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संसद का रणक्षेत्र: पहलगाम हमला और ट्रम्प का दावा, मॉनसून सत्र में क्या दांव पर?

संसद का रणक्षेत्र: पहलगाम हमला और ट्रम्प का दावा, मॉनसून सत्र में क्या दांव पर?

चर्चा में क्यों? (Why in News?):

भारतीय संसद का मॉनसून सत्र, जिसे अक्सर देश के विधायी कैलेंडर का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है, इस बार अत्यधिक तनाव और राजनीतिक सरगर्मी के बीच शुरू होने वाला है। सत्र की शुरुआत से पहले ही, दो बड़े मुद्दे – जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुआ हालिया हमला और अमेरिकी राष्ट्रपति के कश्मीर मुद्दे पर मध्यस्थता के दावे – ने राष्ट्रीय विमर्श में अपनी जगह बना ली है। ये दोनों ही मुद्दे न केवल गंभीर आंतरिक और बाहरी चुनौतियों को दर्शाते हैं, बल्कि सरकार और विपक्ष के बीच तीखे टकराव का कारण बनने के लिए भी तैयार हैं। एक तरफ, पहलगाम हमला आंतरिक सुरक्षा, आतंकवाद और जम्मू-कश्मीर की संवेदनशील स्थिति पर सवाल खड़े करता है, वहीं दूसरी ओर, अमेरिकी राष्ट्रपति का दावा भारत की संप्रभुता, विदेश नीति और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर दूरगामी प्रभाव डालता है। ये दोनों ही घटनाएं आगामी संसदीय सत्र को एक ‘रणक्षेत्र’ में बदल सकती हैं, जहाँ सरकार को विपक्ष के कड़े सवालों का सामना करना होगा और अपनी नीतियों का बचाव करना होगा।

मॉनसून सत्र का महत्व: लोकतंत्र का आईना

संसद का सत्र किसी भी जीवंत लोकतंत्र की आत्मा होता है। यह सिर्फ कानूनों को पारित करने की जगह नहीं है, बल्कि सरकार की जवाबदेही तय करने, राष्ट्रीय मुद्दों पर बहस करने और जनता की आवाज को मुखर करने का एक मंच है।

  • सरकार की जवाबदेही: विपक्ष के पास सरकार से सवाल पूछने, उसकी नीतियों की आलोचना करने और मंत्रालयों के प्रदर्शन पर ध्यान आकर्षित करने का यह सबसे महत्वपूर्ण अवसर होता है। प्रश्नकाल, शून्यकाल और विभिन्न प्रस्तावों के माध्यम से सरकार को जनता के प्रति जवाबदेह ठहराया जाता है।
  • राष्ट्रीय विमर्श का मंच: संसद राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर गहन चर्चा का केंद्र होती है। आर्थिक संकट, सामाजिक मुद्दे, सुरक्षा चुनौतियाँ और विदेश नीति के पहलू – सभी पर यहाँ विस्तार से विचार-विमर्श होता है। यह नागरिकों को महत्वपूर्ण मुद्दों की जटिलता को समझने में मदद करता है।
  • कानून निर्माण: सत्र के दौरान विभिन्न बिलों पर बहस होती है, संशोधन प्रस्तावित किए जाते हैं और अंततः उन्हें कानून का रूप दिया जाता है। यह देश की प्रगति और विकास के लिए आवश्यक विधायी ढांचा प्रदान करता है।

वर्तमान परिदृश्य में, जब देश गंभीर सुरक्षा चुनौतियों और जटिल कूटनीतिक स्थितियों का सामना कर रहा है, मॉनसून सत्र का महत्व और भी बढ़ जाता है। इन दो प्रमुख मुद्दों पर होने वाली बहस भारत की आंतरिक सुरक्षा, विदेश नीति की दिशा और लोकतांत्रिक परिपक्वता को परिभाषित करेगी।

पहला मुद्दा: पहलगाम हमला – आंतरिक सुरक्षा और आतंकवाद का दुष्चक्र

जम्मू-कश्मीर में पहलगाम जैसी घटनाएं न केवल मानवीय त्रासदी हैं, बल्कि भारत की आंतरिक सुरक्षा तंत्र के लिए एक गंभीर चुनौती भी हैं। यह सिर्फ एक हमला नहीं, बल्कि दशकों से कश्मीर को जकड़े हुए आतंकवाद के दुष्चक्र का एक स्याह प्रतिबिंब है।

घटना का विवरण और तत्काल प्रभाव:

पहलगाम हमला, जिसने निर्दोष नागरिकों को निशाना बनाया, जम्मू-कश्मीर में सामान्य स्थिति की बहाली के दावों पर सवालिया निशान लगाता है। यह पर्यटन सीजन के दौरान हुआ, जिससे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था और पर्यटकों के विश्वास पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा। इस तरह के हमले अक्सर सीमा पार से होने वाली घुसपैठ और स्थानीय नेटवर्क के समर्थन से अंजाम दिए जाते हैं, जो सुरक्षा एजेंसियों के लिए दोहरी चुनौती पेश करते हैं।

राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रभाव:

यह हमला कई मोर्चों पर सुरक्षा चुनौतियों को उजागर करता है:

  • नियंत्रण रेखा (LoC) पर स्थिति: हमले अक्सर LoC पार से घुसपैठ और हथियारों की आपूर्ति से जुड़े होते हैं। यह LoC पर निरंतर निगरानी और आतंकवादियों की घुसपैठ को रोकने की आवश्यकता पर बल देता है।
  • आतंकवाद-रोधी रणनीति: सरकार की आतंकवाद-रोधी रणनीति की प्रभावशीलता पर सवाल उठते हैं। क्या खुफिया जानकारी में कमी थी? क्या सुरक्षा घेरा कमजोर था? क्या स्थानीय समर्थन नेटवर्क अभी भी सक्रिय हैं? इन सवालों के जवाब तलाशने होंगे।
  • नागरिकों की सुरक्षा: सबसे महत्वपूर्ण चिंता निर्दोष नागरिकों की सुरक्षा है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ पर्यटन या सामान्य गतिविधियां लौट रही हैं। ऐसे हमले लोगों में डर पैदा करते हैं और सामान्य जीवन को बाधित करते हैं।
  • जम्मू-कश्मीर में सामान्य स्थिति की बहाली: आर्टिकल 370 के निरस्त होने के बाद सरकार ने जम्मू-कश्मीर में सामान्य स्थिति और विकास के दावों पर जोर दिया है। पहलगाम जैसी घटनाएं इन दावों को चुनौती देती हैं और दिखाती हैं कि शांति की राह अभी भी लंबी और कठिन है।

विपक्ष की भूमिका:

विपक्ष स्वाभाविक रूप से सरकार को घेरने की कोशिश करेगा। उनके प्रमुख तर्क और प्रश्न हो सकते हैं:

  • सुरक्षा चूक: हमले को सुरक्षा चूक मानते हुए सरकार से जवाबदेही की मांग करना।
  • आतंकवाद पर नीति: आतंकवाद से निपटने के लिए सरकार की रणनीति पर सवाल उठाना और वैकल्पिक सुझाव देना।
  • जम्मू-कश्मीर की स्थिति: राज्य में सामान्य स्थिति बहाली के दावों की सत्यता पर सवाल उठाना और स्थानीय लोगों की चिंताओं को उठाना।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा का राजनीतिकरण: सरकार पर आरोप लगाना कि वह राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दे का राजनीतिकरण कर रही है।

सरकार का दृष्टिकोण:

सरकार को विपक्ष के इन आरोपों का सामना करना होगा और अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी:

  • आतंकवाद के खिलाफ दृढ़ संकल्प: सरकार आतंकवाद के खिलाफ अपनी ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति को दोहराएगी और भविष्य में ऐसे हमलों को रोकने के लिए कड़े कदम उठाने का आश्वासन देगी।
  • अंतर्राष्ट्रीय समर्थन: आतंकवाद को एक वैश्विक समस्या बताते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से समर्थन की मांग करना और पाकिस्तान पर सीमा पार आतंकवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाना।
  • विकास और सुरक्षा का संतुलन: जम्मू-कश्मीर में विकास कार्यों के साथ-साथ सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के प्रयासों पर जोर देना।

पहलगाम हमला सिर्फ एक घटना नहीं है, यह एक चेतावनी है कि जम्मू-कश्मीर में शांति और सामान्य स्थिति अभी भी एक नाजुक संतुलन है जिसे निरंतर सतर्कता और एक बहुआयामी रणनीति की आवश्यकता है।

UPSC प्रासंगिकता (GS-III: आंतरिक सुरक्षा):

यह मुद्दा UPSC के आंतरिक सुरक्षा खंड के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। उम्मीदवारों को निम्नलिखित पहलुओं पर ध्यान देना चाहिए:

  • भारत में आतंकवाद के कारण, प्रकार और प्रभाव।
  • जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद का इतिहास, वर्तमान स्थिति और सरकार की नीतियां (ऑपरेशन ऑल आउट, इंटेलिजेंस गैदरिंग, स्थानीय पुलिसिंग का महत्व)।
  • सीमा पार आतंकवाद और इसे रोकने के लिए भारत के प्रयास।
  • भारत की आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों में विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों (सेना, अर्धसैनिक बल, पुलिस, खुफिया एजेंसियां) की भूमिका।
  • साइबर आतंकवाद, नार्को-आतंकवाद जैसे नए रुझान।
  • सुरक्षा तंत्र की क्षमता और कमियां।

दूसरा मुद्दा: ट्रम्प का कश्मीर दावा – भारत की विदेश नीति पर अग्निपरीक्षा

अमेरिकी राष्ट्रपति का यह दावा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें कश्मीर मुद्दे पर मध्यस्थता करने के लिए कहा था, ने एक राजनयिक तूफान खड़ा कर दिया है। यह दावा भारत की विदेश नीति के मूल सिद्धांतों, विशेषकर कश्मीर पर उसकी संप्रभु स्थिति को सीधे चुनौती देता है।

दावा क्या था और भारत की प्रतिक्रिया:

ट्रम्प ने सार्वजनिक रूप से दावा किया कि पीएम मोदी ने उनसे कश्मीर मुद्दे पर “मध्यस्थता” या “सुविधा” देने का अनुरोध किया था। इसके तुरंत बाद, भारत के विदेश मंत्रालय ने इस दावे का जोरदार खंडन किया। भारत ने स्पष्ट किया कि कश्मीर मुद्दा भारत और पाकिस्तान के बीच एक द्विपक्षीय मुद्दा है और इसमें किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता स्वीकार्य नहीं है। भारत का यह रुख दशकों से चला आ रहा है और यह शिमला समझौते (1972) का एक अभिन्न अंग है।

राजनयिक निहितार्थ:

इस दावे के कई गंभीर राजनयिक निहितार्थ हैं:

  • भारत-अमेरिका संबंध: यह घटना भारत-अमेरिका संबंधों में एक अप्रत्याशित खटास ला सकती थी, हालांकि भारत के स्पष्टीकरण से इसे संभाला गया। यह दिखाता है कि बड़े देशों के प्रमुखों के अनौपचारिक बयान भी कितनी बड़ी राजनयिक चुनौती बन सकते हैं।
  • भारत-पाकिस्तान संबंध: पाकिस्तान ने तुरंत ट्रम्प के बयान का स्वागत किया और कश्मीर मुद्दे के अंतर्राष्ट्रीयकरण की अपनी पुरानी मांग को फिर से उठाने का प्रयास किया। यह भारत पर पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय वार्ता के दबाव को बढ़ा सकता है।
  • कश्मीर पर अंतर्राष्ट्रीयकरण का प्रयास: भारत हमेशा से कश्मीर मुद्दे के अंतर्राष्ट्रीयकरण का विरोध करता रहा है। ट्रम्प का बयान अनजाने में या जानबूझकर इस मुद्दे को वैश्विक मंच पर लाने का प्रयास था, जिसे भारत ने दृढ़ता से विफल किया।
  • भारत की संप्रभुता: किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता स्वीकार करना भारत की संप्रभुता और उसके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप को स्वीकार करने जैसा होगा। यह भारत के राष्ट्रीय हितों के खिलाफ है।
  • शिमला समझौता का उल्लंघन: शिमला समझौता (1972) भारत-पाकिस्तान संबंधों के लिए आधारशिला है, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि दोनों देश अपने मुद्दों को द्विपक्षीय रूप से हल करेंगे। ट्रम्प का दावा इस समझौते के मूल पर प्रहार था।

विपक्ष की भूमिका:

विपक्ष इस मुद्दे पर सरकार को घेरने के लिए तैयार है। उनके प्रमुख प्रश्न और मांगें हो सकती हैं:

  • विदेश नीति पर स्पष्टीकरण: विपक्ष प्रधानमंत्री से ट्रम्प के दावे पर स्पष्टीकरण की मांग करेगा।
  • राष्ट्रीय हित का बचाव: क्या सरकार राष्ट्रीय हितों की रक्षा में कमजोर पड़ रही है? क्या प्रधानमंत्री ने वास्तव में ऐसी कोई बात कही थी?
  • द्विपक्षीयता का सिद्धांत: सरकार पर द्विपक्षीयता के भारत के स्थापित सिद्धांत से भटकने का आरोप लगाना।

सरकार का दृष्टिकोण:

सरकार को विपक्ष के इन आरोपों का खंडन करना होगा और अपनी विदेश नीति की दृढ़ता को साबित करना होगा:

  • स्पष्ट खंडन: सरकार ट्रम्प के दावे का स्पष्ट और सशक्त खंडन करना जारी रखेगी, जैसा कि विदेश मंत्रालय ने पहले ही किया है।
  • द्विपक्षीयता पर दृढ़ता: भारत कश्मीर पर अपने द्विपक्षीय रुख पर कायम रहेगा और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को इस बारे में स्पष्ट संदेश देगा।
  • विदेश नीति की सफलता: सरकार अपनी विदेश नीति की सफलताओं पर जोर देगी और बताएगी कि भारत अपने हितों की रक्षा में सक्षम है।

ट्रम्प का दावा एक ‘राजनयिक अनहोनी’ जैसा था, जिसने भारत की विदेश नीति के मूल सिद्धांतों को एक झटके में परीक्षण पर रखा। भारत की त्वरित और स्पष्ट प्रतिक्रिया ने स्थिति को संभाला, लेकिन यह दिखाता है कि भू-राजनीतिक परिदृश्य कितना अप्रत्याशित हो सकता है।

UPSC प्रासंगिकता (GS-II: अंतर्राष्ट्रीय संबंध):

यह मुद्दा UPSC के अंतर्राष्ट्रीय संबंध खंड के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। उम्मीदवारों को निम्नलिखित पहलुओं पर ध्यान देना चाहिए:

  • भारत की विदेश नीति के मूल सिद्धांत (गुटनिरपेक्षता, पंचशील, द्विपक्षीयता, रणनीतिक स्वायत्तता)।
  • भारत-अमेरिका संबंध: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य, वर्तमान स्थिति और भविष्य की संभावनाएं।
  • भारत-पाकिस्तान संबंध: कश्मीर विवाद की पृष्ठभूमि, विभिन्न समझौते (शिमला, लाहौर) और विश्वास बहाली के उपाय।
  • अंतर्राष्ट्रीय संगठनों (UN) और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों की भूमिका।
  • विभिन्न देशों के साथ भारत के द्विपक्षीय संबंध और उनका क्षेत्रीय व वैश्विक भू-राजनीति पर प्रभाव।
  • भारत की ‘पड़ोसी पहले’ नीति और ‘एक्ट ईस्ट’ नीति जैसे अन्य महत्वपूर्ण विदेश नीति आयाम।

संसदीय बहस और सरकार-विपक्ष गतिरोध: लोकतंत्र की प्रयोगशाला

जब ऐसे संवेदनशील मुद्दे संसद में आते हैं, तो सरकार और विपक्ष के बीच तीखे टकराव की स्थिति बनना स्वाभाविक है। यह टकराव एक स्वस्थ लोकतंत्र का हिस्सा भी है और कभी-कभी उसकी उत्पादकता में बाधा भी बन सकता है।

लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा:

विपक्ष का कार्य सरकार को गलतियों पर टोकना और उसकी नीतियों पर सवाल उठाना है। यह ‘चेक एंड बैलेंस’ (नियंत्रण और संतुलन) का महत्वपूर्ण सिद्धांत है, जो किसी भी शक्ति के केंद्रीकरण को रोकता है। बहस और वाद-विवाद से मुद्दों की विभिन्न परतें सामने आती हैं और जनता को भी सूचित निर्णय लेने में मदद मिलती है।

आमने-सामने की स्थिति के कारण:

  • राजनीतिक लाभ: आगामी चुनावों को देखते हुए, दोनों पक्ष इन मुद्दों का उपयोग राजनीतिक लाभ उठाने के लिए कर सकते हैं। विपक्ष सरकार की विफलताओं को उजागर करेगा, जबकि सरकार अपनी दृढ़ता और राष्ट्रीय हित की रक्षा का दावा करेगी।
  • वैचारिक मतभेद: सरकार और विपक्ष के बीच आतंकवाद, विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर मूलभूत वैचारिक अंतर हो सकते हैं।
  • विश्वास की कमी: वर्तमान राजनीतिक माहौल में सरकार और विपक्ष के बीच विश्वास की कमी अक्सर देखी जाती है, जिससे रचनात्मक बहस बाधित होती है।

संसदीय कार्यवाही पर प्रभाव:

अत्यधिक गतिरोध से संसदीय कार्यवाही पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है:

  • व्यवधान और स्थगन: अक्सर महत्वपूर्ण बहसें शोरगुल, नारेबाजी और स्थगनों के कारण पूरी नहीं हो पातीं।
  • विधेयकों का पारित होना: महत्वपूर्ण विधेयक बिना पर्याप्त चर्चा के या तो पारित हो जाते हैं, या फिर अटक जाते हैं।
  • सार्वजनिक धारणा: जनता में संसद के प्रति नकारात्मक धारणा बन सकती है यदि वह केवल गतिरोध का मंच लगे, न कि रचनात्मक समाधान का।

आगे की राह: संतुलन और परिपक्वता

मॉनसून सत्र में इन गंभीर मुद्दों पर सार्थक बहस सुनिश्चित करने के लिए सरकार और विपक्ष दोनों को परिपक्वता और राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखने की आवश्यकता है।

  • राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखना: आतंकवाद और विदेश नीति जैसे मुद्दे दलगत राजनीति से ऊपर होने चाहिए। सरकार और विपक्ष दोनों को देश की सुरक्षा और प्रतिष्ठा को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए।
  • सार्थक बहस: बहस का उद्देश्य सिर्फ हंगामा खड़ा करना नहीं, बल्कि मुद्दों की जड़ तक जाना और समाधान खोजना होना चाहिए। सरकार को विपक्ष के वैध सवालों का सम्मानपूर्वक जवाब देना चाहिए, और विपक्ष को रचनात्मक आलोचना पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
  • समाधान-उन्मुख दृष्टिकोण: दोनों पक्षों को सिर्फ समस्याओं को उजागर करने के बजाय, उनके संभावित समाधानों पर भी विचार करना चाहिए। राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति पर एक साझा रणनीति विकसित करने का प्रयास किया जा सकता है।
  • संसदीय नियमों का पालन: सदन के सुचारू कामकाज के लिए सभी सदस्यों को संसदीय नियमों और परंपराओं का पालन करना चाहिए। अध्यक्ष/सभापति की भूमिका यहाँ महत्वपूर्ण हो जाती है।
  • संचार और समन्वय: सरकार और विपक्ष के बीच बेहतर संचार और समन्वय से कई गतिरोधों को टाला जा सकता है।

निष्कर्ष

मॉनसून सत्र भारतीय लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षा साबित होगा। पहलगाम हमला और ट्रम्प का दावा जैसे मुद्दे न केवल सरकार की नीतियों को चुनौती देंगे, बल्कि भारतीय राजनीति के परिपक्वता स्तर को भी प्रदर्शित करेंगे। यह सत्र हमें याद दिलाएगा कि लोकतंत्र में वाद-विवाद और असहमति आवश्यक है, लेकिन राष्ट्रीय हित हमेशा सर्वोच्च होना चाहिए। एक जिम्मेदार सरकार और एक सशक्त विपक्ष मिलकर ही देश को आगे ले जा सकते हैं, खासकर तब जब देश आंतरिक और बाहरी दोनों मोर्चों पर गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा हो। यह उम्मीद की जाती है कि संसद का यह सत्र महज एक ‘रणक्षेत्र’ न बनकर, गहन विचार-विमर्श, रचनात्मक बहस और राष्ट्र हित में लिए गए महत्वपूर्ण निर्णयों का साक्षी बनेगा।

UPSC परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न (Practice Questions for UPSC Exam)

प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) – 10 MCQs

(निम्नलिखित प्रश्नों पर विचार करें और सही उत्तर चुनें)

  1. भारत में संसदीय सत्रों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

    1. भारत में एक वर्ष में कम से कम तीन संसदीय सत्र आयोजित किए जाते हैं।
    2. दो सत्रों के बीच अधिकतम अंतराल छह महीने से अधिक नहीं हो सकता।
    3. राष्ट्रपति को संसद के प्रत्येक सदन को सत्र में बुलाने की शक्ति प्राप्त है, लेकिन उनकी इच्छा पर नहीं, बल्कि सरकार की सलाह पर।

    उपरोक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

    (a) केवल I और II

    (b) केवल II

    (c) केवल II और III

    (d) I, II और III

    उत्तर: (c)

    व्याख्या: भारत में आमतौर पर तीन संसदीय सत्र होते हैं: बजट सत्र (फरवरी-मई), मॉनसून सत्र (जुलाई-सितंबर) और शीतकालीन सत्र (नवंबर-दिसंबर)। हालांकि, संविधान में न्यूनतम दो सत्रों का प्रावधान है और दो सत्रों के बीच अधिकतम अंतराल छह महीने से अधिक नहीं हो सकता (अनुच्छेद 85)। राष्ट्रपति संसद को सत्र में बुलाते हैं, लेकिन यह मंत्रिपरिषद की सलाह पर होता है, न कि उनकी इच्छा पर। इसलिए, कथन I गलत है क्योंकि “कम से कम तीन” हमेशा अनिवार्य नहीं है, संविधान केवल “दो” की बात करता है; कथन II और III सही हैं।

  2. जम्मू-कश्मीर में सीमा पार आतंकवाद के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा/से सही नहीं है/हैं?

    1. नियंत्रण रेखा (LoC) भारत और पाकिस्तान के बीच एक अंतरराष्ट्रीय सीमा है।
    2. भारत का स्टैंड है कि आतंकवाद पर कोई भी बातचीत तभी संभव है जब पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को स्थायी रूप से समाप्त कर दे।
    3. आतंकवादी अक्सर स्थानीय आबादी के बीच से सक्रिय नेटवर्क का उपयोग करते हैं।

    उपरोक्त कथनों में से कौन-सा/से सही नहीं है/हैं?

    (a) केवल I

    (b) केवल II

    (c) केवल I और III

    (d) I, II और III

    उत्तर: (a)

    व्याख्या: LoC भारत और पाकिस्तान के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा है, न कि एक अंतरराष्ट्रीय सीमा। यह 1972 के शिमला समझौते के बाद स्थापित की गई थी और एक युद्धविराम रेखा से विकसित हुई है। भारत अंतरराष्ट्रीय सीमा को जम्मू और कश्मीर के जम्मू-कश्मीर खंड में ही मानता है। इसलिए, कथन I सही नहीं है। कथन II और III सही हैं, जो भारत की आतंकवाद नीति और जमीनी हकीकत को दर्शाते हैं।

  3. शिमला समझौते (1972) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

    1. यह भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर सहित सभी विवादों को द्विपक्षीय रूप से हल करने का प्रावधान करता है।
    2. समझौते पर भारत की ओर से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने हस्ताक्षर किए थे।
    3. यह समझौता संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता में किया गया था।

    उपरोक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

    (a) केवल I

    (b) केवल II और III

    (c) केवल I और II

    (d) I, II और III

    उत्तर: (c)

    व्याख्या: शिमला समझौता (1972) भारत और पाकिस्तान के बीच हुआ एक द्विपक्षीय समझौता है, जिसका उद्देश्य कश्मीर सहित सभी मुद्दों को तीसरे पक्ष की मध्यस्थता के बिना हल करना है। इस पर भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो ने हस्ताक्षर किए थे। यह संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता में नहीं किया गया था। इसलिए, कथन I और II सही हैं, जबकि कथन III गलत है।

  4. भारत की विदेश नीति में ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) के सिद्धांत का सबसे अच्छा वर्णन क्या करता है?

    (a) किसी भी अंतरराष्ट्रीय गठबंधन में शामिल न होना।

    (b) अपनी विदेश नीति का निर्धारण अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर करना, बिना किसी अन्य देश के दबाव या प्रभाव के।

    (c) केवल गुटनिरपेक्ष देशों के साथ ही संबंध रखना।

    (d) संयुक्त राष्ट्र के सभी निर्णयों का आँख बंद करके पालन करना।

    उत्तर: (b)

    व्याख्या: रणनीतिक स्वायत्तता का अर्थ है कि भारत अपनी विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा के निर्णय अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर स्वतंत्र रूप से लेगा, बिना किसी बाहरी शक्ति के दबाव या प्रभाव के। यह गुटनिरपेक्षता से विकसित एक अवधारणा है, लेकिन यह केवल गुटनिरपेक्ष देशों तक सीमित नहीं है और भारत को किसी भी देश के साथ संबंध रखने की अनुमति देती है जो उसके हित में हो।

  5. भारतीय संसद में ‘प्रश्नकाल’ के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?

    (a) यह प्रत्येक संसदीय सत्र के अंतिम घंटे में होता है।

    (b) इस दौरान मंत्री सदस्यों द्वारा पूछे गए प्रश्नों का मौखिक या लिखित उत्तर देते हैं।

    (c) प्रश्नकाल के दौरान केवल विरोधी दल के सदस्य ही प्रश्न पूछ सकते हैं।

    (d) यह हमेशा लोकसभा और राज्यसभा दोनों में सुबह 11 बजे से 12 बजे तक होता है।

    उत्तर: (b)

    व्याख्या: प्रश्नकाल संसदीय कार्यवाही का पहला घंटा होता है (सामान्यतः 11 बजे से 12 बजे तक, हालांकि समय बदल सकता है)। इस दौरान सदस्य विभिन्न मंत्रालयों से संबंधित प्रश्न पूछते हैं और संबंधित मंत्री उनके मौखिक (तारांकित प्रश्न) या लिखित (अतारांकित प्रश्न) उत्तर देते हैं। प्रश्नकाल में कोई भी सदस्य (केवल विरोधी दल के सदस्य नहीं) प्रश्न पूछ सकता है। इसलिए, विकल्प (b) सबसे सटीक है।

  6. ‘शून्यकाल’ (Zero Hour) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

    1. यह भारतीय संसदीय नवाचार है और संसदीय नियमों में इसका उल्लेख नहीं है।
    2. इसमें सदस्य बिना पूर्व सूचना के अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दे उठा सकते हैं।
    3. यह प्रश्नकाल के तुरंत बाद होता है।

    उपरोक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

    (a) केवल I

    (b) केवल II और III

    (c) केवल I और III

    (d) I, II और III

    उत्तर: (d)

    व्याख्या: शून्यकाल भारतीय संसदीय प्रक्रिया का एक अनौपचारिक नवाचार है जो 1960 के दशक से प्रचलन में है और इसका उल्लेख संसदीय नियमों में नहीं है। यह प्रश्नकाल के तुरंत बाद शुरू होता है और इसमें सदस्य बिना किसी पूर्व सूचना के राष्ट्रीय महत्व के तत्काल मुद्दों को उठा सकते हैं। इसलिए, सभी तीनों कथन सही हैं।

  7. भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के संदर्भ में ‘हस्तक्षेप न करने’ (Non-Interference) का सिद्धांत क्या दर्शाता है?

    (a) भारत किसी भी देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा।

    (b) कोई भी अन्य देश भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा।

    (c) केवल (a) सही है।

    (d) (a) और (b) दोनों सही हैं।

    उत्तर: (d)

    व्याख्या: अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में ‘हस्तक्षेप न करने’ का सिद्धांत एक द्विपक्षीय अवधारणा है। इसका अर्थ है कि एक देश दूसरे देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा (यह भारत की नीति है) और इसी तरह, कोई अन्य देश भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता (यह भारत की अपेक्षा है)। कश्मीर जैसे मुद्दों पर भारत का रुख इसी सिद्धांत पर आधारित है।

  8. आतंकवाद के वित्तपोषण (Terror Financing) को रोकने के लिए भारत द्वारा किए गए प्रयासों में निम्नलिखित में से कौन-से शामिल हैं?

    1. वित्तीय कार्रवाई कार्य बल (FATF) के साथ सहयोग।
    2. धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) को मजबूत करना।
    3. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के आतंकवाद-रोधी प्रस्तावों का अनुपालन।

    उपरोक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

    (a) केवल I

    (b) केवल II और III

    (c) केवल I और III

    (d) I, II और III

    उत्तर: (d)

    व्याख्या: भारत आतंकवाद के वित्तपोषण को रोकने के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाता है। इसमें FATF जैसे अंतर्राष्ट्रीय निकायों के साथ सहयोग करना, PMLA जैसे घरेलू कानूनों को मजबूत करना, और UNSC के आतंकवाद-रोधी प्रस्तावों का पालन करना शामिल है। ये सभी उपाय भारत की आतंकवाद-रोधी रणनीति का अभिन्न अंग हैं। इसलिए, सभी तीनों कथन सही हैं।

  9. भारत-अमेरिका संबंधों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

    1. भारत-अमेरिका संबंध अब केवल रक्षा और व्यापार तक सीमित हैं।
    2. भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु सहयोग समझौता एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर था।
    3. दोनों देश क्वाड (QUAD) समूह के सदस्य हैं, जिसका उद्देश्य इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सुरक्षा और स्थिरता को बढ़ावा देना है।

    उपरोक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

    (a) केवल I और II

    (b) केवल II और III

    (c) केवल I और III

    (d) I, II और III

    उत्तर: (b)

    व्याख्या: भारत-अमेरिका संबंध रक्षा और व्यापार से कहीं अधिक व्यापक हैं, जिनमें प्रौद्योगिकी, शिक्षा, जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य आदि जैसे कई क्षेत्र शामिल हैं। इसलिए कथन I गलत है। भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु सहयोग समझौता (123 समझौता) एक ऐतिहासिक समझौता था जिसने दोनों देशों के बीच संबंधों को मजबूत किया। भारत और अमेरिका दोनों क्वाड (QUAD – चतुर्भुजीय सुरक्षा संवाद) के सदस्य हैं, जिसमें जापान और ऑस्ट्रेलिया भी शामिल हैं। इसलिए कथन II और III सही हैं।

  10. संसद में सरकार और विपक्ष के बीच ‘गतिरोध’ के मुख्य कारणों में क्या शामिल हो सकते हैं?

    1. आगामी चुनावों को देखते हुए राजनीतिक लाभ की तलाश।
    2. विभिन्न मुद्दों पर वैचारिक मतभेद।
    3. संसद के नियमों और प्रक्रियाओं के बारे में जानकारी का अभाव।
    4. सरकार और विपक्ष के बीच विश्वास की कमी।

    उपरोक्त में से कौन-सा/से कारण गतिरोध के लिए सबसे संभावित हैं?

    (a) केवल I और II

    (b) केवल I, II और IV

    (c) केवल II, III और IV

    (d) I, II, III और IV

    उत्तर: (b)

    व्याख्या: राजनीतिक लाभ, वैचारिक मतभेद और विश्वास की कमी अक्सर संसद में गतिरोध का कारण बनती हैं। हालांकि, संसद के नियमों और प्रक्रियाओं की जानकारी का अभाव आमतौर पर मुख्य कारण नहीं होता, क्योंकि सदस्यों को नियमों के बारे में जानकारी होती है, भले ही वे उनका पालन न करें। इसलिए, कथन I, II और IV गतिरोध के सबसे संभावित कारण हैं।

मुख्य परीक्षा (Mains)

(निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर लगभग 150-250 शब्दों में दें)

  1. “संसद एक ‘रणक्षेत्र’ नहीं, बल्कि ‘विमर्श का मंच’ होनी चाहिए।” मॉनसून सत्र में पहलगाम हमले और अमेरिकी राष्ट्रपति के कश्मीर दावे जैसे मुद्दों पर होने वाली संभावित बहस के आलोक में इस कथन का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। भारत में संसदीय उत्पादकता सुनिश्चित करने के लिए सरकार और विपक्ष क्या कदम उठा सकते हैं? (GS-II: संसद और राज्य विधानमंडल)
  2. जम्मू-कश्मीर में हालिया हमले आंतरिक सुरक्षा के लिए एक गंभीर चुनौती पेश करते हैं। भारत में आतंकवाद से निपटने के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता क्यों है? इस संदर्भ में, सीमा पार आतंकवाद के वित्तपोषण को रोकने में भारत को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है और उन्हें कैसे दूर किया जा सकता है? (GS-III: आंतरिक सुरक्षा)
  3. “भारत की विदेश नीति ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ के सिद्धांत पर आधारित है, जो किसी भी बाहरी दबाव को अस्वीकार करती है।” अमेरिकी राष्ट्रपति के कश्मीर मुद्दे पर मध्यस्थता के दावे के संदर्भ में इस कथन का मूल्यांकन कीजिए। क्या ऐसी घटनाएं भारत के अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को प्रभावित करती हैं और भारत ऐसे राजनयिक तनावों को कैसे संभालता है? (GS-II: अंतर्राष्ट्रीय संबंध)

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