दबाव का अंतिम इम्तिहान: एक इंटरव्यू और आपातकाल के अनजाने पहलू
चर्चा में क्यों? (Why in News?):
भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर का हालिया बयान, जिसमें उन्होंने बताया कि कैसे उन्होंने आपातकाल के आखिरी दिन यूपीएससी (तत्कालीन) का इंटरव्यू दिया और इस अनुभव ने उन्हें दबाव में बात करना सिखाया, चर्चा का विषय बन गया है। उन्होंने यह भी जिक्र किया कि इंटरव्यू लेने वाले अधिकारी उस समय देश के वास्तविक हालात से कितने अनजान थे। यह घटना सिर्फ एक व्यक्तिगत स्मृति नहीं, बल्कि सिविल सेवा के लिए तैयारी कर रहे लाखों उम्मीदवारों के लिए गहन सीख और चिंतन का विषय है। यह हमें न केवल इतिहास के एक महत्वपूर्ण दौर की याद दिलाता है, बल्कि आधुनिक सिविल सेवक में आवश्यक गुणों—दबाव प्रबंधन, जमीनी हकीकत की समझ और प्रभावी संवाद—की महत्ता पर भी प्रकाश डालता है।
आपातकाल: भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़
किसी भी घटना को समझने के लिए उसके ऐतिहासिक संदर्भ को जानना अनिवार्य है। डॉ. जयशंकर जिस “आपातकाल” की बात कर रहे हैं, वह 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक, यानी 21 महीने की अवधि के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लगाया गया था। यह भारत के स्वतंत्रता के बाद के इतिहास में सबसे विवादास्पद अवधियों में से एक था, जिसने देश के राजनीतिक, सामाजिक और न्यायिक ताने-बाने को गहराई से प्रभावित किया।
आपातकाल क्यों लगाया गया?
- राजनीतिक अस्थिरता: 1970 के दशक की शुरुआत में देश में राजनीतिक अशांति बढ़ रही थी। जयप्रकाश नारायण (जेपी) के नेतृत्व में ‘संपूर्ण क्रांति’ आंदोलन जोर पकड़ रहा था, जिसमें भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और मूल्य वृद्धि के खिलाफ आवाज उठाई जा रही थी।
- आर्थिक चुनौतियाँ: 1971 के भारत-पाक युद्ध, तेल संकट और बढ़ती मुद्रास्फीति ने अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव डाला था।
- न्यायिक फैसला: 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इंदिरा गांधी के रायबरेली निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव को अमान्य घोषित कर दिया, जिससे उनके पद पर बने रहने पर संकट आ गया।
- आंतरिक अशांति का डर: सरकार ने तर्क दिया कि देश में आंतरिक अशांति का खतरा बढ़ गया है, जिससे कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए यह कदम आवश्यक था।
आपातकाल के दौरान क्या हुआ?
- मौलिक अधिकारों का निलंबन: नागरिकों के मौलिक अधिकारों, विशेषकर अनुच्छेद 19 (भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सभा करने की स्वतंत्रता आदि) को निलंबित कर दिया गया।
- प्रेस सेंसरशिप: समाचार पत्रों पर कठोर सेंसरशिप लागू की गई, जिससे सरकार की आलोचना पर रोक लगा दी गई।
- गिरफ्तारियाँ: जेपी नारायण सहित हजारों राजनीतिक विरोधियों और कार्यकर्ताओं को बिना किसी मुकदमे के गिरफ्तार कर लिया गया।
- संवैधानिक संशोधन: 42वाँ संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1976 पारित किया गया, जिसने संविधान की प्रस्तावना में “समाजवादी” और “पंथनिरपेक्ष” शब्द जोड़े, और संसद की सर्वोच्चता स्थापित करने का प्रयास किया।
- अनिवार्य नसबंदी: संजय गांधी के नेतृत्व में अनिवार्य नसबंदी जैसे विवादास्पद कार्यक्रम चलाए गए, जिनका व्यापक विरोध हुआ।
आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के लिए एक अग्निपरीक्षा थी। इसने शासन में सत्ता के केंद्रीकरण, नागरिक स्वतंत्रता के हनन और संस्थागत जवाबदेही की कमी के खतरों को उजागर किया। यह दिखाता है कि कैसे सत्ता का दुरुपयोग हो सकता है, भले ही इसके पीछे कथित रूप से “राष्ट्रहित” का तर्क दिया गया हो।
डॉ. जयशंकर का अनुभव: एक अनोखी अंतर्दृष्टि
डॉ. जयशंकर का यह कथन कि उन्होंने आपातकाल के आखिरी दिन इंटरव्यू दिया, एक प्रतीकात्मक महत्त्व रखता है। आपातकाल आधिकारिक तौर पर 21 मार्च 1977 को समाप्त हुआ था। इसका मतलब है कि उन्होंने एक ऐसे समय में इंटरव्यू दिया, जब देश एक संक्रमणकालीन दौर से गुजर रहा था – एक दमनकारी शासन का अंत हो रहा था और लोकतंत्र की वापसी की उम्मीद जाग रही थी।
दबाव में संवाद की कला
डॉ. जयशंकर के अनुसार, इस अनुभव ने उन्हें “दबाव में बात करना” सिखाया। सिविल सेवा का जीवन स्वयं दबाव से भरा होता है। चाहे वह जनसेवा का दबाव हो, नीतिगत निर्णयों का दबाव हो, मीडिया की जाँच का दबाव हो या राजनीतिक हस्तक्षेप का दबाव हो। ऐसे में, दबाव में शांत रहकर, तार्किक रूप से और स्पष्ट रूप से संवाद करने की क्षमता एक अधिकारी के लिए सबसे महत्वपूर्ण कौशल में से एक है।
- स्पष्टता (Clarity): दबाव में अक्सर व्यक्ति घबराकर अस्पष्ट बातें कहने लगता है। प्रभावी संवाद के लिए विचारों में स्पष्टता होना आवश्यक है।
- संक्षिप्तता (Conciseness): संकट की स्थिति में लंबे और अनावश्यक बयानों से बचना चाहिए। सीधे मुद्दे पर आना और कम शब्दों में अपनी बात रखना महत्वपूर्ण है।
- आत्मविश्वास (Confidence): भले ही आप आंतरिक रूप से दबाव महसूस कर रहे हों, आपकी संवाद शैली में आत्मविश्वास झलकना चाहिए। यह आपके निर्णयों को विश्वसनीयता प्रदान करता है।
- सुनने की क्षमता (Active Listening): संवाद सिर्फ बोलने का नाम नहीं है, बल्कि सुनने का भी है। दबाव में भी सामने वाले की बात को ध्यान से समझना और फिर प्रतिक्रिया देना आवश्यक है।
एक अधिकारी को अक्सर मीडिया, जनता, सहकर्मियों और वरिष्ठों से कठिन सवालों का सामना करना पड़ता है। इन स्थितियों में घबराहट या झुंझलाहट दिखाने के बजाय, शांत और संयमित रहना, तथ्यात्मक जवाब देना और समाधान-उन्मुख दृष्टिकोण अपनाना ही प्रभावी नेतृत्व की पहचान है।
अधिकारियों का “अनजान” होना: एक गहरी चुनौती
डॉ. जयशंकर का यह अवलोकन कि इंटरव्यू लेने वाले अधिकारी देश के वास्तविक हालात से “अनजान” थे, सिविल सेवा की एक गहरी और गंभीर चुनौती को उजागर करता है। आपातकाल के दौरान, सरकारी तंत्र ने नागरिकों के अनुभवों से दूरी बना ली थी। यह दूरी कई कारणों से उत्पन्न हो सकती है:
- सत्ता की ऊँचाई: अक्सर शीर्ष पदों पर बैठे अधिकारी जमीनी हकीकत से कट जाते हैं क्योंकि उनका सीधा संपर्क आम जनता से कम हो जाता है।
- सूचना का फ़िल्टर होना: सूचना का प्रवाह नीचे से ऊपर की ओर जाते हुए कई स्तरों पर फ़िल्टर हो जाता है, जिससे वास्तविक स्थिति की सही तस्वीर सामने नहीं आ पाती।
- डर का माहौल: आपातकाल जैसे दमनकारी माहौल में, निचले स्तर के अधिकारी या जनता सच बताने से डरते हैं, जिससे उच्च अधिकारी गलत धारणाएँ बना लेते हैं।
- आत्मसंतुष्टि और जड़ता: कई बार अधिकारी अपने पद और विशेषाधिकारों में इतने रम जाते हैं कि वे बदलाव या नई वास्तविकताओं को स्वीकार करने से हिचकिचाते हैं।
यह ‘अनजान’ होना सिर्फ सूचना की कमी नहीं है, बल्कि यह एक मानसिकता को दर्शाता है जहाँ सहानुभूति, जवाबदेही और जन-केंद्रित शासन का अभाव होता है। एक प्रभावी सिविल सेवक वह है जो न केवल नीतियों को लागू करता है, बल्कि नागरिकों की नब्ज को भी समझता है, उनकी आकांक्षाओं और परेशानियों से वाकिफ होता है।
UPSC उम्मीदवारों के लिए महत्वपूर्ण सीख (A Comprehensive Guide for Aspirants)
डॉ. जयशंकर के अनुभव से यूपीएससी उम्मीदवार कई अमूल्य सबक सीख सकते हैं। यह सिर्फ परीक्षा पास करने के बारे में नहीं है, बल्कि एक जिम्मेदार और प्रभावी सिविल सेवक बनने के बारे में है।
1. ऐतिहासिक संदर्भ और समसामयिक समझ का महत्त्व
- क्यों पढ़ें इतिहास: आपातकाल जैसी घटनाएँ हमें शासन के खतरों, लोकतांत्रिक संस्थाओं की नाजुकता और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के महत्व को समझाती हैं। ये घटनाएँ हमें वर्तमान मुद्दों को बेहतर ढंग से समझने में मदद करती हैं (उदा. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, निजता का अधिकार)। जीएस पेपर 1 (इतिहास) और जीएस पेपर 2 (शासन) के लिए यह समझ महत्वपूर्ण है।
- समसामयिक घटनाओं का विश्लेषण: केवल समाचारों को रटना पर्याप्त नहीं है। महत्वपूर्ण घटनाओं के पीछे के कारणों, उनके विभिन्न पहलुओं (सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, नैतिक), और उनके संभावित परिणामों का विश्लेषण करना सीखें। यही आपको ‘अनजान’ होने से बचाएगा।
2. दबाव प्रबंधन और व्यक्तित्व विकास (Personality Test)
यूपीएससी इंटरव्यू (व्यक्तित्व परीक्षण) स्वयं एक ‘दबाव का इम्तिहान’ है। बोर्ड के सामने बैठना, अनपेक्षित प्रश्नों का सामना करना और अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन करना अत्यधिक दबाव भरा हो सकता है।
- मॉक इंटरव्यू का अभ्यास: यह आपको दबाव में बोलने, अपने विचारों को व्यवस्थित करने और अपनी कमजोरियों को पहचानने में मदद करेगा।
- आत्म-जागरूकता: अपनी strengths और weaknesses को जानें। अपनी हॉबीज, पृष्ठभूमि और विचारों को लेकर सहज रहें।
- सकारात्मक शारीरिक भाषा: आत्मविश्वास दिखाएँ। आँखों से संपर्क बनाएँ, सीधे बैठें, और अनावश्यक हरकतों से बचें।
- मानसिक दृढ़ता: योग, ध्यान या किसी भी अन्य तकनीक का उपयोग करें जो आपको शांत रहने में मदद करती है। याद रखें, इंटरव्यू में आप अपनी व्यक्तित्व का प्रदर्शन कर रहे हैं, न कि केवल ज्ञान का।
- ईमानदारी और नैतिक दृढ़ता: यदि आप किसी प्रश्न का उत्तर नहीं जानते, तो विनम्रतापूर्वक स्वीकार करें। अपनी मान्यताओं के प्रति ईमानदार रहें, बशर्ते वे संविधान के मूल्यों के अनुरूप हों।
जैसे एक कुम्हार मिट्टी को आग में तपाकर उसे मजबूत बनाता है, वैसे ही दबाव और चुनौती व्यक्ति के व्यक्तित्व को निखारती है। यह आपको केवल जानकारी नहीं देता, बल्कि आपको सीखने और अनुकूलन करने के लिए प्रेरित करता है।
3. जमीनी हकीकत की समझ और सहानुभूति
सिविल सेवक को ‘अनजान’ नहीं होना चाहिए। उसे देश के हर वर्ग की समस्याओं और आकांक्षाओं को समझना होगा।
- विविध समाचार स्रोतों का अध्ययन: केवल एक स्रोत पर निर्भर न रहें। विभिन्न दृष्टिकोणों को पढ़ें और समझें।
- क्षेत्रीय दौरे और लोगों से बातचीत: यदि संभव हो, तो अपने आसपास के ग्रामीण या वंचित क्षेत्रों का दौरा करें। लोगों से सीधे संवाद करें, उनकी कहानियाँ सुनें। यह आपको पाठ्यपुस्तकों से परे की समझ देगा।
- केस स्टडीज़ का विश्लेषण: सामाजिक समस्याओं, सरकारी योजनाओं और उनके प्रभाव से संबंधित केस स्टडीज़ पढ़ें। यह आपको समस्याओं को विभिन्न दृष्टिकोणों से देखने में मदद करेगा।
- सहानुभूति विकसित करें: सिर्फ तथ्यों को जानने से कुछ नहीं होगा; उन तथ्यों के पीछे के मानवीय पहलू को समझना महत्वपूर्ण है। यही आपको एक संवेदनहीन नौकरशाह बनने से रोकेगा।
4. प्रभावी संवाद कौशल
एक सिविल सेवक के लिए लिखना और बोलना दोनों ही महत्वपूर्ण हैं।
- लेखन अभ्यास: मेन्स परीक्षा के लिए उत्तर लेखन का नियमित अभ्यास करें। स्पष्ट, संक्षिप्त और सुसंगत उत्तर लिखना सीखें। यह आपको अपने विचारों को प्रभावी ढंग से व्यक्त करने में मदद करेगा।
- डिबेट्स और ग्रुप डिस्कशन में भाग लेना: यह आपके मौखिक संवाद कौशल को निखारेगा और आपको विभिन्न दृष्टिकोणों को सुनने और अपनी बात रखने में मदद करेगा।
- तटस्थता और वस्तुनिष्ठता: विवादित मुद्दों पर अपनी राय व्यक्त करते समय तटस्थ और वस्तुनिष्ठ रहें। भावनाओं के बजाय तथ्यों और तर्क पर आधारित रहें।
5. नैतिक मूल्यों का आंतरिककरण
आपातकाल एक ऐसा दौर था जब नैतिक मूल्यों और संवैधानिक सिद्धांतों को चुनौती दी गई थी। एक सिविल सेवक को इन मूल्यों का सच्चा प्रहरी होना चाहिए।
- संवैधानिक नैतिकता: संविधान के मूल सिद्धांतों – न्याय, स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और पंथनिरपेक्षता – को समझें और उनका पालन करें।
- नैतिकता (Ethics) पर ध्यान: जीएस पेपर 4 (Ethics, Integrity and Aptitude) को केवल एक विषय के रूप में न पढ़ें, बल्कि उसके सिद्धांतों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें। सत्यनिष्ठा, ईमानदारी, निष्पक्षता, निस्वार्थता जैसे गुण सिविल सेवक के लिए अनिवार्य हैं।
- जनसेवा की भावना: आपका अंतिम लक्ष्य जनता की सेवा करना और उनके जीवन को बेहतर बनाना होना चाहिए। यह भावना आपको किसी भी दबाव या प्रलोभन के सामने झुकने से रोकेगी।
सिविल सेवा में जमीनी हकीकत की समझ क्यों है अनिवार्य?
किसी भी नीति या कानून की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसे जमीनी स्तर पर कैसे लागू किया जाता है। यदि नीतियाँ बनाने वाले और उन्हें लागू करने वाले अधिकारी लोगों की वास्तविक समस्याओं और जरूरतों से अनजान होंगे, तो वे प्रभावी समाधान कभी नहीं दे पाएंगे।
- नीति निर्माण में दक्षता: जब अधिकारियों को जमीनी चुनौतियों की जानकारी होती है, तो वे ऐसी नीतियाँ बनाने में मदद कर सकते हैं जो यथार्थवादी और प्रभावी हों।
- कार्यान्वयन में सुधार: जमीनी समझ से नीतियों को बेहतर ढंग से लागू किया जा सकता है, बाधाओं को दूर किया जा सकता है और लक्षित लाभार्थियों तक लाभ पहुँचाया जा सकता है।
- जनता का विश्वास: जब अधिकारी जनता की समस्याओं को समझते हैं और सहानुभूति दिखाते हैं, तो इससे प्रशासन में जनता का विश्वास बढ़ता है।
- जवाबदेही: जमीनी हकीकत से जुड़ाव अधिकारियों को उनके कार्यों के प्रति अधिक जवाबदेह बनाता है।
- संकट प्रबंधन: प्राकृतिक आपदाओं, महामारियों या सामाजिक अशांति जैसी आपातकालीन स्थितियों में, जमीनी हकीकत की समझ अधिकारी को प्रभावी ढंग से प्रतिक्रिया देने और मानव जीवन को बचाने में मदद करती है।
जैसे एक डॉक्टर रोगी की नब्ज समझे बिना सही इलाज नहीं कर सकता, वैसे ही एक प्रशासक जनता की नब्ज समझे बिना प्रभावी शासन नहीं कर सकता। ‘अनजान’ रहना एक गंभीर प्रशासनिक चूक है जिसके परिणाम दूरगामी हो सकते हैं।
आगे की राह: एक संवेदनशील और प्रभावी नौकरशाही का निर्माण
डॉ. जयशंकर का अनुभव हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि हम कैसे एक ऐसी सिविल सेवा का निर्माण कर सकते हैं जो न केवल कुशल हो, बल्कि संवेदनशील, जवाबदेह और जमीनी हकीकत से जुड़ी हो।
- प्रशिक्षण में सुधार: सिविल सेवा प्रशिक्षण अकादमियों में केवल सैद्धांतिक ज्ञान पर नहीं, बल्कि व्यावहारिक अनुभव, जमीनी दौरे और सामुदायिक सहभागिता पर अधिक जोर दिया जाना चाहिए।
- नैतिकता पर निरंतर जोर: अधिकारियों को लगातार नैतिक दुविधाओं का सामना करना पड़ता है। उनके लिए नैतिक मूल्यों को आंतरिक बनाने और नैतिक निर्णयन कौशल को विकसित करने पर ध्यान देना आवश्यक है।
- प्रौद्योगिकी का बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग: प्रौद्योगिकी डेटा और सूचना तक पहुँच को बढ़ा सकती है, जिससे अधिकारियों को जमीनी हकीकत की बेहतर समझ मिल सकती है। हालांकि, तकनीक मानवीय संपर्क का विकल्प नहीं है।
- नागरिक-केंद्रित प्रशासन: प्रशासन को हमेशा नागरिकों की जरूरतों और अधिकारों को प्राथमिकता देनी चाहिए। यह सुनिश्चित करना कि नागरिक अपनी शिकायतें दर्ज करा सकें और उन पर कार्रवाई हो, आवश्यक है।
- संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता: सिविल सेवक को भारतीय संविधान के मूल सिद्धांतों और मूल्यों के प्रति अटूट प्रतिबद्धता रखनी चाहिए, विशेषकर जब उन पर राजनीतिक या अन्य प्रकार का दबाव हो।
डॉ. एस. जयशंकर का व्यक्तिगत अनुभव, आपातकाल के उस मुश्किल दौर से जुड़ा, यूपीएससी उम्मीदवारों के लिए एक प्रेरणा और एक चेतावनी दोनों है। यह हमें सिखाता है कि दबाव में भी कैसे शांत रहा जाए, प्रभावी ढंग से संवाद किया जाए और सबसे महत्वपूर्ण, देश की वास्तविक नब्ज को कैसे समझा जाए। एक सिविल सेवक का काम सिर्फ नियमों का पालन करना नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाना है। इसके लिए किताबी ज्ञान के साथ-साथ गहरी मानवीय समझ, सहानुभूति और अदम्य साहस की आवश्यकता होती है। यह ‘दबाव का अंतिम इम्तिहान’ ही है जो आपको एक साधारण उम्मीदवार से एक असाधारण लोक सेवक में बदलता है।
UPSC परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न (Practice Questions for UPSC Exam)
प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) – 10 MCQs
निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
-
भारत में आपातकाल (Emergency) के संबंध में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- भारत में आंतरिक आपातकाल 25 जून 1975 को लगाया गया था।
- आपातकाल के दौरान, नागरिकों के मौलिक अधिकारों को पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया था।
- 42वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1976 ने संसद की सर्वोच्चता को स्थापित करने का प्रयास किया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल I और II
(b) केवल II और III
(c) केवल I और III
(d) I, II और III
उत्तर: (c) केवल I और III
व्याख्या: कथन I सही है, आपातकाल 25 जून 1975 को लगाया गया था। कथन III सही है, 42वें संशोधन ने संसद की शक्ति को बढ़ाया था। कथन II गलत है। मौलिक अधिकारों को निलंबित किया गया था, लेकिन “पूरी तरह से समाप्त” नहीं किया गया था; अनुच्छेद 20 और 21 के तहत अधिकार निलंबित नहीं किए जा सकते।
-
42वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा भारतीय संविधान में किए गए प्रमुख परिवर्तनों में शामिल हैं:
- संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ और ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्द जोड़ना।
- नागरिकों के लिए मौलिक कर्तव्यों को जोड़ना।
- लोकसभा और राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल 5 वर्ष से घटाकर 4 वर्ष करना।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल I
(b) केवल I और II
(c) केवल II और III
(d) I, II और III
उत्तर: (b) केवल I और II
व्याख्या: कथन I और II सही हैं। 42वें संशोधन ने प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ और ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्द जोड़े तथा मौलिक कर्तव्यों को शामिल किया। कथन III गलत है, 42वें संशोधन ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल 5 से बढ़ाकर 6 वर्ष किया था, न कि घटाया था। बाद में 44वें संशोधन ने इसे फिर से 5 वर्ष कर दिया।
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आपातकाल के दौरान गठित किस समिति ने मौलिक कर्तव्यों को शामिल करने की सिफारिश की थी?
(a) सरकारिया आयोग
(b) स्वर्ण सिंह समिति
(c) पंछी आयोग
(d) कोठारी आयोग
उत्तर: (b) स्वर्ण सिंह समिति
व्याख्या: सरदार स्वर्ण सिंह समिति ने 42वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम के माध्यम से संविधान में मौलिक कर्तव्यों को शामिल करने की सिफारिश की थी।
-
भारतीय संविधान का कौन-सा अनुच्छेद आंतरिक अशांति के आधार पर राष्ट्रीय आपातकाल लगाने का प्रावधान करता है?
(a) अनुच्छेद 352
(b) अनुच्छेद 356
(c) अनुच्छेद 360
(d) अनुच्छेद 365
उत्तर: (a) अनुच्छेद 352
व्याख्या: अनुच्छेद 352 राष्ट्रीय आपातकाल से संबंधित है, जो युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह (पहले ‘आंतरिक अशांति’ था, जिसे 44वें संशोधन द्वारा बदला गया) के आधार पर लगाया जा सकता है।
-
44वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1978 के संबंध में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- इसने ‘आंतरिक अशांति’ शब्द को ‘सशस्त्र विद्रोह’ से प्रतिस्थापित किया।
- इसने संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार की सूची से हटा दिया।
- इसने अनुच्छेद 20 और 21 द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों को राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान भी निलंबित न किए जाने योग्य बनाया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल I
(b) केवल II और III
(c) केवल I और III
(d) I, II और III
उत्तर: (d) I, II और III
व्याख्या: 44वें संशोधन अधिनियम, 1978 ने आपातकाल के दौरान मौलिक अधिकारों के दुरुपयोग को रोकने के लिए कई महत्वपूर्ण बदलाव किए, जिनमें तीनों कथन शामिल हैं।
-
सिविल सेवा के संदर्भ में ‘सहानुभूति’ (Empathy) का क्या महत्व है?
- यह अधिकारियों को जमीनी हकीकत को बेहतर ढंग से समझने में मदद करती है।
- यह नागरिकों में प्रशासन के प्रति विश्वास पैदा करती है।
- यह नीति निर्माण और कार्यान्वयन को अधिक जन-केंद्रित बनाती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल I
(b) केवल II
(c) केवल I और II
(d) I, II और III
उत्तर: (d) I, II और III
व्याख्या: तीनों कथन सही हैं। सहानुभूति एक सिविल सेवक के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण गुण है, जो उसे नागरिकों की समस्याओं को समझने, विश्वास बनाने और प्रभावी नीतियां बनाने में मदद करती है।
-
यूपीएससी व्यक्तित्व परीक्षण (इंटरव्यू) में दबाव प्रबंधन कौशल का आकलन करने के लिए कौन सी तकनीकें सहायक हो सकती हैं?
- अनपेक्षित या तनावपूर्ण प्रश्न पूछना।
- उम्मीदवार की गैर-मौखिक संचार (Non-verbal communication) का अवलोकन करना।
- उम्मीदवार से किसी जटिल समस्या का तुरंत समाधान बताने को कहना।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल I और II
(b) केवल I और III
(c) केवल II और III
(d) I, II और III
उत्तर: (d) I, II और III
व्याख्या: तीनों तकनीकें इंटरव्यू बोर्ड द्वारा उम्मीदवार के दबाव प्रबंधन कौशल का आकलन करने के लिए उपयोग की जा सकती हैं। वे उम्मीदवार की सोचने की क्षमता, संयम और प्रतिक्रिया का तरीका दर्शाती हैं।
-
निम्नलिखित में से कौन-सा/से ‘प्रभावी संवाद’ के प्रमुख घटकों में से है/हैं, विशेषकर संकट की स्थितियों में?
- स्पष्टता और संक्षिप्तता।
- आत्मविश्वास और संयम।
- सक्रिय श्रवण और सहानुभूति।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल I
(b) केवल I और II
(c) केवल II और III
(d) I, II और III
उत्तर: (d) I, II और III
व्याख्या: ये सभी प्रभावी संवाद के महत्वपूर्ण घटक हैं, खासकर दबाव या संकट की स्थितियों में जहां स्पष्टता, विश्वास और सुनने की क्षमता अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।
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‘अधिकारियों का देश के हालात से अनजान होना’ सिविल सेवा में किस प्रकार की चुनौती को दर्शाता है?
- सूचना के प्रवाह में बाधा।
- जमीनी हकीकत से जुड़ाव की कमी।
- नीति निर्माण में अकुशलता।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल I और II
(b) केवल II और III
(c) केवल I और III
(d) I, II और III
उत्तर: (d) I, II और III
व्याख्या: अधिकारियों का अनजान होना इन सभी चुनौतियों को दर्शाता है। सूचना की कमी से जमीनी हकीकत से जुड़ाव कम होता है, और यह अंततः अकुशल नीति निर्माण की ओर ले जाता है।
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आपातकाल के दौरान प्रेस की स्वतंत्रता पर लगाए गए प्रतिबंधों की जाँच के लिए किस समिति का गठन किया गया था?
(a) शाह आयोग
(b) खेड़ा समिति
(c) आर.एन. मल्होत्रा समिति
(d) विवेक देवराय समिति
उत्तर: (a) शाह आयोग
व्याख्या: आपातकाल की ज्यादतियों की जाँच के लिए 1977 में जनता पार्टी सरकार द्वारा न्यायमूर्ति जे.सी. शाह की अध्यक्षता में शाह आयोग का गठन किया गया था।
मुख्य परीक्षा (Mains)
- डॉ. एस. जयशंकर के आपातकाल के दौरान दिए गए इंटरव्यू के अनुभव को एक केस स्टडी के रूप में लेते हुए, सिविल सेवा में ‘दबाव प्रबंधन’ और ‘जमीनी हकीकत की समझ’ के महत्व का विश्लेषण कीजिए। आज के संदर्भ में एक प्रभावी लोक सेवक के लिए ये गुण कितने प्रासंगिक हैं?
- “अधिकारियों का देश के हालात से अनजान होना, एक गंभीर प्रशासनिक चूक है जिसके परिणाम दूरगामी हो सकते हैं।” इस कथन के आलोक में, आधुनिक सिविल सेवा में सूचना के प्रभावी प्रवाह, सहानुभूति और जन-केंद्रित शासन सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए?
- भारतीय लोकतंत्र में आपातकाल की अवधि एक महत्वपूर्ण मोड़ क्यों मानी जाती है? चर्चा कीजिए कि इस अवधि से सिविल सेवाओं के लिए क्या नैतिक और संस्थागत सबक सीखे जा सकते हैं।
- यूपीएससी व्यक्तित्व परीक्षण (इंटरव्यू) का उद्देश्य केवल ज्ञान का परीक्षण करना नहीं, बल्कि उम्मीदवार के व्यक्तित्व, दृष्टिकोण और व्यवहार का आकलन करना है। डॉ. जयशंकर के अनुभव को ध्यान में रखते हुए, एक सिविल सेवा उम्मीदवार के लिए दबाव में संवाद करने की कला और विभिन्न दृष्टिकोणों को समझने की क्षमता क्यों आवश्यक है?
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दबाव का अंतिम इम्तिहान: एक इंटरव्यू और आपातकाल के अनजाने पहलू
चर्चा में क्यों? (Why in News?):
भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर का हालिया बयान, जिसमें उन्होंने बताया कि कैसे उन्होंने आपातकाल के आखिरी दिन यूपीएससी (तत्कालीन) का इंटरव्यू दिया और इस अनुभव ने उन्हें दबाव में बात करना सिखाया, चर्चा का विषय बन गया है। उन्होंने यह भी जिक्र किया कि इंटरव्यू लेने वाले अधिकारी उस समय देश के वास्तविक हालात से कितने अनजान थे। यह घटना सिर्फ एक व्यक्तिगत स्मृति नहीं, बल्कि सिविल सेवा के लिए तैयारी कर रहे लाखों उम्मीदवारों के लिए गहन सीख और चिंतन का विषय है। यह हमें न केवल इतिहास के एक महत्वपूर्ण दौर की याद दिलाता है, बल्कि आधुनिक सिविल सेवक में आवश्यक गुणों—दबाव प्रबंधन, जमीनी हकीकत की समझ और प्रभावी संवाद—की महत्ता पर भी प्रकाश डालता है।
आपातकाल: भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़
किसी भी घटना को समझने के लिए उसके ऐतिहासिक संदर्भ को जानना अनिवार्य है। डॉ. जयशंकर जिस “आपातकाल” की बात कर रहे हैं, वह 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक, यानी 21 महीने की अवधि के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लगाया गया था। यह भारत के स्वतंत्रता के बाद के इतिहास में सबसे विवादास्पद अवधियों में से एक था, जिसने देश के राजनीतिक, सामाजिक और न्यायिक ताने-बाने को गहराई से प्रभावित किया।
आपातकाल क्यों लगाया गया?
- राजनीतिक अस्थिरता: 1970 के दशक की शुरुआत में देश में राजनीतिक अशांति बढ़ रही थी। जयप्रकाश नारायण (जेपी) के नेतृत्व में ‘संपूर्ण क्रांति’ आंदोलन जोर पकड़ रहा था, जिसमें भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और मूल्य वृद्धि के खिलाफ आवाज उठाई जा रही थी।
- आर्थिक चुनौतियाँ: 1971 के भारत-पाक युद्ध, तेल संकट और बढ़ती मुद्रास्फीति ने अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव डाला था।
- न्यायिक फैसला: 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इंदिरा गांधी के रायबरेली निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव को अमान्य घोषित कर दिया, जिससे उनके पद पर बने रहने पर संकट आ गया।
- आंतरिक अशांति का डर: सरकार ने तर्क दिया कि देश में आंतरिक अशांति का खतरा बढ़ गया है, जिससे कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए यह कदम आवश्यक था।
आपातकाल के दौरान क्या हुआ?
- मौलिक अधिकारों का निलंबन: नागरिकों के मौलिक अधिकारों, विशेषकर अनुच्छेद 19 (भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सभा करने की स्वतंत्रता आदि) को निलंबित कर दिया गया।
- प्रेस सेंसरशिप: समाचार पत्रों पर कठोर सेंसरशिप लागू की गई, जिससे सरकार की आलोचना पर रोक लगा दी गई।
- गिरफ्तारियाँ: जेपी नारायण सहित हजारों राजनीतिक विरोधियों और कार्यकर्ताओं को बिना किसी मुकदमे के गिरफ्तार कर लिया गया।
- संवैधानिक संशोधन: 42वाँ संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1976 पारित किया गया, जिसने संविधान की प्रस्तावना में “समाजवादी” और “पंथनिरपेक्ष” शब्द जोड़े, और संसद की सर्वोच्चता स्थापित करने का प्रयास किया।
- अनिवार्य नसबंदी: संजय गांधी के नेतृत्व में अनिवार्य नसबंदी जैसे विवादास्पद कार्यक्रम चलाए गए, जिनका व्यापक विरोध हुआ।
आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के लिए एक अग्निपरीक्षा थी। इसने शासन में सत्ता के केंद्रीकरण, नागरिक स्वतंत्रता के हनन और संस्थागत जवाबदेही की कमी के खतरों को उजागर किया। यह दिखाता है कि कैसे सत्ता का दुरुपयोग हो सकता है, भले ही इसके पीछे कथित रूप से “राष्ट्रहित” का तर्क दिया गया हो।
डॉ. जयशंकर का अनुभव: एक अनोखी अंतर्दृष्टि
डॉ. जयशंकर का यह कथन कि उन्होंने आपातकाल के आखिरी दिन इंटरव्यू दिया, एक प्रतीकात्मक महत्त्व रखता है। आपातकाल आधिकारिक तौर पर 21 मार्च 1977 को समाप्त हुआ था। इसका मतलब है कि उन्होंने एक ऐसे समय में इंटरव्यू दिया, जब देश एक संक्रमणकालीन दौर से गुजर रहा था – एक दमनकारी शासन का अंत हो रहा था और लोकतंत्र की वापसी की उम्मीद जाग रही थी।
दबाव में संवाद की कला
डॉ. जयशंकर के अनुसार, इस अनुभव ने उन्हें “दबाव में बात करना” सिखाया। सिविल सेवा का जीवन स्वयं दबाव से भरा होता है। चाहे वह जनसेवा का दबाव हो, नीतिगत निर्णयों का दबाव हो, मीडिया की जाँच का दबाव हो या राजनीतिक हस्तक्षेप का दबाव हो। ऐसे में, दबाव में शांत रहकर, तार्किक रूप से और स्पष्ट रूप से संवाद करने की क्षमता एक अधिकारी के लिए सबसे महत्वपूर्ण कौशल में से एक है।
- स्पष्टता (Clarity): दबाव में अक्सर व्यक्ति घबराकर अस्पष्ट बातें कहने लगता है। प्रभावी संवाद के लिए विचारों में स्पष्टता होना आवश्यक है।
- संक्षिप्तता (Conciseness): संकट की स्थिति में लंबे और अनावश्यक बयानों से बचना चाहिए। सीधे मुद्दे पर आना और कम शब्दों में अपनी बात रखना महत्वपूर्ण है।
- आत्मविश्वास (Confidence): भले ही आप आंतरिक रूप से दबाव महसूस कर रहे हों, आपकी संवाद शैली में आत्मविश्वास झलकना चाहिए। यह आपके निर्णयों को विश्वसनीयता प्रदान करता है।
- सुनने की क्षमता (Active Listening): संवाद सिर्फ बोलने का नाम नहीं है, बल्कि सुनने का भी है। दबाव में भी सामने वाले की बात को ध्यान से समझना और फिर प्रतिक्रिया देना आवश्यक है।
एक अधिकारी को अक्सर मीडिया, जनता, सहकर्मियों और वरिष्ठों से कठिन सवालों का सामना करना पड़ता है। इन स्थितियों में घबराहट या झुंझलाहट दिखाने के बजाय, शांत और संयमित रहना, तथ्यात्मक जवाब देना और समाधान-उन्मुख दृष्टिकोण अपनाना ही प्रभावी नेतृत्व की पहचान है।
अधिकारियों का “अनजान” होना: एक गहरी चुनौती
डॉ. जयशंकर का यह अवलोकन कि इंटरव्यू लेने वाले अधिकारी देश के वास्तविक हालात से “अनजान” थे, सिविल सेवा की एक गहरी और गंभीर चुनौती को उजागर करता है। आपातकाल के दौरान, सरकारी तंत्र ने नागरिकों के अनुभवों से दूरी बना ली थी। यह दूरी कई कारणों से उत्पन्न हो सकती है:
- सत्ता की ऊँचाई: अक्सर शीर्ष पदों पर बैठे अधिकारी जमीनी हकीकत से कट जाते हैं क्योंकि उनका सीधा संपर्क आम जनता से कम हो जाता है।
- सूचना का फ़िल्टर होना: सूचना का प्रवाह नीचे से ऊपर की ओर जाते हुए कई स्तरों पर फ़िल्टर हो जाता है, जिससे वास्तविक स्थिति की सही तस्वीर सामने नहीं आ पाती।
- डर का माहौल: आपातकाल जैसे दमनकारी माहौल में, निचले स्तर के अधिकारी या जनता सच बताने से डरते हैं, जिससे उच्च अधिकारी गलत धारणाएँ बना लेते हैं।
- आत्मसंतुष्टि और जड़ता: कई बार अधिकारी अपने पद और विशेषाधिकारों में इतने रम जाते हैं कि वे बदलाव या नई वास्तविकताओं को स्वीकार करने से हिचकिचाते हैं।
यह ‘अनजान’ होना सिर्फ सूचना की कमी नहीं है, बल्कि यह एक मानसिकता को दर्शाता है जहाँ सहानुभूति, जवाबदेही और जन-केंद्रित शासन का अभाव होता है। एक प्रभावी सिविल सेवक वह है जो न केवल नीतियों को लागू करता है, बल्कि नागरिकों की नब्ज को भी समझता है, उनकी आकांक्षाओं और परेशानियों से वाकिफ होता है।
UPSC उम्मीदवारों के लिए महत्वपूर्ण सीख (A Comprehensive Guide for Aspirants)
डॉ. जयशंकर के अनुभव से यूपीएससी उम्मीदवार कई अमूल्य सबक सीख सकते हैं। यह सिर्फ परीक्षा पास करने के बारे में नहीं है, बल्कि एक जिम्मेदार और प्रभावी सिविल सेवक बनने के बारे में है।
1. ऐतिहासिक संदर्भ और समसामयिक समझ का महत्त्व
- क्यों पढ़ें इतिहास: आपातकाल जैसी घटनाएँ हमें शासन के खतरों, लोकतांत्रिक संस्थाओं की नाजुकता और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के महत्व को समझाती हैं। ये घटनाएँ हमें वर्तमान मुद्दों को बेहतर ढंग से समझने में मदद करती हैं (उदा. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, निजता का अधिकार)। जीएस पेपर 1 (इतिहास) और जीएस पेपर 2 (शासन) के लिए यह समझ महत्वपूर्ण है।
- समसामयिक घटनाओं का विश्लेषण: केवल समाचारों को रटना पर्याप्त नहीं है। महत्वपूर्ण घटनाओं के पीछे के कारणों, उनके विभिन्न पहलुओं (सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, नैतिक), और उनके संभावित परिणामों का विश्लेषण करना सीखें। यही आपको ‘अनजान’ होने से बचाएगा।
2. दबाव प्रबंधन और व्यक्तित्व विकास (Personality Test)
यूपीएससी इंटरव्यू (व्यक्तित्व परीक्षण) स्वयं एक ‘दबाव का इम्तिहान’ है। बोर्ड के सामने बैठना, अनपेक्षित प्रश्नों का सामना करना और अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन करना अत्यधिक दबाव भरा हो सकता है।
- मॉक इंटरव्यू का अभ्यास: यह आपको दबाव में बोलने, अपने विचारों को व्यवस्थित करने और अपनी कमजोरियों को पहचानने में मदद करेगा।
- आत्म-जागरूकता: अपनी strengths और weaknesses को जानें। अपनी हॉबीज, पृष्ठभूमि और विचारों को लेकर सहज रहें।
- सकारात्मक शारीरिक भाषा: आत्मविश्वास दिखाएँ। आँखों से संपर्क बनाएँ, सीधे बैठें, और अनावश्यक हरकतों से बचें।
- मानसिक दृढ़ता: योग, ध्यान या किसी भी अन्य तकनीक का उपयोग करें जो आपको शांत रहने में मदद करती है। याद रखें, इंटरव्यू में आप अपनी व्यक्तित्व का प्रदर्शन कर रहे हैं, न कि केवल ज्ञान का।
- ईमानदारी और नैतिक दृढ़ता: यदि आप किसी प्रश्न का उत्तर नहीं जानते, तो विनम्रतापूर्वक स्वीकार करें। अपनी मान्यताओं के प्रति ईमानदार रहें, बशर्ते वे संविधान के मूल्यों के अनुरूप हों।
जैसे एक कुम्हार मिट्टी को आग में तपाकर उसे मजबूत बनाता है, वैसे ही दबाव और चुनौती व्यक्ति के व्यक्तित्व को निखारती है। यह आपको केवल जानकारी नहीं देता, बल्कि आपको सीखने और अनुकूलन करने के लिए प्रेरित करता है।
3. जमीनी हकीकत की समझ और सहानुभूति
सिविल सेवक को ‘अनजान’ नहीं होना चाहिए। उसे देश के हर वर्ग की समस्याओं और आकांक्षाओं को समझना होगा।
- विविध समाचार स्रोतों का अध्ययन: केवल एक स्रोत पर निर्भर न रहें। विभिन्न दृष्टिकोणों को पढ़ें और समझें।
- क्षेत्रीय दौरे और लोगों से बातचीत: यदि संभव हो, तो अपने आसपास के ग्रामीण या वंचित क्षेत्रों का दौरा करें। लोगों से सीधे संवाद करें, उनकी कहानियाँ सुनें। यह आपको पाठ्यपुस्तकों से परे की समझ देगा।
- केस स्टडीज़ का विश्लेषण: सामाजिक समस्याओं, सरकारी योजनाओं और उनके प्रभाव से संबंधित केस स्टडीज़ पढ़ें। यह आपको समस्याओं को विभिन्न दृष्टिकोणों से देखने में मदद करेगा।
- सहानुभूति विकसित करें: सिर्फ तथ्यों को जानने से कुछ नहीं होगा; उन तथ्यों के पीछे के मानवीय पहलू को समझना महत्वपूर्ण है। यही आपको एक संवेदनहीन नौकरशाह बनने से रोकेगा।
4. प्रभावी संवाद कौशल
एक सिविल सेवक के लिए लिखना और बोलना दोनों ही महत्वपूर्ण हैं।
- लेखन अभ्यास: मेन्स परीक्षा के लिए उत्तर लेखन का नियमित अभ्यास करें। स्पष्ट, संक्षिप्त और सुसंगत उत्तर लिखना सीखें। यह आपको अपने विचारों को प्रभावी ढंग से व्यक्त करने में मदद करेगा।
- डिबेट्स और ग्रुप डिस्कशन में भाग लेना: यह आपके मौखिक संवाद कौशल को निखारेगा और आपको विभिन्न दृष्टिकोणों को सुनने और अपनी बात रखने में मदद करेगा।
- तटस्थता और वस्तुनिष्ठता: विवादित मुद्दों पर अपनी राय व्यक्त करते समय तटस्थ और वस्तुनिष्ठ रहें। भावनाओं के बजाय तथ्यों और तर्क पर आधारित रहें।
5. नैतिक मूल्यों का आंतरिककरण
आपातकाल एक ऐसा दौर था जब नैतिक मूल्यों और संवैधानिक सिद्धांतों को चुनौती दी गई थी। एक सिविल सेवक को इन मूल्यों का सच्चा प्रहरी होना चाहिए।
- संवैधानिक नैतिकता: संविधान के मूल सिद्धांतों – न्याय, स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और पंथनिरपेक्षता – को समझें और उनका पालन करें।
- नैतिकता (Ethics) पर ध्यान: जीएस पेपर 4 (Ethics, Integrity and Aptitude) को केवल एक विषय के रूप में न पढ़ें, बल्कि उसके सिद्धांतों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें। सत्यनिष्ठा, ईमानदारी, निष्पक्षता, निस्वार्थता जैसे गुण सिविल सेवक के लिए अनिवार्य हैं।
- जनसेवा की भावना: आपका अंतिम लक्ष्य जनता की सेवा करना और उनके जीवन को बेहतर बनाना होना चाहिए। यह भावना आपको किसी भी दबाव या प्रलोभन के सामने झुकने से रोकेगी।
सिविल सेवा में जमीनी हकीकत की समझ क्यों है अनिवार्य?
किसी भी नीति या कानून की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसे जमीनी स्तर पर कैसे लागू किया जाता है। यदि नीतियाँ बनाने वाले और उन्हें लागू करने वाले अधिकारी लोगों की वास्तविक समस्याओं और जरूरतों से अनजान होंगे, तो वे प्रभावी समाधान कभी नहीं दे पाएंगे।
- नीति निर्माण में दक्षता: जब अधिकारियों को जमीनी चुनौतियों की जानकारी होती है, तो वे ऐसी नीतियाँ बनाने में मदद कर सकते हैं जो यथार्थवादी और प्रभावी हों।
- कार्यान्वयन में सुधार: जमीनी समझ से नीतियों को बेहतर ढंग से लागू किया जा सकता है, बाधाओं को दूर किया जा सकता है और लक्षित लाभार्थियों तक लाभ पहुँचाया जा सकता है।
- जनता का विश्वास: जब अधिकारी जनता की समस्याओं को समझते हैं और सहानुभूति दिखाते हैं, तो इससे प्रशासन में जनता का विश्वास बढ़ता है।
- जवाबदेही: जमीनी हकीकत से जुड़ाव अधिकारियों को उनके कार्यों के प्रति अधिक जवाबदेह बनाता है।
- संकट प्रबंधन: प्राकृतिक आपदाओं, महामारियों या सामाजिक अशांति जैसी आपातकालीन स्थितियों में, जमीनी हकीकत की समझ अधिकारी को प्रभावी ढंग से प्रतिक्रिया देने और मानव जीवन को बचाने में मदद करती है।
जैसे एक डॉक्टर रोगी की नब्ज समझे बिना सही इलाज नहीं कर सकता, वैसे ही एक प्रशासक जनता की नब्ज समझे बिना प्रभावी शासन नहीं कर सकता। ‘अनजान’ रहना एक गंभीर प्रशासनिक चूक है जिसके परिणाम दूरगामी हो सकते हैं।
आगे की राह: एक संवेदनशील और प्रभावी नौकरशाही का निर्माण
डॉ. जयशंकर का अनुभव हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि हम कैसे एक ऐसी सिविल सेवा का निर्माण कर सकते हैं जो न केवल कुशल हो, बल्कि संवेदनशील, जवाबदेह और जमीनी हकीकत से जुड़ी हो।
- प्रशिक्षण में सुधार: सिविल सेवा प्रशिक्षण अकादमियों में केवल सैद्धांतिक ज्ञान पर नहीं, बल्कि व्यावहारिक अनुभव, जमीनी दौरे और सामुदायिक सहभागिता पर अधिक जोर दिया जाना चाहिए।
- नैतिकता पर निरंतर जोर: अधिकारियों को लगातार नैतिक दुविधाओं का सामना करना पड़ता है। उनके लिए नैतिक मूल्यों को आंतरिक बनाने और नैतिक निर्णयन कौशल को विकसित करने पर ध्यान देना आवश्यक है।
- प्रौद्योगिकी का बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग: प्रौद्योगिकी डेटा और सूचना तक पहुँच को बढ़ा सकती है, जिससे अधिकारियों को जमीनी हकीकत की बेहतर समझ मिल सकती है। हालांकि, तकनीक मानवीय संपर्क का विकल्प नहीं है।
- नागरिक-केंद्रित प्रशासन: प्रशासन को हमेशा नागरिकों की जरूरतों और अधिकारों को प्राथमिकता देनी चाहिए। यह सुनिश्चित करना कि नागरिक अपनी शिकायतें दर्ज करा सकें और उन पर कार्रवाई हो, आवश्यक है।
- संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता: सिविल सेवक को भारतीय संविधान के मूल सिद्धांतों और मूल्यों के प्रति अटूट प्रतिबद्धता रखनी चाहिए, विशेषकर जब उन पर राजनीतिक या अन्य प्रकार का दबाव हो।
डॉ. एस. जयशंकर का व्यक्तिगत अनुभव, आपातकाल के उस मुश्किल दौर से जुड़ा, यूपीएससी उम्मीदवारों के लिए एक प्रेरणा और एक चेतावनी दोनों है। यह हमें सिखाता है कि दबाव में भी कैसे शांत रहा जाए, प्रभावी ढंग से संवाद किया जाए और सबसे महत्वपूर्ण, देश की वास्तविक नब्ज को कैसे समझा जाए। एक सिविल सेवक का काम सिर्फ नियमों का पालन करना नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाना है। इसके लिए किताबी ज्ञान के साथ-साथ गहरी मानवीय समझ, सहानुभूति और अदम्य साहस की आवश्यकता होती है। यह ‘दबाव का अंतिम इम्तिहान’ ही है जो आपको एक साधारण उम्मीदवार से एक असाधारण लोक सेवक में बदलता है।
UPSC परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न (Practice Questions for UPSC Exam)
प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) – 10 MCQs
निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
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भारत में आपातकाल (Emergency) के संबंध में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- भारत में आंतरिक आपातकाल 25 जून 1975 को लगाया गया था।
- आपातकाल के दौरान, नागरिकों के मौलिक अधिकारों को पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया था।
- 42वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1976 ने संसद की सर्वोच्चता को स्थापित करने का प्रयास किया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल I और II
(b) केवल II और III
(c) केवल I और III
(d) I, II और III
उत्तर: (c) केवल I और III
व्याख्या: कथन I सही है, आपातकाल 25 जून 1975 को लगाया गया था। कथन III सही है, 42वें संशोधन ने संसद की शक्ति को बढ़ाया था। कथन II गलत है। मौलिक अधिकारों को निलंबित किया गया था, लेकिन “पूरी तरह से समाप्त” नहीं किया गया था; अनुच्छेद 20 और 21 के तहत अधिकार निलंबित नहीं किए जा सकते।
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42वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा भारतीय संविधान में किए गए प्रमुख परिवर्तनों में शामिल हैं:
- संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ और ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्द जोड़ना।
- नागरिकों के लिए मौलिक कर्तव्यों को जोड़ना।
- लोकसभा और राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल 5 वर्ष से घटाकर 4 वर्ष करना।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल I
(b) केवल I और II
(c) केवल II और III
(d) I, II और III
उत्तर: (b) केवल I और II
व्याख्या: कथन I और II सही हैं। 42वें संशोधन ने प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ और ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्द जोड़े तथा मौलिक कर्तव्यों को शामिल किया। कथन III गलत है, 42वें संशोधन ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल 5 से बढ़ाकर 6 वर्ष किया था, न कि घटाया था। बाद में 44वें संशोधन ने इसे फिर से 5 वर्ष कर दिया।
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आपातकाल के दौरान गठित किस समिति ने मौलिक कर्तव्यों को शामिल करने की सिफारिश की थी?
(a) सरकारिया आयोग
(b) स्वर्ण सिंह समिति
(c) पंछी आयोग
(d) कोठारी आयोग
उत्तर: (b) स्वर्ण सिंह समिति
व्याख्या: सरदार स्वर्ण सिंह समिति ने 42वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम के माध्यम से संविधान में मौलिक कर्तव्यों को शामिल करने की सिफारिश की थी।
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भारतीय संविधान का कौन-सा अनुच्छेद आंतरिक अशांति के आधार पर राष्ट्रीय आपातकाल लगाने का प्रावधान करता है?
(a) अनुच्छेद 352
(b) अनुच्छेद 356
(c) अनुच्छेद 360
(d) अनुच्छेद 365
उत्तर: (a) अनुच्छेद 352
व्याख्या: अनुच्छेद 352 राष्ट्रीय आपातकाल से संबंधित है, जो युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह (पहले ‘आंतरिक अशांति’ था, जिसे 44वें संशोधन द्वारा बदला गया) के आधार पर लगाया जा सकता है।
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44वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1978 के संबंध में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- इसने ‘आंतरिक अशांति’ शब्द को ‘सशस्त्र विद्रोह’ से प्रतिस्थापित किया।
- इसने संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार की सूची से हटा दिया।
- इसने अनुच्छेद 20 और 21 द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों को राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान भी निलंबित न किए जाने योग्य बनाया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल I
(b) केवल II और III
(c) केवल I और III
(d) I, II और III
उत्तर: (d) I, II और III
व्याख्या: 44वें संशोधन अधिनियम, 1978 ने आपातकाल के दौरान मौलिक अधिकारों के दुरुपयोग को रोकने के लिए कई महत्वपूर्ण बदलाव किए, जिनमें तीनों कथन शामिल हैं।
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सिविल सेवा के संदर्भ में ‘सहानुभूति’ (Empathy) का क्या महत्व है?
- यह अधिकारियों को जमीनी हकीकत को बेहतर ढंग से समझने में मदद करती है।
- यह नागरिकों में प्रशासन के प्रति विश्वास पैदा करती है।
- यह नीति निर्माण और कार्यान्वयन को अधिक जन-केंद्रित बनाती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल I
(b) केवल II
(c) केवल I और II
(d) I, II और III
उत्तर: (d) I, II और III
व्याख्या: तीनों कथन सही हैं। सहानुभूति एक सिविल सेवक के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण गुण है, जो उसे नागरिकों की समस्याओं को समझने, विश्वास बनाने और प्रभावी नीतियां बनाने में मदद करती है।
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यूपीएससी व्यक्तित्व परीक्षण (इंटरव्यू) में दबाव प्रबंधन कौशल का आकलन करने के लिए कौन सी तकनीकें सहायक हो सकती हैं?
- अनपेक्षित या तनावपूर्ण प्रश्न पूछना।
- उम्मीदवार की गैर-मौखिक संचार (Non-verbal communication) का अवलोकन करना।
- उम्मीदवार से किसी जटिल समस्या का तुरंत समाधान बताने को कहना।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल I और II
(b) केवल I और III
(c) केवल II और III
(d) I, II और III
उत्तर: (d) I, II और III
व्याख्या: तीनों तकनीकें इंटरव्यू बोर्ड द्वारा उम्मीदवार के दबाव प्रबंधन कौशल का आकलन करने के लिए उपयोग की जा सकती हैं। वे उम्मीदवार की सोचने की क्षमता, संयम और प्रतिक्रिया का तरीका दर्शाती हैं।
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निम्नलिखित में से कौन-सा/से ‘प्रभावी संवाद’ के प्रमुख घटकों में से है/हैं, विशेषकर संकट की स्थितियों में?
- स्पष्टता और संक्षिप्तता।
- आत्मविश्वास और संयम।
- सक्रिय श्रवण और सहानुभूति।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल I
(b) केवल I और II
(c) केवल II और III
(d) I, II और III
उत्तर: (d) I, II और III
व्याख्या: ये सभी प्रभावी संवाद के महत्वपूर्ण घटक हैं, खासकर दबाव या संकट की स्थितियों में जहां स्पष्टता, विश्वास और सुनने की क्षमता अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।
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‘अधिकारियों का देश के हालात से अनजान होना’ सिविल सेवा में किस प्रकार की चुनौती को दर्शाता है?
- सूचना के प्रवाह में बाधा।
- जमीनी हकीकत से जुड़ाव की कमी।
- नीति निर्माण में अकुशलता।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल I और II
(b) केवल II और III
(c) केवल I और III
(d) I, II और III
उत्तर: (d) I, II और III
व्याख्या: अधिकारियों का अनजान होना इन सभी चुनौतियों को दर्शाता है। सूचना की कमी से जमीनी हकीकत से जुड़ाव कम होता है, और यह अंततः अकुशल नीति निर्माण की ओर ले जाता है।
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आपातकाल के दौरान प्रेस की स्वतंत्रता पर लगाए गए प्रतिबंधों की जाँच के लिए किस समिति का गठन किया गया था?
(a) शाह आयोग
(b) खेड़ा समिति
(c) आर.एन. मल्होत्रा समिति
(d) विवेक देवराय समिति
उत्तर: (a) शाह आयोग
व्याख्या: आपातकाल की ज्यादतियों की जाँच के लिए 1977 में जनता पार्टी सरकार द्वारा न्यायमूर्ति जे.सी. शाह की अध्यक्षता में शाह आयोग का गठन किया गया था।
मुख्य परीक्षा (Mains)
- डॉ. एस. जयशंकर के आपातकाल के दौरान दिए गए इंटरव्यू के अनुभव को एक केस स्टडी के रूप में लेते हुए, सिविल सेवा में ‘दबाव प्रबंधन’ और ‘जमीनी हकीकत की समझ’ के महत्व का विश्लेषण कीजिए। आज के संदर्भ में एक प्रभावी लोक सेवक के लिए ये गुण कितने प्रासंगिक हैं?
- “अधिकारियों का देश के हालात से अनजान होना, एक गंभीर प्रशासनिक चूक है जिसके परिणाम दूरगामी हो सकते हैं।” इस कथन के आलोक में, आधुनिक सिविल सेवा में सूचना के प्रभावी प्रवाह, सहानुभूति और जन-केंद्रित शासन सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए?
- भारतीय लोकतंत्र में आपातकाल की अवधि एक महत्वपूर्ण मोड़ क्यों मानी जाती है? चर्चा कीजिए कि इस अवधि से सिविल सेवाओं के लिए क्या नैतिक और संस्थागत सबक सीखे जा सकते हैं।
- यूपीएससी व्यक्तित्व परीक्षण (इंटरव्यू) का उद्देश्य केवल ज्ञान का परीक्षण करना नहीं, बल्कि उम्मीदवार के व्यक्तित्व, दृष्टिकोण और व्यवहार का आकलन करना है। डॉ. जयशंकर के अनुभव को ध्यान में रखते हुए, एक सिविल सेवा उम्मीदवार के लिए दबाव में संवाद करने की कला और विभिन्न दृष्टिकोणों को समझने की क्षमता क्यों आवश्यक है?