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संसद में सियासी तूफान: ट्रंप, वोटर लिस्ट और भारतीय लोकतंत्र की चुनौतियां

संसद में सियासी तूफान: ट्रंप, वोटर लिस्ट और भारतीय लोकतंत्र की चुनौतियां

चर्चा में क्यों? (Why in News?):

भारत का विधायी हृदय, संसद भवन, एक बार फिर जीवंत हो उठा है। हाल ही में, मानसून सत्र के आरंभ होने के साथ ही, देश की राजनीतिक धुरी पर दो बड़े मुद्दे छा गए हैं, जिनके कारण सदन में तीखी बहस और हंगामे की आशंका है। पहला मुद्दा, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कथित दावों से संबंधित है, जिसने भारत की संप्रभुता और आंतरिक मामलों में विदेशी हस्तक्षेप के मुद्दे पर एक गंभीर बहस छेड़ दी है। दूसरा, मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया को लेकर उठाई जा रही चिंताएं हैं, जो भारतीय लोकतंत्र की नींव, यानी निष्पक्ष चुनावों की शुचिता पर सवालिया निशान लगा रही हैं। ये दोनों मुद्दे न केवल राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय हैं, बल्कि देश की लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और संस्थागत अखंडता के लिए भी महत्वपूर्ण निहितार्थ रखते हैं।

यह लेख इन दोनों मुद्दों की गहराई में जाएगा, संसद के मानसून सत्र के महत्व को रेखांकित करेगा, और भारतीय लोकतंत्र के समक्ष मौजूद चुनौतियों तथा आगे की राह पर विस्तृत चर्चा करेगा। यूपीएससी उम्मीदवारों के लिए, यह लेख इन जटिल समसामयिक विषयों को समझने, उनका विश्लेषण करने और परीक्षा के लिए प्रासंगिक नोट्स बनाने में एक व्यापक मार्गदर्शिका के रूप में काम करेगा।

संसद का मानसून सत्र: एक परिचय और इसका महत्व

भारतीय संसद, जो भारत के लोकतांत्रिक ताने-बाने का प्रतीक है, संविधान के अनुच्छेद 85 के तहत वर्ष में न्यूनतम दो बार बैठक करती है, हालाँकि व्यवहार में तीन सत्र होते हैं: बजट सत्र (फरवरी-मई), मानसून सत्र (जुलाई-सितंबर), और शीतकालीन सत्र (नवंबर-दिसंबर)। मानसून सत्र, इन तीनों में से मध्य सत्र है और आमतौर पर यह सरकार के विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने, महत्वपूर्ण मुद्दों पर बहस करने और विपक्ष को सरकार को जवाबदेह ठहराने का एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान करता है।

सत्र के दौरान, सांसद विभिन्न विधायी प्रस्तावों पर चर्चा करते हैं, विधेयकों को पारित करते हैं, बजटीय प्रावधानों की समीक्षा करते हैं, और सार्वजनिक महत्व के मुद्दों पर बहस करते हैं। प्रश्नकाल, शून्यकाल, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव, स्थगन प्रस्ताव और अविश्वास प्रस्ताव जैसे संसदीय उपकरण विपक्ष को सरकार की नीतियों और कार्यों पर सवाल उठाने का अवसर प्रदान करते हैं। यह सत्र भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की जीवंतता को दर्शाता है, जहाँ विभिन्न आवाजों को सुना जाता है और राष्ट्रीय हित में निर्णय लिए जाते हैं।

विदेशी दावों का बवंडर: ट्रंप प्रकरण की परतें

हाल ही में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कथित दावों ने भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में एक हलचल पैदा कर दी है। इन दावों का सार और उनके पीछे की वास्तविकता चाहे जो भी हो, महत्वपूर्ण बात यह है कि इन्होंने भारत की संप्रभुता, राष्ट्रीय सुरक्षा और आंतरिक मामलों में संभावित विदेशी हस्तक्षेप के मुद्दे को केंद्र में ला दिया है।

विदेशी हस्तक्षेप का अर्थ और इसके आयाम:

विदेशी हस्तक्षेप का तात्पर्य किसी अन्य देश द्वारा किसी राष्ट्र के आंतरिक मामलों में उसके राष्ट्रीय हितों को प्रभावित करने के उद्देश्य से की गई किसी भी कार्रवाई से है। यह प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप से लेकर अप्रत्यक्ष माध्यमों जैसे:

  • सूचना युद्ध (Information Warfare): दुष्प्रचार, गलत सूचना, या प्रचार के माध्यम से सार्वजनिक राय को प्रभावित करना।
  • साइबर हमले (Cyber Attacks): महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे या चुनावी प्रणालियों को बाधित करना।
  • आर्थिक दबाव (Economic Pressure): व्यापार प्रतिबंधों या वित्तीय साधनों का उपयोग करना।
  • राजनीतिक पैरवी (Political Lobbying): विदेशी सरकारों या नेताओं पर सीधे प्रभाव डालने का प्रयास करना।
  • चुनावों को प्रभावित करने का प्रयास (Election Interference): किसी विशेष उम्मीदवार या पार्टी के पक्ष में या खिलाफ प्रचार करना।

भारतीय संदर्भ में निहितार्थ:

यदि ट्रंप के दावे सत्य हैं, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं:

  1. संप्रभुता पर हमला: भारत एक संप्रभु राष्ट्र है, और उसके आंतरिक राजनीतिक मामलों में किसी भी बाहरी शक्ति का हस्तक्षेप उसकी संप्रभुता का सीधा उल्लंघन है।
  2. राष्ट्रीय सुरक्षा: विदेशी हस्तक्षेप देश की राष्ट्रीय सुरक्षा को कमजोर कर सकता है, खासकर यदि इसमें संवेदनशील जानकारी या महत्वपूर्ण चुनावी प्रक्रियाओं को प्रभावित करने का प्रयास शामिल हो।
  3. लोकतांत्रिक संस्थाओं का क्षरण: यदि विदेशी शक्तियाँ चुनावों या राजनीतिक निर्णयों को प्रभावित कर सकती हैं, तो यह जनता के लोकतांत्रिक प्रक्रिया में विश्वास को कम कर देगा।
  4. कूटनीतिक संबंध: इस तरह के दावे भारत के द्विपक्षीय और बहुपक्षीय संबंधों को प्रभावित कर सकते हैं, विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ।
  5. घरेलू राजनीति में ध्रुवीकरण: ऐसे दावे राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का कारण बन सकते हैं, जिससे घरेलू राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ सकता है।

संसद की भूमिका:

इस मुद्दे पर संसद में बहस अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह सरकार को स्थिति स्पष्ट करने, भविष्य में ऐसे हस्तक्षेपों को रोकने के लिए उठाए जा सकने वाले कदमों पर चर्चा करने और देश को आश्वस्त करने का अवसर प्रदान करती है कि उसकी लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं सुरक्षित हैं। विपक्ष के लिए यह सरकार को इस मुद्दे पर जवाबदेह ठहराने का एक मंच है।

“लोकतंत्र का मंदिर – संसद – न केवल कानून बनाता है, बल्कि यह वह सर्वोच्च मंच भी है जहाँ राष्ट्र अपनी चिंताओं को व्यक्त करता है, चुनौतियों पर विचार-विमर्श करता है और अपने भविष्य की दिशा निर्धारित करता है।”

मतदाता सूची पुनरीक्षण: लोकतंत्र की नींव पर सवाल

किसी भी लोकतंत्र की सफलता निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनावों पर निर्भर करती है, और निष्पक्ष चुनावों की नींव एक त्रुटिरहित मतदाता सूची है। मतदाता सूची पुनरीक्षण वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से मतदाता सूची को अद्यतन किया जाता है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि इसमें सभी पात्र नागरिक शामिल हैं और अपात्र या मृत मतदाताओं को हटा दिया गया है। हाल ही में इस प्रक्रिया को लेकर कुछ चिंताएं सामने आई हैं, जिसके कारण इस मुद्दे पर संसद में गरमागरम बहस होने की संभावना है।

मतदाता सूची पुनरीक्षण का महत्व:

  • शुचिता और सटीकता: एक सटीक मतदाता सूची यह सुनिश्चित करती है कि केवल पात्र नागरिक ही वोट दें, जिससे चुनाव की शुचिता बनी रहती है।
  • समावेशिता: यह सुनिश्चित करना कि कोई भी पात्र मतदाता छूट न जाए, विशेष रूप से हाशिए पर रहने वाले और कमजोर वर्ग, लोकतंत्र की समावेशी प्रकृति के लिए महत्वपूर्ण है।
  • अवैध मतदान की रोकथाम: मृत मतदाताओं, दोहरी प्रविष्टियों या अयोग्य व्यक्तियों को हटाना फर्जी या अवैध मतदान को रोकता है।
  • नागरिकों का विश्वास: जब नागरिकों को मतदाता सूची की सटीकता पर भरोसा होता है, तो उनका पूरी चुनावी प्रक्रिया में विश्वास बढ़ता है।

पुनरीक्षण प्रक्रिया में चुनौतियाँ और चिंताएँ:

भारत जैसे विशाल और विविध देश में मतदाता सूची का पुनरीक्षण एक जटिल कार्य है। इसमें कई चुनौतियाँ और चिंताएँ सामने आती हैं:

  1. त्रुटिपूर्ण विलोपन (Erroneous Deletions): अक्सर ऐसी शिकायतें मिलती हैं कि पात्र मतदाताओं के नाम गलती से सूची से हटा दिए गए हैं, जिससे उन्हें मतदान के अधिकार से वंचित होना पड़ता है।
  2. दोहरी प्रविष्टियाँ (Duplicate Entries): कभी-कभी एक ही व्यक्ति का नाम विभिन्न स्थानों पर या विभिन्न संस्करणों में दर्ज हो जाता है, जिससे फर्जी मतदान की संभावना बढ़ जाती है।
  3. शामिल न होना (Exclusion of Marginalized): शहरी गरीबों, प्रवासी श्रमिकों, बेघरों और ट्रांसजेंडर समुदाय जैसे हाशिए पर रहने वाले समूहों का मतदाता सूची में शामिल होना एक चुनौती बनी हुई है।
  4. डेटा गोपनीयता (Data Privacy): मतदाता डेटा को एकत्र करने और संग्रहीत करने में गोपनीयता और सुरक्षा सुनिश्चित करना एक महत्वपूर्ण चिंता है, विशेष रूप से आधार या अन्य पहचान पत्रों के साथ लिंकिंग के संदर्भ में।
  5. तकनीकी चुनौतियाँ: तकनीकी त्रुटियां, सॉफ्टवेयर की खामियां, और ऑनलाइन पंजीकरण पोर्टलों की पहुँच भी समस्याएँ पैदा कर सकती हैं।
  6. राजनीतिक आरोप: विपक्षी दल अक्सर मतदाता सूची में हेरफेर या जानबूझकर कुछ वर्गों के मतदाताओं को हटाने के आरोप लगाते हैं, जिससे राजनीतिक विवाद उत्पन्न होता है।

भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की भूमिका:

भारत निर्वाचन आयोग (ECI) मतदाता सूची की तैयारी और पुनरीक्षण के लिए जिम्मेदार संवैधानिक निकाय है। यह जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और 1951 के प्रावधानों के तहत कार्य करता है। ECI नियमित रूप से मतदाता सूची के विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (Special Summary Revision – SSR) अभियान चलाता है, जिसमें मतदाताओं को अपने नाम दर्ज कराने, हटाने या सुधारने का अवसर मिलता है। पारदर्शिता और सटीकता सुनिश्चित करने के लिए आयोग लगातार नई तकनीकों और प्रक्रियाओं को अपनाने का प्रयास करता है, जैसे कि EPIC (Elector Photo Identity Card) और चुनावी रोल की ऑनलाइन उपलब्धता।

आगे की राह (पुनरीक्षण के संदर्भ में):

  • निरंतर अद्यतन: एक गतिशील मतदाता सूची प्रणाली विकसित करना जो जन्म, मृत्यु और निवास परिवर्तन को स्वचालित रूप से अपडेट कर सके।
  • नागरिक-केंद्रित दृष्टिकोण: पंजीकरण और सुधार प्रक्रियाओं को अधिक सुलभ और उपयोगकर्ता-अनुकूल बनाना।
  • प्रौद्योगिकी का बेहतर उपयोग: डेटाबेस प्रबंधन और सत्यापन प्रक्रियाओं में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ब्लॉकचेन जैसी उन्नत तकनीकों का उपयोग।
  • जागरूकता अभियान: मतदाताओं को पुनरीक्षण प्रक्रियाओं के बारे में शिक्षित करने और उन्हें अपनी भागीदारी के लिए प्रोत्साहित करने के लिए मजबूत जागरूकता अभियान चलाना।
  • निष्पक्ष ऑडिट: मतदाता सूची के नियमित, स्वतंत्र ऑडिट सुनिश्चित करना ताकि उसकी सटीकता और शुचिता का सत्यापन हो सके।

“एक स्वस्थ लोकतंत्र की धड़कन उसके स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों में निहित होती है, जिसकी पहली शर्त एक त्रुटिरहित और समावेशी मतदाता सूची है। यह लोकतंत्र की आत्मा है, जिसे सावधानी से पोषित किया जाना चाहिए।”

संसद में संभावित हंगामे का विश्लेषण

संसद का सत्र अक्सर बहस और चर्चा के साथ-साथ हंगामे और व्यवधानों का भी गवाह बनता है। जब ट्रंप के दावों और मतदाता सूची पुनरीक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे एजेंडे में होते हैं, तो यह स्वाभाविक है कि सदन में गरमागरम बहस और विरोध प्रदर्शन की संभावना बढ़ जाती है।

हंगामे के कारण:

  • राजनीतिक ध्रुवीकरण: प्रमुख मुद्दों पर सरकार और विपक्ष के बीच गहरी वैचारिक मतभेद।
  • जवाबदेही सुनिश्चित करना: विपक्ष सरकार को संवेदनशील मुद्दों पर जवाबदेह ठहराने के लिए अक्सर संसदीय प्रक्रियाओं का उपयोग करता है, जिसमें कभी-कभी व्यवधान भी शामिल होते हैं।
  • जनता का ध्यान आकर्षित करना: संसद में हंगामे के माध्यम से विपक्ष राष्ट्रीय मुद्दों पर जनता का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास करता है।
  • विपक्ष की रणनीति: प्रमुख विधेयकों को पारित होने से रोकने या सरकार पर किसी विशेष मुद्दे पर बहस के लिए दबाव बनाने हेतु।

संसदीय प्रक्रियाएँ और हंगामा:

संसद में कई प्रक्रियागत उपकरण हैं जिनका उपयोग बहस और विरोध के लिए किया जाता है:

  • स्थगन प्रस्ताव (Adjournment Motion): यह एक असाधारण उपाय है जिसका उपयोग तत्काल सार्वजनिक महत्व के किसी निश्चित मामले पर चर्चा के लिए सदन के सामान्य कामकाज को स्थगित करने के लिए किया जाता है। अक्सर सरकार को घेरने के लिए इसका उपयोग किया जाता है।
  • ध्यानाकर्षण प्रस्ताव (Calling Attention Motion): यह किसी मंत्री का ध्यान सार्वजनिक महत्व के किसी मामले की ओर आकर्षित करने और उस पर एक आधिकारिक बयान प्राप्त करने के लिए होता है।
  • अविश्वास प्रस्ताव (No-Confidence Motion): यदि विपक्ष को लगता है कि सरकार ने अपना बहुमत खो दिया है या वह संवैधानिक रूप से कार्य नहीं कर रही है, तो वह अविश्वास प्रस्ताव ला सकता है।
  • प्रश्नकाल और शून्यकाल (Question Hour & Zero Hour): ये सरकार को जवाबदेह ठहराने के लिए महत्वपूर्ण समय होते हैं, लेकिन अक्सर इन अवधियों में भी हंगामा देखा जाता है, खासकर जब विपक्ष किसी विशेष मुद्दे पर तत्काल चर्चा चाहता है।

व्यवधानों का प्रभाव:

हालांकि विरोध और जवाबदेही लोकतंत्र का अभिन्न अंग हैं, अत्यधिक व्यवधानों से संसदीय कार्यप्रणाली पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है:

  • विधायी कार्य में बाधा: महत्वपूर्ण विधेयकों और कानूनों पर चर्चा और उनके पारित होने में देरी होती है।
  • सार्वजनिक धन का अपव्यय: संसदीय कार्यवाही के बाधित होने से जनता के पैसे का नुकसान होता है।
  • सदन की गरिमा में कमी: बार-बार होने वाला हंगामा सदन की गंभीरता और गरिमा को कम करता है, जिससे जनता का संसदीय प्रक्रियाओं में विश्वास कम होता है।
  • महत्वपूर्ण बहसों का अभाव: हंगामे के कारण कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर विस्तृत और सार्थक बहस नहीं हो पाती है।

भारतीय लोकतंत्र के समक्ष चुनौतियाँ

ट्रंप के दावों और मतदाता सूची के मुद्दों के साथ-साथ, भारतीय लोकतंत्र कई व्यापक चुनौतियों का सामना कर रहा है:

  1. राजनीतिक ध्रुवीकरण और असहिष्णुता: समाज में बढ़ती ध्रुवीकरण की प्रवृत्ति और राजनीतिक बहसों में असहिष्णुता ने रचनात्मक संवाद को बाधित किया है।
  2. संस्थाओं का क्षरण: चुनाव आयोग, न्यायपालिका, और विभिन्न जाँच एजेंसियों जैसी लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता और अखंडता पर सवाल उठना एक चिंता का विषय है।
  3. धनबल और बाहुबल का प्रभाव: चुनावों में धन और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों का प्रभाव अभी भी एक बड़ी चुनौती है।
  4. सूचना का विखंडन और गलत सूचना: सोशल मीडिया के युग में, गलत सूचना (misinformation) और दुष्प्रचार (disinformation) तेजी से फैलते हैं, जिससे सार्वजनिक राय और चुनावी प्रक्रिया प्रभावित होती है।
  5. संसदीय उत्पादकता में गिरावट: बार-बार होने वाले व्यवधानों के कारण संसद की उत्पादकता प्रभावित होती है, जिससे महत्वपूर्ण विधायी कार्यों में बाधा आती है।
  6. क्षेत्रीय असमानताएँ और सामाजिक विभाजन: आर्थिक असमानताएँ, जातिगत और धार्मिक विभाजन अभी भी लोकतंत्र के समावेशी स्वरूप को चुनौती देते हैं।
  7. राज्यों के अधिकार का क्षरण: संघीय ढाँचे में राज्यों के अधिकारों का कथित क्षरण भी एक चिंता का विषय रहा है।

आगे की राह: संसद और लोकतंत्र का सशक्तिकरण

भारतीय लोकतंत्र की चुनौतियों का सामना करने और उसकी मजबूती सुनिश्चित करने के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण आवश्यक है:

  1. संसदीय प्रक्रियाओं का सम्मान:
    • विपक्ष और सरकार दोनों को संसदीय नियमों और प्रक्रियाओं का सम्मान करना चाहिए।
    • बहस, चर्चा और असहमति को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए, लेकिन व्यवधानों को न्यूनतम किया जाना चाहिए।
    • प्रोडक्टिविटी बढ़ाने के लिए सदस्यों को विभिन्न प्रक्रियाओं (प्रश्नकाल, शून्यकाल) का रचनात्मक उपयोग करना चाहिए।
  2. विधेयकों की गहन जाँच:
    • विधेयकों को बिना पर्याप्त बहस के पारित करने के बजाय, उन्हें संसदीय स्थायी समितियों (Parliamentary Standing Committees) को संदर्भित करने की प्रथा को मजबूत किया जाना चाहिए।
    • समितियाँ विशेषज्ञ इनपुट प्राप्त कर सकती हैं और अधिक विस्तृत जाँच कर सकती हैं, जिससे बेहतर कानून बनते हैं।
  3. चुनावी सुधारों को जारी रखना:
    • मतदाता सूची की सटीकता सुनिश्चित करने के लिए निर्वाचन आयोग को निरंतर प्रयास करने चाहिए।
    • चुनावों में धन बल और आपराधिक तत्वों के प्रभाव को कम करने के लिए कड़े नियम और उनका प्रभावी प्रवर्तन आवश्यक है।
    • डिजिटल साक्षरता और मतदाता जागरूकता कार्यक्रमों को मजबूत किया जाना चाहिए।
  4. संस्थाओं की स्वायत्तता की सुरक्षा:
    • चुनाव आयोग, न्यायपालिका और केंद्रीय जाँच एजेंसियों जैसी संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और स्वायत्तता को बनाए रखना और मजबूत करना।
    • उनकी नियुक्तियों और कार्यप्रणाली में पारदर्शिता सुनिश्चित करना।
  5. नागरिक समाज और मीडिया की भूमिका:
    • नागरिक समाज संगठनों और एक स्वतंत्र, जिम्मेदार मीडिया को बढ़ावा देना, जो सरकार को जवाबदेह ठहराते हैं और जनता को सूचित करते हैं।
    • गलत सूचना और दुष्प्रचार का मुकाबला करने के लिए तथ्य-जाँच और मीडिया साक्षरता कार्यक्रमों को बढ़ावा देना।
  6. संघवाद को मजबूत करना:
    • केंद्र और राज्यों के बीच सहयोगात्मक संघवाद की भावना को बढ़ावा देना।
    • वित्तीय और विधायी शक्तियों के विकेंद्रीकरण पर विचार करना जहाँ उपयुक्त हो।
  7. डिजिटल सुरक्षा और साइबर संप्रभुता:
    • विदेशी साइबर हमलों और सूचना युद्ध से बचाने के लिए देश के डिजिटल बुनियादी ढांचे को मजबूत करना।
    • डेटा गोपनीयता कानूनों को सुदृढ़ करना।

निष्कर्ष:

मानसून सत्र 2025 न केवल विधायी कार्यों का एक महत्वपूर्ण मंच है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र की चुनौतियों और उसकी लचीलेपन का भी एक दर्पण है। ट्रंप के दावों और मतदाता सूची के पुनरीक्षण पर होने वाली बहस भारतीय संसद के उस मूल उद्देश्य को उजागर करती है, जहाँ राष्ट्र के समक्ष मौजूद सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की जाती है। यह समय है कि सभी राजनीतिक दल, विशेष रूप से संसद के सदस्य, इन मुद्दों पर सार्थक और रचनात्मक बहस में संलग्न हों। लोकतंत्र का स्वास्थ्य बहस की गहराई, कानून की गुणवत्ता और चुनावी प्रक्रिया की शुचिता से मापा जाता है। एक मजबूत संसद ही एक मजबूत और जीवंत लोकतंत्र की नींव है, और यह सत्र भारत के लोकतांत्रिक भविष्य की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

UPSC परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न (Practice Questions for UPSC Exam)

प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) – 10 MCQs

(प्रत्येक प्रश्न के लिए सही विकल्प चुनें और फिर उत्तर एवं व्याख्या देखें)

1. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 85 के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. यह राष्ट्रपति को संसद के सत्रों को आहूत करने और सत्रावसान करने की शक्ति प्रदान करता है।
  2. दो सत्रों के बीच अधिकतम छह महीने का अंतराल हो सकता है।
  3. यह भारत में लोकसभा और राज्यसभा दोनों के लिए वर्ष में अनिवार्य रूप से तीन सत्रों का प्रावधान करता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल I और II

(b) केवल II और III

(c) केवल I

(d) I, II और III

उत्तर: (a)

व्याख्या: अनुच्छेद 85 राष्ट्रपति को संसद के सत्रों को आहूत करने (summon), सत्रावसान करने (prorogue) और लोकसभा को भंग करने (dissolve) की शक्ति प्रदान करता है। संविधान यह भी अनिवार्य करता है कि संसद के दो सत्रों के बीच छह महीने से अधिक का अंतराल नहीं होना चाहिए, जिसका अर्थ है कि वर्ष में कम से कम दो सत्र होने चाहिए। हालाँकि, व्यवहार में तीन सत्र (बजट, मानसून, शीतकालीन) होते हैं, लेकिन संविधान उन्हें अनिवार्य नहीं करता है।

2. भारत में मतदाता सूची तैयार करने और उसके पुनरीक्षण की जिम्मेदारी मुख्यतः किसकी है?

(a) भारत सरकार का गृह मंत्रालय

(b) भारत निर्वाचन आयोग (ECI)

(c) संबंधित राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी

(d) संसद की विधायी समिति

उत्तर: (b)

व्याख्या: भारत निर्वाचन आयोग (ECI) एक संवैधानिक निकाय है जो भारत में संघ और राज्य के चुनाव कराने के लिए जिम्मेदार है, जिसमें मतदाता सूची का पर्यवेक्षण, निर्देशन और नियंत्रण, साथ ही उसकी तैयारी और पुनरीक्षण भी शामिल है।

3. निम्नलिखित में से कौन-सा संसदीय उपकरण किसी तत्काल सार्वजनिक महत्व के मामले पर चर्चा के लिए सदन के सामान्य कामकाज को स्थगित करने के लिए प्रयोग किया जाता है?

(a) ध्यानाकर्षण प्रस्ताव

(b) स्थगन प्रस्ताव

(c) शून्यकाल

(d) विशेष उल्लेख

उत्तर: (b)

व्याख्या: स्थगन प्रस्ताव (Adjournment Motion) का उपयोग तत्काल सार्वजनिक महत्व के किसी निश्चित मामले पर चर्चा के लिए सदन के सामान्य कामकाज को स्थगित करने के लिए किया जाता है। इसके लिए 50 सदस्यों के समर्थन की आवश्यकता होती है।

4. जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 निम्नलिखित में से किस प्रावधान से संबंधित है?

(a) चुनाव में भ्रष्ट आचरण और अन्य अपराधों का निवारण

(b) मतदाताओं की योग्यता और मतदाता सूची की तैयारी

(c) संसद सदस्यों और राज्य विधानसभा सदस्यों की अयोग्यता

(d) चुनाव याचिकाओं का निपटारा

उत्तर: (b)

व्याख्या: जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (Representation of the People Act, 1950) मुख्य रूप से मतदाताओं की योग्यता, मतदाता सूची की तैयारी और संसदीय तथा राज्य विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन से संबंधित है। जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 चुनाव में भ्रष्ट आचरण, अपराधों और चुनाव याचिकाओं से संबंधित है।

5. ‘शून्यकाल’ (Zero Hour) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

  1. यह भारतीय संसदीय नवाचार है और संसदीय नियमों में इसका उल्लेख नहीं है।
  2. यह प्रश्नकाल के ठीक बाद शुरू होता है।
  3. सदस्य बिना किसी पूर्व सूचना के तत्काल सार्वजनिक महत्व के मामलों को उठा सकते हैं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल I और II

(b) केवल II और III

(c) केवल I और III

(d) I, II और III

उत्तर: (d)

व्याख्या: शून्यकाल (Zero Hour) भारतीय संसदीय नवाचार है, जिसका संसदीय नियमों में कोई उल्लेख नहीं है। यह प्रश्नकाल के ठीक बाद दोपहर 12 बजे शुरू होता है और जब तक दिन का एजेंडा (नियमित व्यावसायिक कार्य) लिया जाता है, तब तक चलता है। इसमें सदस्य पूर्व सूचना के बिना तत्काल सार्वजनिक महत्व के मामले उठा सकते हैं।

6. भारत में ‘अविश्वास प्रस्ताव’ (No-Confidence Motion) के संबंध में, निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है?

(a) इसे केवल लोकसभा में ही पेश किया जा सकता है।

(b) इसे स्वीकार करने के लिए कम से कम 50 सदस्यों के समर्थन की आवश्यकता होती है।

(c) इसे पेश करने का कारण बताना अनिवार्य है।

(d) यदि यह पारित हो जाता है, तो मंत्रिपरिषद को इस्तीफा देना पड़ता है।

उत्तर: (c)

व्याख्या: अविश्वास प्रस्ताव को पेश करने का कोई कारण बताना अनिवार्य नहीं है। संविधान का अनुच्छेद 75 (3) यह कहता है कि मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होगी। इसलिए, अविश्वास प्रस्ताव केवल लोकसभा में ही पेश किया जा सकता है। इसे स्वीकार करने के लिए 50 सदस्यों के समर्थन की आवश्यकता होती है, और यदि यह पारित हो जाता है, तो सरकार (मंत्रिपरिषद) को इस्तीफा देना पड़ता है।

7. ‘संप्रभुता’ (Sovereignty) शब्द का सबसे अच्छा वर्णन कौन करता है?

(a) किसी राष्ट्र की विदेशी सहायता पर निर्भरता।

(b) किसी राष्ट्र की अपने आंतरिक और बाहरी मामलों में स्वतंत्र और सर्वोच्च निर्णय लेने की शक्ति।

(c) किसी राष्ट्र की केवल बाहरी मामलों को नियंत्रित करने की क्षमता।

(d) किसी राष्ट्र की अपनी सीमाओं की रक्षा करने की क्षमता।

उत्तर: (b)

व्याख्या: संप्रभुता एक राष्ट्र की अपने आंतरिक मामलों (जैसे शासन, कानून बनाना) और बाहरी मामलों (जैसे अन्य देशों के साथ संबंध) में स्वतंत्र और सर्वोच्च निर्णय लेने की शक्ति को संदर्भित करती है। इसका अर्थ है कि वह किसी बाहरी शक्ति के नियंत्रण में नहीं है।

8. मतदाता पहचान पत्र (EPIC) भारत में किसके द्वारा जारी किया जाता है?

(a) गृह मंत्रालय

(b) चुनाव आयोग

(c) राज्य सरकारें

(d) भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI)

उत्तर: (b)

व्याख्या: मतदाता पहचान पत्र (Elector Photo Identity Card – EPIC), जिसे वोटर आईडी कार्ड भी कहा जाता है, भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा चुनाव के दौरान मतदाताओं की पहचान के लिए जारी किया जाता है।

9. भारतीय संसद के बजट सत्र के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?

(a) यह आमतौर पर मानसून सत्र के बाद आयोजित किया जाता है।

(b) यह सबसे छोटा संसदीय सत्र होता है।

(c) इसमें भारत सरकार का वार्षिक वित्तीय विवरण (बजट) प्रस्तुत और चर्चा किया जाता है।

(d) इसमें कोई विधेयक पारित नहीं किया जाता है।

उत्तर: (c)

व्याख्या: बजट सत्र आमतौर पर फरवरी से मई तक आयोजित किया जाता है और यह संसद का सबसे लंबा सत्र होता है। इसमें सरकार का वार्षिक वित्तीय विवरण (बजट) प्रस्तुत किया जाता है और उस पर चर्चा होती है। इस सत्र में कई महत्वपूर्ण विधेयक भी पारित किए जाते हैं।

10. ‘सुप्रीमसी ऑफ पार्लियामेंट’ (Parliamentary Supremacy) की अवधारणा किस देश की संसदीय प्रणाली से सर्वाधिक जुड़ी हुई है?

(a) संयुक्त राज्य अमेरिका

(b) यूनाइटेड किंगडम (ब्रिटेन)

(c) भारत

(d) कनाडा

उत्तर: (b)

व्याख्या: ‘सुप्रीमसी ऑफ पार्लियामेंट’ या ‘संसदीय संप्रभुता’ की अवधारणा यूनाइटेड किंगडम की संसदीय प्रणाली की एक प्रमुख विशेषता है, जहाँ संसद सर्वोच्च कानून बनाने वाली संस्था है और कोई भी अदालत संसद द्वारा बनाए गए कानून को असंवैधानिक घोषित नहीं कर सकती। भारत में संसदीय संप्रभुता के बजाय ‘संसदीय सर्वोच्चता’ (Parliamentary Sovereignty) और ‘न्यायिक समीक्षा’ (Judicial Review) के बीच संतुलन है।

मुख्य परीक्षा (Mains)

1. “हाल ही में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कथित दावों और मतदाता सूची पुनरीक्षण पर उठे विवाद ने भारतीय लोकतंत्र के समक्ष महत्वपूर्ण चुनौतियाँ प्रस्तुत की हैं।” इस कथन के आलोक में, भारत की संप्रभुता और चुनावी अखंडता पर पड़ने वाले प्रभावों का विश्लेषण करें। (250 शब्द)

2. भारतीय संसदीय प्रणाली में विरोध प्रदर्शन और व्यवधान एक सामान्य घटना बन गए हैं। क्या आपको लगता है कि ये लोकतंत्र के लिए आवश्यक हैं या केवल संसदीय कार्यप्रणाली में बाधा? इस संदर्भ में, संसद में रचनात्मक बहस को बढ़ावा देने और इसकी उत्पादकता बढ़ाने के लिए सुझाव दीजिए। (250 शब्द)

3. एक त्रुटिरहित मतदाता सूची किसी भी लोकतांत्रिक चुनाव की आधारशिला है। भारत में मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया में आने वाली प्रमुख चुनौतियों पर चर्चा करें और निर्वाचन आयोग द्वारा इन चुनौतियों का सामना करने के लिए उठाए जा सकने वाले कदमों का सुझाव दीजिए। (250 शब्द)

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