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प्री-मानसून का विध्वंस: हिमाचल-उत्तराखंड में 100+ मौतें, बाढ़ का कहर और भारत की बढ़ती जल-आपदाएँ

प्री-मानसून का विध्वंस: हिमाचल-उत्तराखंड में 100+ मौतें, बाढ़ का कहर और भारत की बढ़ती जल-आपदाएँ

चर्चा में क्यों? (Why in News?):

हाल के दिनों में भारत के उत्तरी राज्यों, विशेषकर हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड, में समय-पूर्व मानसून की दस्तक ने भारी तबाही मचाई है। सामान्यतः जून के अंत या जुलाई की शुरुआत में आने वाला पूर्ण मानसून इस बार अपनी प्रारंभिक अवस्था में ही प्रचंड रूप धारण कर चुका है। इस आकस्मिक वर्षा और बाढ़ के कारण 100 से अधिक लोगों की जान चली गई है, जबकि सैकड़ों लोग बेघर हो गए हैं। कई राज्यों में नदियाँ उफान पर हैं, जिससे जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है और व्यापक स्तर पर संपत्ति का नुकसान हुआ है। यह घटनाक्रम न केवल एक तात्कालिक आपदा है, बल्कि यह भारत के बढ़ते जलवायु परिवर्तन जोखिमों और अनियोजित विकास के गंभीर परिणामों की ओर भी इशारा करता है, जो देश के आपदा प्रबंधन तंत्र के लिए नई चुनौतियाँ खड़ी कर रहा है।

प्री-मानसून क्या है और यह इतना विनाशकारी क्यों?

भारत में ‘प्री-मानसून’ शब्द का उपयोग आमतौर पर अप्रैल से जून के मध्य तक होने वाली वर्षा और मौसम संबंधी गतिविधियों के लिए किया जाता है, जो मुख्य ग्रीष्मकालीन मानसून (दक्षिण-पश्चिम मानसून) के आगमन से पहले होती हैं। यह मानसून से पहले की अवधि अक्सर अचानक गरज-चमक के साथ वर्षा, तेज़ हवाओं और कभी-कभी ओलावृष्टि से चिह्नित होती है। हालाँकि, इस बार की घटनाएँ सामान्य प्री-मानसून गतिविधियों से कहीं अधिक गंभीर थीं।

क्या आप जानते हैं? भारत में मुख्य मानसून, जिसे दक्षिण-पश्चिम मानसून कहा जाता है, आमतौर पर जून की शुरुआत में केरल से दस्तक देता है और धीरे-धीरे पूरे देश में फैलता है। प्री-मानसून गतिविधियाँ एक प्रकार का ‘पूर्वाभ्यास’ होती हैं, लेकिन इस बार का ‘पूर्वाभ्यास’ ही मुख्य प्रदर्शन से ज़्यादा विनाशकारी साबित हुआ।

इस विनाश का मुख्य कारण प्री-मानसून गतिविधियों की तीव्रता, मात्रा और अप्रत्याशितता रही। सामान्यतः प्री-मानसून वर्षा हल्की और छिटपुट होती है, लेकिन इस बार यह अत्यधिक केंद्रित, तीव्र और लगातार हुई। पहाड़ी क्षेत्रों में, जहाँ की भूगर्भीय संरचना पहले से ही नाजुक है, इतनी तीव्र वर्षा से भूस्खलन, अचानक बाढ़ (Flash Floods) और नदियों का उफान पर आना स्वाभाविक था।

विनाश का पैमाना: आंकड़े, प्रभावित क्षेत्र और मानवीय त्रासदी

हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड इस आपदा के केंद्र रहे, जहाँ 100 से अधिक लोगों की मौतें दर्ज की गईं। लेकिन इसका प्रभाव इन दो राज्यों तक ही सीमित नहीं रहा। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दिल्ली जैसे मैदानी राज्यों में भी भारी वर्षा और नदियों के बढ़ते जलस्तर ने बाढ़ जैसी स्थिति उत्पन्न की।

  • मानवीय क्षति: 100+ लोगों की मौतें, सैकड़ों घायल और लापता, हजारों लोग विस्थापित। कई परिवारों ने अपने प्रियजनों और जीवन भर की कमाई खो दी।
  • बुनियादी ढाँचे का विध्वंस: सड़कों, पुलों, बिजली और संचार लाइनों को व्यापक क्षति हुई है। विशेषकर पहाड़ी क्षेत्रों में कई गाँव बाहरी दुनिया से कट गए।
    • उदाहरण के लिए, हिमाचल में मनाली-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग कई स्थानों पर क्षतिग्रस्त हो गया, जिससे आवागमन ठप हो गया।
  • आर्थिक प्रभाव: कृषि भूमि जलमग्न हो गई, जिससे फसलों को भारी नुकसान हुआ। पर्यटन उद्योग, जो हिमाचल और उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, को गहरा झटका लगा है। छोटे व्यवसायों और आजीविका पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है।
  • पर्यावरणीय और पारिस्थितिकीय प्रभाव: भूस्खलन से वनों को क्षति, मिट्टी का कटाव, नदियों में गाद (silt) का बढ़ना और जल स्रोतों का दूषित होना देखा गया।

आपदा के कारण: बहुआयामी विश्लेषण

किसी भी बड़ी प्राकृतिक आपदा के पीछे अक्सर कारणों का एक जटिल जाल होता है, जिसमें प्राकृतिक और मानवजनित दोनों कारक शामिल होते हैं। इस बार की प्री-मानसून तबाही भी इसका अपवाद नहीं है।

प्राकृतिक कारण:

  1. समय-पूर्व और अत्यधिक वर्षा: जैसा कि नाम से स्पष्ट है, प्री-मानसून वर्षा का समय से पहले और असामान्य रूप से तीव्र होना प्रमुख कारण रहा। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, कुछ क्षेत्रों में सामान्य से कई गुना अधिक वर्षा दर्ज की गई।
  2. बादल फटना (Cloudbursts): पहाड़ी क्षेत्रों में बादल फटने की घटनाएँ (एक छोटे से क्षेत्र में कम समय में अत्यधिक वर्षा) आम बात हैं, लेकिन इस बार इनकी आवृत्ति और तीव्रता अधिक थी, जिससे अचानक बाढ़ और भूस्खलन को बढ़ावा मिला।
  3. भूस्खलन (Landslides): हिमालय जैसे युवा और विवर्तनिक रूप से सक्रिय पर्वत श्रृंखलाओं में भारी वर्षा के कारण भूस्खलन एक बड़ी चुनौती है। ढीली मिट्टी और चट्टानों का पानी के साथ मिलकर नीचे खिसकना तबाही का कारण बना।
  4. नदियों का उफान: लगातार और तीव्र वर्षा से नदियों, नालों और धाराओं में पानी का स्तर असामान्य रूप से बढ़ गया, जिससे वे अपने किनारों को तोड़कर आसपास के निचले इलाकों में फैल गईं।

मानवजनित कारण:

  1. अवैज्ञानिक और अनियोजित विकास:
    • अत्यधिक शहरीकरण और निर्माण: पहाड़ों को काटकर सड़कों, होटलों और आवासीय भवनों का निर्माण बिना उचित भूगर्भीय अध्ययन के किया जा रहा है। इससे पहाड़ अस्थिर हो जाते हैं।
    • नदी तल पर अतिक्रमण: नदियों के किनारों और बाढ़ के मैदानों (floodplains) पर अवैध कब्ज़ा और निर्माण, जिससे नदियों को अपने प्राकृतिक मार्ग से भटकने पर मजबूर होना पड़ता है।
  2. वनों की कटाई और पर्यावरणीय क्षरण:
    • पेड़ मिट्टी को बाँध कर रखते हैं और वर्षा जल के प्रवाह को धीमा करते हैं। वनों की अंधाधुंध कटाई से मिट्टी का कटाव बढ़ता है और भूस्खलन की संभावनाएँ बढ़ जाती हैं।
    • विशेषकर हिमालयी क्षेत्र, जिसे भारत का “जल स्तंभ” कहा जाता है, अपनी नाजुक पारिस्थितिकी के लिए जाना जाता है। इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप बड़े पैमाने पर विनाश का कारण बन सकता है।
  3. अपर्याप्त जल निकासी प्रणाली: शहरों और कस्बों में जल निकासी प्रणालियों का पुराना या अवरुद्ध होना, जिससे थोड़ी सी वर्षा में भी जल जमाव और शहरी बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
  4. जलवायु परिवर्तन: यह एक वैश्विक मुद्दा है जिसका सीधा संबंध स्थानीय चरम मौसमी घटनाओं से है।
    • बढ़ते वैश्विक तापमान के कारण वायुमंडल में अधिक नमी धारण करने की क्षमता बढ़ जाती है, जिससे अचानक भारी वर्षा की संभावना बढ़ जाती है।
    • मौसम के पैटर्न में अप्रत्याशित बदलाव (जैसे मानसून का समय से पहले या देर से आना, या उसकी तीव्रता में बदलाव) जलवायु परिवर्तन का सीधा परिणाम हैं।
  5. अक्षम आपदा प्रबंधन:
    • प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों का अपर्याप्त होना या उनकी जानकारी का प्रभावी ढंग से लोगों तक न पहुँचना।
    • आपदा से निपटने के लिए स्थानीय निकायों की क्षमता का अभाव।
    • आपदा के बाद राहत और बचाव कार्यों में समन्वय की कमी।

केस स्टडी: केदारनाथ त्रासदी (2013)

उत्तराखंड की 2013 की केदारनाथ त्रासदी भी मानसून से पहले की अत्यधिक वर्षा, बादल फटने और नदियों के उफान का एक विनाशकारी उदाहरण थी। उस घटना में भी मानवीय हस्तक्षेप (अवैज्ञानिक निर्माण, नदियों के किनारे अतिक्रमण) ने प्राकृतिक आपदा की भयावहता को कई गुना बढ़ा दिया था। इस बार की घटनाएँ उस त्रासदी की दुखद याद दिलाती हैं और बताती हैं कि हमने अतीत की गलतियों से पर्याप्त सबक नहीं सीखा है।

हिमाचल और उत्तराखंड की विशेष संवेदनशीलता

ये दोनों राज्य हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा हैं, जिसकी अपनी विशिष्ट विशेषताएँ और चुनौतियाँ हैं:

  1. भूगर्भीय अस्थिरता: हिमालय एक युवा वलित पर्वत श्रृंखला है जो अभी भी विवर्तनिक रूप से सक्रिय है। यह क्षेत्र भूकंप और भूस्खलन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है।
  2. खड़ी ढलानें और संकरी घाटियाँ: तीव्र ढलानें और गहरी घाटियाँ पानी के तेज़ बहाव को बढ़ावा देती हैं, जिससे मिट्टी का कटाव और अचानक बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है।
  3. पर्यावरणीय संवेदनशीलता: इस क्षेत्र की पारिस्थितिकी बेहद नाजुक है। किसी भी बड़े पैमाने पर निर्माण या वनों की कटाई का सीधा असर पर्यावरण पर पड़ता है।
  4. पर्यटन का दबाव: इन राज्यों की अर्थव्यवस्था में पर्यटन की बड़ी भूमिका है। अनियंत्रित पर्यटन और इसके लिए विकसित होने वाले बुनियादी ढाँचे (सड़कें, होटल) अक्सर पर्यावरण नियमों की अनदेखी करते हुए बनते हैं, जिससे आपदा का खतरा बढ़ता है।

प्रभावों का व्यापक विश्लेषण:

1. मानवीय और सामाजिक प्रभाव:

  • जीवन और आजीविका का नुकसान: 100 से अधिक मौतें, कई लोगों का विस्थापन और आजीविका का नुकसान एक बड़ी मानवीय त्रासदी है।
  • मनोवैज्ञानिक आघात: आपदा प्रभावित लोगों, विशेषकर बच्चों और बुजुर्गों पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ते हैं, जो लंबे समय तक बने रहते हैं।
  • स्वास्थ्य संकट: दूषित पेयजल, स्वच्छता की कमी और जलजनित रोगों का खतरा बढ़ जाता है।
  • शिक्षा और सार्वजनिक सेवाओं में बाधा: स्कूलों और स्वास्थ्य केंद्रों को नुकसान पहुँचने से आवश्यक सेवाएँ बाधित होती हैं।

2. आर्थिक प्रभाव:

  • कृषि और बागवानी को नुकसान: हिमाचल की सेब की फसल और उत्तराखंड की अन्य नकदी फसलें बुरी तरह प्रभावित हुई हैं।
  • पर्यटन उद्योग पर मार: पर्यटन सीजन के चरम पर आने वाली इस आपदा से होटलों, गेस्ट हाउसों और संबंधित व्यवसायों को भारी नुकसान हुआ है।
  • बुनियादी ढाँचे की क्षति: सड़कों, पुलों, बिजली ट्रांसमिशन लाइनों और संचार नेटवर्क की मरम्मत और पुनर्निर्माण में अरबों रुपये का खर्च आएगा, जिससे राज्य के वित्त पर दबाव पड़ेगा।
  • आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान: सड़कों के बाधित होने से आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति प्रभावित हुई है, जिससे कीमतें बढ़ सकती हैं।

3. पर्यावरणीय प्रभाव:

  • मिट्टी का कटाव और भूस्खलन: भूस्खलन से उपजाऊ मिट्टी बह गई, जिससे भविष्य में कृषि और वनीकरण के प्रयास बाधित होंगे।
  • नदी प्रदूषण: बाढ़ का पानी अपने साथ मलबा, अपशिष्ट और दूषित पदार्थ बहाकर ले जाता है, जिससे नदियों का पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होता है।
  • जैव विविधता का नुकसान: अचानक आई बाढ़ और भूस्खलन से स्थानीय वनस्पतियों और जीवों को नुकसान पहुँच सकता है।

आपदा प्रबंधन: भारत की वर्तमान स्थिति और चुनौतियाँ

भारत ने 2005 में आपदा प्रबंधन अधिनियम पारित कर एक सुदृढ़ आपदा प्रबंधन ढाँचा तैयार किया है, जिसमें राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA), राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF) और राज्य स्तर पर समान संस्थाएँ (SDMA, SDRF) शामिल हैं।

सकारात्मक पहलू:

  • NDRF की त्वरित प्रतिक्रिया टीमें, जो बचाव और राहत कार्यों में विशेषज्ञ हैं।
  • प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों में सुधार (जैसे चक्रवात के लिए)।
  • समुदाय-आधारित आपदा प्रबंधन पर जोर।

चुनौतियाँ और अंतराल:

  1. पहाड़ी क्षेत्रों की विशिष्ट चुनौतियाँ: मैदानी इलाकों के मुकाबले पहाड़ी क्षेत्रों में बचाव कार्य, निकासी और राहत सामग्री पहुँचाना बेहद कठिन होता है, खासकर जब सड़कें और पुल क्षतिग्रस्त हो जाएँ।
  2. जलवायु परिवर्तन के अप्रत्याशित पैटर्न: मौसमी घटनाओं की बढ़ती अप्रत्याशितता और तीव्रता, मौजूदा पूर्वानुमान मॉडल को चुनौती देती है।
  3. डेटा और भविष्यवाणी की सटीकता: स्थानीय स्तर पर सटीक मौसम पूर्वानुमान और बादल फटने जैसी छोटी, तीव्र घटनाओं की भविष्यवाणी करना अभी भी एक बड़ी चुनौती है।
  4. क्षमताबढ़ाने और जागरूकता की कमी: स्थानीय प्रशासन और समुदाय स्तर पर आपदा से निपटने की क्षमता और जागरूकता में अभी भी सुधार की आवश्यकता है।
  5. अनियोजित विकास पर नियंत्रण का अभाव: पर्यावरण नियमों को प्रभावी ढंग से लागू करने और अनियोजित, असुरक्षित निर्माण को रोकने में विफलता।
  6. अंतर-राज्यीय समन्वय: जब एक नदी बेसिन में कई राज्य शामिल हों, तो बाढ़ प्रबंधन और चेतावनी साझा करने में अंतर-राज्यीय समन्वय एक चुनौती बन जाता है।

आगे की राह: स्थायी समाधान की ओर

इस प्रकार की आपदाओं से निपटने और भविष्य के लिए भारत को अधिक लचीला बनाने के लिए बहुआयामी और दीर्घकालिक दृष्टिकोण की आवश्यकता है:

1. जलवायु-लचीला बुनियादी ढाँचा (Climate-Resilient Infrastructure):

  • सड़कों, पुलों और भवनों का निर्माण इस तरह से किया जाना चाहिए कि वे चरम मौसमी घटनाओं का सामना कर सकें। इसमें उचित इंजीनियरिंग, ढलान स्थिरीकरण और जल निकासी का ध्यान रखना शामिल है।
  • “हमें केवल निर्माण नहीं करना है, हमें ‘लचीला’ (resilient) निर्माण करना है, ऐसा निर्माण जो प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठा सके।”

2. प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली में सुधार:

  • मौसम पूर्वानुमान और स्थानीय स्तर पर सूक्ष्म-मौसम घटनाओं (जैसे बादल फटना) के लिए अधिक उन्नत और सटीक प्रणालियों का विकास।
  • ‘अंतिम मील’ कनेक्टिविटी सुनिश्चित करना ताकि चेतावनी समय पर और प्रभावी ढंग से दूरदराज के समुदायों तक पहुँच सके।

3. पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील विकास:

  • हिमालयी जैसे नाजुक पारिस्थितिकी तंत्रों में विकास परियोजनाओं को पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) और रणनीतिक पर्यावरणीय आकलन (SEA) के सख्त दिशानिर्देशों का पालन करना चाहिए।
  • नदियों के प्राकृतिक प्रवाह मार्गों और बाढ़ के मैदानों का सम्मान किया जाना चाहिए, और उन पर किसी भी अतिक्रमण को सख्ती से रोका जाना चाहिए।
  • ‘ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर’ को बढ़ावा देना, जैसे कि वनीकरण और आर्द्रभूमि का संरक्षण, जो प्राकृतिक स्पंज के रूप में कार्य करते हैं।

4. सामुदायिक भागीदारी और क्षमता निर्माण:

  • स्थानीय समुदायों को आपदा जोखिम न्यूनीकरण (DRR) प्रयासों में शामिल करना और उन्हें बचाव, निकासी और प्रारंभिक प्रतिक्रिया के लिए प्रशिक्षित करना।
  • ग्राम पंचायतों और शहरी स्थानीय निकायों को आपदा प्रबंधन के लिए सशक्त बनाना।

5. भूमि उपयोग नियोजन (Land-Use Planning):

  • जोखिम क्षेत्रों (जैसे भूस्खलन-प्रवण क्षेत्र, बाढ़ के मैदान) की पहचान करना और उन क्षेत्रों में निर्माण पर सख्त प्रतिबंध लगाना।
  • मास्टर प्लान और जोनिंग नियमों को आपदा जोखिमों को ध्यान में रखकर तैयार करना।

6. अनुसंधान और विकास:

  • जलवायु परिवर्तन के क्षेत्रीय प्रभावों और इसके चरम मौसमी घटनाओं पर पड़ने वाले असर पर गहन अनुसंधान।
  • आपदा प्रबंधन के लिए नई प्रौद्योगिकियों और नवाचारों का उपयोग (जैसे ड्रोन, AI, GIS)।

7. अंतर-राज्यीय और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग:

  • नदी बेसिनों में स्थित राज्यों के बीच बाढ़ प्रबंधन, जल-जमाव और चेतावनी प्रणाली पर बेहतर समन्वय।
  • जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथाओं को अपनाना।

निष्कर्ष

हिमाचल और उत्तराखंड में प्री-मानसून की तबाही एक दुखद याद दिलाती है कि प्रकृति के साथ खिलवाड़ के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। यह केवल एक मौसमी घटना नहीं, बल्कि अनियोजित विकास, जलवायु परिवर्तन और अपर्याप्त आपदा तैयारियों का एक जटिल परिणाम है। भारत को अब केवल प्रतिक्रियात्मक आपदा प्रबंधन से आगे बढ़कर एक सक्रिय, निवारक और स्थायी दृष्टिकोण अपनाना होगा। हमें अपनी नदियों, पहाड़ों और वनों का सम्मान करना सीखना होगा, क्योंकि अंततः मानव का अस्तित्व इन्हीं पारिस्थितिक तंत्रों के स्वस्थ रहने पर निर्भर करता है। यह समय है कि हम ‘विकास’ की अपनी परिभाषा पर पुनर्विचार करें और ‘पर्यावरण-संवेदनशील विकास’ को प्राथमिकता दें, ताकि भविष्य में ऐसी त्रासदियों से बचा जा सके और एक सुरक्षित, अधिक लचीला भारत का निर्माण किया जा सके।

UPSC परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न (Practice Questions for UPSC Exam)

प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) – 10 MCQs

  1. प्रश्न 1: निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

    1. प्री-मानसून वर्षा भारत में मुख्य दक्षिण-पश्चिम मानसून के आगमन से पहले होती है।
    2. भारत में प्री-मानसून वर्षा मुख्य रूप से अप्रैल से जून के मध्य तक होती है।
    3. प्री-मानसून वर्षा को कभी-कभी ‘अमरावती वर्षा’ के नाम से भी जाना जाता है।

    उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

    (a) केवल I और II
    (b) केवल II और III
    (c) केवल I
    (d) I, II और III

    उत्तर: (a)

    व्याख्या: कथन I और II सही हैं। प्री-मानसून वर्षा दक्षिण-पश्चिम मानसून से पहले अप्रैल-जून में होती है। कथन III गलत है; ‘अमरावती वर्षा’ के बजाय ‘आम्र वर्षा’ (Mango Showers) या ‘ब्लॉसम शावर’ (Blossom Showers) जैसे स्थानीय नाम केरल और कर्नाटक में प्री-मानसून वर्षा के लिए उपयोग किए जाते हैं, जो आम के पकने या कॉफी के फूलों के लिए फायदेमंद होती है।

  2. प्रश्न 2: ‘बादल फटना’ (Cloudburst) की घटना के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

    1. यह एक छोटे से भौगोलिक क्षेत्र में बहुत कम समय में अत्यधिक वर्षा का एक रूप है।
    2. यह आमतौर पर उष्णकटिबंधीय चक्रवातों से जुड़ा होता है।
    3. भारत में बादल फटने की घटनाएँ मुख्य रूप से हिमालयी क्षेत्रों में देखी जाती हैं।

    उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

    (a) केवल I
    (b) केवल I और II
    (c) केवल I और III
    (d) I, II और III

    उत्तर: (c)

    व्याख्या: कथन I और III सही हैं। बादल फटना एक छोटी अवधि में अत्यधिक स्थानीयकृत वर्षा है, और भारत में यह अक्सर हिमालयी क्षेत्रों की स्थलाकृति के कारण होता है। कथन II गलत है; बादल फटना मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय चक्रवातों से नहीं, बल्कि स्थानीय संवहनी धाराओं (convective currents) और स्थलाकृति से जुड़ा होता है, खासकर पहाड़ी क्षेत्रों में।

  3. प्रश्न 3: भारत में आपदा प्रबंधन के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सी संस्थाएँ अधिनियमित ढाँचे का हिस्सा हैं?

    1. राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA)
    2. राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF)
    3. राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA)
    4. जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA)

    नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

    (a) केवल I, II और III
    (b) केवल II, III और IV
    (c) केवल I और IV
    (d) I, II, III और IV

    उत्तर: (d)

    व्याख्या: भारत में आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत NDMA, NDRF, SDMA और DDMA सभी प्रमुख संस्थाएँ हैं जो राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर पर आपदा प्रबंधन का कार्य करती हैं।

  4. प्रश्न 4: निम्नलिखित में से कौन-सा/से कारक हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में बाढ़ और भूस्खलन की संवेदनशीलता को बढ़ाता/बढ़ाते है/हैं?

    1. हिमालय का युवा और विवर्तनिक रूप से सक्रिय होना।
    2. अवैज्ञानिक और अनियोजित शहरीकरण।
    3. वनों की कटाई।

    नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

    (a) केवल I
    (b) केवल II और III
    (c) केवल I और III
    (d) I, II और III

    उत्तर: (d)

    व्याख्या: तीनों कथन सही हैं। हिमालय की भूगर्भीय अस्थिरता (युवा और सक्रिय), अनियोजित विकास (जैसे सड़क निर्माण, नदियों के किनारे निर्माण) और वनों की कटाई, ये सभी कारक इन क्षेत्रों में बाढ़ और भूस्खलन के जोखिम को बढ़ाते हैं।

  5. प्रश्न 5: ‘फ्लैश फ्लड’ (Flash Flood) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

    1. यह एक तीव्र और स्थानीयकृत बाढ़ है जो बहुत कम समय में आती है।
    2. इसका कारण केवल अत्यधिक वर्षा हो सकता है, बाँध टूटना नहीं।
    3. शहरी क्षेत्रों में खराब जल निकासी प्रणाली फ्लैश फ्लड के जोखिम को बढ़ा सकती है।

    उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

    (a) केवल I
    (b) केवल I और III
    (c) केवल II और III
    (d) I, II और III

    उत्तर: (b)

    व्याख्या: कथन I और III सही हैं। फ्लैश फ्लड तीव्र वर्षा, बादल फटने, या बाँध/तटबंध टूटने जैसे कई कारणों से हो सकती है (इसलिए कथन II गलत है)। शहरी क्षेत्रों में अपर्याप्त जल निकासी प्रणाली भी फ्लैश फ्लड का कारण बन सकती है।

  6. प्रश्न 6: जलवायु परिवर्तन के कारण चरम मौसमी घटनाओं (Extreme Weather Events) में वृद्धि के संभावित प्रभावों में शामिल हैं:

    1. तीव्र वर्षा की घटनाओं में वृद्धि।
    2. सूखे की आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि।
    3. समुद्र के स्तर में वृद्धि।

    उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

    (a) केवल I
    (b) केवल II
    (c) केवल I और III
    (d) I, II और III

    उत्तर: (d)

    व्याख्या: ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के कारण वायुमंडल में अधिक नमी धारण करने की क्षमता बढ़ जाती है, जिससे तीव्र वर्षा की संभावना बढ़ती है (I)। साथ ही, मौसमी पैटर्न में बदलाव से कुछ क्षेत्रों में सूखे की आवृत्ति और तीव्रता भी बढ़ सकती है (II)। ध्रुवीय बर्फ के पिघलने और महासागरों के थर्मल विस्तार के कारण समुद्र का स्तर भी बढ़ रहा है (III)। इसलिए, सभी कथन सही हैं।

  7. प्रश्न 7: भारत में आपदा जोखिम न्यूनीकरण (Disaster Risk Reduction – DRR) के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सी पहलें महत्वपूर्ण हैं?

    1. आपदा प्रतिरोधी बुनियादी ढाँचे का निर्माण।
    2. समुदाय-आधारित आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण।
    3. प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों का आधुनिकीकरण।
    4. प्राकृतिक संसाधनों का सतत प्रबंधन।

    नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

    (a) केवल I और II
    (b) केवल I, II और III
    (c) केवल II और IV
    (d) I, II, III और IV

    उत्तर: (d)

    व्याख्या: आपदा जोखिम न्यूनीकरण एक समग्र दृष्टिकोण है जिसमें जोखिमों को कम करने के लिए विभिन्न उपाय शामिल होते हैं। इसमें लचीले बुनियादी ढाँचे का निर्माण, समुदाय को सशक्त बनाना, चेतावनी प्रणालियों में सुधार और पर्यावरणीय स्थिरता सुनिश्चित करना – सभी महत्वपूर्ण पहलू हैं। इसलिए, सभी कथन सही हैं।

  8. प्रश्न 8: निम्नलिखित में से कौन-सा कथन हिमालयी क्षेत्र की पारिस्थितिक संवेदनशीलता का सबसे अच्छा वर्णन करता है?

    (a) यह क्षेत्र मुख्य रूप से अपनी खनिज संपदा के लिए जाना जाता है, जिससे भूस्खलन का खतरा बढ़ता है।
    (b) यह एक युवा वलित पर्वत श्रृंखला है जिसमें ढीली मिट्टी, तीव्र ढलानें और विवर्तनिक अस्थिरता है।
    (c) इस क्षेत्र में अत्यधिक जैव विविधता है, लेकिन मानव हस्तक्षेप से कोई खतरा नहीं है।
    (d) यह मुख्यतः पठारी क्षेत्र है जहाँ जल जमाव की समस्या आम है।

    उत्तर: (b)

    व्याख्या: कथन (b) हिमालयी क्षेत्र की पारिस्थितिक संवेदनशीलता का सबसे सटीक वर्णन करता है। यह एक युवा और विवर्तनिक रूप से सक्रिय पर्वत श्रृंखला है जिसकी भूगर्भीय संरचना अस्थिर है, और तीव्र ढलानें भूस्खलन और बाढ़ के प्रति अधिक संवेदनशील बनाती हैं। अन्य विकल्प गलत या अपूर्ण हैं।

  9. प्रश्न 9: भारत में हाल की आपदाओं में पर्यटन उद्योग पर पड़े नकारात्मक प्रभाव के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सत्य है?

    (a) पर्यटन केवल पहाड़ी राज्यों की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है और मैदानी राज्यों पर इसका कोई असर नहीं होता।
    (b) अनियंत्रित पर्यटन विकास ने हिमालयी क्षेत्रों में आपदा जोखिम को कम किया है।
    (c) आपदाएँ पर्यटन सीजन को बाधित करती हैं, जिससे स्थानीय आजीविका और राज्य के राजस्व को नुकसान होता है।
    (d) आपदाएँ पर्यटन को बढ़ावा देती हैं क्योंकि लोग क्षतिग्रस्त क्षेत्रों को देखने आते हैं।

    उत्तर: (c)

    व्याख्या: कथन (c) सत्य है। आपदाएँ विशेष रूप से पर्यटन सीजन के दौरान यात्रा को हतोत्साहित करती हैं, जिससे होटल, परिवहन और संबंधित सेवाओं पर निर्भर स्थानीय अर्थव्यवस्था और राज्य के राजस्व को भारी नुकसान होता है। अन्य कथन गलत या भ्रामक हैं।

  10. प्रश्न 10: ‘पर्यावरणीय प्रभाव आकलन’ (Environmental Impact Assessment – EIA) का प्राथमिक उद्देश्य क्या है?

    (a) विकास परियोजनाओं को पर्यावरणीय विचारों के बिना मंजूरी देना।
    (b) किसी प्रस्तावित परियोजना के पर्यावरणीय परिणामों का मूल्यांकन करना और उन्हें कम करने के उपाय सुझाना।
    (c) केवल बड़े पैमाने की औद्योगिक परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभावों का अध्ययन करना।
    (d) परियोजना की लागत-लाभ विश्लेषण करना, पर्यावरणीय कारकों को छोड़कर।

    उत्तर: (b)

    व्याख्या: EIA का प्राथमिक उद्देश्य किसी भी प्रस्तावित विकास परियोजना के संभावित पर्यावरणीय प्रभावों का व्यवस्थित रूप से मूल्यांकन करना है और इन नकारात्मक प्रभावों को रोकने, कम करने या नियंत्रित करने के लिए उपयुक्त शमन उपायों का सुझाव देना है, ताकि सतत विकास सुनिश्चित किया जा सके।

मुख्य परीक्षा (Mains)

  1. हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में हाल की प्री-मानसून तबाही को देखते हुए, भारत में आपदाओं के लिए प्राकृतिक और मानवजनित कारकों के बीच जटिल अंतर्संबंधों का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। आपदा प्रबंधन में ‘निवारण’ (Prevention) पर ‘प्रतिक्रिया’ (Response) की तुलना में अधिक ध्यान देने की आवश्यकता पर भी चर्चा कीजिए।

  2. अनियोजित शहरीकरण, वनों की कटाई और जलवायु परिवर्तन किस प्रकार हिमालयी क्षेत्र की पर्यावरणीय संवेदनशीलता को बढ़ा रहे हैं? इस संदर्भ में, ‘पर्यावरण-संवेदनशील विकास’ के सिद्धांतों को लागू करने के लिए सरकार और स्थानीय समुदायों के लिए आगे की क्या राह हो सकती है?

  3. भारत का वर्तमान आपदा प्रबंधन ढाँचा चरम मौसमी घटनाओं से निपटने में कितना प्रभावी है? उन प्रमुख चुनौतियों और अंतरालों की पहचान कीजिए जो इसकी प्रभावशीलता को बाधित करते हैं, और सुदृढीकरण के लिए ठोस उपाय सुझाइए।

  4. हाल की जल-आपदाओं के आलोक में, भारत में जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ‘जलवायु-लचीले बुनियादी ढाँचे’ और ‘प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों’ की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए। इस दिशा में तकनीकी नवाचारों और समुदाय-आधारित दृष्टिकोणों के महत्व पर प्रकाश डालिए।

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