Get free Notes

सफलता सिर्फ कड़ी मेहनत से नहीं, सही मार्गदर्शन से मिलती है। हमारे सभी विषयों के कम्पलीट नोट्स, G.K. बेसिक कोर्स, और करियर गाइडेंस बुक के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

Click Here

बड़ा बदलाव: 6 दशक पुराना आयकर कानून होगा खत्म? संसद में पेश होगी रिपोर्ट!

बड़ा बदलाव: 6 दशक पुराना आयकर कानून होगा खत्म? संसद में पेश होगी रिपोर्ट!

चर्चा में क्यों? (Why in News?)

भारत की संसदीय प्रणाली में मानसून सत्र हमेशा से महत्वपूर्ण रहा है, लेकिन इस बार एक ऐसी खबर सुर्खियों में है जो देश के हर नौकरीपेशा, व्यवसायी और निवेशक पर सीधा असर डाल सकती है। खबर यह है कि केंद्र सरकार देश के 60 साल पुराने आयकर कानून (Income Tax Act), 1961 को बदलने की तैयारी में है। हाल ही में, लोकसभा में प्रत्यक्ष कर संहिता (Direct Tax Code – DTC) से संबंधित एक संसदीय समिति की रिपोर्ट पेश की गई है, जिसने इस बड़े आर्थिक सुधार की नींव रख दी है। यह एक ऐसा कदम है जिसका उद्देश्य भारत के जटिल कर परिदृश्य को सरल, पारदर्शी और आधुनिक बनाना है। यह सिर्फ एक कानूनी बदलाव नहीं, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक नए युग की शुरुआत का संकेत हो सकता है।

आयकर कानून 1961: एक संक्षिप्त परिचय (Income Tax Act 1961: A Brief Introduction)

भारत में आयकर संग्रह का आधार आयकर कानून, 1961 है। यह कानून 1 अप्रैल, 1962 को लागू हुआ था और तब से इसने देश के राजकोषीय ढांचे में केंद्रीय भूमिका निभाई है। इस कानून का मुख्य उद्देश्य व्यक्तियों, हिंदू अविभाजित परिवारों (HUF), कंपनियों, फर्मों और अन्य संस्थाओं की आय पर कर लगाना है। समय के साथ, इस कानून में असंख्य संशोधन किए गए हैं ताकि बदलते आर्थिक परिदृश्य, वैश्विक रुझानों और सरकार की नीतिगत प्राथमिकताओं को समायोजित किया जा सके।

कल्पना कीजिए आपका घर 60 साल पुराना है। आपने उसे समय-समय पर मरम्मत करवाया है, नए कमरे जोड़े हैं, दीवारें तोड़ी हैं, लेकिन क्या वह आज भी उतना ही कार्यकुशल और आधुनिक है जितना एक नया बना घर होगा? यही स्थिति कुछ हद तक आयकर कानून 1961 की है। इसमें इतने संशोधन हुए हैं कि यह एक पैचवर्क बन गया है, जिससे इसकी मूल संरचना जटिल और समझने में मुश्किल हो गई है।

क्यों पड़ गई थी बदलाव की ज़रूरत?

  • जटिलता और अस्पष्टता: वर्षों के संशोधनों ने कानून को बेहद जटिल बना दिया है, जिससे करदाताओं और कर अधिकारियों दोनों के लिए इसे समझना और लागू करना मुश्किल हो गया है।
  • विवादों की अधिकता: कानून की जटिलता और अस्पष्टता के कारण कर संबंधी विवादों और मुकदमों की संख्या बहुत बढ़ गई है, जिससे अदालतों और अपीलीय न्यायाधिकरणों पर भारी बोझ पड़ा है।
  • बदलते आर्थिक परिदृश्य: 1960 के दशक का कानून 21वीं सदी की डिजिटल अर्थव्यवस्था, स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र और वैश्विक व्यापार की गतिशीलता को पूरी तरह से संबोधित नहीं कर पाता।
  • अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा: वैश्विक स्तर पर भारत को निवेश के लिए एक आकर्षक गंतव्य बनाने के लिए एक सरल और अनुमानित कर प्रणाली आवश्यक है।
  • राजस्व रिसाव: जटिल नियमों के कारण कर चोरी और कर आधार का क्षरण होने की संभावना बढ़ जाती है।

प्रत्यक्ष कर संहिता (DTC) का जन्म: क्यों पड़ी बदलाव की ज़रूरत? (Birth of Direct Tax Code: Why the Need for Change?)

आयकर कानून 1961 की इन अंतर्निहित समस्याओं को पहचानते हुए, भारत सरकार ने कई बार कर सुधारों की दिशा में प्रयास किए हैं। इन्हीं प्रयासों के परिणामस्वरूप प्रत्यक्ष कर संहिता (Direct Tax Code – DTC) की अवधारणा सामने आई। डीटीसी का विचार एक ऐसे नए, एकीकृत और सरल कर कानून को बनाना है जो वर्तमान आयकर कानून 1961 और धन कर कानून 1957 (जो अब निरस्त हो चुका है) की जगह ले सके।

इसकी ज़रूरत को कई दशकों से महसूस किया जा रहा था। विभिन्न समितियों ने इसकी वकालत की है:

  • केलकर टास्क फोर्स (2002-04): विजय केलकर की अध्यक्षता वाली इस समिति ने कर सुधारों की व्यापक सिफारिशें कीं, जिनमें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों को तर्कसंगत बनाना शामिल था।
  • डीटीसी बिल 2009: तत्कालीन सरकार ने 2009 में डीटीसी बिल का एक मसौदा पेश किया, जिसका उद्देश्य कर कानूनों को आधुनिक बनाना था। हालांकि, यह विधेयक पारित नहीं हो सका।
  • अखिलेश रंजन टास्क फोर्स (2019): वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2017 में एक कार्यबल का गठन किया, जिसकी अध्यक्षता केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) के सदस्य अखिलेश रंजन ने की। इस कार्यबल का उद्देश्य भारत के प्रत्यक्ष कर कानूनों को युक्तिसंगत बनाने और एक नया प्रत्यक्ष कर कानून बनाने के लिए सिफारिशें करना था। इसी कार्यबल की रिपोर्ट अब लोकसभा में पेश की गई है।

मुख्य उद्देश्य और अपेक्षाएँ:

डीटीसी का केंद्रीय विचार एक ऐसा कानून बनाना है जो निम्नलिखित उद्देश्यों को पूरा करे:

  1. सरलता और स्पष्टता: नियमों को आसान बनाना ताकि सामान्य करदाता भी इसे आसानी से समझ सकें।
  2. निष्पक्षता और समानता: सभी आय समूहों और व्यावसायिक संस्थाओं के लिए कर भार को अधिक न्यायसंगत बनाना।
  3. कर आधार का विस्तार: अधिक लोगों को कर दायरे में लाना और कर चोरी को कम करना।
  4. राजस्व तटस्थता: सुनिश्चित करना कि नए कानून से सरकार के राजस्व पर नकारात्मक प्रभाव न पड़े।
  5. अंतर्राष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथाओं के साथ संरेखण: वैश्विक कर प्रणालियों के अनुरूप नियमों को ढालना ताकि भारत विदेशी निवेश के लिए अधिक आकर्षक बन सके।
  6. मुकदमेबाजी में कमी: स्पष्ट नियमों के माध्यम से कर विवादों को कम करना।

प्रत्यक्ष कर संहिता (DTC) क्या है? (What is Direct Tax Code – DTC?)

प्रत्यक्ष कर संहिता (DTC) सिर्फ एक विधेयक नहीं, बल्कि एक व्यापक सुधार है जिसका लक्ष्य भारत की प्रत्यक्ष कर प्रणाली का पुनर्गठन करना है। यह आयकर अधिनियम, 1961 और संभवतः कुछ अन्य छोटे प्रत्यक्ष कर कानूनों को समेकित और सरल करेगा।

DTC के संभावित प्रमुख प्रस्ताव (अखिलेश रंजन टास्क फोर्स की रिपोर्ट के आधार पर अनुमानित):

हालांकि रिपोर्ट की विस्तृत जानकारी अभी सार्वजनिक नहीं की गई है, लेकिन पिछली डीटीसी चर्चाओं और कार्यबल की सिफारिशों के आधार पर कुछ संभावित बदलावों की उम्मीद की जा सकती है:

1. कर स्लैब का सरलीकरण और युक्तिसंगत बनाना (Simplification and Rationalization of Tax Slabs)

  • वर्तमान में कई कर स्लैब हैं, खासकर व्यक्तियों के लिए। डीटीसी का लक्ष्य इन्हें कम करना और अधिक तर्कसंगत बनाना हो सकता है।
  • कम स्लैब से कर प्रणाली समझने में आसान होगी और अनुपालन लागत कम होगी।
  • उदाहरण: पहले 5-7 स्लैब के बजाय, 3-4 प्रमुख स्लैब हो सकते हैं, जिनमें निम्न, मध्यम और उच्च आय वर्ग के लिए स्पष्ट दरें हों।

2. छूट और कटौतियों का पुनर्मूल्यांकन (Re-evaluation of Exemptions and Deductions)

  • आयकर कानून 1961 में विभिन्न प्रकार की छूटें और कटौतियाँ (जैसे धारा 80C, 80D, HRA, LTA आदि) हैं। ये अक्सर कर प्रणाली को जटिल बनाती हैं और कर आधार को कम करती हैं।
  • डीटीसी का उद्देश्य इनमें से कई कटौतियों को कम करना या समाप्त करना हो सकता है, जिससे कर दरें कम की जा सकें।
  • क्यों? जब कम छूटें होती हैं, तो कर दरें भी कम रखी जा सकती हैं, जिससे करदाताओं को सीधे लाभ होता है और सरकार का राजस्व भी बना रहता है। यह ‘कम दर, कम छूट’ के वैश्विक सिद्धांत पर आधारित है।

3. कॉर्पोरेट कराधान में सुधार (Reforms in Corporate Taxation)

  • कॉर्पोरेट टैक्स दरों को अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप और अधिक प्रतिस्पर्धी बनाया जा सकता है।
  • लाभांश वितरण कर (Dividend Distribution Tax – DDT) जैसे प्रावधानों की समीक्षा की जा सकती है (DDT पहले ही हटा दिया गया है, लेकिन नए नियमों में और स्पष्टता आ सकती है)।
  • घरेलू और विदेशी कंपनियों के लिए कर प्रावधानों को सुव्यवस्थित किया जा सकता है।

4. पूंजीगत लाभ कराधान का सरलीकरण (Simplification of Capital Gains Taxation)

  • वर्तमान में विभिन्न परिसंपत्तियों (शेयर, अचल संपत्ति, ऋण निधि) के लिए पूंजीगत लाभ की गणना और कराधान के नियम अलग-अलग हैं।
  • डीटीसी एक एकीकृत और सरल दृष्टिकोण अपना सकता है, जिससे निवेशकों के लिए स्पष्टता बढ़ेगी।
  • होल्डिंग अवधि के आधार पर दीर्घकालिक और अल्पकालिक पूंजीगत लाभ की परिभाषाओं को स्पष्ट किया जा सकता है।

5. विवाद समाधान तंत्र को मजबूत करना (Strengthening Dispute Resolution Mechanism)

  • कर विवादों को कम करने और उनके त्वरित समाधान के लिए नए तंत्र प्रस्तावित किए जा सकते हैं।
  • प्री-एसेसमेंट परामर्श, अग्रिम नियमन और मध्यस्थता जैसी प्रक्रियाओं को बढ़ावा दिया जा सकता है।

6. अंतरराष्ट्रीय कराधान के प्रावधान (Provisions for International Taxation)

  • ई-कॉमर्स और डिजिटल अर्थव्यवस्था से उत्पन्न होने वाले मुद्दों को संबोधित करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय कराधान के नियमों को अद्यतन किया जा सकता है।
  • दोहरे कराधान से बचाव समझौतों (Double Taxation Avoidance Agreements – DTAAs) के कार्यान्वयन को और अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।

7. प्रशासनिक सुधार और डिजिटलीकरण (Administrative Reforms and Digitization)

  • कर प्रशासन को अधिक कुशल, पारदर्शी और तकनीक-आधारित बनाया जा सकता है।
  • फेसलेस मूल्यांकन और अपील को और सुदृढ़ किया जा सकता है।

संभावित लाभ (Potential Benefits)

एक नए और आधुनिक प्रत्यक्ष कर संहिता के कई दूरगामी लाभ हो सकते हैं, जो न केवल करदाताओं बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेंगे:

  1. करदाताओं के लिए आसानी:
    • सरल नियम और प्रक्रियाएं कर रिटर्न दाखिल करना आसान बनाएंगी।
    • कर अनुपालन लागत (Compliance Cost) में कमी आएगी।
    • कर विशेषज्ञों पर निर्भरता कम होगी।
  2. व्यापार और निवेश को बढ़ावा:
    • एक अनुमानित और स्थिर कर प्रणाली विदेशी और घरेलू निवेश को आकर्षित करेगी।
    • ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ रैंकिंग में सुधार होगा, जिससे भारत वैश्विक स्तर पर अधिक प्रतिस्पर्धी बनेगा।
    • उद्यमियों के लिए नए व्यवसाय शुरू करना और उनका विस्तार करना आसान होगा।
  3. विवादों में कमी:
    • स्पष्ट और सुसंगत नियम कर अधिकारियों और करदाताओं के बीच गलतफहमी को कम करेंगे, जिससे मुकदमेबाजी घटेगी।
    • अदालतों और अपीलीय निकायों पर बोझ कम होगा।
  4. सरकारी राजस्व में वृद्धि:
    • सरलीकृत प्रणाली से कर अनुपालन बढ़ेगा, जिससे कर आधार का विस्तार होगा और सरकार का राजस्व बढ़ेगा।
    • कर चोरी के अवसर कम होंगे।
  5. न्यायसंगत कर प्रणाली:
    • सभी आय समूहों पर कर भार का अधिक संतुलित वितरण हो सकता है।
    • अमीर और गरीब के बीच आय असमानता को कुछ हद तक कम करने में मदद मिल सकती है (हालांकि यह डीटीसी का सीधा लक्ष्य नहीं है, एक प्रगतिशील कर प्रणाली इसका समर्थन कर सकती है)।
  6. अर्थव्यवस्था को गति:
    • बढ़ी हुई कर दक्षता, निवेश और उपभोक्ता व्यय से आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलेगा।
    • यह भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के लक्ष्य में सहायक हो सकता है।

चुनौतियाँ और चिंताएँ (Challenges and Concerns)

हालांकि डीटीसी के लाभ कई हैं, लेकिन इसे लागू करने और इसके प्रभाव को प्रबंधित करने में कुछ महत्वपूर्ण चुनौतियाँ और चिंताएँ भी हैं:

  1. संक्रमणकालीन चुनौतियाँ (Transitional Challenges):
    • पुराने से नए सिस्टम में बदलाव एक जटिल प्रक्रिया होगी।
    • करदाताओं, कर पेशेवरों और कर विभाग को नए नियमों के अनुकूल होने में समय लगेगा।
    • शुरुआती चरण में भ्रम और अनिश्चितता का माहौल हो सकता है।
  2. राजस्व तटस्थता बनाए रखना:
    • यह सुनिश्चित करना कि नए कानून से सरकार के कर राजस्व में कोई बड़ी कमी न आए, एक बड़ी चुनौती होगी।
    • राजस्व में कमी से सरकारी खर्चों और विकास परियोजनाओं पर असर पड़ सकता है।
  3. विभिन्न हितधारकों का प्रतिरोध:
    • कुछ समूहों या उद्योगों को नई प्रणाली से नुकसान हो सकता है (उदाहरण के लिए, यदि उनकी पसंदीदा छूटें समाप्त हो जाती हैं), जिससे विरोध हो सकता है।
    • कर पेशेवरों को भी नए नियमों के साथ तालमेल बिठाने में समय लगेगा।
  4. डिजिटल बुनियादी ढांचा:
    • नई, तकनीक-आधारित कर प्रणाली को सुचारू रूप से चलाने के लिए एक मजबूत और त्रुटिहीन डिजिटल बुनियादी ढांचा आवश्यक होगा।
    • साइबर सुरक्षा और डेटा गोपनीयता के मुद्दे भी महत्वपूर्ण होंगे।
  5. राजनीतिक इच्छाशक्ति:
    • एक ऐसे बड़े सुधार को लागू करने के लिए मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता होगी जो विभिन्न वर्गों को प्रभावित कर सकता है।
    • संसदीय बहस और आम सहमति बनाना महत्वपूर्ण होगा।
  6. सटीक डेटा और विश्लेषण का अभाव:
    • कानून के विभिन्न प्रस्तावों के अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभावों का सटीक आकलन करना और उसके आधार पर नीतियां बनाना मुश्किल हो सकता है।

किसी भी बड़े बदलाव की तरह, डीटीसी भी चुनौतियों से रहित नहीं है। यह एक जटिल सर्जरी है – अगर सफल हो तो मरीज (अर्थव्यवस्था) को नया जीवन मिलेगा, लेकिन इसमें सावधानी और विशेषज्ञता की आवश्यकता होगी ताकि कोई बड़ा नुकसान न हो।

आगे की राह: विधेयक से कानून तक का सफर (Way Forward: Journey from Bill to Law)

संसदीय समिति की रिपोर्ट पेश होना एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है, लेकिन यह केवल शुरुआत है। एक नए प्रत्यक्ष कर कानून के प्रभावी होने से पहले कई चरण पूरे करने होंगे:

  1. रिपोर्ट पर विचार-विमर्श: सरकार और संसद रिपोर्ट में की गई सिफारिशों का गहन अध्ययन करेंगे। इसमें विभिन्न मंत्रालयों, विशेषज्ञों और हितधारकों के साथ परामर्श शामिल होगा।
  2. विधेयक का मसौदा तैयार करना: रिपोर्ट की सिफारिशों के आधार पर एक नया ‘प्रत्यक्ष कर संहिता विधेयक’ (Direct Tax Code Bill) तैयार किया जाएगा। यह एक विस्तृत कानूनी दस्तावेज होगा जिसमें नए कर कानून के सभी प्रावधान शामिल होंगे।
  3. संसद में पेश करना: विधेयक को लोकसभा या राज्यसभा में पेश किया जाएगा। चूंकि यह एक धन विधेयक (Money Bill) हो सकता है, इसे लोकसभा में ही पेश किया जाना संभावित है।
  4. संसदीय समिति की जाँच: आमतौर पर, ऐसे महत्वपूर्ण विधेयकों को संसद की स्थायी समिति (Parliamentary Standing Committee) को भेजा जाता है। समिति विधेयक के प्रावधानों पर गहन विचार-विमर्श करेगी, विशेषज्ञों, जनता और हितधारकों से सुझाव मांगेगी और अपनी रिपोर्ट संसद को सौंपेगी।
  5. संसदीय बहस और पारित होना: समिति की रिपोर्ट के बाद, विधेयक पर संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) में बहस होगी। इसमें संशोधनों पर विचार किया जाएगा और फिर मतदान द्वारा विधेयक को पारित किया जाएगा।
  6. राष्ट्रपति की मंजूरी: दोनों सदनों से पारित होने के बाद, विधेयक को राष्ट्रपति की सहमति के लिए भेजा जाएगा। राष्ट्रपति की सहमति मिलने के बाद, यह विधेयक कानून बन जाएगा।
  7. कार्यान्वयन: एक बार कानून बनने के बाद, सरकार को इसके प्रभावी कार्यान्वयन के लिए नियम और विनियम (Rules and Regulations) अधिसूचित करने होंगे। इसमें कर अधिकारियों को प्रशिक्षित करना, नए आईटी सिस्टम विकसित करना और करदाताओं को शिक्षित करना शामिल होगा।

यह प्रक्रिया समय लेने वाली हो सकती है, जिसमें गहन विचार-विमर्श और आम सहमति की आवश्यकता होगी। पारदर्शिता और जनभागीदारी इस पूरी प्रक्रिया को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण होगी।

UPSC परीक्षा के लिए इसका महत्व (Importance for UPSC Exam)

यह विषय UPSC सिविल सेवा परीक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है और विभिन्न चरणों में पूछा जा सकता है:

  • प्रारंभिक परीक्षा (Prelims):
    • प्रत्यक्ष कर, अप्रत्यक्ष कर के बीच अंतर।
    • विभिन्न प्रत्यक्ष करों (आयकर, कॉर्पोरेट कर) से संबंधित अवधारणाएँ।
    • प्रत्यक्ष कर संहिता (DTC) का उद्देश्य और उसकी पृष्ठभूमि।
    • संसदीय प्रक्रियाएँ, विशेष रूप से धन विधेयक (Money Bill) और विधेयक को कानून बनाने की प्रक्रिया।
    • विभिन्न समितियाँ और आयोग जो कर सुधारों से संबंधित रहे हैं (केलकर समिति, अखिलेश रंजन टास्क फोर्स)।
    • कर संबंधित शब्दावली: कर आधार (Tax Base), कर उत्प्लावकता (Tax Buoyancy), कर अनुपालन (Tax Compliance), राजस्व तटस्थता (Revenue Neutrality)।
  • मुख्य परीक्षा (Mains):
    • सामान्य अध्ययन पेपर-II (राजव्यवस्था और शासन): विधायी प्रक्रिया, संसदीय समितियों की भूमिका, सरकार की नीति निर्माण प्रक्रिया, शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही।
    • सामान्य अध्ययन पेपर-III (अर्थव्यवस्था): भारतीय अर्थव्यवस्था, आर्थिक सुधार, कराधान प्रणाली, राजकोषीय नीति, ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’, आर्थिक विकास पर कर सुधारों का प्रभाव, कर आधार विस्तार, कर उत्प्लावकता, जीडीपी पर प्रभाव।
    • निबंध (Essay): आर्थिक सुधारों, सुशासन या भारतीय अर्थव्यवस्था के भविष्य से संबंधित निबंधों में इस विषय का उपयोग किया जा सकता है।
  • साक्षात्कार (Interview):
    • भारत के कर सुधारों पर आपकी राय।
    • आयकर कानून में बदलाव के संभावित लाभ और चुनौतियाँ।
    • एक प्रभावी कर प्रणाली के गुण।
    • आर्थिक नीतियों का आम नागरिक पर प्रभाव।

निष्कर्ष (Conclusion)

आयकर कानून, 1961 को बदलने और एक नई प्रत्यक्ष कर संहिता लागू करने का कदम भारत के आर्थिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय साबित हो सकता है। यह न केवल करदाताओं के लिए जीवन को सरल बनाने का वादा करता है, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक स्तर पर और अधिक प्रतिस्पर्धी और आकर्षक बनाने की क्षमता रखता है। यह एक जटिल और चुनौतीपूर्ण यात्रा होगी, लेकिन अगर इसे सावधानीपूर्वक और विचारपूर्वक किया जाए, तो यह भारत को 21वीं सदी की आवश्यकताओं के अनुरूप एक आधुनिक, कुशल और न्यायसंगत कर प्रणाली प्रदान कर सकता है। यह सुधार, वास्तव में, एक मजबूत और समृद्ध भारत के निर्माण की दिशा में एक बड़ा कदम होगा।

UPSC परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न (Practice Questions for UPSC Exam)

प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) – 10 MCQs

(प्रत्येक प्रश्न के लिए, सही विकल्प चुनें और फिर उत्तर एवं व्याख्या देखें)

1. प्रत्यक्ष कर संहिता (Direct Tax Code – DTC) का प्राथमिक उद्देश्य क्या है?
(a) केवल अप्रत्यक्ष करों को सरल बनाना।
(b) आयकर अधिनियम, 1961 और संबंधित प्रत्यक्ष कर कानूनों को समेकित और सरल बनाना।
(c) केवल कॉर्पोरेट कर दरों को बढ़ाना।
(d) केवल नए सब्सिडी कार्यक्रम शुरू करना।

उत्तर: (b)
व्याख्या: प्रत्यक्ष कर संहिता (DTC) का मुख्य उद्देश्य आयकर अधिनियम, 1961 और अन्य प्रत्यक्ष कर कानूनों को एक ही कानून में एकीकृत करके उन्हें सरल, स्पष्ट और आधुनिक बनाना है।

2. भारत में ‘आयकर’ किस श्रेणी के कर के अंतर्गत आता है?
(a) अप्रत्यक्ष कर
(b) प्रत्यक्ष कर
(c) सीमा शुल्क
(d) वस्तु एवं सेवा कर (GST)

उत्तर: (b)
व्याख्या: आयकर एक प्रत्यक्ष कर है क्योंकि इसका बोझ सीधे उस व्यक्ति पर पड़ता है जिसकी आय पर यह लगाया जाता है और इसे दूसरों पर टाला नहीं जा सकता।

3. प्रत्यक्ष कर संहिता (DTC) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. DTC का एक उद्देश्य कर आधार (Tax Base) का विस्तार करना है।
2. यह कर प्रशासन को अधिक कुशल बनाने पर केंद्रित है।
3. यह मुख्य रूप से आयकर अधिनियम, 1961 को प्रतिस्थापित करने का प्रयास करता है।
उपरोक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (d)
व्याख्या: DTC का लक्ष्य कर आधार का विस्तार करना, कर प्रशासन को कुशल बनाना और आयकर अधिनियम, 1961 को प्रतिस्थापित करना है ताकि कर प्रणाली को सरल और प्रभावी बनाया जा सके।

4. निम्नलिखित में से कौन-सी समिति/कार्यबल भारत में प्रत्यक्ष कर सुधारों से संबंधित रहा है?
1. केलकर टास्क फोर्स
2. अखिलेश रंजन टास्क फोर्स
3. जीएसटी परिषद
सही विकल्प चुनें:

(a) केवल 1
(b) केवल 1 और 2
(c) केवल 2 और 3
(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b)
व्याख्या: केलकर टास्क फोर्स और अखिलेश रंजन टास्क फोर्स दोनों प्रत्यक्ष कर सुधारों से संबंधित रहे हैं। जीएसटी परिषद अप्रत्यक्ष कर (वस्तु एवं सेवा कर) से संबंधित है।

5. ‘राजस्व तटस्थता’ (Revenue Neutrality) शब्द का क्या अर्थ है जो कर सुधारों के संदर्भ में अक्सर उपयोग किया जाता है?
(a) नए कर कानून से सरकार के राजस्व में महत्वपूर्ण वृद्धि होगी।
(b) नए कर कानून से सरकार के राजस्व में कोई बदलाव नहीं आएगा।
(c) नए कर कानून से सरकार के राजस्व में महत्वपूर्ण कमी नहीं आएगी।
(d) कर प्रणाली को केवल गरीब वर्गों के लिए तटस्थ बनाया जाएगा।

उत्तर: (c)
व्याख्या: राजस्व तटस्थता का अर्थ है कि कर सुधार के बाद सरकार के कुल कर राजस्व पर नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए; यानी, राजस्व लगभग उतना ही रहना चाहिए या कम नहीं होना चाहिए।

6. भारत के संविधान का कौन सा अनुच्छेद यह कहता है कि “कानून के अधिकार के बिना कोई कर नहीं लगाया या एकत्र किया जाएगा”?
(a) अनुच्छेद 263
(b) अनुच्छेद 265
(c) अनुच्छेद 268
(d) अनुच्छेद 280

उत्तर: (b)
व्याख्या: अनुच्छेद 265 यह प्रावधान करता है कि कानून के अधिकार के बिना कोई कर नहीं लगाया या एकत्र किया जाएगा। यह भारत में कराधान की संवैधानिकता का आधार है।

7. ‘कर उत्प्लावकता’ (Tax Buoyancy) का सबसे अच्छा वर्णन क्या है?
(a) सरकारी राजस्व पर कर की दर में बदलाव का प्रभाव।
(b) कर राजस्व में वह वृद्धि जब जीडीपी की वृद्धि दर से अधिक हो।
(c) कर दरों में परिवर्तन के बिना कर आधार में वृद्धि।
(d) अर्थव्यवस्था में परिवर्तन के जवाब में कर राजस्व में कमी।

उत्तर: (b)
व्याख्या: कर उत्प्लावकता तब होती है जब कर राजस्व में वृद्धि सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि दर से अधिक होती है, जो एक कुशल और लचीली कर प्रणाली का संकेत है।

8. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन ‘धन विधेयक’ (Money Bill) के संबंध में सही नहीं है?
(a) इसे केवल लोकसभा में ही पेश किया जा सकता है।
(b) राज्यसभा इसे अस्वीकार या संशोधित नहीं कर सकती है।
(c) राष्ट्रपति धन विधेयक को पुनर्विचार के लिए वापस नहीं कर सकते।
(d) लोकसभा अध्यक्ष का निर्णय अंतिम होता है कि कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं।

उत्तर: (b)
व्याख्या: राज्यसभा धन विधेयक को अस्वीकार या संशोधित नहीं कर सकती है, लेकिन वह संशोधनों की सिफारिश कर सकती है, जिन्हें लोकसभा स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है। अन्य सभी कथन सही हैं।

9. ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ (Ease of Doing Business) रैंकिंग में सुधार के लिए प्रत्यक्ष कर संहिता कैसे सहायक हो सकती है?
(a) यह केवल विदेशी निवेश को प्रतिबंधित करेगी।
(b) यह कर अनुपालन को सरल बनाकर और मुकदमेबाजी कम करके सहायक हो सकती है।
(c) यह केवल बड़े निगमों को लाभ पहुंचाएगी।
(d) इसका व्यापार पर कोई सीधा प्रभाव नहीं पड़ेगा।

उत्तर: (b)
व्याख्या: एक सरल और अनुमानित कर प्रणाली, जिसमें कर अनुपालन आसान हो और विवाद कम हों, व्यापार करने में आसानी को बढ़ाती है, जिससे देश निवेश के लिए अधिक आकर्षक बनता है।

10. आयकर अधिनियम, 1961 को निरस्त करने और एक नई प्रत्यक्ष कर संहिता लाने का विचार निम्नलिखित में से किस सिद्धांत पर आधारित है?
(a) कर दरों को बढ़ाना।
(b) कर प्रणाली को और अधिक जटिल बनाना।
(c) ‘कम दर, कम छूट’ (Lower Rates, Fewer Exemptions) के सिद्धांत पर आधारित एक सरल और कुशल कर प्रणाली बनाना।
(d) केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को लक्षित करना।

उत्तर: (c)
व्याख्या: नई प्रत्यक्ष कर संहिता का मुख्य सिद्धांत अक्सर ‘कम दर, कम छूट’ होता है, जिसका अर्थ है कि कर दरों को कम रखते हुए विभिन्न प्रकार की छूटों और कटौतियों को कम करना या समाप्त करना ताकि कर आधार को व्यापक बनाया जा सके और प्रणाली को सरल बनाया जा सके।

मुख्य परीक्षा (Mains)

1. “भारत के 60 साल पुराने आयकर कानून, 1961 को प्रत्यक्ष कर संहिता (DTC) से प्रतिस्थापित करने की आवश्यकता जटिलता और आधुनिक आर्थिक आवश्यकताओं के बीच एक संतुलन साधने का प्रयास है।” इस कथन का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए और ऐसे कर सुधार से जुड़े संभावित लाभों और चुनौतियों पर चर्चा कीजिए। (250 शब्द)

2. एक सरल और युक्तिसंगत कर व्यवस्था भारत के आर्थिक विकास और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए महत्वपूर्ण है। इस कथन के आलोक में, नई प्रत्यक्ष कर संहिता की अपेक्षित विशेषताओं और विभिन्न हितधारकों पर इसके संभावित प्रभावों पर विस्तार से चर्चा कीजिए। (250 शब्द)

3. विधायी प्रक्रिया में संसदीय समितियों की भूमिका पर चर्चा कीजिए, विशेष रूप से प्रत्यक्ष कर संहिता जैसे बड़े आर्थिक सुधारों के संदर्भ में। ऐसी समितियाँ प्रभावी जाँच सुनिश्चित करने में किन चुनौतियों का सामना करती हैं? (150 शब्द)

4. ‘कर उत्प्लावकता’ और ‘कर आधार विस्तार’ की अवधारणाओं की व्याख्या कीजिए। एक नई प्रत्यक्ष कर संहिता भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए इन राजकोषीय उद्देश्यों को प्राप्त करने में कैसे योगदान कर सकती है? (150 शब्द)

Leave a Comment