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मॉनसून का रौद्र रूप: आपदाओं की बढ़ती संख्या और उनसे निपटने की राष्ट्रीय रणनीति

मॉनसून का रौद्र रूप: आपदाओं की बढ़ती संख्या और उनसे निपटने की राष्ट्रीय रणनीति

चर्चा में क्यों? (Why in News?):

हाल ही में देश के विभिन्न हिस्सों से सामने आई प्राकृतिक आपदाओं की विचलित कर देने वाली खबरें हमारे सामने एक गंभीर चुनौती खड़ी करती हैं। एक तरफ जहां मुंबई जैसे महानगर में भारी बारिश के कारण हवाई अड्डे पर विमान के रनवे से फिसलने की घटना ने शहरी बुनियादी ढांचे की संवेदनशीलता को उजागर किया, वहीं दूसरी ओर हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्य में भूस्खलन से पति-पत्नी की दुखद मृत्यु और वैष्णो देवी मार्ग पर चार श्रद्धालुओं का घायल होना हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र पर बढ़ते दबाव और प्राकृतिक आपदाओं के प्रति हमारी तैयारियों की कमी को दर्शाता है। ये घटनाएं कोई अकेली नहीं हैं, बल्कि यह भारत में बढ़ते चरम मौसमी घटनाओं और उनके गहराते प्रभावों की एक बड़ी तस्वीर का हिस्सा हैं। यह हमें इस बात पर सोचने को मजबूर करता है कि क्या हम वास्तव में मॉनसून के इस बदलते मिजाज और उससे उपजी आपदाओं के लिए तैयार हैं?

प्राकृतिक आपदाओं का बढ़ता ग्राफ: एक राष्ट्रीय चिंता

पिछले कुछ दशकों में, भारत ने प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता में उल्लेखनीय वृद्धि देखी है। चाहे वह अप्रत्याशित बाढ़ हो, विनाशकारी भूस्खलन हो, लंबे समय तक चलने वाला सूखा हो या तीव्र चक्रवात, इन घटनाओं ने न केवल जान-माल का भारी नुकसान किया है, बल्कि देश के विकास पथ पर भी गहरी छाप छोड़ी है। इन आपदाओं का बढ़ता ग्राफ केवल मौसमी बदलावों का परिणाम नहीं है, बल्कि यह जलवायु परिवर्तन, अनियोजित शहरीकरण, वनों की कटाई और पर्यावरण के प्रति असंवेदनशील विकास मॉडल का एक जटिल मिश्रण है।

“प्रकृति कोई आपदा नहीं भेजती, वह बस अपनी प्रतिक्रिया देती है।”

मुंबई की बारिश: शहरी बाढ़ का एक स्थायी संकट

मुंबई, भारत की आर्थिक राजधानी, हर साल मॉनसून के दौरान भारी बारिश और उसके परिणामस्वरूप होने वाली बाढ़ से जूझती है। इस साल भी विमान के फिसलने की घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि हमारी शहरी प्रणालियां अभी भी इन चरम मौसमी घटनाओं के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं हैं।

मुंबई में शहरी बाढ़ के प्रमुख कारण:

  1. अवैज्ञानिक शहरीकरण और अतिक्रमण:
    • मैंग्रोव और वेटलैंड्स का विनाश: मैंग्रोव और आर्द्रभूमि प्राकृतिक स्पंज का काम करते हैं, जो अतिरिक्त पानी को सोखकर बाढ़ को नियंत्रित करते हैं। मुंबई में इनके बड़े पैमाने पर विनाश ने शहर की प्राकृतिक जल निकासी क्षमता को गंभीर रूप से कमजोर किया है।
    • तटीय नियमन क्षेत्र (CRZ) का उल्लंघन: CRZ के नियमों का उल्लंघन कर निर्माण कार्य ने समुद्र के पानी के शहर में प्रवेश का रास्ता खोल दिया है और जल निकासी को बाधित किया है।
    • खुली जगहों और पार्कों की कमी: कंक्रीट के जंगल में बदलता शहर पानी को जमीन में सोखने का मौका नहीं देता, जिससे जलभराव होता है।
  2. अपरिप्याप्त और पुरानी जल निकासी प्रणाली:
    • औपनिवेशिक युग की प्रणाली: मुंबई की अधिकांश जल निकासी प्रणाली ब्रिटिश काल की है, जो आज की बढ़ती आबादी और जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली अत्यधिक वर्षा को संभालने में सक्षम नहीं है।
    • गाद और कचरे का जमाव: नियमित रखरखाव की कमी और ठोस कचरे का अनुचित निपटान नालों को बंद कर देता है, जिससे पानी का बहाव अवरुद्ध होता है।
    • स्लुइस गेट्स की समस्या: समुद्र के स्तर में वृद्धि के कारण उच्च ज्वार के दौरान स्लुइस गेट्स को बंद रखना पड़ता है, जिससे शहर के भीतर पानी का निकास रुक जाता है।
  3. जलवायु परिवर्तन का प्रभाव:
    • चरम वर्षा की घटनाएँ: जलवायु परिवर्तन के कारण अब कम समय में अधिक तीव्र वर्षा की घटनाएँ बढ़ गई हैं, जिन्हें मौजूदा जल निकासी प्रणाली संभाल नहीं पाती।
    • समुद्र के स्तर में वृद्धि: यह तटीय शहरों जैसे मुंबई के लिए एक दीर्घकालिक खतरा है, जो जल निकासी को प्रभावित करता है और खारे पानी के प्रवेश को बढ़ाता है।
  4. मानव व्यवहार और जागरूकता की कमी:
    • कचरा फेंकना: नागरिक अक्सर कचरा नालों में फेंक देते हैं, जिससे रुकावटें पैदा होती हैं।
    • अस्थायी अतिक्रमण: झोपड़पट्टियों और अवैध निर्माणों से जलमार्ग अवरुद्ध होते हैं।

शहरी बाढ़ के प्रभाव:

  • आर्थिक नुकसान: व्यापार ठप्प, परिवहन बाधित, संपत्ति का नुकसान।
  • स्वास्थ्य जोखिम: जलजनित बीमारियाँ, मच्छरों का प्रकोप।
  • परिवहन और बुनियादी ढांचे पर दबाव: सड़कें, रेलवे, हवाई अड्डे प्रभावित।
  • मनोवैज्ञानिक प्रभाव: तनाव, चिंता, दैनिक जीवन में व्यवधान।

समाधान की दिशा: मुंबई के लिए आगे की राह

मुंबई को एक ‘स्पंज सिटी’ में बदलने की आवश्यकता है, जहाँ पानी को सोखने और निकालने की प्राकृतिक क्षमता को बहाल किया जाए।

  • एकीकृत जल निकासी प्रबंधन: आधुनिक जल निकासी प्रणालियों का उन्नयन, जिसमें बड़े तूफानी जल नालियों और भूमिगत भंडारण टैंकों का निर्माण शामिल हो।
  • हरित बुनियादी ढाँचा: मैंग्रोव और आर्द्रभूमि का संरक्षण, शहरी हरियाली को बढ़ावा देना, वर्षा जल संचयन को अनिवार्य करना।
  • भूमि उपयोग योजना का सख्त कार्यान्वयन: संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण पर प्रतिबंध, CRZ नियमों का कड़ाई से पालन।
  • प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली: वर्षा की तीव्रता और संभावित जलभराव क्षेत्रों की सटीक भविष्यवाणी के लिए उन्नत मौसम विज्ञान उपकरणों का उपयोग।
  • सामुदायिक भागीदारी: कचरा प्रबंधन में सुधार और नागरिकों को शहरी बाढ़ के प्रति जागरूक करना।
  • आपदा प्रतिरोधी बुनियादी ढाँचा: इमारतों, सड़कों और हवाई अड्डों का निर्माण इस तरह से हो कि वे चरम मौसमी घटनाओं का सामना कर सकें।

हिमाचल की त्रासदी: हिमालयी पारिस्थितिकी का बिगड़ता संतुलन

हिमाचल प्रदेश में भूस्खलन की घटना, जिसमें पति-पत्नी की जान चली गई, हिमालयी क्षेत्र की बढ़ती संवेदनशीलता को उजागर करती है। हिमालय, एक युवा और भूगर्भीय रूप से अस्थिर पर्वत श्रृंखला, प्राकृतिक रूप से भूस्खलन-प्रवण है। हालांकि, मानवीय गतिविधियों ने इस जोखिम को कई गुना बढ़ा दिया है।

हिमालय में भूस्खलन के कारण:

  1. अत्यधिक वर्षा और बादल फटना:
    • जलवायु परिवर्तन के कारण मॉनसून पैटर्न में बदलाव आया है, जिससे कम समय में अत्यधिक और केंद्रित वर्षा होती है, जो ढलानों को अस्थिर कर देती है।
    • बादल फटने की घटनाएँ, जो हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ रही हैं, अचानक भारी मात्रा में पानी छोड़ती हैं जिससे मिट्टी का कटाव और भूस्खलन होता है।
  2. मानवीय हस्तक्षेप:
    • सड़क निर्माण और बुनियादी ढाँचा परियोजनाएँ: पहाड़ी ढलानों को काटकर सड़कें बनाना, सुरंगें खोदना और बड़े बांधों का निर्माण मिट्टी की संरचना को कमजोर करता है। अक्सर, कटाई के बाद मिट्टी का उचित स्थिरीकरण नहीं किया जाता।
    • वनों की कटाई और अनियंत्रित विकास: पेड़ मिट्टी को बांधे रखने में मदद करते हैं। वनों की अंधाधुंध कटाई से मिट्टी का कटाव बढ़ता है और ढलानें अस्थिर हो जाती हैं। पर्यटन और शहरीकरण के नाम पर अनियोजित निर्माण भी एक बड़ी समस्या है।
    • खनन गतिविधियाँ: अवैध और अनियंत्रित खनन गतिविधियाँ भी भूस्खलन को बढ़ावा देती हैं।
  3. प्राकृतिक कारक:
    • कमजोर भूविज्ञान: हिमालय भूगर्भीय रूप से युवा और अस्थिर है, जिसमें नरम चट्टानें और फिसलन भरी परतें शामिल हैं।
    • भूकंपीय गतिविधि: यह क्षेत्र भूकंपीय रूप से सक्रिय है, और छोटे से छोटे झटके भी पहले से कमजोर ढलानों को अस्थिर कर सकते हैं।
    • नदियों का कटाव: नदियाँ अपने किनारों पर कटाव करती हैं, जिससे ढलानें अस्थिर हो सकती हैं।

भूस्खलन के प्रभाव:

  • जान-माल का नुकसान: सबसे सीधा और विनाशकारी प्रभाव।
  • बुनियादी ढांचे का विनाश: सड़कें, पुल, बिजली लाइनें, घर नष्ट हो जाते हैं।
  • कृषि और आजीविका पर असर: खेत बह जाते हैं, पर्यटन प्रभावित होता है।
  • पर्यावरण क्षरण: मिट्टी का नुकसान, जल स्रोतों का प्रदूषण।

समाधान की दिशा: हिमालयी क्षेत्र के लिए सतत विकास

हिमालय को बचाने के लिए ‘संवेदनशील विकास’ के दृष्टिकोण की आवश्यकता है।

  • वैज्ञानिक भूस्खलन मानचित्रण और जोखिम मूल्यांकन: भूस्खलन-प्रवण क्षेत्रों की पहचान करना और उन क्षेत्रों में निर्माण गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाना।
  • इंजीनियरिंग हस्तक्षेप: ढलानों को स्थिर करने के लिए वैज्ञानिक तकनीकों का उपयोग, जैसे दीवारें बनाना, ढलान स्थिरीकरण, और जल निकासी चैनलों का निर्माण।
  • वनीकरण और पुनर्वनीकरण: अधिक पेड़ लगाना, विशेष रूप से ढलानों पर, मिट्टी को बांधने और कटाव को रोकने के लिए।
  • पर्यावरण-संवेदनशील पर्यटन: हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र पर बोझ कम करने के लिए पर्यटन को विनियमित करना और पारिस्थितिकी-पर्यटन को बढ़ावा देना।
  • प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली: भूस्खलन की निगरानी के लिए सेंसर और अन्य प्रौद्योगिकियों का उपयोग करना ताकि समय पर चेतावनी दी जा सके।
  • आपदा-प्रतिरोधी बुनियादी ढाँचा: सड़कों और भवनों का निर्माण ऐसे मानकों पर करना जो भूस्खलन के प्रभाव को कम कर सकें।
  • समुदाय-आधारित तैयारी: स्थानीय समुदायों को भूस्खलन के संकेतों और उनसे बचाव के तरीकों के बारे में शिक्षित करना।

आपदा प्रबंधन: भारत की वर्तमान स्थिति और चुनौतियाँ

भारत ने आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों में महत्वपूर्ण प्रगति की है। चक्रवातों और बाढ़ के लिए पूर्व चेतावनी प्रणालियों में सुधार हुआ है, और राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF) और राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (SDRF) जैसे समर्पित बलों ने प्रतिक्रिया समय में सुधार किया है।

भारत का आपदा प्रबंधन ढाँचा:

  • आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005: यह अधिनियम भारत में आपदा प्रबंधन के लिए कानूनी और संस्थागत ढाँचा प्रदान करता है।
  • राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA): प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में, यह आपदा प्रबंधन के लिए नीतियां, योजनाएं और दिशानिर्देश तैयार करता है।
  • राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA) और जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA): राज्यों और जिलों में आपदा प्रबंधन गतिविधियों का समन्वय करते हैं।
  • राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF): विशेष रूप से प्रशिक्षित और सुसज्जित बल जो आपदा प्रतिक्रिया और बचाव कार्यों में संलग्न होते हैं।
  • आपदा प्रबंधन योजनाएँ: राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर पर योजनाएँ तैयार की गई हैं जो आपदा के विभिन्न चरणों (शमन, तैयारी, प्रतिक्रिया, पुनर्प्राप्ति) को कवर करती हैं।

चुनौतियाँ:

  1. पूर्व-आपदा तैयारी पर अपर्याप्त जोर: हमारा दृष्टिकोण अभी भी प्रतिक्रिया-केंद्रित है, शमन और तैयारी पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता।
  2. समन्वय की कमी: विभिन्न सरकारी एजेंसियों, NGOs और निजी क्षेत्र के बीच प्रभावी समन्वय एक चुनौती बना हुआ है।
  3. क्षमता निर्माण और जागरूकता: स्थानीय स्तर पर आपदा प्रबंधन के लिए पर्याप्त क्षमता और जागरूकता की कमी है।
  4. वित्तपोषण और संसाधन: आपदा प्रबंधन के लिए पर्याप्त और समय पर वित्तपोषण एक चुनौती है।
  5. जलवायु परिवर्तन का बढ़ता प्रभाव: अप्रत्याशित और चरम मौसमी घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति मौजूदा प्रणालियों पर भारी दबाव डाल रही है।
  6. डेटा और प्रौद्योगिकी का अभाव: जोखिम मूल्यांकन, प्रारंभिक चेतावनी और निर्णय लेने के लिए अद्यतन डेटा और अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी तक पहुंच की कमी।
  7. भूमि उपयोग योजना का कमजोर कार्यान्वयन: संवेदनशील क्षेत्रों में अनियोजित विकास जारी है।

“किसी आपदा से पहले की एक औंस तैयारी आपदा के बाद के एक पाउंड इलाज के बराबर है।”

जलवायु परिवर्तन: आपदाओं का मूल कारण

ऊपर वर्णित सभी घटनाएँ—मुंबई में अत्यधिक बारिश, हिमाचल में भूस्खलन—जलवायु परिवर्तन के व्यापक संदर्भ से जुड़ी हुई हैं। वैश्विक तापमान में वृद्धि ने पृथ्वी के प्राकृतिक प्रणालियों के संतुलन को बिगाड़ दिया है, जिससे चरम मौसमी घटनाएँ अधिक सामान्य और तीव्र हो रही हैं।

भारत पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव:

  • अनियमित मॉनसून पैटर्न: मॉनसून की शुरुआत और वापसी में अनिश्चितता, वर्षा का असमान वितरण (कम समय में अधिक केंद्रित वर्षा और सूखे की लंबी अवधि)।
  • तापमान में वृद्धि: हीटवेव की बढ़ती आवृत्ति और तीव्रता।
  • समुद्र के स्तर में वृद्धि: तटीय क्षेत्रों में बाढ़, खारे पानी का प्रवेश, तटीय कटाव।
  • ग्लेशियरों का पिघलना: हिमालय में ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना, जिससे अल्पकालिक बाढ़ और दीर्घकालिक जल संकट का खतरा है।
  • कृषि पर प्रभाव: फसल चक्र का बाधित होना, कीटों और बीमारियों का प्रकोप।
  • स्वास्थ्य पर प्रभाव: जलजनित और वेक्टर-जनित बीमारियों का प्रसार।

अनुकूलन और शमन (Adaptation & Mitigation):

  • शमन (Mitigation): ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के उपाय, जैसे नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देना, ऊर्जा दक्षता में सुधार, वनीकरण।
  • अनुकूलन (Adaptation): जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के अनुकूल होने के लिए किए गए उपाय, जैसे आपदा-प्रतिरोधी बुनियादी ढाँचा, सूखा-प्रतिरोधी फसलें, प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों में सुधार।

भारत ने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) के तहत 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है, लेकिन इसके लिए बड़े पैमाने पर प्रयासों और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता होगी।

आगे की राह: एक समग्र और सतत दृष्टिकोण

प्राकृतिक आपदाओं के बढ़ते खतरे से निपटने के लिए भारत को एक समग्र, सतत और बहु-आयामी दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। यह केवल प्रतिक्रिया तक सीमित नहीं हो सकता, बल्कि इसमें शमन, तैयारी, प्रतिक्रिया और पुनर्प्राप्ति के सभी चरण शामिल होने चाहिए।

  1. पूर्व-आपदा तैयारी पर जोर (Proactive Approach):
    • जोखिम मूल्यांकन और मानचित्रण: सभी जोखिम-प्रवण क्षेत्रों की वैज्ञानिक रूप से पहचान करना और सटीक जोखिम मानचित्र तैयार करना।
    • प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों का उन्नयन: अत्याधुनिक मौसम विज्ञान उपकरण, AI और मशीन लर्निंग का उपयोग करके अधिक सटीक और समय पर चेतावनी देना। यह मोबाइल अलर्ट, सामुदायिक रेडियो और स्थानीय भाषाओं में संदेशों के माध्यम से व्यापक वितरण सुनिश्चित करे।
    • क्षमता निर्माण और प्रशिक्षण: NDRF, SDRF, स्थानीय प्रशासन और स्वयंसेवकों के लिए नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करना। स्थानीय समुदायों को ‘आपदा मित्र’ के रूप में तैयार करना।
  2. जलवायु-लचीला और पारिस्थितिकी-संवेदनशील बुनियादी ढाँचा (Climate-Resilient & Eco-Sensitive Infrastructure):
    • “बिल्ड बैक बेटर” का सिद्धांत: आपदा के बाद पुनर्निर्माण करते समय, भविष्य की आपदाओं का सामना करने के लिए बेहतर और मजबूत बुनियादी ढाँचा बनाना।
    • स्थायी शहरी नियोजन: ‘स्पंज सिटी’ अवधारणा को बढ़ावा देना, जिसमें हरित स्थान, वर्षा जल संचयन, कुशल जल निकासी प्रणाली और जल निकायों का संरक्षण शामिल हो।
    • पहाड़ी क्षेत्रों में वैज्ञानिक निर्माण: सड़कों, पुलों और भवनों के निर्माण में भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षणों और सख्त पर्यावरणीय मानदंडों का पालन करना। ढलान स्थिरीकरण तकनीकों का अनिवार्य उपयोग।
  3. पारिस्थितिकी तंत्र-आधारित अनुकूलन (Ecosystem-Based Adaptation – EbA):
    • वनीकरण और पुनर्वनीकरण: विशेष रूप से जलग्रहण क्षेत्रों और ढलानों पर सघन वृक्षारोपण करना।
    • मैंग्रोव और आर्द्रभूमि संरक्षण: तटीय क्षेत्रों को तूफानों और बाढ़ से बचाने के लिए मैंग्रोव और अन्य प्राकृतिक बाधाओं को बहाल करना।
    • सतत भूमि और जल प्रबंधन: मिट्टी के कटाव को रोकने और जल स्रोतों को बनाए रखने के लिए वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों और जल संरक्षण तकनीकों को बढ़ावा देना।
  4. शासन और नीतिगत सुधार:
    • कठोर भूमि उपयोग नियोजन: जोखिम-प्रवण क्षेत्रों में किसी भी प्रकार के निर्माण पर सख्त प्रतिबंध लगाना।
    • अंतर-एजेंसी समन्वय: केंद्र, राज्य और स्थानीय निकायों के बीच बेहतर समन्वय के लिए तंत्र स्थापित करना।
    • आपदा प्रबंधन में प्रौद्योगिकी का एकीकरण: रिमोट सेंसिंग, GIS, ड्रोन और डेटा एनालिटिक्स का उपयोग जोखिम मूल्यांकन, निगरानी और प्रतिक्रिया के लिए करना।
    • निजी क्षेत्र की भागीदारी: आपदा प्रतिरोधी निवेशों में निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित करना और कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी (CSR) के तहत आपदा प्रबंधन गतिविधियों को बढ़ावा देना।
  5. समुदाय-आधारित आपदा प्रबंधन (Community-Based Disaster Management):
    • स्थानीय समुदायों को आपदा जोखिम न्यूनीकरण प्रयासों में शामिल करना। वे अपनी स्थानीय परिस्थितियों को सबसे अच्छी तरह समझते हैं।
    • जागरूकता अभियान और शिक्षा कार्यक्रम, जो लोगों को आपदाओं के दौरान क्या करें और क्या न करें के बारे में जानकारी दें।
  6. वित्तपोषण और बीमा:
    • आपदा प्रबंधन के लिए पर्याप्त और लचीला वित्तपोषण तंत्र सुनिश्चित करना।
    • फसलों, घरों और व्यवसायों के लिए आपदा बीमा को बढ़ावा देना ताकि रिकवरी प्रक्रिया तेज हो सके।
  7. अंतर्राष्ट्रीय सहयोग:
    • जलवायु परिवर्तन और आपदा जोखिम न्यूनीकरण पर वैश्विक समझौतों का समर्थन करना और सर्वोत्तम प्रथाओं का आदान-प्रदान करना।
    • सेन्डाई फ्रेमवर्क फॉर डिजास्टर रिस्क रिडक्शन (Sendai Framework for Disaster Risk Reduction) के लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में कार्य करना।

निष्कर्ष (Conclusion)

मुंबई और हिमाचल में हाल की घटनाएँ एक अनुस्मारक हैं कि भारत प्राकृतिक आपदाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है, और जलवायु परिवर्तन इस संवेदनशीलता को बढ़ा रहा है। आपदाओं को “भगवान की मर्जी” मानकर निष्क्रिय रहने का समय नहीं है। हमें एक सक्रिय, दूरदर्शी और विज्ञान-आधारित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है जो शमन, तैयारी और लचीलेपन पर समान जोर देता हो। जब तक हम अपने विकास मॉडल को प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने के लिए नहीं बदलेंगे, और जब तक हम अपने नागरिकों को इन चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार नहीं करेंगे, तब तक मॉनसून का रौद्र रूप हमें हर साल नई त्रासदियों से अवगत कराता रहेगा। यह केवल सरकारी एजेंसियों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि प्रत्येक नागरिक की है कि वह एक सुरक्षित, अधिक लचीले और पर्यावरण के प्रति जागरूक भारत के निर्माण में अपना योगदान दे।

UPSC परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न (Practice Questions for UPSC Exam)

प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) – 10 MCQs

(निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर नीचे दिए गए हैं।)

  1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
    1. भारत में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) का गठन आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत किया गया है।
    2. NDMA का अध्यक्ष केंद्रीय गृह मंत्री होते हैं।
    3. आपदा प्रबंधन चक्र में प्रतिक्रिया, पुनर्प्राप्ति, शमन और तैयारी जैसे चरण शामिल हैं।

    उपरोक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

    (a) केवल I और II

    (b) केवल II और III

    (c) केवल I और III

    (d) I, II और III

    उत्तर: (c)

    व्याख्या: कथन I सही है, NDMA का गठन आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत हुआ है। कथन II गलत है, NDMA के अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं। कथन III सही है, आपदा प्रबंधन चक्र में शमन (Mitigation), तैयारी (Preparedness), प्रतिक्रिया (Response) और पुनर्प्राप्ति (Recovery) जैसे चरण शामिल हैं।

  2. शहरी बाढ़ के संबंध में, निम्नलिखित में से कौन-सा कारक प्रमुख योगदानकर्ता है/हैं?
    1. मैंग्रोव और आर्द्रभूमि का विनाश।
    2. पुरानी और अपर्याप्त जल निकासी प्रणाली।
    3. कठोर सतहों (जैसे कंक्रीट और डामर) में वृद्धि।
    4. कम समय में अत्यधिक वर्षा की बढ़ती आवृत्ति।

    नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनें:

    (a) केवल I, II और III

    (b) केवल II, III और IV

    (c) केवल I, III और IV

    (d) I, II, III और IV

    उत्तर: (d)

    व्याख्या: ये सभी कारक शहरी बाढ़ में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। मैंग्रोव और आर्द्रभूमि प्राकृतिक स्पंज का काम करते हैं। पुरानी जल निकासी प्रणाली बढ़ती आबादी और चरम वर्षा को संभालने में सक्षम नहीं है। कठोर सतहें पानी को जमीन में रिसने नहीं देतीं। जलवायु परिवर्तन के कारण अत्यधिक वर्षा की घटनाएँ बढ़ गई हैं।

  3. निम्नलिखित में से कौन-सी मानवीय गतिविधियाँ हिमालयी क्षेत्र में भूस्खलन के जोखिम को बढ़ाती हैं?
    1. पहाड़ी ढलानों पर अनियोजित सड़क निर्माण।
    2. वनों की कटाई।
    3. नदियों के किनारों पर अतिक्रमण।
    4. पर्यटन के लिए अनियंत्रित निर्माण।

    नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनें:

    (a) केवल I और II

    (b) केवल II, III और IV

    (c) केवल I, III और IV

    (d) I, II, III और IV

    उत्तर: (d)

    व्याख्या: ये सभी मानवीय गतिविधियाँ हिमालयी क्षेत्र की नाजुक पारिस्थितिकी को बाधित करती हैं और भूस्खलन के जोखिम को बढ़ाती हैं। सड़क निर्माण से ढलान अस्थिर होते हैं, वनों की कटाई मिट्टी को कमजोर करती है, नदियों पर अतिक्रमण जल प्रवाह को बाधित करता है और अनियंत्रित निर्माण भूगर्भीय स्थिरता को प्रभावित करता है।

  4. ‘स्पंज सिटी’ अवधारणा का प्राथमिक उद्देश्य क्या है?

    (a) शहरों में जल पर्यटन को बढ़ावा देना।

    (b) शहरी जल निकायों में जलीय जीवन का संरक्षण करना।

    (c) शहरी बाढ़ को कम करने के लिए वर्षा जल को अवशोषित और पुन: उपयोग करना।

    (d) शहरों में पीने के पानी की आपूर्ति के लिए नए जलाशय बनाना।

    उत्तर: (c)

    व्याख्या: ‘स्पंज सिटी’ एक शहरी नियोजन अवधारणा है जिसका उद्देश्य शहरों को प्राकृतिक प्रणालियों जैसे हरित स्थानों, वर्षा जल संचयन और कुशल जल निकासी के माध्यम से वर्षा जल को अवशोषित करने, स्टोर करने और पुन: उपयोग करने में मदद करना है, जिससे शहरी बाढ़ को कम किया जा सके।
  5. भारत में जलवायु परिवर्तन से संबंधित निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
    1. भारत ने 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है।
    2. राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते के तहत एक प्रतिबद्धता है।
    3. जलवायु परिवर्तन के कारण मॉनसून पैटर्न में अधिक अनिश्चितता देखी जा रही है।

    नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनें:

    (a) केवल I

    (b) केवल II और III

    (c) केवल I और III

    (d) I, II और III

    उत्तर: (d)

    व्याख्या: तीनों कथन सही हैं। भारत ने COP26 में 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य घोषित किया है। NDC पेरिस समझौते के तहत देशों द्वारा अपनी जलवायु कार्रवाई की प्रतिबद्धताएं हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण भारत में मॉनसून पैटर्न में अनियमितताएं बढ़ रही हैं।

  6. आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा निकाय राष्ट्रीय स्तर पर आपदा प्रबंधन के लिए नीतियां, योजनाएं और दिशानिर्देश तैयार करने के लिए जिम्मेदार है?

    (a) राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF)

    (b) राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA)

    (c) राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA)

    (d) गृह मंत्रालय

    उत्तर: (c)

    व्याख्या: राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) शीर्ष निकाय है जो आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत राष्ट्रीय स्तर पर नीतियां, योजनाएं और दिशानिर्देश तैयार करता है।
  7. ‘सेन्डाई फ्रेमवर्क फॉर डिजास्टर रिस्क रिडक्शन’ का मुख्य फोकस क्या है?

    (a) विकासशील देशों को आपदा राहत कोष प्रदान करना।

    (b) जलवायु परिवर्तन शमन तकनीकों पर शोध करना।

    (c) आपदा जोखिम को कम करने के लिए वैश्विक, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर कार्रवाई करना।

    (d) प्राकृतिक आपदाओं के बाद केवल पुनर्निर्माण गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित करना।

    उत्तर: (c)

    व्याख्या: सेन्डाई फ्रेमवर्क (2015-2030) आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए एक स्वैच्छिक, गैर-बाध्यकारी समझौता है जो आपदा जोखिम को कम करने के लिए वैश्विक, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर कार्रवाई करने पर जोर देता है, न कि केवल प्रतिक्रिया पर।
  8. निम्नलिखित में से कौन-सा कारक शहरी बाढ़ में जल निकासी प्रणाली की क्षमता को सबसे अधिक प्रभावित करता है?

    (a) शहर में पेड़ों की संख्या।

    (b) ठोस कचरे का अनुचित निपटान।

    (c) शहर में झीलों और तालाबों की संख्या।

    (d) शहर में भूमिगत मेट्रो लाइनों का विस्तार।

    उत्तर: (b)

    व्याख्या: ठोस कचरे का अनुचित निपटान सीधे नालों और सीवरों को बंद कर देता है, जिससे जल निकासी प्रणाली की क्षमता गंभीर रूप से प्रभावित होती है और जलभराव होता है।
  9. हिमालयी क्षेत्र को भूस्खलन के प्रति अधिक संवेदनशील बनाने वाले कारकों में शामिल हैं:
    1. भूगर्भीय रूप से युवा और अस्थिर पर्वत श्रृंखला।
    2. उच्च भूकंपीय गतिविधि।
    3. अत्यधिक और केंद्रित वर्षा।

    उपरोक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

    (a) केवल I

    (b) केवल II और III

    (c) केवल I और III

    (d) I, II और III

    उत्तर: (d)

    व्याख्या: हिमालय एक युवा पर्वत श्रृंखला है जो भूगर्भीय रूप से अस्थिर है, उच्च भूकंपीय क्षेत्र में स्थित है, और हाल के वर्षों में जलवायु परिवर्तन के कारण अत्यधिक केंद्रित वर्षा का अनुभव कर रहा है, ये सभी कारक इसे भूस्खलन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बनाते हैं।

  10. भारत में “बिल्ड बैक बेटर” (Build Back Better) सिद्धांत का क्या अर्थ है?

    (a) आपदा प्रभावित क्षेत्रों में तेजी से अस्थायी आश्रय बनाना।

    (b) आपदा से पहले मौजूद बुनियादी ढांचे को बिल्कुल वैसे ही पुनर्निर्मित करना।

    (c) आपदा के बाद पुनर्निर्माण करते समय, भविष्य की आपदाओं का सामना करने के लिए अधिक लचीला और मजबूत बुनियादी ढाँचा बनाना।

    (d) केवल क्षतिग्रस्त ऐतिहासिक इमारतों का जीर्णोद्धार करना।

    उत्तर: (c)

    व्याख्या: “बिल्ड बैक बेटर” आपदा रिकवरी का एक सिद्धांत है जिसका अर्थ है कि पुनर्निर्माण प्रयासों को न केवल क्षति की मरम्मत करनी चाहिए, बल्कि भविष्य की आपदाओं के प्रति समुदाय और बुनियादी ढांचे की लचीलापन को भी बढ़ाना चाहिए, जिससे वे अधिक सुरक्षित और मजबूत बनें।

मुख्य परीक्षा (Mains)

  1. “भारत में प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती आवृत्ति और तीव्रता केवल मौसमी बदलावों का परिणाम नहीं है, बल्कि यह जलवायु परिवर्तन और अनियोजित विकास का एक जटिल मिश्रण है।” इस कथन का आलोचनात्मक विश्लेषण करें और प्राकृतिक आपदाओं के प्रति भारत की भेद्यता को कम करने के लिए आवश्यक संस्थागत और नीतिगत सुधारों का सुझाव दें। (250 शब्द)
  2. शहरी बाढ़, मुंबई जैसे महानगरों के लिए एक स्थायी संकट बन गया है। इस समस्या के अंतर्निहित कारणों का विश्लेषण करें और ‘स्पंज सिटी’ अवधारणा तथा अन्य टिकाऊ समाधानों के माध्यम से शहरी लचीलापन बढ़ाने के लिए एक व्यापक रणनीति सुझाएं। (250 शब्द)
  3. हिमालय, पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील और भूगर्भीय रूप से अस्थिर होने के कारण, भूस्खलन और बादल फटने जैसी आपदाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। इस क्षेत्र में आपदा जोखिम को बढ़ाने वाले प्राकृतिक और मानवजनित कारकों पर चर्चा करें। हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण और आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए ‘संवेदनशील विकास’ के महत्व पर प्रकाश डालें। (250 शब्द)
  4. “आपदा प्रबंधन केवल प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि तैयारी, लचीलापन और पुनर्निर्माण है।” भारत के संदर्भ में इस कथन का मूल्यांकन करें और आपदा-प्रतिरोधी बुनियादी ढांचे के महत्व और इसे प्राप्त करने के लिए अपनाए जा सकने वाले उपायों पर प्रकाश डालें। (250 शब्द)

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[–SEO_TITLE–]मॉनसून का रौद्र रूप: आपदाओं की बढ़ती संख्या और उनसे निपटने की राष्ट्रीय रणनीति

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मॉनसून का रौद्र रूप: आपदाओं की बढ़ती संख्या और उनसे निपटने की राष्ट्रीय रणनीति

चर्चा में क्यों? (Why in News?):

हाल ही में देश के विभिन्न हिस्सों से सामने आई प्राकृतिक आपदाओं की विचलित कर देने वाली खबरें हमारे सामने एक गंभीर चुनौती खड़ी करती हैं। एक तरफ जहां मुंबई जैसे महानगर में भारी बारिश के कारण हवाई अड्डे पर विमान के रनवे से फिसलने की घटना ने शहरी बुनियादी ढांचे की संवेदनशीलता को उजागर किया, वहीं दूसरी ओर हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्य में भूस्खलन से पति-पत्नी की दुखद मृत्यु और वैष्णो देवी मार्ग पर चार श्रद्धालुओं का घायल होना हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र पर बढ़ते दबाव और प्राकृतिक आपदाओं के प्रति हमारी तैयारियों की कमी को दर्शाता है। ये घटनाएं कोई अकेली नहीं हैं, बल्कि यह भारत में बढ़ते चरम मौसमी घटनाओं और उनके गहराते प्रभावों की एक बड़ी तस्वीर का हिस्सा हैं। यह हमें इस बात पर सोचने को मजबूर करता है कि क्या हम वास्तव में मॉनसून के इस बदलते मिजाज और उससे उपजी आपदाओं के लिए तैयार हैं?

प्राकृतिक आपदाओं का बढ़ता ग्राफ: एक राष्ट्रीय चिंता

पिछले कुछ दशकों में, भारत ने प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता में उल्लेखनीय वृद्धि देखी है। चाहे वह अप्रत्याशित बाढ़ हो, विनाशकारी भूस्खलन हो, लंबे समय तक चलने वाला सूखा हो या तीव्र चक्रवात, इन घटनाओं ने न केवल जान-माल का भारी नुकसान किया है, बल्कि देश के विकास पथ पर भी गहरी छाप छोड़ी है। इन आपदाओं का बढ़ता ग्राफ केवल मौसमी बदलावों का परिणाम नहीं है, बल्कि यह जलवायु परिवर्तन, अनियोजित शहरीकरण, वनों की कटाई और पर्यावरण के प्रति असंवेदनशील विकास मॉडल का एक जटिल मिश्रण है।

“प्रकृति कोई आपदा नहीं भेजती, वह बस अपनी प्रतिक्रिया देती है।”

मुंबई की बारिश: शहरी बाढ़ का एक स्थायी संकट

मुंबई, भारत की आर्थिक राजधानी, हर साल मॉनसून के दौरान भारी बारिश और उसके परिणामस्वरूप होने वाली बाढ़ से जूझती है। इस साल भी विमान के फिसलने की घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि हमारी शहरी प्रणालियां अभी भी इन चरम मौसमी घटनाओं के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं हैं।

मुंबई में शहरी बाढ़ के प्रमुख कारण:

  1. अवैज्ञानिक शहरीकरण और अतिक्रमण:
    • मैंग्रोव और वेटलैंड्स का विनाश: मैंग्रोव और आर्द्रभूमि प्राकृतिक स्पंज का काम करते हैं, जो अतिरिक्त पानी को सोखकर बाढ़ को नियंत्रित करते हैं। मुंबई में इनके बड़े पैमाने पर विनाश ने शहर की प्राकृतिक जल निकासी क्षमता को गंभीर रूप से कमजोर किया है।
    • तटीय नियमन क्षेत्र (CRZ) का उल्लंघन: CRZ के नियमों का उल्लंघन कर निर्माण कार्य ने समुद्र के पानी के शहर में प्रवेश का रास्ता खोल दिया है और जल निकासी को बाधित किया है।
    • खुली जगहों और पार्कों की कमी: कंक्रीट के जंगल में बदलता शहर पानी को जमीन में सोखने का मौका नहीं देता, जिससे जलभराव होता है।
  2. अपरिप्याप्त और पुरानी जल निकासी प्रणाली:
    • औपनिवेशिक युग की प्रणाली: मुंबई की अधिकांश जल निकासी प्रणाली ब्रिटिश काल की है, जो आज की बढ़ती आबादी और जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली अत्यधिक वर्षा को संभालने में सक्षम नहीं है।
    • गाद और कचरे का जमाव: नियमित रखरखाव की कमी और ठोस कचरे का अनुचित निपटान नालों को बंद कर देता है, जिससे पानी का बहाव अवरुद्ध होता है।
    • स्लुइस गेट्स की समस्या: समुद्र के स्तर में वृद्धि के कारण उच्च ज्वार के दौरान स्लुइस गेट्स को बंद रखना पड़ता है, जिससे शहर के भीतर पानी का निकास रुक जाता है।
  3. जलवायु परिवर्तन का प्रभाव:
    • चरम वर्षा की घटनाएँ: जलवायु परिवर्तन के कारण अब कम समय में अधिक तीव्र वर्षा की घटनाएँ बढ़ गई हैं, जिन्हें मौजूदा जल निकासी प्रणाली संभाल नहीं पाती।
    • समुद्र के स्तर में वृद्धि: यह तटीय शहरों जैसे मुंबई के लिए एक दीर्घकालिक खतरा है, जो जल निकासी को प्रभावित करता है और खारे पानी के प्रवेश को बढ़ाता है।
  4. मानव व्यवहार और जागरूकता की कमी:
    • कचरा फेंकना: नागरिक अक्सर कचरा नालों में फेंक देते हैं, जिससे रुकावटें पैदा होती हैं।
    • अस्थायी अतिक्रमण: झोपड़पट्टियों और अवैध निर्माणों से जलमार्ग अवरुद्ध होते हैं।

शहरी बाढ़ के प्रभाव:

  • आर्थिक नुकसान: व्यापार ठप्प, परिवहन बाधित, संपत्ति का नुकसान।
  • स्वास्थ्य जोखिम: जलजनित बीमारियाँ, मच्छरों का प्रकोप।
  • परिवहन और बुनियादी ढांचे पर दबाव: सड़कें, रेलवे, हवाई अड्डे प्रभावित।
  • मनोवैज्ञानिक प्रभाव: तनाव, चिंता, दैनिक जीवन में व्यवधान।

समाधान की दिशा: मुंबई के लिए आगे की राह

मुंबई को एक ‘स्पंज सिटी’ में बदलने की आवश्यकता है, जहाँ पानी को सोखने और निकालने की प्राकृतिक क्षमता को बहाल किया जाए।

  • एकीकृत जल निकासी प्रबंधन: आधुनिक जल निकासी प्रणालियों का उन्नयन, जिसमें बड़े तूफानी जल नालियों और भूमिगत भंडारण टैंकों का निर्माण शामिल हो।
  • हरित बुनियादी ढाँचा: मैंग्रोव और आर्द्रभूमि का संरक्षण, शहरी हरियाली को बढ़ावा देना, वर्षा जल संचयन को अनिवार्य करना।
  • भूमि उपयोग योजना का सख्त कार्यान्वयन: संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण पर प्रतिबंध, CRZ नियमों का कड़ाई से पालन।
  • प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली: वर्षा की तीव्रता और संभावित जलभराव क्षेत्रों की सटीक भविष्यवाणी के लिए उन्नत मौसम विज्ञान उपकरणों का उपयोग।
  • सामुदायिक भागीदारी: कचरा प्रबंधन में सुधार और नागरिकों को शहरी बाढ़ के प्रति जागरूक करना।
  • आपदा प्रतिरोधी बुनियादी ढाँचा: इमारतों, सड़कों और हवाई अड्डों का निर्माण इस तरह से हो कि वे चरम मौसमी घटनाओं का सामना कर सकें।

हिमाचल की त्रासदी: हिमालयी पारिस्थितिकी का बिगड़ता संतुलन

हिमाचल प्रदेश में भूस्खलन की घटना, जिसमें पति-पत्नी की जान चली गई, हिमालयी क्षेत्र की बढ़ती संवेदनशीलता को उजागर करती है। हिमालय, एक युवा और भूगर्भीय रूप से अस्थिर पर्वत श्रृंखला, प्राकृतिक रूप से भूस्खलन-प्रवण है। हालांकि, मानवीय गतिविधियों ने इस जोखिम को कई गुना बढ़ा दिया है।

हिमालय में भूस्खलन के कारण:

  1. अत्यधिक वर्षा और बादल फटना:
    • जलवायु परिवर्तन के कारण मॉनसून पैटर्न में बदलाव आया है, जिससे कम समय में अत्यधिक और केंद्रित वर्षा होती है, जो ढलानों को अस्थिर कर देती है।
    • बादल फटने की घटनाएँ, जो हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ रही हैं, अचानक भारी मात्रा में पानी छोड़ती हैं जिससे मिट्टी का कटाव और भूस्खलन होता है।
  2. मानवीय हस्तक्षेप:
    • सड़क निर्माण और बुनियादी ढाँचा परियोजनाएँ: पहाड़ी ढलानों को काटकर सड़कें बनाना, सुरंगें खोदना और बड़े बांधों का निर्माण मिट्टी की संरचना को कमजोर करता है। अक्सर, कटाई के बाद मिट्टी का उचित स्थिरीकरण नहीं किया जाता।
    • वनों की कटाई और अनियंत्रित विकास: पेड़ मिट्टी को बांधे रखने में मदद करते हैं। वनों की अंधाधुंध कटाई से मिट्टी का कटाव बढ़ता है और ढलानें अस्थिर हो जाती हैं। पर्यटन और शहरीकरण के नाम पर अनियोजित निर्माण भी एक बड़ी समस्या है।
    • खनन गतिविधियाँ: अवैध और अनियंत्रित खनन गतिविधियाँ भी भूस्खलन को बढ़ावा देती हैं।
  3. प्राकृतिक कारक:
    • कमजोर भूविज्ञान: हिमालय भूगर्भीय रूप से युवा और अस्थिर है, जिसमें नरम चट्टानें और फिसलन भरी परतें शामिल हैं।
    • भूकंपीय गतिविधि: यह क्षेत्र भूकंपीय रूप से सक्रिय है, और छोटे से छोटे झटके भी पहले से कमजोर ढलानों को अस्थिर कर सकते हैं।
    • नदियों का कटाव: नदियाँ अपने किनारों पर कटाव करती हैं, जिससे ढलानें अस्थिर हो सकती हैं।

भूस्खलन के प्रभाव:

  • जान-माल का नुकसान: सबसे सीधा और विनाशकारी प्रभाव।
  • बुनियादी ढांचे का विनाश: सड़कें, पुल, बिजली लाइनें, घर नष्ट हो जाते हैं।
  • कृषि और आजीविका पर असर: खेत बह जाते हैं, पर्यटन प्रभावित होता है।
  • पर्यावरण क्षरण: मिट्टी का नुकसान, जल स्रोतों का प्रदूषण।

समाधान की दिशा: हिमालयी क्षेत्र के लिए सतत विकास

हिमालय को बचाने के लिए ‘संवेदनशील विकास’ के दृष्टिकोण की आवश्यकता है।

  • वैज्ञानिक भूस्खलन मानचित्रण और जोखिम मूल्यांकन: भूस्खलन-प्रवण क्षेत्रों की पहचान करना और उन क्षेत्रों में निर्माण गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाना।
  • इंजीनियरिंग हस्तक्षेप: ढलानों को स्थिर करने के लिए वैज्ञानिक तकनीकों का उपयोग, जैसे दीवारें बनाना, ढलान स्थिरीकरण, और जल निकासी चैनलों का निर्माण।
  • वनीकरण और पुनर्वनीकरण: अधिक पेड़ लगाना, विशेष रूप से ढलानों पर, मिट्टी को बांधने और कटाव को रोकने के लिए।
  • पर्यावरण-संवेदनशील पर्यटन: हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र पर बोझ कम करने के लिए पर्यटन को विनियमित करना और पारिस्थितिकी-पर्यटन को बढ़ावा देना।
  • प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली: भूस्खलन की निगरानी के लिए सेंसर और अन्य प्रौद्योगिकियों का उपयोग करना ताकि समय पर चेतावनी दी जा सके।
  • आपदा-प्रतिरोधी बुनियादी ढाँचा: सड़कों और भवनों का निर्माण ऐसे मानकों पर करना जो भूस्खलन के प्रभाव को कम कर सकें।
  • समुदाय-आधारित तैयारी: स्थानीय समुदायों को भूस्खलन के संकेतों और उनसे बचाव के तरीकों के बारे में शिक्षित करना।

आपदा प्रबंधन: भारत की वर्तमान स्थिति और चुनौतियाँ

भारत ने आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों में महत्वपूर्ण प्रगति की है। चक्रवातों और बाढ़ के लिए पूर्व चेतावनी प्रणालियों में सुधार हुआ है, और राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF) और राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (SDRF) जैसे समर्पित बलों ने प्रतिक्रिया समय में सुधार किया है।

भारत का आपदा प्रबंधन ढाँचा:

  • आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005: यह अधिनियम भारत में आपदा प्रबंधन के लिए कानूनी और संस्थागत ढाँचा प्रदान करता है।
  • राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA): प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में, यह आपदा प्रबंधन के लिए नीतियां, योजनाएं और दिशानिर्देश तैयार करता है।
  • राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA) और जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA): राज्यों और जिलों में आपदा प्रबंधन गतिविधियों का समन्वय करते हैं।
  • राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF): विशेष रूप से प्रशिक्षित और सुसज्जित बल जो आपदा प्रतिक्रिया और बचाव कार्यों में संलग्न होते हैं।
  • आपदा प्रबंधन योजनाएँ: राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर पर योजनाएँ तैयार की गई हैं जो आपदा के विभिन्न चरणों (शमन, तैयारी, प्रतिक्रिया, पुनर्प्राप्ति) को कवर करती हैं।

चुनौतियाँ:

  1. पूर्व-आपदा तैयारी पर अपर्याप्त जोर: हमारा दृष्टिकोण अभी भी प्रतिक्रिया-केंद्रित है, शमन और तैयारी पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता।
  2. समन्वय की कमी: विभिन्न सरकारी एजेंसियों, NGOs और निजी क्षेत्र के बीच प्रभावी समन्वय एक चुनौती बना हुआ है।
  3. क्षमता निर्माण और जागरूकता: स्थानीय स्तर पर आपदा प्रबंधन के लिए पर्याप्त क्षमता और जागरूकता की कमी है।
  4. वित्तपोषण और संसाधन: आपदा प्रबंधन के लिए पर्याप्त और समय पर वित्तपोषण एक चुनौती है।
  5. जलवायु परिवर्तन का बढ़ता प्रभाव: अप्रत्याशित और चरम मौसमी घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति मौजूदा प्रणालियों पर भारी दबाव डाल रही है।
  6. डेटा और प्रौद्योगिकी का अभाव: जोखिम मूल्यांकन, प्रारंभिक चेतावनी और निर्णय लेने के लिए अद्यतन डेटा और अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी तक पहुंच की कमी।
  7. भूमि उपयोग योजना का कमजोर कार्यान्वयन: संवेदनशील क्षेत्रों में अनियोजित विकास जारी है।

“किसी आपदा से पहले की एक औंस तैयारी आपदा के बाद के एक पाउंड इलाज के बराबर है।”

जलवायु परिवर्तन: आपदाओं का मूल कारण

ऊपर वर्णित सभी घटनाएँ—मुंबई में अत्यधिक बारिश, हिमाचल में भूस्खलन—जलवायु परिवर्तन के व्यापक संदर्भ से जुड़ी हुई हैं। वैश्विक तापमान में वृद्धि ने पृथ्वी के प्राकृतिक प्रणालियों के संतुलन को बिगाड़ दिया है, जिससे चरम मौसमी घटनाएँ अधिक सामान्य और तीव्र हो रही हैं।

भारत पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव:

  • अनियमित मॉनसून पैटर्न: मॉनसून की शुरुआत और वापसी में अनिश्चितता, वर्षा का असमान वितरण (कम समय में अधिक केंद्रित वर्षा और सूखे की लंबी अवधि)।
  • तापमान में वृद्धि: हीटवेव की बढ़ती आवृत्ति और तीव्रता।
  • समुद्र के स्तर में वृद्धि: तटीय क्षेत्रों में बाढ़, खारे पानी का प्रवेश, तटीय कटाव।
  • ग्लेशियरों का पिघलना: हिमालय में ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना, जिससे अल्पकालिक बाढ़ और दीर्घकालिक जल संकट का खतरा है।
  • कृषि पर प्रभाव: फसल चक्र का बाधित होना, कीटों और बीमारियों का प्रकोप।
  • स्वास्थ्य पर प्रभाव: जलजनित और वेक्टर-जनित बीमारियों का प्रसार।

अनुकूलन और शमन (Adaptation & Mitigation):

  • शमन (Mitigation): ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के उपाय, जैसे नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देना, ऊर्जा दक्षता में सुधार, वनीकरण।
  • अनुकूलन (Adaptation): जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के अनुकूल होने के लिए किए गए उपाय, जैसे आपदा-प्रतिरोधी बुनियादी ढाँचा, सूखा-प्रतिरोधी फसलें, प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों में सुधार।

भारत ने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) के तहत 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है, लेकिन इसके लिए बड़े पैमाने पर प्रयासों और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता होगी।

आगे की राह: एक समग्र और सतत दृष्टिकोण

प्राकृतिक आपदाओं के बढ़ते खतरे से निपटने के लिए भारत को एक समग्र, सतत और बहु-आयामी दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। यह केवल प्रतिक्रिया तक सीमित नहीं हो सकता, बल्कि इसमें शमन, तैयारी, प्रतिक्रिया और पुनर्प्राप्ति के सभी चरण शामिल होने चाहिए।

  1. पूर्व-आपदा तैयारी पर जोर (Proactive Approach):
    • जोखिम मूल्यांकन और मानचित्रण: सभी जोखिम-प्रवण क्षेत्रों की वैज्ञानिक रूप से पहचान करना और सटीक जोखिम मानचित्र तैयार करना।
    • प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों का उन्नयन: अत्याधुनिक मौसम विज्ञान उपकरण, AI और मशीन लर्निंग का उपयोग करके अधिक सटीक और समय पर चेतावनी देना। यह मोबाइल अलर्ट, सामुदायिक रेडियो और स्थानीय भाषाओं में संदेशों के माध्यम से व्यापक वितरण सुनिश्चित करे।
    • क्षमता निर्माण और प्रशिक्षण: NDRF, SDRF, स्थानीय प्रशासन और स्वयंसेवकों के लिए नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करना। स्थानीय समुदायों को ‘आपदा मित्र’ के रूप में तैयार करना।
  2. जलवायु-लचीला और पारिस्थितिकी-संवेदनशील बुनियादी ढाँचा (Climate-Resilient & Eco-Sensitive Infrastructure):
    • “बिल्ड बैक बेटर” का सिद्धांत: आपदा के बाद पुनर्निर्माण करते समय, भविष्य की आपदाओं का सामना करने के लिए बेहतर और मजबूत बुनियादी ढाँचा बनाना।
    • स्थायी शहरी नियोजन: ‘स्पंज सिटी’ अवधारणा को बढ़ावा देना, जिसमें हरित स्थान, वर्षा जल संचयन, कुशल जल निकासी प्रणाली और जल निकायों का संरक्षण शामिल हो।
    • पहाड़ी क्षेत्रों में वैज्ञानिक निर्माण: सड़कों, पुलों और भवनों के निर्माण में भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षणों और सख्त पर्यावरणीय मानदंडों का पालन करना। ढलान स्थिरीकरण तकनीकों का अनिवार्य उपयोग।
  3. पारिस्थितिकी तंत्र-आधारित अनुकूलन (Ecosystem-Based Adaptation – EbA):
    • वनीकरण और पुनर्वनीकरण: विशेष रूप से जलग्रहण क्षेत्रों और ढलानों पर सघन वृक्षारोपण करना।
    • मैंग्रोव और आर्द्रभूमि संरक्षण: तटीय क्षेत्रों को तूफानों और बाढ़ से बचाने के लिए मैंग्रोव और अन्य प्राकृतिक बाधाओं को बहाल करना।
    • सतत भूमि और जल प्रबंधन: मिट्टी के कटाव को रोकने और जल स्रोतों को बनाए रखने के लिए वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों और जल संरक्षण तकनीकों को बढ़ावा देना।
  4. शासन और नीतिगत सुधार:
    • कठोर भूमि उपयोग नियोजन: जोखिम-प्रवण क्षेत्रों में किसी भी प्रकार के निर्माण पर सख्त प्रतिबंध लगाना।
    • अंतर-एजेंसी समन्वय: केंद्र, राज्य और स्थानीय निकायों के बीच बेहतर समन्वय के लिए तंत्र स्थापित करना।
    • आपदा प्रबंधन में प्रौद्योगिकी का एकीकरण: रिमोट सेंसिंग, GIS, ड्रोन और डेटा एनालिटिक्स का उपयोग जोखिम मूल्यांकन, निगरानी और प्रतिक्रिया के लिए करना।
    • निजी क्षेत्र की भागीदारी: आपदा प्रतिरोधी निवेशों में निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित करना और कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी (CSR) के तहत आपदा प्रबंधन गतिविधियों को बढ़ावा देना।
  5. समुदाय-आधारित आपदा प्रबंधन (Community-Based Disaster Management):
    • स्थानीय समुदायों को आपदा जोखिम न्यूनीकरण प्रयासों में शामिल करना। वे अपनी स्थानीय परिस्थितियों को सबसे अच्छी तरह समझते हैं।
    • जागरूकता अभियान और शिक्षा कार्यक्रम, जो लोगों को आपदाओं के दौरान क्या करें और क्या न करें के बारे में जानकारी दें।
  6. वित्तपोषण और बीमा:
    • आपदा प्रबंधन के लिए पर्याप्त और लचीला वित्तपोषण तंत्र सुनिश्चित करना।
    • फसलों, घरों और व्यवसायों के लिए आपदा बीमा को बढ़ावा देना ताकि रिकवरी प्रक्रिया तेज हो सके।
  7. अंतर्राष्ट्रीय सहयोग:
    • जलवायु परिवर्तन और आपदा जोखिम न्यूनीकरण पर वैश्विक समझौतों का समर्थन करना और सर्वोत्तम प्रथाओं का आदान-प्रदान करना।
    • सेन्डाई फ्रेमवर्क फॉर डिजास्टर रिस्क रिडक्शन (Sendai Framework for Disaster Risk Reduction) के लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में कार्य करना।

निष्कर्ष (Conclusion)

मुंबई और हिमाचल में हाल की घटनाएँ एक अनुस्मारक हैं कि भारत प्राकृतिक आपदाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है, और जलवायु परिवर्तन इस संवेदनशीलता को बढ़ा रहा है। आपदाओं को “भगवान की मर्जी” मानकर निष्क्रिय रहने का समय नहीं है। हमें एक सक्रिय, दूरदर्शी और विज्ञान-आधारित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है जो शमन, तैयारी और लचीलेपन पर समान जोर देता हो। जब तक हम अपने विकास मॉडल को प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने के लिए नहीं बदलेंगे, और जब तक हम अपने नागरिकों को इन चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार नहीं करेंगे, तब तक मॉनसून का रौद्र रूप हमें हर साल नई त्रासदियों से अवगत कराता रहेगा। यह केवल सरकारी एजेंसियों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि प्रत्येक नागरिक की है कि वह एक सुरक्षित, अधिक लचीले और पर्यावरण के प्रति जागरूक भारत के निर्माण में अपना योगदान दे।

UPSC परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न (Practice Questions for UPSC Exam)

प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) – 10 MCQs

(निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर नीचे दिए गए हैं।)

  1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
    1. भारत में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) का गठन आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत किया गया है।
    2. NDMA का अध्यक्ष केंद्रीय गृह मंत्री होते हैं।
    3. आपदा प्रबंधन चक्र में प्रतिक्रिया, पुनर्प्राप्ति, शमन और तैयारी जैसे चरण शामिल हैं।

    उपरोक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

    (a) केवल I और II

    (b) केवल II और III

    (c) केवल I और III

    (d) I, II और III

    उत्तर: (c)

    व्याख्या: कथन I सही है, NDMA का गठन आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत हुआ है। कथन II गलत है, NDMA के अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं। कथन III सही है, आपदा प्रबंधन चक्र में शमन (Mitigation), तैयारी (Preparedness), प्रतिक्रिया (Response) और पुनर्प्राप्ति (Recovery) जैसे चरण शामिल हैं।

  2. शहरी बाढ़ के संबंध में, निम्नलिखित में से कौन-सा कारक प्रमुख योगदानकर्ता है/हैं?
    1. मैंग्रोव और आर्द्रभूमि का विनाश।
    2. पुरानी और अपर्याप्त जल निकासी प्रणाली।
    3. कठोर सतहों (जैसे कंक्रीट और डामर) में वृद्धि।
    4. कम समय में अत्यधिक वर्षा की बढ़ती आवृत्ति।

    नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनें:

    (a) केवल I, II और III

    (b) केवल II, III और IV

    (c) केवल I, III और IV

    (d) I, II, III और IV

    उत्तर: (d)

    व्याख्या: ये सभी कारक शहरी बाढ़ में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। मैंग्रोव और आर्द्रभूमि प्राकृतिक स्पंज का काम करते हैं। पुरानी जल निकासी प्रणाली बढ़ती आबादी और चरम वर्षा को संभालने में सक्षम नहीं है। कठोर सतहें पानी को जमीन में रिसने नहीं देतीं। जलवायु परिवर्तन के कारण अत्यधिक वर्षा की घटनाएँ बढ़ गई हैं।

  3. निम्नलिखित में से कौन-सी मानवीय गतिविधियाँ हिमालयी क्षेत्र में भूस्खलन के जोखिम को बढ़ाती हैं?
    1. पहाड़ी ढलानों पर अनियोजित सड़क निर्माण।
    2. वनों की कटाई।
    3. नदियों के किनारों पर अतिक्रमण।
    4. पर्यटन के लिए अनियंत्रित निर्माण।

    नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनें:

    (a) केवल I और II

    (b) केवल II, III और IV

    (c) केवल I, III और IV

    (d) I, II, III और IV

    उत्तर: (d)

    व्याख्या: ये सभी मानवीय गतिविधियाँ हिमालयी क्षेत्र की नाजुक पारिस्थितिकी को बाधित करती हैं और भूस्खलन के जोखिम को बढ़ाती हैं। सड़क निर्माण से ढलान अस्थिर होते हैं, वनों की कटाई मिट्टी को कमजोर करती है, नदियों पर अतिक्रमण जल प्रवाह को बाधित करता है और अनियंत्रित निर्माण भूगर्भीय स्थिरता को प्रभावित करता है।

  4. ‘स्पंज सिटी’ अवधारणा का प्राथमिक उद्देश्य क्या है?

    (a) शहरों में जल पर्यटन को बढ़ावा देना।

    (b) शहरी जल निकायों में जलीय जीवन का संरक्षण करना।

    (c) शहरी बाढ़ को कम करने के लिए वर्षा जल को अवशोषित और पुन: उपयोग करना।

    (d) शहरों में पीने के पानी की आपूर्ति के लिए नए जलाशय बनाना।

    उत्तर: (c)

    व्याख्या: ‘स्पंज सिटी’ एक शहरी नियोजन अवधारणा है जिसका उद्देश्य शहरों को प्राकृतिक प्रणालियों जैसे हरित स्थानों, वर्षा जल संचयन और कुशल जल निकासी के माध्यम से वर्षा जल को अवशोषित करने, स्टोर करने और पुन: उपयोग करने में मदद करना है, जिससे शहरी बाढ़ को कम किया जा सके।
  5. भारत में जलवायु परिवर्तन से संबंधित निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
    1. भारत ने 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है।
    2. राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते के तहत एक प्रतिबद्धता है।
    3. जलवायु परिवर्तन के कारण मॉनसून पैटर्न में अधिक अनिश्चितता देखी जा रही है।

    नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनें:

    (a) केवल I

    (b) केवल II और III

    (c) केवल I और III

    (d) I, II और III

    उत्तर: (d)

    व्याख्या: तीनों कथन सही हैं। भारत ने COP26 में 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य घोषित किया है। NDC पेरिस समझौते के तहत देशों द्वारा अपनी जलवायु कार्रवाई की प्रतिबद्धताएं हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण भारत में मॉनसून पैटर्न में अनियमितताएं बढ़ रही हैं।

  6. आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा निकाय राष्ट्रीय स्तर पर आपदा प्रबंधन के लिए नीतियां, योजनाएं और दिशानिर्देश तैयार करने के लिए जिम्मेदार है?

    (a) राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF)

    (b) राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA)

    (c) राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA)

    (d) गृह मंत्रालय

    उत्तर: (c)

    व्याख्या: राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) शीर्ष निकाय है जो आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत राष्ट्रीय स्तर पर नीतियां, योजनाएं और दिशानिर्देश तैयार करता है।
  7. ‘सेन्डाई फ्रेमवर्क फॉर डिजास्टर रिस्क रिडक्शन’ का मुख्य फोकस क्या है?

    (a) विकासशील देशों को आपदा राहत कोष प्रदान करना।

    (b) जलवायु परिवर्तन शमन तकनीकों पर शोध करना।

    (c) आपदा जोखिम को कम करने के लिए वैश्विक, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर कार्रवाई करना।

    (d) प्राकृतिक आपदाओं के बाद केवल पुनर्निर्माण गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित करना।

    उत्तर: (c)

    व्याख्या: सेन्डाई फ्रेमवर्क (2015-2030) आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए एक स्वैच्छिक, गैर-बाध्यकारी समझौता है जो आपदा जोखिम को कम करने के लिए वैश्विक, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर कार्रवाई करने पर जोर देता है, न कि केवल प्रतिक्रिया पर।
  8. निम्नलिखित में से कौन-सा कारक शहरी बाढ़ में जल निकासी प्रणाली की क्षमता को सबसे अधिक प्रभावित करता है?

    (a) शहर में पेड़ों की संख्या।

    (b) ठोस कचरे का अनुचित निपटान।

    (c) शहर में झीलों और तालाबों की संख्या।

    (d) शहर में भूमिगत मेट्रो लाइनों का विस्तार।

    उत्तर: (b)

    व्याख्या: ठोस कचरे का अनुचित निपटान सीधे नालों और सीवरों को बंद कर देता है, जिससे जल निकासी प्रणाली की क्षमता गंभीर रूप से प्रभावित होती है और जलभराव होता है।
  9. हिमालयी क्षेत्र को भूस्खलन के प्रति अधिक संवेदनशील बनाने वाले कारकों में शामिल हैं:
    1. भूगर्भीय रूप से युवा और अस्थिर पर्वत श्रृंखला।
    2. उच्च भूकंपीय गतिविधि।
    3. अत्यधिक और केंद्रित वर्षा।

    उपरोक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

    (a) केवल I

    (b) केवल II और III

    (c) केवल I और III

    (d) I, II और III

    उत्तर: (d)

    व्याख्या: हिमालय एक युवा पर्वत श्रृंखला है जो भूगर्भीय रूप से अस्थिर है, उच्च भूकंपीय क्षेत्र में स्थित है, और हाल के वर्षों में जलवायु परिवर्तन के कारण अत्यधिक केंद्रित वर्षा का अनुभव कर रहा है, ये सभी कारक इसे भूस्खलन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बनाते हैं।

  10. भारत में “बिल्ड बैक बेटर” (Build Back Better) सिद्धांत का क्या अर्थ है?

    (a) आपदा प्रभावित क्षेत्रों में तेजी से अस्थायी आश्रय बनाना।

    (b) आपदा से पहले मौजूद बुनियादी ढांचे को बिल्कुल वैसे ही पुनर्निर्मित करना।

    (c) आपदा के बाद पुनर्निर्माण करते समय, भविष्य की आपदाओं का सामना करने के लिए अधिक लचीला और मजबूत बुनियादी ढाँचा बनाना।

    (d) केवल क्षतिग्रस्त ऐतिहासिक इमारतों का जीर्णोद्धार करना।

    उत्तर: (c)

    व्याख्या: “बिल्ड बैक बेटर” आपदा रिकवरी का एक सिद्धांत है जिसका अर्थ है कि पुनर्निर्माण प्रयासों को न केवल क्षति की मरम्मत करनी चाहिए, बल्कि भविष्य की आपदाओं के प्रति समुदाय और बुनियादी ढांचे की लचीलापन को भी बढ़ाना चाहिए, जिससे वे अधिक सुरक्षित और मजबूत बनें।

मुख्य परीक्षा (Mains)

  1. “भारत में प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती आवृत्ति और तीव्रता केवल मौसमी बदलावों का परिणाम नहीं है, बल्कि यह जलवायु परिवर्तन और अनियोजित विकास का एक जटिल मिश्रण है।” इस कथन का आलोचनात्मक विश्लेषण करें और प्राकृतिक आपदाओं के प्रति भारत की भेद्यता को कम करने के लिए आवश्यक संस्थागत और नीतिगत सुधारों का सुझाव दें। (250 शब्द)
  2. शहरी बाढ़, मुंबई जैसे महानगरों के लिए एक स्थायी संकट बन गया है। इस समस्या के अंतर्निहित कारणों का विश्लेषण करें और ‘स्पंज सिटी’ अवधारणा तथा अन्य टिकाऊ समाधानों के माध्यम से शहरी लचीलापन बढ़ाने के लिए एक व्यापक रणनीति सुझाएं। (250 शब्द)
  3. हिमालय, पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील और भूगर्भीय रूप से अस्थिर होने के कारण, भूस्खलन और बादल फटने जैसी आपदाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। इस क्षेत्र में आपदा जोखिम को बढ़ाने वाले प्राकृतिक और मानवजनित कारकों पर चर्चा करें। हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण और आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए ‘संवेदनशील विकास’ के महत्व पर प्रकाश डालें। (250 शब्द)
  4. “आपदा प्रबंधन केवल प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि तैयारी, लचीलापन और पुनर्निर्माण है।” भारत के संदर्भ में इस कथन का मूल्यांकन करें और आपदा-प्रतिरोधी बुनियादी ढांचे के महत्व और इसे प्राप्त करने के लिए अपनाए जा सकने वाले उपायों पर प्रकाश डालें। (250 शब्द)

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