतिक अतीत से ऊपर उठकर पद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखें, खासकर जब वे राज्य सभा के सभापति के रूप में विधायी कार्यवाही का संचालन कर रहे हों।
वहीं, सरकार के लिए भी यह महत्वपूर्ण है कि वह संवैधानिक पदाधिकारियों के साथ संवाद और समन्वय बनाए रखे, ताकि ‘असहजता’ की स्थिति उत्पन्न न हो और यदि हो भी, तो उसका समाधान संवैधानिक दायरे में सम्मानजनक तरीके से किया जा सके। ‘भनक न होना’ जैसा पहलू एक गंभीर संचार खाई या गलत आकलन को दर्शाता है, जो भविष्य में बड़े संस्थागत टकरावों का कारण बन सकता है।
अंततः, इस घटना से सबक लेते हुए, सभी हितधारकों – सरकार, विपक्ष, संवैधानिक पदाधिकारी और नागरिक समाज – को संवैधानिक मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराना चाहिए। संस्थागत स्वायत्तता का सम्मान, प्रभावी संवाद और पद की गरिमा को बनाए रखना ही भारतीय लोकतंत्र को मजबूत और जीवंत बनाए रखने की कुंजी है। यह घटना यूपीएससी उम्मीदवारों के लिए राजव्यवस्था, शासन और समसामयिक घटनाओं के अंतर-संबंधों को समझने का एक उत्कृष्ट केस स्टडी प्रस्तुत करती है।
UPSC परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न (Practice Questions for UPSC Exam)
प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) – 10 MCQs
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प्रश्न 1: भारत के उपराष्ट्रपति के पद के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- उपराष्ट्रपति राज्य सभा का पदेन सभापति होता है।
- उपराष्ट्रपति का चुनाव संसद के दोनों सदनों और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों से मिलकर बने निर्वाचक मंडल द्वारा होता है।
- उपराष्ट्रपति को हटाने का संकल्प केवल राज्य सभा में ही प्रस्तुत किया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(A) केवल a और b
(B) केवल b और c
(C) केवल a और c
(D) a, b और c
उत्तर: (C)
व्याख्या:
कथन (a) सही है। अनुच्छेद 64 के अनुसार, उपराष्ट्रपति राज्य सभा का पदेन सभापति होता है।
कथन (b) गलत है। उपराष्ट्रपति के चुनाव में संसद के दोनों सदनों के सभी सदस्य (निर्वाचित और मनोनीत) भाग लेते हैं, जबकि राज्य विधानसभाओं के सदस्य भाग नहीं लेते। यह राष्ट्रपति के चुनाव से भिन्न है।
कथन (c) सही है। अनुच्छेद 67(b) के अनुसार, उपराष्ट्रपति को हटाने का संकल्प केवल राज्य सभा में ही प्रस्तुत किया जा सकता है, जिसे लोक सभा स्वीकार करती है। -
प्रश्न 2: भारत के उपराष्ट्रपति के त्यागपत्र के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?
(A) उपराष्ट्रपति अपना त्यागपत्र भारत के मुख्य न्यायाधीश को संबोधित करते हैं।
(B) उपराष्ट्रपति अपना त्यागपत्र राष्ट्रपति को संबोधित करते हैं।
(C) उपराष्ट्रपति अपना त्यागपत्र लोक सभा अध्यक्ष को संबोधित करते हैं।
(D) उपराष्ट्रपति अपना त्यागपत्र राज्य सभा के सभापति को संबोधित करते हैं।
उत्तर: (B)
व्याख्या: अनुच्छेद 67(a) के अनुसार, उपराष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा राष्ट्रपति को अपना पद त्याग सकता है। -
प्रश्न 3: भारतीय संविधान के किस अनुच्छेद के तहत उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है, जब राष्ट्रपति का पद रिक्त होता है?
(A) अनुच्छेद 63
(B) अनुच्छेद 64
(C) अनुच्छेद 65
(D) अनुच्छेद 66
उत्तर: (C)
व्याख्या: अनुच्छेद 65 में प्रावधान है कि राष्ट्रपति के पद में आकस्मिक रिक्ति या उनकी अनुपस्थिति में उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के रूप में कार्य करेगा या उनके कृत्यों का निर्वहन करेगा। -
प्रश्न 4: राज्य सभा के सभापति के रूप में उपराष्ट्रपति की भूमिका के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
- वह सदन में वाद-विवाद और चर्चा को नियंत्रित करते हैं।
- वह सदन के नियमों की व्याख्या करते हैं और उनका प्रवर्तन करते हैं।
- मत बराबर होने की स्थिति में उनके पास निर्णायक मत (casting vote) नहीं होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(A) केवल a और b
(B) केवल b और c
(C) केवल a और c
(D) a, b और c
उत्तर: (A)
व्याख्या:
कथन (a) और (b) सही हैं। राज्य सभा के सभापति के रूप में, उपराष्ट्रपति सदन की कार्यवाही का संचालन करते हैं, नियमों की व्याख्या करते हैं और अनुशासन बनाए रखते हैं।
कथन (c) गलत है। अनुच्छेद 100(1) के तहत, राज्य सभा के सभापति (या लोक सभा अध्यक्ष) के पास पहली बार में मत देने का अधिकार नहीं होता, लेकिन मत बराबर होने की स्थिति में उनके पास निर्णायक मत (casting vote) होता है। -
प्रश्न 5: भारत के उपराष्ट्रपति के चुनाव में कौन भाग लेते हैं?
(A) केवल संसद के निर्वाचित सदस्य
(B) संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित और मनोनीत सदस्य
(C) संसद के दोनों सदनों और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य
(D) संसद के दोनों सदनों, राज्य विधानसभाओं और केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य
उत्तर: (B)
व्याख्या: अनुच्छेद 66(1) के अनुसार, उपराष्ट्रपति का चुनाव संसद के दोनों सदनों के सदस्यों (निर्वाचित और मनोनीत दोनों) से मिलकर बने निर्वाचक मंडल द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा होता है। -
प्रश्न 6: निम्नलिखित में से कौन कभी भारत के उपराष्ट्रपति नहीं रहे हैं?
(A) डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन
(B) जाकिर हुसैन
(C) नीलम संजीव रेड्डी
(D) एम. वेंकैया नायडू
उत्तर: (C)
व्याख्या: नीलम संजीव रेड्डी भारत के राष्ट्रपति (और लोकसभा अध्यक्ष) रहे हैं, लेकिन उपराष्ट्रपति कभी नहीं रहे। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, जाकिर हुसैन और एम. वेंकैया नायडू तीनों भारत के उपराष्ट्रपति रहे हैं। -
प्रश्न 7: उपराष्ट्रपति का कार्यकाल समाप्त होने से पहले उनके पद को रिक्त करने के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- वह राष्ट्रपति को अपना त्यागपत्र दे सकते हैं।
- उन्हें राज्य सभा के सदस्यों के पूर्ण बहुमत से पारित संकल्प द्वारा हटाया जा सकता है, जिसे लोक सभा स्वीकार करती है।
- उनके निष्कासन के लिए संसद के प्रत्येक सदन में विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(A) केवल a
(B) केवल a और b
(C) केवल b और c
(D) a, b और c
उत्तर: (B)
व्याख्या:
कथन (a) सही है (अनुच्छेद 67(a))।
कथन (b) सही है (अनुच्छेद 67(b))। यहां ‘समस्त सदस्यों के बहुमत’ का अर्थ तत्कालीन कुल सदस्यों का बहुमत है, जो प्रभावी बहुमत (effective majority) के समान है।
कथन (c) गलत है। उपराष्ट्रपति को हटाने के लिए ‘विशेष बहुमत’ (जो राष्ट्रपति के महाभियोग के लिए आवश्यक है) की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि राज्य सभा में तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत (effective majority) और लोक सभा की साधारण सहमति की आवश्यकता होती है। -
प्रश्न 8: निम्नलिखित कथनों में से कौन सा राज्य सभा के सभापति की शक्तियों और कार्यों का सबसे अच्छा वर्णन करता है?
(A) वह धन विधेयक के संबंध में लोक सभा अध्यक्ष के समान शक्तियाँ रखता है।
(B) वह किसी भी विधेयक पर निर्णायक मत दे सकता है, भले ही मत बराबर न हों।
(C) वह राज्य सभा में सदन के नेता के रूप में कार्य करता है और सरकार की नीतियों का बचाव करता है।
(D) वह सदन की कार्यवाही का संचालन करता है, सदस्यों को बोलने की अनुमति देता है और अनुशासन बनाए रखता है।
उत्तर: (D)
व्याख्या:
कथन (A) गलत है। धन विधेयक के संबंध में लोक सभा अध्यक्ष के पास विशेष शक्तियाँ होती हैं (जैसे यह तय करना कि कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं), जो राज्य सभा के सभापति के पास नहीं होती।
कथन (B) गलत है। सभापति केवल मत बराबर होने की स्थिति में ही निर्णायक मत दे सकता है (अनुच्छेद 100)।
कथन (C) गलत है। राज्य सभा में सदन का नेता आमतौर पर सत्ताधारी दल का एक वरिष्ठ मंत्री होता है, न कि सभापति। सभापति एक तटस्थ भूमिका निभाता है।
कथन (D) सही है। यह राज्य सभा के सभापति की मुख्य भूमिकाओं और शक्तियों का सटीक वर्णन करता है। -
प्रश्न 9: भारत का उपराष्ट्रपति, जब राष्ट्रपति के रूप में कार्य कर रहा होता है, तो:
- वह राज्य सभा के सभापति के रूप में कार्य करना जारी रखता है।
- उसे राष्ट्रपति के सभी अधिकार और उन्मुक्तियाँ प्राप्त होती हैं।
- उसे राष्ट्रपति का वेतन और भत्ते प्राप्त होते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(A) केवल a और b
(B) केवल b और c
(C) केवल a और c
(D) a, b और c
उत्तर: (B)
व्याख्या:
कथन (a) गलत है। जब उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है, तो वह राज्य सभा के सभापति के रूप में कार्य नहीं करता। राज्य सभा का उपसभापति इस दौरान सभापति के कर्तव्यों का निर्वहन करता है।
कथन (b) सही है। अनुच्छेद 65(3) स्पष्ट रूप से कहता है कि उपराष्ट्रपति जब राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है, तो उसे राष्ट्रपति के सभी अधिकार और उन्मुक्तियाँ प्राप्त होती हैं।
कथन (c) सही है। अनुच्छेद 65(3) यह भी कहता है कि उसे राष्ट्रपति के सभी वेतन, भत्ते और विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं। -
प्रश्न 10: संविधान का ‘मूल ढाँचा’ सिद्धांत (Basic Structure Doctrine) निम्नलिखित में से किस मामले में प्रतिपादित किया गया था?
(A) गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य
(B) केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य
(C) मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ
(D) एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ
उत्तर: (B)
व्याख्या: ‘मूल ढाँचा’ सिद्धांत केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित किया गया था, जिसमें यह कहा गया था कि संसद संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन कर सकती है, लेकिन वह संविधान के ‘मूल ढांचे’ को नहीं बदल सकती।
मुख्य परीक्षा (Mains)
- “उपराष्ट्रपति का पद दलीय राजनीति से ऊपर और संवैधानिक निष्पक्षता का प्रतीक होना चाहिए।” जगदीप धनखड़ के कार्यकाल और उनके इस्तीफे पर हुई हालिया सियासत के आलोक में इस कथन का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।
- भारतीय संविधान में उपराष्ट्रपति की दोहरी भूमिका (राज्य सभा के सभापति और कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में) कैसे संवैधानिक संतुलन को बनाए रखने में मदद करती है? हाल की घटनाओं के संदर्भ में इस पद की गरिमा और राजनीतिक सक्रियता के बीच के नाजुक संतुलन की विवेचना कीजिए।
- सरकार और संवैधानिक प्रमुखों के बीच “असहजता” या “संवादहीनता” की स्थिति एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए क्यों हानिकारक है? इस तरह की परिस्थितियों से बचने और संस्थागत स्वायत्तता को बढ़ावा देने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं?
- “न्यायपालिका की शक्तियों और संसदीय संप्रभुता के बीच संतुलन भारतीय लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण पहलू है।” उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ की न्यायपालिका पर की गई टिप्पणियों और उनके कथित इस्तीफे के संदर्भ में इस कथन का परीक्षण कीजिए। क्या संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों को ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर सार्वजनिक रूप से टिप्पणी करनी चाहिए?
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