आज से संसद सत्र: ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और ‘सीजफायर’ के पीछे की पूरी कहानी, जो आपको जाननी चाहिए
चर्चा में क्यों? (Why in News?):
भारत की लोकतांत्रिक परंपरा का हृदय, संसद, एक बार फिर जीवंत होने को तैयार है। आज से संसद का बहुप्रतीक्षित मानसून सत्र शुरू हो रहा है, और इस सत्र की शुरुआत प्रधानमंत्री के मीडिया संबोधन से होगी। हालांकि, राजनीतिक गलियारों में और जनता के बीच यह फुसफुसाहट तेज है कि यह सत्र केवल नियमित विधायी कार्यों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और ‘सीजफायर’ जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भारी हंगामे के आसार हैं। यह सिर्फ एक सत्र की शुरुआत नहीं, बल्कि सरकार और विपक्ष के बीच एक तीव्र वैचारिक और राजनीतिक संघर्ष के मंच की स्थापना है, जिसके केंद्र में राष्ट्रीय सुरक्षा, मानवाधिकार और शासन से जुड़े गंभीर प्रश्न हैं।
संसद सत्र: लोकतंत्र का हृदय और उसकी धड़कनें
भारतीय संसद, जो भारत के लोगों की आकांक्षाओं और विचारों का प्रतिनिधित्व करती है, हमारे लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ है। यह वह स्थान है जहाँ कानून बनाए जाते हैं, नीतियों पर बहस होती है, और सरकार को उसके कार्यों के लिए जवाबदेह ठहराया जाता है। संसद के सत्र – बजट सत्र, मानसून सत्र और शीतकालीन सत्र – लोकतंत्र के इस हृदय की धड़कनें हैं, जिनके माध्यम से राष्ट्र की नब्ज महसूस की जाती है।
क्या होते हैं संसद के सत्र?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 85(1) के तहत, राष्ट्रपति के पास संसद के प्रत्येक सदन को समय-समय पर समन करने की शक्ति है। हालांकि, दो सत्रों के बीच अधिकतम छह महीने से अधिक का अंतराल नहीं होना चाहिए। पारंपरिक रूप से, भारतीय संसद में एक वर्ष में तीन सत्र होते हैं:
- बजट सत्र (फरवरी-मई): यह सबसे लंबा और महत्वपूर्ण सत्र होता है, जिसमें केंद्रीय बजट पेश किया जाता है और उस पर विस्तार से चर्चा होती है।
- मानसून सत्र (जुलाई-सितंबर): यह आमतौर पर एक मध्यकालीन सत्र होता है, जिसमें विभिन्न विधायी कार्य और सार्वजनिक महत्व के मुद्दों पर चर्चा होती है।
- शीतकालीन सत्र (नवंबर-दिसंबर): यह सबसे छोटा सत्र होता है, जिसमें महत्वपूर्ण विधेयकों पर विचार-विमर्श होता है।
इन सत्रों के दौरान, संसद सदस्य (सांसद) विभिन्न संसदीय उपकरणों का उपयोग करके सरकार से प्रश्न पूछते हैं, नीतियों पर बहस करते हैं और जनता की समस्याओं को उठाते हैं।
संसद सत्र की महत्ता: क्यों है यह हमारे लिए महत्वपूर्ण?
एक आम नागरिक के रूप में, हमें संसद सत्र को केवल राजनीतिक खींचतान के रूप में नहीं देखना चाहिए, बल्कि इसे लोकतंत्र की कार्यप्रणाली के रूप में समझना चाहिए। इसकी महत्ता निम्नलिखित बिंदुओं में निहित है:
- विधायिका का कार्य: नए कानूनों का निर्माण, मौजूदा कानूनों में संशोधन या उन्हें निरस्त करना। यह देश के सामाजिक-आर्थिक विकास की दिशा निर्धारित करता है।
- कार्यपालिका पर नियंत्रण: संसद विभिन्न उपकरणों (प्रश्नकाल, शून्यकाल, अविश्वास प्रस्ताव, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव) के माध्यम से सरकार को उसके कार्यों के लिए जवाबदेह ठहराती है। यह सुनिश्चित करता है कि सरकार मनमाने तरीके से काम न करे।
- वित्तीय नियंत्रण: सरकार द्वारा किए जाने वाले सभी खर्चों को संसद की मंजूरी लेनी होती है। बजट का अनुमोदन और अनुदान मांगों पर चर्चा इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है।
- बहस और विचार-विमर्श का मंच: संसद विभिन्न मुद्दों पर विचारों के आदान-प्रदान और सार्वजनिक बहस का एक महत्वपूर्ण मंच है, जो नीतियों को अधिक समावेशी और प्रभावी बनाता है।
- शिकायतों का निवारण: सांसद अपने निर्वाचन क्षेत्रों और जनता की समस्याओं को संसद में उठाते हैं, जिससे सरकार उन पर ध्यान देने के लिए बाध्य होती है।
“संसद केवल एक भवन नहीं है, बल्कि यह वह विचार है जो भारत के संविधान में निहित है। यह भारत की आत्मा है, जो लोकतंत्र के सिद्धांतों को दर्शाती है।”
प्रधानमंत्री का संबोधन: एजेंडे का निर्धारण
सत्र की शुरुआत में प्रधानमंत्री का मीडिया को संबोधित करना एक स्थापित परंपरा है। यह संबोधन सिर्फ एक औपचारिक बयान नहीं होता, बल्कि इसके कई रणनीतिक निहितार्थ होते हैं:
- सरकार की प्राथमिकताएं: प्रधानमंत्री सत्र के लिए सरकार के एजेंडे, प्रमुख विधेयकों और उन मुद्दों पर प्रकाश डालते हैं जिन पर सरकार चर्चा करना चाहती है।
- विपक्ष को संदेश: यह एक अवसर होता है जब प्रधानमंत्री विपक्ष से रचनात्मक सहयोग की अपील करते हैं, या कुछ मामलों में विपक्ष द्वारा उठाए जा सकने वाले मुद्दों पर सरकार का प्रारंभिक रुख स्पष्ट करते हैं।
- जनता से संवाद: यह जनता तक पहुँचने का एक माध्यम भी है, जहाँ सरकार अपनी नीतियों और उपलब्धियों को रेखांकित करती है।
- सत्र का मिजाज तय करना: प्रधानमंत्री का संबोधन अक्सर सत्र के शुरुआती माहौल और मिजाज को तय करता है। उनके बयान सत्र की गति और दिशा को प्रभावित कर सकते हैं।
‘ऑपरेशन सिंदूर’ और ‘सीजफायर’: क्यों हो सकता है हंगामा?
मानसून सत्र में जिन दो मुद्दों पर सबसे अधिक हंगामा होने की संभावना है, वे हैं ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और ‘सीजफायर’। ये दोनों मुद्दे राष्ट्रीय सुरक्षा, मानवाधिकार और राजनीतिक संवेदनशीलता के जटिल जाल में फंसे हुए हैं। आइए इन्हें गहराई से समझते हैं।
‘ऑपरेशन सिंदूर’ – एक संवेदनशील आंतरिक सुरक्षा अभियान का विश्लेषण
हालांकि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ एक काल्पनिक नाम हो सकता है या किसी अत्यंत गोपनीय अभियान का कोडनेम, पर ऐसे अभियान, जो राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े हों और जिनमें सुरक्षा बलों की कार्रवाई शामिल हो, अक्सर संसदीय बहस का विषय बनते हैं। मान लीजिए, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ एक व्यापक आंतरिक सुरक्षा अभियान है जिसे किसी विशेष क्षेत्र में उग्रवाद, आतंकवाद या संगठित अपराध से निपटने के लिए शुरू किया गया है।
हंगामे के संभावित कारण:
- मानवाधिकारों का उल्लंघन: किसी भी बड़े सुरक्षा अभियान में, मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोप लगना आम बात है, चाहे वे वास्तविक हों या कथित। स्थानीय आबादी द्वारा अत्यधिक बल प्रयोग, गलत गिरफ्तारी या हिरासत में मौत के आरोप अक्सर उठते हैं। यदि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में ऐसे कोई आरोप लगे हैं, तो विपक्ष उन्हें जोर-शोर से उठाएगा।
- नागरिकों को नुकसान (Collateral Damage): अभियानों के दौरान अक्सर निर्दोष नागरिकों को नुकसान पहुँचता है या उनकी संपत्ति नष्ट होती है। ऐसी घटनाओं पर विपक्षी दल सरकार से जवाबदेही की मांग करते हैं।
- पारदर्शिता का अभाव: ऐसे अभियानों की प्रकृति गोपनीय होती है, लेकिन पारदर्शिता की कमी अक्सर संदेह पैदा करती है। सरकार द्वारा जानकारी साझा करने में अनिच्छा या विलंब विपक्ष को हंगामा करने का अवसर देता है।
- राजनीतिकरण: आंतरिक सुरक्षा के मुद्दे अक्सर राजनीतिक रंग ले लेते हैं। यदि ऑपरेशन किसी विशेष क्षेत्र या समुदाय को लक्षित प्रतीत होता है, तो इसे राजनीतिक बदले की भावना या भेदभाव के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।
- क़ानूनी वैधता: अभियान की संवैधानिक वैधता या इसमें प्रयुक्त विशेष शक्तियों (जैसे AFSPA – सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम) का उपयोग भी बहस का मुद्दा बन सकता है। क्या अभियान कानूनों के दायरे में था? क्या आवश्यक प्रक्रिया का पालन किया गया?
केस स्टडी: अतीत में, ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’, ‘ऑपरेशन ग्रीन हंट’ जैसे अभियानों पर संसद और जनता में तीखी बहस हुई है, जहाँ सुरक्षा आवश्यकताओं और मानवाधिकारों के बीच संतुलन साधने की चुनौती सामने आई थी। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ भी इसी तरह के सवालों के घेरे में आ सकता है।
UPSC प्रासंगिकता: यह विषय आंतरिक सुरक्षा (जीएस-III), मानवाधिकार (जीएस-II), शासन (जीएस-II) और नैतिकता (जीएस-IV) के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह आपको राज्य की शक्ति, नागरिक स्वतंत्रता और राष्ट्रीय हित के बीच नाजुक संतुलन को समझने में मदद करता है।
‘सीजफायर’ – एक शांति पहल या रणनीतिक चूक?
‘सीजफायर’ या युद्धविराम, संघर्षरत पक्षों के बीच शत्रुता को अस्थायी या स्थायी रूप से रोकने का एक समझौता होता है। यह अक्सर शांति प्रक्रिया की दिशा में पहला कदम होता है। लेकिन, यह भी गहरे विवादों को जन्म दे सकता है। मान लीजिए, ‘सीजफायर’ किसी सीमावर्ती क्षेत्र में या किसी विद्रोही समूह के साथ हुआ है।
हंगामे के संभावित कारण:
- उल्लंघन के आरोप: सीजफायर समझौते अक्सर उल्लंघनों के आरोपों से घिरे रहते हैं। यदि विपक्षी दल या प्रभावित समुदाय यह आरोप लगाते हैं कि सीजफायर का उल्लंघन हो रहा है, या सरकार उन उल्लंघनों पर पर्याप्त कार्रवाई नहीं कर रही है, तो हंगामा तय है।
- सुरक्षा चिताएं: कुछ सुरक्षा विशेषज्ञ या विपक्षी दल यह तर्क दे सकते हैं कि सीजफायर ने देश की सुरक्षा को कमजोर किया है, या इससे आतंकवादी/विद्रोही समूहों को अपनी स्थिति मजबूत करने का मौका मिला है।
- निगोशिएशन की शर्तें: सीजफायर समझौते की शर्तें हमेशा विवाद का विषय हो सकती हैं। क्या सरकार ने बहुत अधिक रियायतें दीं? क्या समझौते से राष्ट्रीय हितों से समझौता हुआ?
- स्थानीय आबादी पर प्रभाव: सीजफायर का स्थानीय आबादी पर सीधा प्रभाव पड़ता है। यदि इससे उनकी सुरक्षा, आजीविका या अधिकारों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है, तो उनकी शिकायतें संसद में उठेंगी।
- पारदर्शिता और जवाबदेही: सीजफायर जैसे संवेदनशील समझौतों के बारे में जानकारी का अभाव भी संदेह पैदा करता है। सरकार पर आरोप लग सकते हैं कि उसने पर्याप्त परामर्श के बिना एकतरफा निर्णय लिया।
ऐतिहासिक उदाहरण: भारत-पाकिस्तान सीमा पर या जम्मू-कश्मीर में विभिन्न उग्रवादी समूहों के साथ हुए सीजफायर समझौते हमेशा राजनीतिक और सामरिक बहस का केंद्र रहे हैं। इसी तरह, वैश्विक स्तर पर भी सीजफायर समझौते (जैसे गाजा पट्टी में) अक्सर विवादों से घिरे रहते हैं।
UPSC प्रासंगिकता: यह विषय अंतर्राष्ट्रीय संबंध (जीएस-II), आंतरिक सुरक्षा (जीएस-III), और नैतिकता (जीएस-IV) के लिए महत्वपूर्ण है। यह आपको राष्ट्रीय सुरक्षा, कूटनीति, शांति स्थापना और संघर्ष समाधान के जटिल पहलुओं को समझने में मदद करता है।
संसद में हंगामे का स्वरूप: संसदीय उपकरण और मर्यादा
जब सरकार और विपक्ष के बीच इन संवेदनशील मुद्दों पर मतभेद होते हैं, तो संसद में हंगामे की स्थिति अक्सर देखने को मिलती है। यह हंगामा विभिन्न संसदीय उपकरणों के माध्यम से प्रकट होता है:
- प्रश्नकाल और शून्यकाल: यह सांसदों को सरकार से सवाल पूछने और सार्वजनिक महत्व के मुद्दों को उठाने का अवसर देता है। अक्सर इन कालों में तीखी नोकझोंक होती है।
- ध्यानाकर्षण प्रस्ताव (Calling Attention Motion): यह एक तत्काल सार्वजनिक महत्व के मामले पर मंत्री का ध्यान आकर्षित करने और उस पर एक संक्षिप्त बयान प्राप्त करने के लिए पेश किया जाता है।
- स्थगन प्रस्ताव (Adjournment Motion): यह एक निश्चित, महत्वपूर्ण और तत्काल सार्वजनिक महत्व के मामले पर चर्चा करने के लिए सदन के सामान्य कामकाज को स्थगित करने का प्रस्ताव है। इसे स्वीकार करना आसान नहीं होता, और यदि स्वीकार हो जाए तो सरकार के खिलाफ अविश्वास का संकेत हो सकता है।
- अविश्वास प्रस्ताव (No-Confidence Motion): यदि विपक्ष को लगता है कि सरकार ने सदन का विश्वास खो दिया है, तो वह अविश्वास प्रस्ताव पेश कर सकती है। यदि यह पारित हो जाए तो सरकार को इस्तीफा देना पड़ता है।
- निंदा प्रस्ताव (Censure Motion): यह सरकार की नीतियों या कार्यों के खिलाफ लाया जाता है और इसमें विशिष्ट मंत्रालय या मंत्री की निंदा की जाती है।
हंगामा और गतिरोध, हालांकि संसदीय लोकतंत्र का एक हिस्सा हो सकते हैं (विपक्ष की आवाज के रूप में), लेकिन अत्यधिक होने पर यह संसद के कामकाज को बाधित करते हैं, जिससे महत्वपूर्ण विधायी कार्य और बहस प्रभावित होती है। इससे जनता का संसद पर विश्वास भी कम हो सकता है।
सरकार और विपक्ष की भूमिका: संतुलन की तलाश
एक जीवंत लोकतंत्र में, सरकार और विपक्ष दोनों की महत्वपूर्ण भूमिकाएँ होती हैं।
सरकार की भूमिका:
- सुशासन प्रदान करना: सरकार का प्राथमिक कार्य देश को प्रभावी ढंग से चलाना और जन कल्याणकारी नीतियां लागू करना है।
- जवाबदेही: सरकार को संसद और जनता के प्रति जवाबदेह रहना चाहिए, अपने निर्णयों का बचाव करना चाहिए और पारदर्शिता सुनिश्चित करनी चाहिए।
- सर्वसम्मति बनाना: महत्वपूर्ण मुद्दों पर सरकार को विपक्ष और अन्य हितधारकों के साथ सर्वसम्मति बनाने का प्रयास करना चाहिए।
- सदन चलाना: सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए भी जिम्मेदार है कि सदन का कामकाज सुचारू रूप से चले और महत्वपूर्ण विधायी कार्य पूरे हों।
विपक्ष की भूमिका:
- सरकार की जवाबदेही तय करना: विपक्ष का मुख्य कार्य सरकार की नीतियों और कार्यों की आलोचनात्मक जांच करना और उसे जनता के प्रति जवाबदेह ठहराना है।
- वैकल्पिक नीतियाँ प्रस्तुत करना: विपक्ष को न केवल आलोचना करनी चाहिए, बल्कि सरकार की नीतियों के व्यवहार्य विकल्प भी प्रस्तुत करने चाहिए।
- सार्वजनिक समस्याओं को उठाना: विपक्ष जनता की आवाज़ बनता है और उनकी शिकायतों और चिंताओं को संसद में उठाता है।
- कानून निर्माण में योगदान: विपक्ष का रचनात्मक सहयोग कानून निर्माण प्रक्रिया को मजबूत बनाता है।
एक स्वस्थ लोकतंत्र में, सरकार और विपक्ष के बीच सहयोग और प्रतिस्पर्धा का एक संतुलन होना चाहिए। रचनात्मक आलोचना, स्वस्थ बहस और आपसी सम्मान संसद के कामकाज के लिए आवश्यक हैं।
चुनौतियाँ और आगे की राह
भारतीय संसद को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, खासकर जब संवेदनशील मुद्दों पर हंगामा होता है:
- अत्यधिक व्यवधान: सत्रों के दौरान लगातार व्यवधान के कारण कार्यवाही का बहुमूल्य समय बर्बाद होता है, जिससे महत्वपूर्ण विधेयकों पर पर्याप्त बहस नहीं हो पाती।
- बहस की गुणवत्ता में गिरावट: शोर-शराबे और बहिर्गमन के कारण अक्सर गंभीर मुद्दों पर गहरी और सार्थक बहस का अभाव रहता है।
- अध्यादेशों पर अत्यधिक निर्भरता: संसदीय गतिरोध के कारण सरकार को अक्सर अध्यादेशों का सहारा लेना पड़ता है, जो विधायिका की शक्ति को कमजोर करता है।
- स्थायी समितियों का कमजोर होना: विधेयकों को अक्सर स्थायी समितियों के पास नहीं भेजा जाता या उन्हें पर्याप्त समय नहीं दिया जाता, जिससे कानून बनाने की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
आगे की राह:
- संसदीय नियमों का सुदृढीकरण: सदस्यों को सदन के नियमों का पालन करने और मर्यादा बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। व्यवधान पैदा करने वाले सदस्यों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
- पूर्व-विधायी जांच: विधेयकों को संसद में पेश करने से पहले विस्तृत सार्वजनिक परामर्श और विशेषज्ञ समीक्षा से गुजरना चाहिए।
- समिति प्रणाली का सशक्तिकरण: विधेयकों को अधिक बार और पर्याप्त समय के लिए संसदीय समितियों को भेजा जाना चाहिए, जहाँ विस्तृत जांच और गैर-पक्षपातपूर्ण बहस हो सके।
- प्रोडक्टिविटी इंडिकेटर: संसद की उत्पादकता को केवल पारित विधेयकों की संख्या से नहीं, बल्कि बहस की गुणवत्ता, सरकार की जवाबदेही और जनहित के मुद्दों पर विचार-विमर्श से भी मापा जाना चाहिए।
- आपसी सम्मान और संवाद: सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को आपसी सम्मान और खुले संवाद की भावना विकसित करनी चाहिए ताकि गतिरोधों को रचनात्मक रूप से हल किया जा सके।
निष्कर्ष
संसद का मानसून सत्र, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और ‘सीजफायर’ जैसे मुद्दों के साथ, भारतीय लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षा साबित होगा। यह न केवल सरकार की नीतियों और विपक्ष की रणनीति को परखेगा, बल्कि यह भी दिखाएगा कि हमारे प्रतिनिधि राष्ट्र के सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण मुद्दों पर कितनी परिपक्वता और जिम्मेदारी के साथ विचार-विमर्श कर सकते हैं। एक मजबूत और प्रभावी संसद ही एक मजबूत और प्रगतिशील भारत की गारंटी है। यह हम सभी की जिम्मेदारी है कि हम संसदीय कार्यवाही पर नजर रखें, अपने प्रतिनिधियों को जवाबदेह ठहराएं और एक ऐसे लोकतंत्र की दिशा में काम करें जहाँ बहस हो, असहमति हो, लेकिन अंततः राष्ट्रीय हित सर्वोपरि हो। यह ‘पूरी कहानी’ हमें यही सिखाती है कि संसद सिर्फ एक चुनावी अखाड़ा नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का एक पवित्र मंच है।
UPSC परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न (Practice Questions for UPSC Exam)
प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) – 10 MCQs
(निम्नलिखित कथनों पर विचार करें)
- प्रश्न: भारतीय संसद के सत्रों के संबंध में, निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
- संविधान के अनुसार, संसद के दो सत्रों के बीच अधिकतम छह महीने से अधिक का अंतराल नहीं होना चाहिए।
- भारत में पारंपरिक रूप से तीन संसदीय सत्र होते हैं: बजट, मानसून और शीतकालीन सत्र।
- राष्ट्रपति के पास संसद के प्रत्येक सदन को सत्र में बुलाने (समन करने) की शक्ति है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
(A) केवल a और b
(B) केवल b और c
(C) केवल a और c
(D) a, b और c
उत्तर: (D)
व्याख्या: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 85(1) के तहत, राष्ट्रपति के पास संसद के प्रत्येक सदन को समय-समय पर समन करने की शक्ति है, यह सुनिश्चित करते हुए कि दो सत्रों के बीच अधिकतम छह महीने से अधिक का अंतराल न हो। भारत में पारंपरिक रूप से बजट (फरवरी-मई), मानसून (जुलाई-सितंबर) और शीतकालीन (नवंबर-दिसंबर) सत्र होते हैं। अतः सभी कथन सही हैं। - प्रश्न: संसद में स्थगन प्रस्ताव (Adjournment Motion) के संबंध में, निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
- इसे केवल लोक सभा में पेश किया जा सकता है, राज्य सभा में नहीं।
- इसका उद्देश्य एक निश्चित, महत्वपूर्ण और तत्काल सार्वजनिक महत्व के मामले पर चर्चा करना होता है।
- स्थगन प्रस्ताव को स्वीकार करने के लिए कम से कम 100 सदस्यों का समर्थन आवश्यक है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
(A) केवल a और b
(B) केवल b और c
(C) केवल a
(D) a, b और c
उत्तर: (A)
व्याख्या: स्थगन प्रस्ताव एक महत्वपूर्ण संसदीय उपकरण है जिसे केवल लोक सभा में पेश किया जा सकता है (राज्य सभा में इसका समतुल्य ‘अल्पकालिक चर्चा’ होती है)। इसका उद्देश्य एक निश्चित, महत्वपूर्ण और तत्काल सार्वजनिक महत्व के मामले पर सदन के सामान्य कामकाज को स्थगित करके चर्चा करना है। इसे स्वीकार करने के लिए कम से कम 50 सदस्यों के समर्थन की आवश्यकता होती है, न कि 100 की। अतः कथन ‘c’ गलत है। - प्रश्न: निम्नलिखित में से कौन सा/से संसदीय उपकरण सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने में मदद करता/करते है/हैं?
- प्रश्नकाल
- शून्यकाल
- ध्यानाकर्षण प्रस्ताव
- अविश्वास प्रस्ताव
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनें:
(A) केवल 1, 2 और 3
(B) केवल 2, 3 और 4
(C) केवल 1 और 4
(D) 1, 2, 3 और 4
उत्तर: (D)
व्याख्या: ये सभी संसदीय उपकरण सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। प्रश्नकाल में मंत्री लिखित या मौखिक जवाब देते हैं, शून्यकाल में सदस्य बिना पूर्व सूचना के मुद्दे उठाते हैं, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव में किसी महत्वपूर्ण मुद्दे पर मंत्री का ध्यान आकर्षित किया जाता है, और अविश्वास प्रस्ताव सरकार को पद छोड़ने के लिए मजबूर कर सकता है। अतः सभी सही हैं। - प्रश्न: सशस्त्र बल (विशेष शक्तियाँ) अधिनियम (AFSPA) के संबंध में, निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
- यह अशांत क्षेत्रों में तैनात सशस्त्र बलों को विशेष शक्तियाँ प्रदान करता है।
- यह अधिनियम केवल भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में ही लागू होता है।
- इसके तहत दी गई शक्तियों में गिरफ्तारी, तलाशी और कुछ मामलों में घातक बल का उपयोग शामिल है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
(A) केवल a और b
(B) केवल b और c
(C) केवल a और c
(D) a, b और c
उत्तर: (C)
व्याख्या: AFSPA अशांत क्षेत्रों में तैनात सशस्त्र बलों को विशेष शक्तियाँ प्रदान करता है, जिनमें बिना वारंट गिरफ्तारी, तलाशी और कुछ परिस्थितियों में घातक बल का उपयोग शामिल है। हालांकि यह मुख्य रूप से उत्तर-पूर्वी राज्यों में लागू रहा है, यह जम्मू-कश्मीर जैसे अन्य अशांत क्षेत्रों में भी लागू किया गया है। अतः कथन ‘b’ गलत है। - प्रश्न: भारत में स्थायी संसदीय समितियों (Standing Parliamentary Committees) के महत्व के संबंध में, निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
- ये विधेयक की विस्तृत जांच करती हैं और व्यापक सार्वजनिक परामर्श की अनुमति देती हैं।
- ये संसद के सत्र में न होने पर भी कार्य करती हैं।
- ये सदन के लिए महत्वपूर्ण रिपोर्टें और सिफारिशें प्रस्तुत करती हैं, जिससे कानून निर्माण की गुणवत्ता बढ़ती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
(A) केवल a और b
(B) केवल b और c
(C) केवल a और c
(D) a, b और c
उत्तर: (D)
व्याख्या: स्थायी संसदीय समितियाँ संसद के कामकाज का एक अभिन्न अंग हैं। वे विधेयकों की विस्तृत जांच करती हैं, संबंधित हितधारकों से परामर्श करती हैं और संसद के सत्र में न होने पर भी कार्य करती हैं। उनकी रिपोर्टें और सिफारिशें कानून बनाने की गुणवत्ता को बढ़ाने में महत्वपूर्ण होती हैं। अतः सभी कथन सही हैं। - प्रश्न: युद्धविराम (Ceasefire) समझौते के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
- यह आमतौर पर संघर्षरत पक्षों के बीच शत्रुता को स्थायी रूप से समाप्त करने का एक समझौता होता है।
- सीजफायर समझौते अक्सर शांति प्रक्रिया की दिशा में पहला कदम होते हैं।
- अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानून (International Humanitarian Law) के तहत, युद्धविराम के दौरान भी नागरिकों की सुरक्षा का ध्यान रखा जाना चाहिए।
उपर्युक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
(A) केवल a और b
(B) केवल b और c
(C) केवल a और c
(D) a, b और c
उत्तर: (B)
व्याख्या: सीजफायर या युद्धविराम, संघर्षरत पक्षों के बीच शत्रुता को अस्थायी या स्थायी रूप से रोकने का एक समझौता होता है, लेकिन यह जरूरी नहीं कि स्थायी समाप्ति हो (कथन ‘a’ में “स्थायी रूप से” गलत है, यह अस्थायी भी हो सकता है)। यह अक्सर शांति प्रक्रिया की दिशा में पहला कदम होता है। अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानून (जिसे युद्ध का कानून भी कहा जाता है) युद्धविराम सहित सभी सैन्य अभियानों के दौरान नागरिकों और गैर-लड़ाकों की सुरक्षा पर जोर देता है। अतः कथन ‘b’ और ‘c’ सही हैं। - प्रश्न: भारत में संसदीय कार्यवाही में ‘बहिर्गमन (Walkout)’ के संबंध में, निम्नलिखित में से कौन सा कथन सबसे सटीक है?
(A) यह एक औपचारिक संसदीय उपकरण है जिसे सदन के नियमों में परिभाषित किया गया है।
(B) यह आमतौर पर विपक्ष द्वारा सरकार के किसी निर्णय या कार्रवाई के विरोध में किया जाता है।
(C) इसे अक्सर अविश्वास प्रस्ताव के विकल्प के रूप में देखा जाता है।
(D) बहिर्गमन के बाद, संबंधित सदस्य को अगले सत्र तक सदन में प्रवेश की अनुमति नहीं होती।
उत्तर: (B)
व्याख्या: बहिर्गमन एक औपचारिक संसदीय उपकरण नहीं है (कथन A गलत)। यह सदन के नियमों में परिभाषित नहीं है। यह आमतौर पर विपक्ष द्वारा सरकार के किसी निर्णय, कानून, या किसी अन्य मुद्दे के विरोध या असंतोष को व्यक्त करने के लिए किया जाता है, जहाँ वे बहस में भाग नहीं लेना चाहते। यह अविश्वास प्रस्ताव का विकल्प नहीं है (कथन C गलत), क्योंकि अविश्वास प्रस्ताव सरकार की वैधता को चुनौती देता है। बहिर्गमन के बाद सदस्यों को अगले सत्र तक रोका नहीं जाता (कथन D गलत)। - प्रश्न: संसद में किसी विधेयक पर पूर्व-विधायी जांच (Pre-legislative Scrutiny) का प्राथमिक उद्देश्य क्या है?
(A) विधेयक को बिना किसी बहस के सीधे पारित कराना।
(B) विधेयक को अंतिम रूप देने से पहले जनता और हितधारकों से प्रतिक्रिया प्राप्त करना।
(C) यह सुनिश्चित करना कि विधेयक केवल स्थायी समिति द्वारा ही अनुमोदित हो।
(D) कार्यपालिका को विधायी प्रक्रिया में पूर्ण नियंत्रण देना।
उत्तर: (B)
व्याख्या: पूर्व-विधायी जांच का प्राथमिक उद्देश्य विधेयक को संसद में पेश करने या अंतिम रूप देने से पहले जनता, विशेषज्ञों, और हितधारकों से व्यापक प्रतिक्रिया और सुझाव प्राप्त करना है। इससे विधेयक की गुणवत्ता में सुधार होता है और वह अधिक समावेशी बनता है। - प्रश्न: भारतीय संसद में सरकार पर वित्तीय नियंत्रण स्थापित करने वाले प्रमुख तरीकों में से कौन सा/से शामिल है/हैं?
- बजट का अनुमोदन
- अनुदान मांगों पर चर्चा और मतदान
- स्थायी समितियों द्वारा व्यय की जांच
उपर्युक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
(A) केवल a और b
(B) केवल b और c
(C) केवल a और c
(D) a, b और c
उत्तर: (D)
व्याख्या: भारतीय संसद सरकार पर वित्तीय नियंत्रण रखती है। बजट का अनुमोदन, विभिन्न मंत्रालयों के लिए अनुदान मांगों पर चर्चा और मतदान, तथा लोक लेखा समिति (PAC) और अनुमान समिति (Estimates Committee) जैसी स्थायी समितियों द्वारा सरकारी खर्चों की जांच, ये सभी वित्तीय नियंत्रण के महत्वपूर्ण तरीके हैं। अतः सभी कथन सही हैं। - प्रश्न: भारतीय संसदीय लोकतंत्र में, ‘कार्यपालिका पर नियंत्रण’ से आप क्या समझते हैं?
(A) केवल न्यायपालिका द्वारा सरकार के निर्णयों की समीक्षा।
(B) विधायिका द्वारा सरकार के कार्यों, नीतियों और खर्चों की जांच और जवाबदेही तय करना।
(C) प्रधानमंत्री द्वारा मंत्रियों के विभागों का आवंटन और प्रदर्शन की निगरानी।
(D) राजनीतिक दलों द्वारा अपने सदस्यों पर अनुशासन लागू करना।
उत्तर: (B)
व्याख्या: भारतीय संसदीय लोकतंत्र में, ‘कार्यपालिका पर नियंत्रण’ का अर्थ है कि विधायिका (संसद) विभिन्न संसदीय उपकरणों जैसे प्रश्नकाल, शून्यकाल, विभिन्न प्रस्तावों, बहस और समितियों के माध्यम से सरकार (कार्यपालिका) के कार्यों, नीतियों और वित्तीय खर्चों की जांच करती है और उसे जनता के प्रति जवाबदेह ठहराती है। यह शक्ति के पृथक्करण और संतुलन-जांच प्रणाली का एक महत्वपूर्ण पहलू है।
मुख्य परीक्षा (Mains)
- “संसद, भारतीय लोकतंत्र का हृदय है।” इस कथन के प्रकाश में, संसद के सत्रों की महत्ता का विश्लेषण कीजिए और चर्चा कीजिए कि कैसे ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसे संवेदनशील आंतरिक सुरक्षा मुद्दों पर होने वाला हंगामा इसकी कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकता है। (250 शब्द)
- ‘सीजफायर’ जैसे संवेदनशील समझौतों के दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा और मानवाधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना एक जटिल चुनौती है। संसद ऐसे मुद्दों पर बहस के लिए एक महत्वपूर्ण मंच कैसे प्रदान करती है, और इसके लिए उसे किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है? समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए। (250 शब्द)
- भारतीय संसदीय प्रणाली में सरकार और विपक्ष की भूमिकाएं परस्पर पूरक हैं, फिर भी अक्सर वे टकराव में बदल जाती हैं। संसद की कार्यक्षमता और गुणवत्तापूर्ण कानून निर्माण सुनिश्चित करने के लिए सरकार और विपक्ष के बीच रचनात्मक सहयोग को कैसे बढ़ावा दिया जा सकता है? सुझाए गए उपायों पर विस्तार से चर्चा कीजिए। (250 शब्द)
- संसद में बढ़ते व्यवधान और बहस की गिरती गुणवत्ता भारतीय लोकतंत्र के लिए एक चिंता का विषय है। इन चुनौतियों के कारणों की पहचान करते हुए, संसद की उत्पादकता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए ठोस सुधारों का सुझाव दीजिए। (250 शब्द)