न्यायिक महाभियोग का तूफान: 100 सांसद, एक न्यायाधीश और संवैधानिक प्रक्रिया की अग्निपरीक्षा
चर्चा में क्यों? (Why in News?):
हाल ही में, केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू के एक बयान ने देश भर में सुर्खियां बटोरीं, जिसमें उन्होंने संकेत दिया कि दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया जाएगा। यह बयान ऐसे समय आया है जब न्यायमूर्ति वर्मा के घर से कथित तौर पर नकदी बरामद होने के मामले ने राजनीतिक और न्यायिक गलियारों में हलचल मचा दी है। खबर के अनुसार, इस महाभियोग प्रस्ताव पर 100 सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं, जो किसी भी न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रक्रिया शुरू करने के लिए आवश्यक समर्थन से अधिक है। यह घटनाक्रम भारतीय न्यायपालिका की स्वतंत्रता, जवाबदेही और संवैधानिक प्रक्रिया की जटिलताओं पर एक बार फिर बहस छेड़ता है।
किसी भी न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव अपने आप में एक गंभीर और दुर्लभ घटना है, जो संवैधानिक मशीनरी की असाधारण परिस्थितियों में ही सक्रिय होती है। यह केवल एक कानूनी या राजनीतिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि न्यायपालिका की पवित्रता और लोकतंत्र के स्तंभों को अक्षुण्ण रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। आइए, इस पूरी प्रक्रिया, इसके इतिहास, चुनौतियों और भविष्य की राह को गहराई से समझते हैं।
महाभियोग क्या है? (What is Impeachment?)
भारतीय संदर्भ में, महाभियोग (Impeachment) एक अर्ध-न्यायिक प्रक्रिया है जिसका उपयोग संविधान द्वारा उच्च संवैधानिक पदाधिकारियों, जैसे भारत के राष्ट्रपति, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों, मुख्य चुनाव आयुक्त, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) आदि को उनके पद से हटाने के लिए किया जाता है। यह प्रक्रिया ‘साधारण बहुमत’ से नहीं, बल्कि संसद के दोनों सदनों में ‘विशेष बहुमत’ से पारित होनी चाहिए, जो इसकी गंभीरता और दुर्लभता को दर्शाता है।
“महाभियोग का उद्देश्य केवल किसी अधिकारी को दंडित करना नहीं है, बल्कि सार्वजनिक विश्वास को बनाए रखना और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करना है।”
यह प्रक्रिया सुनिश्चित करती है कि देश के सर्वोच्च पदों पर बैठे व्यक्ति मनमाने ढंग से या अपने पद का दुरुपयोग करके कार्य न करें। यह ‘चेक एंड बैलेंस’ (Checks and Balances) के सिद्धांत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसके तहत विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका एक-दूसरे पर निगरानी रखती हैं ताकि सत्ता का कोई भी केंद्र निरंकुश न हो पाए।
भारत में न्यायिक महाभियोग की प्रक्रिया (Process of Judicial Impeachment in India)
भारत में सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को पद से हटाने की प्रक्रिया भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(4), 124(5), 217 और 218 के तहत निर्धारित की गई है, और इसे ‘न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968’ द्वारा विस्तार से विनियमित किया गया है। यह प्रक्रिया अत्यंत जटिल और कठोर है, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि न्यायाधीशों को बिना किसी ठोस कारण के मनमाने ढंग से न हटाया जाए, और उनकी स्वतंत्रता बनी रहे। इसे एक प्रकार की ‘संवैधानिक शल्य चिकित्सा’ (Constitutional Surgery) के रूप में देखा जा सकता है, जो तभी की जाती है जब शरीर (न्यायपालिका) को गंभीर खतरा हो।
महाभियोग प्रस्ताव के आधार (Grounds for Impeachment Proposal)
संविधान के अनुसार, किसी न्यायाधीश को केवल दो आधारों पर हटाया जा सकता है:
- साबित कदाचार (Proved Misbehaviour): इसमें न्यायाधीश द्वारा अपने पद का दुरुपयोग, भ्रष्टाचार, आपराधिक गतिविधियाँ या ऐसा कोई भी कृत्य शामिल है जो उनके पद की गरिमा और अखंडता के खिलाफ हो। ‘कदाचार’ की सटीक परिभाषा कानून में नहीं दी गई है, लेकिन यह व्यापक रूप से ऐसे कृत्यों को संदर्भित करता है जो उनके न्यायिक कर्तव्यों के निष्पादन में अनुचित होते हैं।
- अक्षमता (Incapacity): इसका अर्थ है कि न्यायाधीश शारीरिक या मानसिक रूप से अपने न्यायिक कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ हैं। यह बीमारी, विकलांगता या किसी अन्य ऐसी स्थिति के कारण हो सकता है जो उन्हें न्याय प्रदान करने से रोकती है।
न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया के चरण (Stages of the Process to Remove Judges)
यह प्रक्रिया एक ‘तीन-चरण की रॉकेट’ की तरह है, जिसमें प्रत्येक चरण को सफलतापूर्वक पार करना अनिवार्य है:
1. प्रस्ताव का प्रस्तुतीकरण (Initiation of Motion):
- महाभियोग प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में शुरू किया जा सकता है।
- लोकसभा में: प्रस्ताव को कम से कम 100 सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित किया जाना चाहिए।
- राज्यसभा में: प्रस्ताव को कम से कम 50 सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित किया जाना चाहिए।
2. अध्यक्ष/सभापति का विचार (Consideration by Speaker/Chairman):
- प्रस्ताव प्राप्त होने पर, सदन के पीठासीन अधिकारी (लोकसभा में अध्यक्ष या राज्यसभा में सभापति) को यह तय करना होता है कि प्रस्ताव को स्वीकार किया जाए या अस्वीकार किया जाए।
- यदि पीठासीन अधिकारी प्रस्ताव को स्वीकार कर लेते हैं, तो वे आरोपों की जांच के लिए एक ‘जांच समिति’ (Inquiry Committee) का गठन करते हैं।
3. जांच समिति का गठन (Formation of Inquiry Committee):
- ‘न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968’ के तहत, इस समिति में तीन सदस्य होते हैं:
- सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश या सर्वोच्च न्यायालय के एक वरिष्ठतम न्यायाधीश।
- किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश।
- एक प्रतिष्ठित न्यायविद (Eminent Jurist)।
- समिति को आरोपों की जांच करने, सबूत इकट्ठा करने और न्यायाधीश को अपना बचाव प्रस्तुत करने का अवसर देने का अधिकार होता है। यह समिति सिविल कोर्ट की शक्तियाँ रखती है, जैसे साक्ष्य इकट्ठा करना, गवाहों को बुलाना आदि।
4. समिति की रिपोर्ट (Committee’s Report):
- जांच पूरी होने पर, समिति अपनी रिपोर्ट पीठासीन अधिकारी को प्रस्तुत करती है।
- यदि रिपोर्ट में न्यायाधीश को ‘कदाचार’ या ‘अक्षमता’ का दोषी नहीं पाया जाता है, तो महाभियोग प्रस्ताव समाप्त हो जाता है और उस पर सदन में आगे कोई कार्रवाई नहीं की जाती है।
- यदि रिपोर्ट में न्यायाधीश को दोषी पाया जाता है, तो प्रस्ताव को उस सदन में विचार के लिए लाया जाता है जिसने इसे शुरू किया था।
5. संसद में चर्चा और मतदान (Debate and Voting in Parliament):
- दोषी पाए जाने पर, प्रस्ताव पर सदन में चर्चा होती है। न्यायाधीश को संसद में अपना प्रतिनिधित्व करने का अवसर दिया जा सकता है, या वे अपने बचाव में किसी वकील को भेज सकते हैं।
- सदन में प्रस्ताव को ‘सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत’ और ‘उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत’ (विशेष बहुमत) से पारित होना चाहिए।
6. दूसरे सदन में प्रक्रिया (Process in the Other House):
- यदि एक सदन में प्रस्ताव विशेष बहुमत से पारित हो जाता है, तो इसे दूसरे सदन में भेजा जाता है।
- दूसरा सदन भी इस पर चर्चा करता है और इसे उसी विशेष बहुमत से पारित करना होता है।
7. राष्ट्रपति का आदेश (President’s Order):
- दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत से पारित होने के बाद, प्रस्ताव को राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है।
- राष्ट्रपति, प्रस्ताव पारित होने पर, न्यायाधीश को पद से हटाने का आदेश जारी करते हैं। इस आदेश के बाद न्यायाधीश को तुरंत अपने पद से हट जाना होता है।
यह प्रक्रिया दर्शाती है कि न्यायाधीशों को हटाना कितना मुश्किल है, जो उनकी स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है।
ऐतिहासिक संदर्भ: भारत में महाभियोग के प्रयास (Historical Context: Impeachment Attempts in India)
भारत के इतिहास में, किसी भी न्यायाधीश को महाभियोग द्वारा पद से हटाया नहीं गया है, जिससे यह प्रक्रिया अत्यधिक दुर्लभ बन जाती है। हालांकि, कुछ न्यायाधीशों के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाए गए, लेकिन वे अंतिम चरण तक नहीं पहुँच पाए:
- न्यायमूर्ति वी. रामास्वामी (सर्वोच्च न्यायालय) – 1993: यह भारत में किसी सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के खिलाफ पहला महाभियोग प्रस्ताव था। उन पर पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रहते हुए वित्तीय अनियमितताओं का आरोप था। जांच समिति ने उन्हें कदाचार का दोषी पाया था। लोकसभा में मतदान हुआ, लेकिन कांग्रेस पार्टी के मतदान से दूर रहने के कारण प्रस्ताव को आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल पाया और यह विफल रहा।
- न्यायमूर्ति सौमित्र सेन (कलकत्ता उच्च न्यायालय) – 2009-2011: उन पर धन के दुरुपयोग और कदाचार का आरोप था। राज्यसभा ने महाभियोग प्रस्ताव को पारित कर दिया था, लेकिन इससे पहले कि लोकसभा में इस पर मतदान होता, न्यायमूर्ति सेन ने इस्तीफा दे दिया, जिससे प्रक्रिया समाप्त हो गई। यह किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के खिलाफ पहला महाभियोग प्रस्ताव था जिसने राज्यसभा में सफलता प्राप्त की।
- न्यायमूर्ति पी.डी. दिनाकरन (सिक्किम उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश) – 2009-2011: उन पर भूमि हथियाने और अपने पद का दुरुपयोग करने सहित कई आरोप लगे थे। राज्यसभा के सभापति ने आरोपों की जांच के लिए एक समिति का गठन किया था। समिति की जांच शुरू होने से पहले ही न्यायमूर्ति दिनाकरन ने इस्तीफा दे दिया था।
- न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा (तत्कालीन भारत के मुख्य न्यायाधीश) – 2018: भारत के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ पहला महाभियोग प्रस्ताव। कांग्रेस सहित विपक्षी दलों ने राज्यसभा के सभापति के समक्ष प्रस्ताव पेश किया था, जिसमें उन पर “कदाचार” का आरोप लगाया गया था। हालांकि, सभापति (जो उपराष्ट्रपति भी हैं) ने इस प्रस्ताव को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि इसमें “पर्याप्त और पुष्ट करने वाले सबूतों की कमी” है।
ये उदाहरण दर्शाते हैं कि महाभियोग प्रक्रिया कितनी चुनौतीपूर्ण है और किसी न्यायाधीश को हटाने के लिए कितनी उच्च बाधाएं पार करनी पड़ती हैं। यह प्रक्रिया केवल तभी सक्रिय होती है जब आरोप अत्यधिक गंभीर हों और ठोस सबूतों पर आधारित हों।
प्रक्रिया में चुनौतियाँ और आलोचनाएँ (Challenges and Criticisms in the Process)
हालांकि महाभियोग की प्रक्रिया न्यायपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए एक महत्वपूर्ण तंत्र है, इसकी अपनी चुनौतियाँ और आलोचनाएँ भी हैं:
- राजनीतिकरण का खतरा: महाभियोग प्रक्रिया एक विशुद्ध रूप से कानूनी प्रक्रिया होने के बजाय, इसमें अनिवार्य रूप से राजनीतिक आयाम शामिल होते हैं। 100 या 50 सांसदों के हस्ताक्षर की आवश्यकता इसे राजनीतिक प्रभाव के प्रति संवेदनशील बनाती है। विपक्षी दल इसे सरकार पर दबाव बनाने या न्यायपालिका को अस्थिर करने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं, जैसा कि न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा के मामले में देखा गया था।
- ‘कदाचार’ की अस्पष्ट परिभाषा: ‘साबित कदाचार’ या ‘अक्षमता’ की सटीक कानूनी परिभाषा का अभाव है। यह व्याख्या के लिए जगह छोड़ता है और मनमानी या राजनीतिक प्रेरित व्याख्याओं को जन्म दे सकता है।
- जटिल और लंबी प्रक्रिया: महाभियोग की प्रक्रिया अत्यंत लंबी, महंगी और समय लेने वाली होती है। यह न्यायाधीश के कार्यकाल के अंतिम वर्षों में शुरू होने पर शायद ही कभी पूरी हो पाती है, जैसा कि न्यायमूर्ति रामास्वामी और सेन के मामलों में देखा गया। इससे न्यायपालिका में अनिश्चितता और अव्यवस्था फैलती है।
- न्यायिक स्वतंत्रता पर संभावित प्रभाव: यदि महाभियोग प्रक्रिया को राजनीतिक रूप से प्रेरित होकर बार-बार शुरू किया जाता है, तो यह न्यायाधीशों को भयभीत कर सकता है और उन्हें बिना किसी भय या पक्षपात के निर्णय लेने से रोक सकता है। न्यायाधीशों को लगातार इस बात का डर सता सकता है कि उनके निर्णय राजनीतिक दलों को नापसंद होने पर उनके खिलाफ महाभियोग का खतरा मंडरा सकता है।
- साक्ष्य एकत्र करने में कठिनाई: न्यायिक कदाचार के मामलों में साक्ष्य एकत्र करना मुश्किल हो सकता है, क्योंकि इसमें अक्सर गोपनीय जानकारी और जटिल कानूनी मुद्दे शामिल होते हैं।
- नैतिकता संहिता का अभाव: न्यायाधीशों के लिए कोई स्पष्ट और व्यापक आचार संहिता नहीं है जिसका उल्लंघन ‘कदाचार’ के रूप में देखा जाए। इससे आरोप लगाना और उनका मूल्यांकन करना मुश्किल हो जाता है।
न्यायिक स्वतंत्रता बनाम जवाबदेही (Judicial Independence vs. Accountability)
यह महाभियोग का मुद्दा भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में न्यायिक स्वतंत्रता और जवाबदेही के नाजुक संतुलन के केंद्र में है।
न्यायिक स्वतंत्रता क्यों महत्वपूर्ण है?
- निष्पक्ष न्याय: एक स्वतंत्र न्यायपालिका ही निष्पक्ष और तटस्थ होकर न्याय प्रदान कर सकती है, बिना किसी राजनीतिक दबाव, कार्यकारी हस्तक्षेप या जनमत के प्रभाव के।
- संविधान का संरक्षक: न्यायपालिका संविधान की व्याख्या और रक्षा करती है, यह सुनिश्चित करती है कि विधायिका और कार्यपालिका संवैधानिक सीमाओं के भीतर कार्य करें।
- नागरिक अधिकारों की सुरक्षा: यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षक है और सरकार के किसी भी मनमाने कार्य से उनकी रक्षा करती है।
हालांकि, स्वतंत्रता का अर्थ पूर्ण स्वायत्तता या निरंकुशता नहीं है। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में, कोई भी संस्था जवाबदेही से परे नहीं हो सकती।
न्यायिक जवाबदेही क्यों आवश्यक है?
- जनता का विश्वास: न्यायपालिका पर जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए जवाबदेही आवश्यक है। यदि न्यायाधीश भ्रष्ट या अक्षम पाए जाते हैं और उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती, तो न्याय प्रणाली में जनता का विश्वास डगमगा जाएगा।
- पद का दुरुपयोग रोकना: जवाबदेही यह सुनिश्चित करती है कि न्यायाधीश अपने विशाल अधिकारों और शक्तियों का दुरुपयोग न करें।
- संवैधानिक नैतिकता: लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अनुसार, सभी सार्वजनिक अधिकारियों को अपने कृत्यों के लिए जवाबदेह होना चाहिए।
महाभियोग प्रक्रिया इसी संतुलन को साधने का एक प्रयास है। यह न्यायाधीशों को उनके कर्तव्यों के निर्वहन में स्वतंत्रता प्रदान करती है, लेकिन गंभीर कदाचार या अक्षमता के मामलों में उन्हें पद से हटाने का एक तंत्र भी प्रदान करती है। चुनौती यह है कि इस तंत्र का उपयोग ऐसे तरीके से किया जाए जिससे स्वतंत्रता को कमजोर किए बिना जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।
संवैधानिक प्रावधान (Constitutional Provisions)
न्यायाधीशों को हटाने से संबंधित प्रमुख संवैधानिक प्रावधान और अधिनियम निम्नलिखित हैं:
- अनुच्छेद 124(4): यह सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने के आधार (साबित कदाचार या अक्षमता) और संसद में विशेष बहुमत की आवश्यकता को निर्धारित करता है।
- अनुच्छेद 124(5): यह संसद को न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया को विनियमित करने के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है। इसी अधिकार के तहत ‘न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968’ बनाया गया था।
- अनुच्छेद 217: यह उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति और पद की शर्तों से संबंधित है। इसमें कहा गया है कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान तरीके से हटाया जा सकता है।
- अनुच्छेद 218: यह उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों पर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों से संबंधित कुछ प्रावधानों (जैसे हटाने) को लागू करता है।
- न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968: यह अधिनियम सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाने की विस्तृत प्रक्रिया निर्धारित करता है, जिसमें प्रस्ताव की शुरुआत, जांच समिति का गठन, उसकी शक्तियां और संसद में मतदान की प्रक्रिया शामिल है।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य (Global Perspective)
दुनिया भर के लोकतांत्रिक देशों में न्यायाधीशों को हटाने के लिए विभिन्न प्रक्रियाएं अपनाई जाती हैं, जो न्यायिक स्वतंत्रता और जवाबदेही के संतुलन को दर्शाती हैं:
- संयुक्त राज्य अमेरिका: संघीय न्यायाधीशों को ‘महाभियोग’ (Impeachment) द्वारा हटाया जा सकता है, ठीक वैसे ही जैसे राष्ट्रपति को। प्रतिनिधि सभा (House of Representatives) महाभियोग प्रस्ताव पेश करती है और उसे साधारण बहुमत से पारित करती है, जिसके बाद सीनेट (Senate) आरोपों की सुनवाई करती है और दो-तिहाई बहुमत से दोषी पाए जाने पर हटाती है। आधार “देशद्रोह, रिश्वत, या अन्य उच्च अपराध और कदाचार” हैं।
- यूनाइटेड किंगडम: न्यायाधीशों को ‘संसद के दोनों सदनों के संयुक्त पते’ (Joint Address of both Houses of Parliament) के माध्यम से हटाया जा सकता है। यह प्रक्रिया भी भारत के समान है, जहां एक प्रस्ताव को दोनों सदनों द्वारा पारित किया जाता है और फिर सम्राट द्वारा अनुमोदित किया जाता है।
- कनाडा: न्यायाधीशों को न्यायिक परिषद की सिफारिश पर संसद द्वारा हटाया जा सकता है, लेकिन यह प्रक्रिया भी अत्यंत दुर्लभ है और कदाचार या अक्षमता के लिए होती है।
यह दिखाता है कि अधिकांश लोकतंत्रों में न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया जानबूझकर जटिल बनाई गई है ताकि उनकी स्वतंत्रता की रक्षा की जा सके, जबकि उन्हें गंभीर कदाचार के लिए जवाबदेह भी ठहराया जा सके।
आगे की राह (Way Forward)
न्यायाधीशों के खिलाफ महाभियोग प्रस्तावों की बढ़ती संख्या, भले ही वे सफल न हों, प्रणाली में कुछ अंतर्निहित मुद्दों को उजागर करती है। भविष्य में न्यायिक जवाबदेही और स्वतंत्रता के संतुलन को बनाए रखने के लिए कुछ कदम उठाए जा सकते हैं:
- ‘कदाचार’ की स्पष्ट परिभाषा: ‘साबित कदाचार’ और ‘अक्षमता’ की अधिक स्पष्ट और विस्तृत कानूनी परिभाषा आवश्यक है। यह न्यायिक निर्णय को राजनीतिक दबाव से बचाएगा और जांच समिति के लिए भी दिशानिर्देश प्रदान करेगा।
- समीक्षा योग्य आंतरिक तंत्र: न्यायपालिका के भीतर एक मजबूत, पारदर्शी और प्रभावी ‘इन-हाउस प्रक्रिया’ की आवश्यकता है। वर्तमान में, CJI के पास न्यायाधीशों के कदाचार से निपटने की कुछ शक्तियाँ हैं, लेकिन यह एक औपचारिक जांच प्रक्रिया नहीं है। एक स्वतंत्र न्यायिक जवाबदेही तंत्र (National Judicial Accountability Commission – NJAC के समान, लेकिन अधिक सुविचारित) स्थापित किया जा सकता है जो शुरुआती शिकायतों की जांच करे और गंभीर मामलों को संसद के पास भेजें। यह राजनीतिकरण को कम करेगा।
- न्यायिक मानक और नैतिकता संहिता: न्यायाधीशों के लिए एक व्यापक, सार्वजनिक रूप से सुलभ और पालन की जाने वाली आचार संहिता विकसित की जानी चाहिए। यह संहिता न केवल न्यायाधीशों को उनके व्यवहार के लिए दिशानिर्देश प्रदान करेगी, बल्कि कदाचार के आरोपों का मूल्यांकन करने के लिए एक बेंचमार्क भी प्रदान करेगी।
- समय-सीमा का निर्धारण: न्यायाधीश (जांच) अधिनियम में संशोधन करके महाभियोग प्रक्रिया के प्रत्येक चरण के लिए एक यथार्थवादी समय-सीमा निर्धारित की जा सकती है। इससे प्रक्रिया की अनिश्चितता और अत्यधिक देरी को कम किया जा सकेगा।
- प्रस्तावों की गंभीरता का प्रारंभिक मूल्यांकन: अध्यक्ष/सभापति के पास यह तय करने के लिए अधिक मजबूत दिशानिर्देश और एक सलाहकार पैनल होना चाहिए कि क्या कोई महाभियोग प्रस्ताव वास्तव में गंभीर और प्रथम दृष्टया योग्य है, ताकि तुच्छ या राजनीतिक रूप से प्रेरित प्रस्तावों को शुरू में ही खारिज किया जा सके।
- क्षमता निर्माण: न्यायाधीशों को नैतिक निर्णय लेने, तनाव प्रबंधन और वित्तीय पारदर्शिता जैसे क्षेत्रों में नियमित प्रशिक्षण और मार्गदर्शन प्रदान किया जाना चाहिए ताकि कदाचार की संभावना को कम किया जा सके।
इन कदमों से न्यायिक जवाबदेही सुनिश्चित की जा सकेगी, न्यायपालिका पर जनता का विश्वास बढ़ेगा और इसकी स्वतंत्रता को भी अक्षुण्ण रखा जा सकेगा।
निष्कर्ष (Conclusion)
न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव का मामला एक बार फिर न्यायिक स्वतंत्रता और जवाबदेही के बीच के स्थायी तनाव को सामने लाया है। भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली में न्यायपालिका का स्थान अद्वितीय और महत्वपूर्ण है, और इसकी अखंडता को बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता है। महाभियोग की प्रक्रिया, हालांकि दुर्लभ और जटिल, संवैधानिक मशीनरी का एक अनिवार्य हिस्सा है जो असाधारण परिस्थितियों में न्यायपालिका को उसके मार्ग पर वापस ला सकती है।
यह महत्वपूर्ण है कि इस प्रक्रिया का उपयोग अत्यंत सावधानी और निष्पक्षता से किया जाए, राजनीतिक स्कोर सेटल करने के लिए नहीं, बल्कि केवल तभी जब ‘साबित कदाचार’ या ‘अक्षमता’ के ठोस सबूत हों। न्यायपालिका को अपनी विश्वसनीयता और जनता के विश्वास को बनाए रखने के लिए आंतरिक रूप से मजबूत नैतिक मानकों को अपनाना चाहिए और जवाबदेही के तंत्र को मजबूत करना चाहिए। अंततः, एक मजबूत, स्वतंत्र और जवाबदेह न्यायपालिका ही भारत के लोकतंत्र की सच्ची प्रहरी बन सकती है। यह घटना हमें इस संतुलन को और अधिक मजबूती से स्थापित करने का अवसर प्रदान करती है।
UPSC परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न (Practice Questions for UPSC Exam)
प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) – 10 MCQs
(निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न में एक या अधिक कथन दिए गए हैं। आपको दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनना है।)
प्रश्न 1: भारत में किसी सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- महाभियोग प्रस्ताव लोकसभा में कम से कम 100 सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित होना चाहिए।
- राज्यसभा में महाभियोग प्रस्ताव पेश करने के लिए कम से कम 50 सदस्यों के हस्ताक्षर अनिवार्य हैं।
- जांच समिति में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश या एक वरिष्ठतम न्यायाधीश, किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित न्यायविद शामिल होते हैं।
- प्रस्ताव को दोनों सदनों द्वारा साधारण बहुमत से पारित किया जाना चाहिए।
उपरोक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- केवल a, b और c
- केवल b, c और d
- केवल a और d
- केवल c और d
उत्तर: A
व्याख्या:
कथन (a), (b), (c) सही हैं।
कथन (d) गलत है। प्रस्ताव को दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत (सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत और उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत) से पारित किया जाना चाहिए, न कि साधारण बहुमत से।
प्रश्न 2: भारतीय संविधान के निम्नलिखित में से कौन से अनुच्छेद सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया से संबंधित हैं?
- अनुच्छेद 124(4)
- अनुच्छेद 124(5)
- अनुच्छेद 217
- अनुच्छेद 324
सही कूट का चयन कीजिए:
- केवल a और b
- केवल a, b और c
- केवल a, c और d
- सभी a, b, c और d
उत्तर: B
व्याख्या:
अनुच्छेद 124(4) सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाने के आधार और प्रक्रिया को निर्धारित करता है।
अनुच्छेद 124(5) संसद को न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया को विनियमित करने के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है।
अनुच्छेद 217 उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति और पद की शर्तों से संबंधित है, जिसमें हटाने का उल्लेख सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के समान तरीके से किया गया है।
अनुच्छेद 324 भारत के चुनाव आयोग से संबंधित है।
प्रश्न 3: भारत में किसी न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- आज तक, भारत में किसी भी न्यायाधीश को महाभियोग द्वारा पद से हटाया नहीं गया है।
- न्यायमूर्ति सौमित्र सेन ऐसे पहले उच्च न्यायालय के न्यायाधीश थे जिनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव राज्यसभा में पारित हुआ था।
- न्यायमूर्ति वी. रामास्वामी एकमात्र ऐसे सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश हैं जिनके खिलाफ जांच समिति ने कदाचार का दोषी पाया था।
उपरोक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- केवल a और b
- केवल b और c
- केवल a और c
- a, b और c
उत्तर: D
व्याख्या:
तीनों कथन सही हैं। भारत में आज तक कोई भी न्यायाधीश महाभियोग से नहीं हटाया गया है। न्यायमूर्ति सौमित्र सेन का प्रस्ताव राज्यसभा में पारित हुआ था लेकिन लोकसभा में मतदान से पहले उन्होंने इस्तीफा दे दिया। न्यायमूर्ति वी. रामास्वामी सर्वोच्च न्यायालय के एकमात्र न्यायाधीश थे जिनकी जांच समिति ने कदाचार का दोषी पाया था, लेकिन प्रस्ताव लोकसभा में विफल रहा।
प्रश्न 4: न्यायाधीशों को हटाने के लिए ‘न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968’ के तहत गठित जांच समिति के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- यह समिति केवल लोकसभा अध्यक्ष द्वारा ही गठित की जा सकती है।
- समिति के पास सिविल कोर्ट की शक्तियाँ होती हैं।
- यदि समिति न्यायाधीश को दोषी नहीं पाती है, तो महाभियोग प्रस्ताव समाप्त हो जाता है।
उपरोक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- केवल a और b
- केवल b और c
- केवल a और c
- a, b और c
उत्तर: B
व्याख्या:
कथन (a) गलत है। जांच समिति को लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति द्वारा गठित किया जा सकता है, जिसके भी सदन में प्रस्ताव पेश किया गया हो।
कथन (b) और (c) सही हैं। समिति को साक्ष्य इकट्ठा करने, गवाहों को बुलाने आदि की सिविल कोर्ट की शक्तियाँ होती हैं, और यदि दोषी नहीं पाया जाता तो प्रस्ताव समाप्त हो जाता है।
प्रश्न 5: भारत में न्यायाधीशों के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव किस आधार पर लाया जा सकता है?
- असंवेदनशीलता
- साबित कदाचार
- मानसिक अक्षमता
- लोकप्रियता की कमी
सही कूट का चयन कीजिए:
- केवल b
- केवल b और c
- केवल a, b और c
- सभी a, b, c और d
उत्तर: B
व्याख्या:
भारतीय संविधान के अनुसार, न्यायाधीशों को केवल ‘साबित कदाचार’ या ‘अक्षमता’ के आधार पर हटाया जा सकता है। मानसिक अक्षमता ‘अक्षमता’ के अंतर्गत आती है। असंवेदनशीलता और लोकप्रियता की कमी महाभियोग के आधार नहीं हैं।
प्रश्न 6: भारतीय न्यायपालिका के संदर्भ में, ‘न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968’ का मुख्य उद्देश्य क्या है?
- सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया को विनियमित करना।
- न्यायाधीशों के वेतन और भत्तों का निर्धारण करना।
- उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया को विस्तृत करना।
- न्यायाधीशों के सेवानिवृत्ति की आयु को बढ़ाना।
उत्तर: C
व्याख्या:
‘न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968’ विशेष रूप से सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाने की विस्तृत प्रक्रिया से संबंधित है, जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 124(5) के तहत संसद को अधिकार दिया गया है।
प्रश्न 7: महाभियोग प्रक्रिया में ‘विशेष बहुमत’ का क्या अर्थ है, जैसा कि भारतीय संविधान में वर्णित है?
- सदन की कुल सदस्य संख्या का साधारण बहुमत।
- उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत।
- सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों का कम से कम दो-तिहाई बहुमत।
- केवल उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का साधारण बहुमत।
उत्तर: C
व्याख्या:
‘विशेष बहुमत’ का अर्थ है सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत (यानी 50% से अधिक) और उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों का कम से कम दो-तिहाई बहुमत। यह साधारण बहुमत से अधिक कठोर है।
प्रश्न 8: निम्नलिखित में से कौन भारतीय न्यायपालिका में न्यायिक जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए एक महत्वपूर्ण तंत्र है?
- महाभियोग प्रक्रिया
- न्यायिक सक्रियता
- जनहित याचिका (PIL)
- न्यायिक समीक्षा
उत्तर: A
व्याख्या:
महाभियोग प्रक्रिया सीधे तौर पर न्यायाधीशों को उनके कथित कदाचार या अक्षमता के लिए जवाबदेह ठहराने और उन्हें पद से हटाने का एक संवैधानिक तंत्र है। न्यायिक सक्रियता, जनहित याचिका और न्यायिक समीक्षा न्यायपालिका के कार्य करने के तरीके से संबंधित हैं, न कि सीधे न्यायाधीशों की व्यक्तिगत जवाबदेही से।
प्रश्न 9: न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव के संबंध में निम्नलिखित कथनों में से कौन सा सही है?
- यह भारत के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ लाया गया पहला महाभियोग प्रस्ताव था।
- यह प्रस्ताव लोकसभा के अध्यक्ष द्वारा खारिज कर दिया गया था।
- प्रस्ताव पर 100 से अधिक सांसदों ने हस्ताक्षर किए थे।
- यह प्रस्ताव अंततः राज्यसभा में विशेष बहुमत से पारित हुआ था।
उत्तर: A
व्याख्या:
न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव भारत के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ लाया गया पहला प्रस्ताव था। यह राज्यसभा के सभापति द्वारा “पर्याप्त और पुष्ट करने वाले सबूतों की कमी” के आधार पर खारिज कर दिया गया था, न कि लोकसभा अध्यक्ष द्वारा। प्रस्ताव पर विपक्षी दलों के सांसदों ने हस्ताक्षर किए थे, लेकिन यह राज्यसभा में पारित नहीं हो सका।
प्रश्न 10: भारत में न्यायिक महाभियोग की प्रक्रिया की सबसे बड़ी आलोचनाओं में से एक क्या है?
- न्यायाधीशों को हटाने के लिए बहुत कम कठोर प्रक्रिया।
- प्रक्रिया का अत्यधिक राजनीतिकरण होने की संभावना।
- न्यायाधीशों की स्वतंत्रता को बढ़ावा देना।
- यह प्रक्रिया केवल सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों पर लागू होती है।
उत्तर: B
व्याख्या:
महाभियोग प्रक्रिया की एक प्रमुख आलोचना यह है कि इसमें सांसदों के हस्ताक्षर की आवश्यकता और संसदीय मतदान के कारण इसके राजनीतिकरण का खतरा रहता है, जिससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। यह एक बहुत कठोर प्रक्रिया है, स्वतंत्रता को बढ़ावा नहीं देती, और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों पर भी लागू होती है।
मुख्य परीक्षा (Mains)
प्रश्न 1: भारत में न्यायिक स्वतंत्रता और न्यायिक जवाबदेही के बीच नाजुक संतुलन को बनाए रखने में महाभियोग की प्रक्रिया की भूमिका का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए। क्या आपको लगता है कि यह प्रक्रिया अपने वर्तमान स्वरूप में पर्याप्त है? अपने उत्तर के समर्थन में तर्क प्रस्तुत कीजिए।
प्रश्न 2: “न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968” भारतीय न्यायपालिका में न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया को कैसे विनियमित करता है? इस प्रक्रिया से जुड़ी प्रमुख चुनौतियों और आलोचनाओं पर प्रकाश डालिए, और न्यायिक जवाबदेही को मजबूत करने के लिए आवश्यक सुधारों का सुझाव दीजिए।
प्रश्न 3: हाल ही में न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव की चर्चा ने न्यायिक नैतिकता और कदाचार के मुद्दों को फिर से सुर्खियों में ला दिया है। न्यायिक प्रणाली में भ्रष्टाचार और कदाचार से निपटने के लिए भारत में कौन से मौजूदा तंत्र उपलब्ध हैं? क्या इन तंत्रों को अधिक प्रभावी बनाने की आवश्यकता है? विवेचना कीजिए।
प्रश्न 4: न्यायिक महाभियोग की प्रक्रिया, हालांकि संवैधानिक रूप से स्थापित है, भारतीय इतिहास में बहुत कम सफल रही है। इस प्रक्रिया की दुर्लभता के क्या कारण हैं? राजनीतिकरण के खतरों के बावजूद, यह प्रक्रिया लोकतंत्र के ‘चेक एंड बैलेंस’ सिद्धांत को कैसे बनाए रखती है?