समाजशास्त्र के महत्वपूर्ण प्रश्न: अपनी वैचारिक स्पष्टता को परखें
प्रिय उम्मीदवारों, “The Sociology Scholar” के साथ अपनी दैनिक बौद्धिक चुनौती के लिए तैयार हो जाइए! यह अभ्यास सेट आपके समाजशास्त्रीय ज्ञान की गहराई और वैचारिक स्पष्टता का परीक्षण करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। प्रमुख विचारकों से लेकर समकालीन सामाजिक मुद्दों तक, प्रत्येक प्रश्न आपको अपनी तैयारी का मूल्यांकन करने और अपनी विश्लेषणात्मक क्षमताओं को बढ़ाने में मदद करेगा। आइए, इन चुनौतीपूर्ण प्रश्नों के माध्यम से समाजशास्त्र की दुनिया में गोता लगाएँ और अपनी सफलता की नींव को और मजबूत करें।
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कार्ल मार्क्स के अनुसार, पूँजीवादी व्यवस्था में श्रमिकों का अलगाव (Alienation) किस कारण होता है?
- उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण
- उत्पाद से विच्छेद
- राजनीतिक भागीदारी
- सामाजिक एकजुटता
सही उत्तर: b
विस्तृत व्याख्या:
उत्पाद से विच्छेद (Alienation from the product) कार्ल मार्क्स के अलगाव के सिद्धांत का एक केंद्रीय पहलू है। मार्क्स के अनुसार, पूँजीवादी व्यवस्था में, श्रमिक अपने द्वारा उत्पादित वस्तुओं से अलग हो जाते हैं क्योंकि वे उन पर कोई स्वामित्व या नियंत्रण नहीं रखते हैं। उत्पादित वस्तुएँ पूँजीपति की संपत्ति बन जाती हैं, और श्रमिक केवल उन्हें बनाने की प्रक्रिया का एक साधन होते हैं। इससे श्रमिक को अपने श्रम के फल से अलगाव महसूस होता है।
- उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण: यह अलगाव का कारण नहीं, बल्कि इसका अभाव अलगाव की ओर ले जाता है।
- राजनीतिक भागीदारी: यह सीधे तौर पर मार्क्स के अलगाव के चार आयामों में से एक नहीं है, हालांकि राजनीतिक शक्तिहीनता अलगाव का एक परिणाम हो सकती है।
- सामाजिक एकजुटता: पूँजीवाद में अलगाव सामाजिक एकजुटता को कमजोर करता है, न कि इसका कारण बनता है।
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मैक्स वेबर के नौकरशाही (Bureaucracy) के आदर्श प्रारूप (Ideal Type) की कौन सी विशेषता नहीं है?
- पदानुक्रमित संरचना
- लिखित नियम और विनियम
- व्यक्तिगत संबंध
- अनैमनामिकता (Impersonality)
सही उत्तर: c
विस्तृत व्याख्या:
मैक्स वेबर ने नौकरशाही को आधुनिक तर्कसंगत समाजों की एक कुशल और तार्किक प्रशासनिक प्रणाली के रूप में वर्णित किया था। उनके आदर्श प्रारूप के अनुसार, नौकरशाही की मुख्य विशेषताओं में पदानुक्रमित संरचना, लिखित नियम और विनियम, अनैमनामिकता (निर्णय व्यक्तिगत भावनाओं के बजाय वस्तुनिष्ठ नियमों पर आधारित होते हैं) और विशेषीकरण शामिल हैं। व्यक्तिगत संबंध नौकरशाही की विशेषता नहीं हैं, बल्कि वे इसकी दक्षता और निष्पक्षता में बाधा डाल सकते हैं। नौकरशाही में निर्णय व्यक्तिपरक न होकर वस्तुनिष्ठ होते हैं।
- पदानुक्रमित संरचना: यह नौकरशाही की एक मूलभूत विशेषता है, जिसमें प्रत्येक निचले पद पर बैठा व्यक्ति अपने से ऊपर वाले के प्रति जवाबदेह होता है।
- लिखित नियम और विनियम: ये नौकरशाही के संचालन को मानकीकृत और अनुमानित बनाते हैं।
- अनैमनामिकता: इसका अर्थ है कि अधिकारी व्यक्ति-विशेष के प्रति नहीं, बल्कि पद और नियमों के प्रति कार्य करते हैं।
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एमिल दुर्खीम के अनुसार, समाज में ‘एनोमी’ (Anomie) की स्थिति कब उत्पन्न होती है?
- सामाजिक मानदंडों का अत्यधिक कठोर होना
- सामाजिक मानदंडों का कमजोर या अनुपस्थित होना
- उच्च सामाजिक एकजुटता
- व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अत्यधिक होना
सही उत्तर: b
विस्तृत व्याख्या:
एमिल दुर्खीम ने एनोमी (Anomie) की अवधारणा का उपयोग ऐसी स्थिति का वर्णन करने के लिए किया जब समाज में सामाजिक मानदंड (norms) कमजोर या अनुपस्थित होते हैं, जिससे व्यक्तियों को यह स्पष्ट नहीं होता कि उनसे क्या अपेक्षा की जाती है। यह सामाजिक नियंत्रण की कमी और व्यक्तियों में दिशाहीनता की भावना की ओर ले जाता है, अक्सर सामाजिक परिवर्तनों, आर्थिक संकटों या अन्य प्रमुख सामाजिक उथल-पुथल के दौरान देखा जाता है। दुर्खीम ने इसे आत्महत्या के विभिन्न प्रकारों में से एक (एनोमिक आत्महत्या) के साथ भी जोड़ा।
- सामाजिक मानदंडों का अत्यधिक कठोर होना: यह ‘फेटलिस्टिक’ (Fatalistic) आत्महत्या से संबंधित हो सकता है, लेकिन एनोमी से नहीं।
- उच्च सामाजिक एकजुटता: यह एनोमी के विपरीत है, क्योंकि यह समाज को स्थिरता प्रदान करती है।
- व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अत्यधिक होना: यह एनोमी का परिणाम हो सकता है, लेकिन इसका प्रत्यक्ष कारण नहीं है।
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टैल्कॉट पार्सन्स द्वारा प्रतिपादित ‘पैटर्न वेरिएबल’ (Pattern Variables) की अवधारणा किससे संबंधित है?
- सामाजिक गतिशीलता
- सामाजिक संरचना के विश्लेषण
- क्रिया के दोहरे आयाम
- सांस्कृतिक मूल्य
सही उत्तर: c
विस्तृत व्याख्या:
टैल्कॉट पार्सन्स ने पैटर्न वेरिएबल की अवधारणा को सामाजिक क्रिया (social action) के विश्लेषण के लिए एक उपकरण के रूप में विकसित किया। यह विकल्पों के एक सेट को संदर्भित करता है जिसका सामना व्यक्तियों को अपनी सामाजिक बातचीत में करना पड़ता है। ये पाँच द्वंद्वात्मक युग्म (जैसे विशिष्टता बनाम सार्वभौमिकता, भावनात्मकता बनाम भावनात्मक तटस्थता) यह समझने में मदद करते हैं कि व्यक्ति विभिन्न सामाजिक स्थितियों में कैसे कार्य करते हैं और विभिन्न सामाजिक संरचनाएं कैसे कार्य करती हैं। यह मूल रूप से व्यक्तिगत क्रिया के दोहरे आयामों को दर्शाता है।
- सामाजिक गतिशीलता: पार्सन्स के पैटर्न वेरिएबल सीधे तौर पर सामाजिक गतिशीलता से संबंधित नहीं हैं, हालांकि वे सामाजिक परिवर्तन के विश्लेषण में अप्रत्यक्ष रूप से उपयोगी हो सकते हैं।
- सामाजिक संरचना के विश्लेषण: हालांकि यह सामाजिक संरचना के विश्लेषण में सहायक होते हैं, मुख्य रूप से यह क्रिया के द्वंद्व को दर्शाते हैं।
- सांस्कृतिक मूल्य: पैटर्न वेरिएबल सांस्कृतिक मूल्यों को दर्शाते हैं, लेकिन अधिक व्यापक रूप से यह क्रिया के विकल्पों के बारे में है।
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रॉबर्ट के. मर्टन द्वारा ‘विचलन’ (Deviance) के अध्ययन में प्रस्तुत ‘नवीनता’ (Innovation) किस प्रकार के अनुकूलन को संदर्भित करती है?
- सांस्कृतिक लक्ष्यों और संस्थागत साधनों दोनों को स्वीकार करना
- सांस्कृतिक लक्ष्यों को स्वीकार करना, लेकिन संस्थागत साधनों को अस्वीकार करना
- सांस्कृतिक लक्ष्यों को अस्वीकार करना, लेकिन संस्थागत साधनों को स्वीकार करना
- सांस्कृतिक लक्ष्यों और संस्थागत साधनों दोनों को अस्वीकार करना
सही उत्तर: b
विस्तृत व्याख्या:
रॉबर्ट के. मर्टन ने अपनी ‘एनोमी सिद्धांत’ (Strain Theory) के तहत विचलन के पाँच प्रकारों का वर्णन किया। नवीनता (Innovation) एक प्रकार का अनुकूलन है जिसमें व्यक्ति समाज के सांस्कृतिक लक्ष्यों (जैसे धन, सफलता) को स्वीकार करते हैं, लेकिन उन्हें प्राप्त करने के लिए समाज द्वारा अनुमोदित संस्थागत साधनों (जैसे कड़ी मेहनत, शिक्षा) को अस्वीकार कर देते हैं या बाइपास करते हैं। इसके बजाय, वे अक्सर अवैध या अपरंपरागत साधनों का सहारा लेते हैं।
- सांस्कृतिक लक्ष्यों और संस्थागत साधनों दोनों को स्वीकार करना: यह ‘अनुरूपता’ (Conformity) है, विचलन नहीं।
- सांस्कृतिक लक्ष्यों को अस्वीकार करना, लेकिन संस्थागत साधनों को स्वीकार करना: यह ‘कर्मकांडवाद’ (Ritualism) है।
- सांस्कृतिक लक्ष्यों और संस्थागत साधनों दोनों को अस्वीकार करना: यह ‘पलायनवाद’ (Retreatism) है।
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जी.एच. मीड के ‘स्व’ (Self) के सिद्धांत में ‘मैं’ (I) और ‘मुझे’ (Me) की अवधारणाएँ क्या दर्शाती हैं?
- ‘मैं’ सामाजिक अपेक्षाएँ, ‘मुझे’ व्यक्तिगत प्रतिक्रिया
- ‘मैं’ व्यक्तिगत प्रतिक्रिया, ‘मुझे’ सामाजिक अपेक्षाएँ
- ‘मैं’ चेतन मन, ‘मुझे’ अचेतन मन
- ‘मैं’ जन्मजात प्रवृत्ति, ‘मुझे’ अर्जित व्यवहार
सही उत्तर: b
विस्तृत व्याख्या:
जॉर्ज हर्बर्ट मीड के प्रतीकात्मक अंतःक्रियावाद (Symbolic Interactionism) के सिद्धांत में, ‘मैं’ (I) व्यक्ति की तात्कालिक, सहज और रचनात्मक प्रतिक्रिया है जो सामाजिक अपेक्षाओं के प्रति आती है। यह व्यक्ति के ‘स्व’ का सहज, अनिश्चित और अपरंपरागत पहलू है। इसके विपरीत, ‘मुझे’ (Me) व्यक्ति के ‘स्व’ का वह हिस्सा है जो दूसरों की सामाजिक अपेक्षाओं और दृष्टिकोणों को आत्मसात करता है। यह ‘सामान्यीकृत अन्य’ (Generalized Other) के माध्यम से समाज के संगठित दृष्टिकोण को दर्शाता है। संक्षेप में, ‘मैं’ व्यक्तिगत प्रतिक्रिया है और ‘मुझे’ सामाजिक अपेक्षाएँ हैं।
- ‘मैं’ सामाजिक अपेक्षाएँ, ‘मुझे’ व्यक्तिगत प्रतिक्रिया: यह गलत है, क्योंकि ‘मैं’ व्यक्तिगत प्रतिक्रिया है।
- ‘मैं’ चेतन मन, ‘मुझे’ अचेतन मन: यह फ्रायड के सिद्धांतों से संबंधित है, मीड से नहीं।
- ‘मैं’ जन्मजात प्रवृत्ति, ‘मुझे’ अर्जित व्यवहार: यह गलत है और मीड के ‘स्व’ के सिद्धांत के सार को नहीं पकड़ता है।
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‘गुणात्मक शोध’ (Qualitative Research) की कौन सी विशेषता नहीं है?
- गहन अध्ययन
- संख्यात्मक डेटा पर ध्यान
- संदर्भ-विशिष्टता
- सहभागी अवलोकन
सही उत्तर: b
विस्तृत व्याख्या:
गुणात्मक शोध सामाजिक घटनाओं की गहराई और संदर्भ को समझने पर केंद्रित होता है। इसकी विशेषताओं में गहन अध्ययन, संदर्भ-विशिष्टता, सहभागी अवलोकन, साक्षात्कार और फोकस समूह जैसी विधियों का उपयोग शामिल है। गुणात्मक शोध मुख्य रूप से शब्दों, छवियों और अनुभवों पर आधारित होता है, न कि संख्यात्मक डेटा पर। संख्यात्मक डेटा पर ध्यान ‘मात्रात्मक शोध’ (Quantitative Research) की विशेषता है।
- गहन अध्ययन: गुणात्मक शोध का मुख्य उद्देश्य गहराई से समझना है।
- संदर्भ-विशिष्टता: यह मानता है कि सामाजिक घटनाएँ उनके संदर्भ में समझी जानी चाहिए।
- सहभागी अवलोकन: यह गुणात्मक शोध में एक महत्वपूर्ण विधि है।
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भारतीय समाज में ‘संस्कृतिकरण’ (Sanskritization) की अवधारणा किसने दी?
- एम.एन. श्रीनिवास
- ए.आर. देसाई
- घुरिए
- योगेन्द्र सिंह
सही उत्तर: a
विस्तृत व्याख्या:
एम.एन. श्रीनिवास ने ‘संस्कृतिकरण’ की अवधारणा प्रस्तुत की। यह उस प्रक्रिया को संदर्भित करता है जिसमें एक ‘निम्न’ जाति या जनजाति या अन्य समूह अपनी स्थिति को बढ़ाने के लिए ‘उच्च’ या ‘द्विज’ जाति के अनुष्ठानों, जीवन-शैली और प्रथाओं को अपनाता है। यह भारतीय समाज में सामाजिक गतिशीलता का एक महत्वपूर्ण रूप है।
- ए.आर. देसाई: मार्क्सवादी दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं।
- घुरिए: भारतीय समाजशास्त्र के अग्रणी, जाति पर उनके कार्य के लिए प्रसिद्ध।
- योगेन्द्र सिंह: भारतीय समाज में आधुनिकीकरण और सामाजिक परिवर्तन पर उनके कार्य के लिए जाने जाते हैं।
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‘डिजिटल विभाजन’ (Digital Divide) मुख्य रूप से किस असमानता को संदर्भित करता है?
- भौगोलिक विभाजन
- डिजिटल प्रौद्योगिकी तक पहुँच और उसके उपयोग में असमानता
- शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच सांस्कृतिक अंतर
- आर्थिक वर्गों के बीच राजनीतिक अंतर
सही उत्तर: b
विस्तृत व्याख्या:
डिजिटल विभाजन सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (ICT) जैसे इंटरनेट, कंप्यूटर और मोबाइल फोन तक पहुँच, उपयोग और लाभ प्राप्त करने में विभिन्न सामाजिक-आर्थिक समूहों या भौगोलिक क्षेत्रों के बीच की असमानता को संदर्भित करता है। यह आय, शिक्षा, उम्र, लिंग, जाति/नस्ल और भौगोलिक स्थान जैसे कारकों से प्रभावित होता है। यह अवधारणा इस बात पर प्रकाश डालती है कि कैसे कुछ समूह डिजिटल क्रांति से लाभान्वित हो रहे हैं जबकि अन्य पीछे छूट रहे हैं, जिससे नई सामाजिक असमानताएँ पैदा हो रही हैं।
- भौगोलिक विभाजन: डिजिटल विभाजन का एक पहलू हो सकता है, लेकिन यह केवल भौगोलिक नहीं है।
- शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच सांस्कृतिक अंतर: यह एक अलग अवधारणा है।
- आर्थिक वर्गों के बीच राजनीतिक अंतर: यह भी एक अलग अवधारणा है।
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समाजशास्त्र में ‘संदर्भ समूह’ (Reference Group) की अवधारणा का क्या अर्थ है?
- एक ऐसा समूह जिसका व्यक्ति सदस्य होता है
- एक ऐसा समूह जिसका व्यक्ति सदस्य नहीं होता, लेकिन उसकी जीवनशैली का अनुकरण करता है
- एक ऐसा समूह जो प्राथमिक संबंधों पर आधारित हो
- एक ऐसा समूह जो औपचारिक संरचना पर आधारित हो
सही उत्तर: b
विस्तृत व्याख्या:
संदर्भ समूह एक ऐसा समूह होता है जिसका व्यक्ति सदस्य हो भी सकता है और नहीं भी, लेकिन वह अपने व्यवहार, मूल्यों, दृष्टिकोण और आत्म-छवि को आकार देने के लिए उस समूह को एक मानक के रूप में उपयोग करता है। यह वह समूह है जिससे व्यक्ति अपनी स्थिति का मूल्यांकन करता है और जिसकी आकांक्षा करता है। रॉबर्ट के. मर्टन ने इस अवधारणा को लोकप्रिय बनाया।
- एक ऐसा समूह जिसका व्यक्ति सदस्य होता है: यह एक ‘सदस्यता समूह’ (Membership Group) है।
- एक ऐसा समूह जो प्राथमिक संबंधों पर आधारित हो: यह ‘प्राथमिक समूह’ (Primary Group) है।
- एक ऐसा समूह जो औपचारिक संरचना पर आधारित हो: यह ‘द्वितीयक समूह’ (Secondary Group) है।
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हालिया शोध में सामने आया है कि सोशल मीडिया एल्गोरिदम सार्वजनिक राय को प्रभावित कर सकते हैं। यह समाजशास्त्र की किस उप-शाखा के अध्ययन का विषय है?
- ग्रामीण समाजशास्त्र
- पर्यावरण समाजशास्त्र
- संचार और मीडिया समाजशास्त्र
- शिक्षा का समाजशास्त्र
सही उत्तर: c
विस्तृत व्याख्या:
सोशल मीडिया एल्गोरिदम द्वारा सार्वजनिक राय को प्रभावित करने का अध्ययन संचार और मीडिया समाजशास्त्र का एक महत्वपूर्ण विषय है। यह उप-शाखा जनसंचार माध्यमों (समाचार, सोशल मीडिया, इंटरनेट) और उनके सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रभावों का विश्लेषण करती है, जिसमें राय निर्माण, एजेंडा-सेटिंग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म की भूमिका शामिल है।
- ग्रामीण समाजशास्त्र: ग्रामीण जीवन और समुदायों का अध्ययन करता है।
- पर्यावरण समाजशास्त्र: मानव समाजों और प्राकृतिक पर्यावरण के बीच संबंधों का अध्ययन करता है।
- शिक्षा का समाजशास्त्र: शिक्षा प्रणाली और उसके सामाजिक प्रभावों का अध्ययन करता है।
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पियरे बोर्डियो द्वारा प्रस्तुत ‘हैबिटस’ (Habitus) की अवधारणा क्या दर्शाती है?
- व्यक्ति की जन्मजात प्रवृत्तियाँ
- सामाजिक रूप से निर्मित स्वभाव और व्यवहार पैटर्न
- भौतिक वस्तुओं का संग्रह
- सामाजिक स्थिति का बाहरी प्रदर्शन
सही उत्तर: b
विस्तृत व्याख्या:
पियरे बोर्डियो का हैबिटस (Habitus) एक केंद्रीय अवधारणा है जो सामाजिक रूप से वातानुकूलित स्वभावों की एक प्रणाली को संदर्भित करता है। यह अतीत के अनुभवों और सामाजिक संरचनाओं द्वारा आकार दिए गए व्यवहार, सोच और धारणा के पैटर्न हैं। हैबिटस हमारे कार्यों, निर्णयों और स्वाद को निर्देशित करता है, जिससे यह सामाजिक संरचनाओं और व्यक्तिगत एजेंसी के बीच एक कड़ी के रूप में कार्य करता है। यह व्यक्ति के भीतर सामाजिक दुनिया के अंतरीकरण (internalization) को दर्शाता है।
- व्यक्ति की जन्मजात प्रवृत्तियाँ: हैबिटस जन्मजात नहीं, बल्कि अर्जित होता है।
- भौतिक वस्तुओं का संग्रह: यह ‘आर्थिक पूंजी’ या ‘भौतिक संस्कृति’ से अधिक संबंधित है।
- सामाजिक स्थिति का बाहरी प्रदर्शन: यह ‘स्थिति प्रतीक’ (Status Symbol) से संबंधित है, हैबिटस से नहीं।
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‘प्राथमिक समूह’ (Primary Group) की विशेषता क्या है?
- अव्यक्त (Impersonal) संबंध
- अप्रत्यक्ष संचार
- घनिष्ठ और व्यक्तिगत संबंध
- विशिष्ट लक्ष्य उन्मुख
सही उत्तर: c
विस्तृत व्याख्या:
चार्ल्स कूले द्वारा प्रतिपादित प्राथमिक समूह छोटे सामाजिक समूह होते हैं जिनकी विशेषता घनिष्ठ और व्यक्तिगत संबंध, आमने-सामने की बातचीत और मजबूत भावनात्मक बंधन होते हैं। परिवार, दोस्तों का समूह और पड़ोस प्राथमिक समूह के उदाहरण हैं। ये समूह व्यक्तियों के समाजीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- अव्यक्त संबंध: यह द्वितीयक समूहों की विशेषता है।
- अप्रत्यक्ष संचार: यह भी द्वितीयक समूहों की विशेषता है।
- विशिष्ट लक्ष्य उन्मुख: यह द्वितीयक समूहों की विशेषता है।
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भारत में जाति व्यवस्था की ‘शुद्धता और प्रदूषण’ (Purity and Pollution) की अवधारणा पर किसने जोर दिया?
- एम.एन. श्रीनिवास
- लुई ड्यूमोंट
- योगेन्द्र सिंह
- आंद्रे बेतेई
सही उत्तर: b
विस्तृत व्याख्या:
फ्रांसीसी समाजशास्त्री लुई ड्यूमोंट ने अपनी पुस्तक ‘होमो हायरार्किकस’ (Homo Hierarchicus) में भारतीय जाति व्यवस्था को समझने के लिए ‘शुद्धता और प्रदूषण’ की अवधारणा को केंद्रीय माना। उनके अनुसार, यह धार्मिक पदानुक्रमित सिद्धांत भारतीय जाति व्यवस्था की विशेषता है, जहाँ उच्च जातियाँ शुद्ध मानी जाती हैं और निम्न जातियाँ प्रदूषित।
- एम.एन. श्रीनिवास: संस्कृतीकरण और प्रभुत्व जाति के लिए जाने जाते हैं।
- योगेन्द्र सिंह: आधुनिकीकरण और सामाजिक परिवर्तन के लिए जाने जाते हैं।
- आंद्रे बेतेई: जाति, वर्ग और शक्ति पर उनके कार्य के लिए जाने जाते हैं।
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‘प्रतीकात्मक अंतःक्रियावाद’ (Symbolic Interactionism) का मुख्य ध्यान किस पर है?
- समाज की वृहद संरचनाएँ
- छोटे पैमाने पर सामाजिक अंतःक्रियाएँ और अर्थ
- समाज में शक्ति संघर्ष
- सामाजिक मानदंडों का कार्य
सही उत्तर: b
विस्तृत व्याख्या:
प्रतीकात्मक अंतःक्रियावाद एक सूक्ष्म-स्तरीय परिप्रेक्ष्य है जो व्यक्तियों के बीच की छोटी पैमाने पर सामाजिक अंतःक्रियाओं और उनके द्वारा निर्मित और व्याख्या किए गए अर्थों पर केंद्रित है। यह मानता है कि हम प्रतीकों (भाषा, संकेत, हावभाव) के माध्यम से एक-दूसरे के साथ बातचीत करते हैं और इन प्रतीकों के अर्थ हमारे सामाजिक अनुभवों के माध्यम से विकसित होते हैं। जॉर्ज हर्बर्ट मीड और हर्बर्ट ब्लूमर इस दृष्टिकोण से जुड़े प्रमुख विचारक हैं।
- समाज की वृहद संरचनाएँ: यह संरचनात्मक कार्यात्मकता और संघर्ष सिद्धांत जैसे वृहद-स्तरीय परिप्रेक्ष्यों का ध्यान केंद्रित है।
- समाज में शक्ति संघर्ष: यह संघर्ष सिद्धांत का मुख्य ध्यान है।
- सामाजिक मानदंडों का कार्य: यह कार्यात्मकतावाद का एक पहलू है।
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‘घोषणात्मक कार्य’ (Manifest Function) और ‘अघोषणात्मक कार्य’ (Latent Function) की अवधारणाएँ किसने दीं?
- मैक्स वेबर
- एमिल दुर्खीम
- रॉबर्ट के. मर्टन
- टैल्कॉट पार्सन्स
सही उत्तर: c
विस्तृत व्याख्या:
रॉबर्ट के. मर्टन ने इन दो अवधारणाओं को कार्यात्मकतावादी विश्लेषण में जोड़ा। घोषणात्मक कार्य (Manifest Function) किसी सामाजिक पैटर्न के वे उद्देश्यपूर्ण और मान्यता प्राप्त परिणाम होते हैं। उदाहरण के लिए, कॉलेज का घोषणात्मक कार्य शिक्षा प्रदान करना है। अघोषणात्मक कार्य (Latent Function) किसी सामाजिक पैटर्न के वे अपरिचित और अनपेक्षित परिणाम होते हैं। उदाहरण के लिए, कॉलेज का अघोषणात्मक कार्य विवाह के साथी खोजना है।
- मैक्स वेबर: नौकरशाही और सामाजिक क्रिया के लिए जाने जाते हैं।
- एमिल दुर्खीम: सामाजिक तथ्य और एनोमी के लिए जाने जाते हैं।
- टैल्कॉट पार्सन्स: सामाजिक व्यवस्था और पैटर्न वेरिएबल के लिए जाने जाते हैं।
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समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से, “पुलिसिंग” (Policing) को अक्सर किस प्रकार के सामाजिक नियंत्रण के रूप में देखा जाता है?
- अनौपचारिक नियंत्रण
- कानूनी या औपचारिक नियंत्रण
- सांस्कृतिक नियंत्रण
- नैतिक नियंत्रण
सही उत्तर: b
विस्तृत व्याख्या:
पुलिसिंग समाज में व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए एक कानूनी या औपचारिक नियंत्रण तंत्र का एक प्रमुख उदाहरण है। यह राज्य द्वारा स्थापित संस्थाओं (पुलिस बलों) द्वारा कानून और व्यवस्था बनाए रखने, अपराध को रोकने और पता लगाने के लिए लागू किया जाता है। अनौपचारिक नियंत्रण मित्रों, परिवार और समुदाय के माध्यम से होता है, जबकि औपचारिक नियंत्रण में कानून, न्यायालय और पुलिस जैसे संस्थागत साधन शामिल होते हैं।
- अनौपचारिक नियंत्रण: परिवार, दोस्तों, समुदाय द्वारा लागू होता है।
- सांस्कृतिक नियंत्रण: सामाजिक मानदंडों और मूल्यों के माध्यम से होता है।
- नैतिक नियंत्रण: व्यक्तिगत नैतिकता और विवेक से संबंधित है।
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एफ.जी. बेली ने अपनी पुस्तक ‘ट्राइब, कास्ट एंड नेशन’ में किस क्षेत्र का अध्ययन किया?
- ओडिशा
- राजस्थान
- उत्तर प्रदेश
- केरल
सही उत्तर: a
विस्तृत व्याख्या:
एफ.जी. बेली (F.G. Bailey) ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘ट्राइब, कास्ट एंड नेशन: ए स्टडी ऑफ पॉलिटिकल एक्टिविटी एंड पॉलिटिकल चेंज इन हाईलैंड ओडिशा’ में ओडिशा के कोंध आदिवासियों और जाति व्यवस्था का अध्ययन किया। उनका कार्य सामाजिक परिवर्तन और स्थानीय राजनीति को समझने में एक महत्वपूर्ण योगदान है।
- अन्य विकल्प गलत हैं क्योंकि बेली का विशिष्ट अध्ययन क्षेत्र ओडिशा था।
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एंटोनी गिडेंस के अनुसार, ‘संरचनाकरण सिद्धांत’ (Structuration Theory) क्या है?
- समाज केवल संरचनाओं द्वारा निर्धारित होता है
- व्यक्ति केवल अपनी इच्छा से कार्य करते हैं
- संरचना और एजेंसी के बीच द्वंद्वात्मक संबंध
- केवल आर्थिक कारक समाज को आकार देते हैं
सही उत्तर: c
विस्तृत व्याख्या:
एंटोनी गिडेंस का संरचनाकरण सिद्धांत (Structuration Theory) इस विचार पर आधारित है कि समाज की संरचनाएँ और व्यक्तिगत एजेंसी (व्यक्तिगत क्रियाएँ) एक-दूसरे से अविभाज्य रूप से जुड़ी हुई हैं और परस्पर निर्भर हैं। संरचनाएँ क्रिया को संभव बनाती हैं और प्रतिबंधित करती हैं, जबकि क्रियाएँ समय के साथ संरचनाओं का पुनरुत्पादन या परिवर्तन करती हैं। यह समाजशास्त्र में संरचना-एजेंसी बहस को संबोधित करने का एक प्रयास है।
- समाज केवल संरचनाओं द्वारा निर्धारित होता है: यह अति-संरचनावादी दृष्टिकोण है।
- व्यक्ति केवल अपनी इच्छा से कार्य करते हैं: यह अति-एजेंसीवादी दृष्टिकोण है।
- केवल आर्थिक कारक समाज को आकार देते हैं: यह मार्क्सवादी आर्थिक निर्धारणवाद से अधिक संबंधित है।
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‘सामाजिक स्तरीकरण’ (Social Stratification) से क्या तात्पर्य है?
- समाज में व्यक्तियों का क्षैतिज विभाजन
- समाज में व्यक्तियों का पदानुक्रमित विभाजन
- केवल आर्थिक असमानता
- केवल राजनीतिक असमानता
सही उत्तर: b
विस्तृत व्याख्या:
सामाजिक स्तरीकरण समाज में व्यक्तियों और समूहों का एक पदानुक्रमित विभाजन है, जिसमें उन्हें संसाधनों, शक्ति और प्रतिष्ठा के आधार पर विभिन्न स्तरों या परतों में रखा जाता है। यह असमानता का एक व्यवस्थित और संस्थागत रूप है, जो वर्ग, जाति, लिंग, नस्ल जैसे विभिन्न आधारों पर हो सकता है।
- समाज में व्यक्तियों का क्षैतिज विभाजन: यह स्तरीकरण नहीं है; स्तरीकरण हमेशा ऊर्ध्वाधर या पदानुक्रमित होता है।
- केवल आर्थिक असमानता: स्तरीकरण में आर्थिक असमानता (वर्ग) शामिल है, लेकिन यह केवल आर्थिक नहीं है; इसमें सामाजिक (स्थिति) और राजनीतिक (शक्ति) आयाम भी होते हैं, जैसा कि मैक्स वेबर ने बताया।
- केवल राजनीतिक असमानता: यह भी स्तरीकरण का एक घटक है, लेकिन स्तरीकरण केवल राजनीतिक नहीं है।
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‘आत्म-दर्पण दर्शन’ (Looking-Glass Self) की अवधारणा किसने विकसित की?
- जी.एच. मीड
- चार्ल्स कूले
- एर्विन गॉफमैन
- सिग्मंड फ्रायड
सही उत्तर: b
विस्तृत व्याख्या:
चार्ल्स कूले ने ‘आत्म-दर्पण दर्शन’ (Looking-Glass Self) की अवधारणा दी। इस सिद्धांत के अनुसार, हम दूसरों की आँखों से खुद को देखते हैं और उनकी प्रतिक्रियाओं के आधार पर अपनी आत्म-छवि विकसित करते हैं। इसमें तीन मुख्य तत्व शामिल हैं: (1) हम कल्पना करते हैं कि हम दूसरों के सामने कैसे दिखते हैं, (2) हम कल्पना करते हैं कि दूसरे हमारे बारे में क्या न्याय करते हैं, और (3) हम इन कथित निर्णयों के आधार पर आत्म-भावना (गर्व या अपमान) विकसित करते हैं।
- जी.एच. मीड: ‘स्व’ (Self) के सिद्धांत और ‘मैं’ व ‘मुझे’ की अवधारणाओं के लिए जाने जाते हैं।
- एर्विन गॉफमैन: नाटकीय दृष्टिकोण (Dramaturgical Approach) के लिए जाने जाते हैं।
- सिग्मंड फ्रायड: मनोविज्ञान में अचेतन मन और मनोविश्लेषण के लिए जाने जाते हैं।
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भारत में ‘ग्रामीन-नगरीय सातत्य’ (Rural-Urban Continuum) की अवधारणा का उपयोग किस संदर्भ में किया जाता है?
- ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच कठोर विभाजन
- ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच स्पष्ट सांस्कृतिक अंतर
- ग्रामीण से शहरी विशेषताओं की क्रमिक निरंतरता
- केवल आर्थिक विकास का मापन
सही उत्तर: c
विस्तृत व्याख्या:
ग्रामीन-नगरीय सातत्य (Rural-Urban Continuum) की अवधारणा यह मानती है कि ग्रामीण और शहरी क्षेत्र दो अलग-अलग ध्रुव नहीं हैं, बल्कि वे एक निरंतरता पर स्थित हैं जहाँ ग्रामीण विशेषताओं से शहरी विशेषताओं की ओर एक क्रमिक परिवर्तन होता है। यह विभाजन के बजाय निरंतरता और मिश्रण पर जोर देता है, विशेषकर भारत जैसे देशों में जहाँ ग्रामीण और शहरी जीवन के बीच कई ओवरलैप पाए जाते हैं।
- ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच कठोर विभाजन: यह सातत्य के विचार के विपरीत है।
- ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच स्पष्ट सांस्कृतिक अंतर: सातत्य का अर्थ है कि ये अंतर धुंधले होते जाते हैं।
- केवल आर्थिक विकास का मापन: यह अवधारणा सामाजिक और सांस्कृतिक विशेषताओं को भी शामिल करती है।
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‘धर्मनिरपेक्षीकरण’ (Secularization) की प्रक्रिया का क्या अर्थ है?
- धर्म का समाज में प्रभुत्व बढ़ना
- धर्म का व्यक्ति के जीवन से पूरी तरह समाप्त हो जाना
- धर्म का सामाजिक जीवन के विभिन्न पहलुओं से प्रभाव कम होना
- राज्य द्वारा सभी धर्मों को समान सम्मान देना
सही उत्तर: c
विस्तृत व्याख्या:
धर्मनिरपेक्षीकरण (Secularization) एक समाजशास्त्रीय प्रक्रिया है जिसमें धर्म का सामाजिक जीवन के विभिन्न पहलुओं (जैसे राजनीति, शिक्षा, विज्ञान) से प्रभाव कम होता जाता है और धार्मिक विश्वास व संस्थाएँ समाज में अपनी केंद्रीय भूमिका खोने लगती हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि धर्म पूरी तरह से समाप्त हो जाता है, बल्कि यह सार्वजनिक क्षेत्र से निजी क्षेत्र की ओर बढ़ता है।
- धर्म का समाज में प्रभुत्व बढ़ना: यह धर्मनिरपेक्षीकरण के विपरीत है।
- धर्म का व्यक्ति के जीवन से पूरी तरह समाप्त हो जाना: धर्मनिरपेक्षीकरण का यह मतलब नहीं है कि व्यक्तिगत धर्म समाप्त हो जाए।
- राज्य द्वारा सभी धर्मों को समान सम्मान देना: यह भारतीय संविधान में ‘धर्मनिरपेक्षता’ की अवधारणा से संबंधित है, जो एक राजनीतिक सिद्धांत है, जबकि समाजशास्त्रीय ‘धर्मनिरपेक्षीकरण’ एक सामाजिक प्रक्रिया है।
-
‘नस्लीय विविधता’ (Racial Diversity) का उच्च शिक्षा संस्थानों में बेहतर अकादमिक परिणामों से जुड़ा होना किस अवधारणा से संबंधित है?
- सामाजिक अलगाव
- सामाजिक पूंजी
- सामाजिक एकीकरण
- सामाजिक विघटन
सही उत्तर: c
विस्तृत व्याख्या:
हालिया शोध से पता चला है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में नस्लीय विविधता बेहतर अकादमिक परिणामों और व्यापक पेशेवर नेटवर्क से जुड़ी है। यह सामाजिक एकीकरण (Social Integration) की अवधारणा से संबंधित है, जहाँ विभिन्न पृष्ठभूमि और दृष्टिकोण वाले व्यक्तियों का समावेश सीखने के माहौल को समृद्ध करता है, आलोचनात्मक सोच को बढ़ावा देता है, और विविध समुदायों के साथ जुड़ने की क्षमता को बढ़ाता है। इससे छात्रों को विभिन्न दृष्टिकोणों को समझने में मदद मिलती है, जो उनके अकादमिक और पेशेवर जीवन दोनों के लिए फायदेमंद होता है।
- सामाजिक अलगाव: यह सामाजिक एकीकरण के विपरीत है और नकारात्मक परिणाम देता है।
- सामाजिक पूंजी: यह सामाजिक नेटवर्क और उनसे प्राप्त होने वाले लाभों को संदर्भित करती है, जो विविधता से बन सकती है लेकिन यह मुख्य अवधारणा नहीं है।
- सामाजिक विघटन: यह समाज में मानदंडों और संरचनाओं के टूटने को संदर्भित करता है और नकारात्मक परिणाम देता है।
-
एर्विन गॉफमैन का ‘नाटकीय दृष्टिकोण’ (Dramaturgical Approach) समाज को कैसे देखता है?
- एक वर्ग संघर्ष के अखाड़े के रूप में
- एक बड़े सामाजिक नाटक या रंगमंच के रूप में
- एक जैविक प्रणाली के रूप में
- एक तर्कसंगत विनिमय प्रणाली के रूप में
सही उत्तर: b
विस्तृत व्याख्या:
एर्विन गॉफमैन ने अपने ‘नाटकीय दृष्टिकोण’ (Dramaturgical Approach) में सामाजिक अंतःक्रिया को एक बड़े सामाजिक नाटक या रंगमंच के रूपक के माध्यम से देखा। उनके अनुसार, व्यक्ति अभिनेता होते हैं जो अपनी पहचान और धारणाओं को प्रबंधित करने के लिए विभिन्न भूमिकाएँ निभाते हैं और अपने प्रदर्शनों को दर्शकों के सामने प्रस्तुत करते हैं (जिसे ‘इम्प्रेशन मैनेजमेंट’ कहते हैं)। ‘फ्रंट स्टेज’ और ‘बैक स्टेज’ जैसे अवधारणाएँ इस दृष्टिकोण का हिस्सा हैं।
- एक वर्ग संघर्ष के अखाड़े के रूप में: यह मार्क्सवादी सिद्धांत का परिप्रेक्ष्य है।
- एक जैविक प्रणाली के रूप में: यह शुरुआती कार्यात्मकतावादी विचारों से संबंधित हो सकता है।
- एक तर्कसंगत विनिमय प्रणाली के रूप में: यह विनिमय सिद्धांत से संबंधित है।
-
‘ग्राम स्वराज’ की अवधारणा किसने प्रतिपादित की?
- बी.आर. अम्बेडकर
- महात्मा गांधी
- जवाहरलाल नेहरू
- राम मनोहर लोहिया
सही उत्तर: b
विस्तृत व्याख्या:
महात्मा गांधी ने ‘ग्राम स्वराज’ की अवधारणा को प्रतिपादित किया। उनके आदर्श ग्राम स्वराज का अर्थ था एक स्व-शासित, आत्मनिर्भर ग्रामीण गणतंत्र जिसमें सभी लोग सद्भाव में रहते हैं और अपनी आवश्यकताओं को स्वयं पूरा करते हैं। यह अवधारणा स्थानीय स्वशासन और विकेन्द्रीकृत सत्ता के उनके दर्शन का केंद्रीय हिस्सा थी।
- बी.आर. अम्बेडकर: दलित आंदोलन और संविधान निर्माण में उनके योगदान के लिए जाने जाते हैं।
- जवाहरलाल नेहरू: भारत के पहले प्रधानमंत्री और मिश्रित अर्थव्यवस्था के समर्थक थे।
- राम मनोहर लोहिया: समाजवादी विचारों और जाति व्यवस्था के विरोध के लिए जाने जाते हैं।
-
फ्रेंच समाजशास्त्री ऑगस्ट कॉम्टे को अक्सर किसका जनक कहा जाता है?
- मानवशास्त्र
- अर्थशास्त्र
- समाजशास्त्र
- राजनीति विज्ञान
सही उत्तर: c
विस्तृत व्याख्या:
ऑगस्ट कॉम्टे को व्यापक रूप से ‘समाजशास्त्र’ का जनक माना जाता है। उन्होंने ही ‘समाजशास्त्र’ शब्द गढ़ा और वैज्ञानिक पद्धतियों का उपयोग करके सामाजिक घटनाओं का अध्ययन करने का प्रस्ताव रखा, जिसे उन्होंने ‘सकारात्मकता’ (Positivism) कहा। उनका मानना था कि समाज का अध्ययन विज्ञान के समान सिद्धांतों का उपयोग करके किया जा सकता है।
- अन्य विकल्प गलत हैं क्योंकि कॉम्टे का मुख्य योगदान समाजशास्त्र के क्षेत्र में था।
-
‘सामाजिक गतिशीलता’ (Social Mobility) की अवधारणा का क्या अर्थ है?
- एक स्थान से दूसरे स्थान पर शारीरिक गति
- सामाजिक पदानुक्रम में व्यक्ति या समूह की स्थिति में परिवर्तन
- सामाजिक मानदंडों में परिवर्तन
- केवल आर्थिक स्थिति में परिवर्तन
सही उत्तर: b
विस्तृत व्याख्या:
सामाजिक गतिशीलता (Social Mobility) समाजशास्त्रीय अवधारणा है जो सामाजिक पदानुक्रम में किसी व्यक्ति या समूह की स्थिति में परिवर्तन को संदर्भित करती है। यह ऊर्ध्वाधर (ऊपर या नीचे की ओर, जैसे पदोन्नति या पदावनति) या क्षैतिज (समान स्तर पर एक स्थिति से दूसरी स्थिति में) हो सकती है। यह किसी समाज में खुलेपन और अवसर की सीमा को दर्शाती है।
- एक स्थान से दूसरे स्थान पर शारीरिक गति: यह भौगोलिक गतिशीलता है, सामाजिक गतिशीलता नहीं।
- सामाजिक मानदंडों में परिवर्तन: यह ‘सामाजिक परिवर्तन’ है।
- केवल आर्थिक स्थिति में परिवर्तन: सामाजिक गतिशीलता में आर्थिक के साथ-साथ सामाजिक प्रतिष्ठा और शक्ति में भी परिवर्तन शामिल होता है।
-
निम्नलिखित में से कौन ‘जनसांख्यिकी’ (Demography) का अध्ययन क्षेत्र नहीं है?
- जन्म दर
- मृत्यु दर
- प्रवास
- व्यक्तिगत मनोविज्ञान
सही उत्तर: d
विस्तृत व्याख्या:
जनसांख्यिकी (Demography) मानव आबादी के आकार, संरचना और वितरण के सांख्यिकीय अध्ययन से संबंधित है। इसके मुख्य अध्ययन क्षेत्रों में जन्म दर, मृत्यु दर, प्रवास और जनसंख्या वृद्धि या कमी के पैटर्न शामिल हैं। व्यक्तिगत मनोविज्ञान व्यक्ति के मानसिक प्रक्रियाओं और व्यवहार का अध्ययन करता है, जो जनसांख्यिकी का प्रत्यक्ष अध्ययन क्षेत्र नहीं है।
- जन्म दर, मृत्यु दर, प्रवास: ये सभी जनसांख्यिकी के प्रमुख अध्ययन क्षेत्र हैं।
-
‘आधुनिकता’ (Modernity) की एक प्रमुख विशेषता क्या है?
- परंपरा पर अत्यधिक निर्भरता
- तर्कसंगतता और विज्ञान पर जोर
- स्थिर सामाजिक संरचनाएँ
- सामुदायिक पहचान का प्रभुत्व
सही उत्तर: b
विस्तृत व्याख्या:
आधुनिकता (Modernity) एक ऐतिहासिक और सामाजिक युग को संदर्भित करती है जिसकी विशेषता तर्कसंगतता, विज्ञान, औद्योगीकरण, शहरीकरण और व्यक्तिगत स्वायत्तता पर जोर है। यह परंपरा से अलगाव और प्रगति में विश्वास से चिह्नित है। इसमें सामाजिक और राजनीतिक संस्थानों का भी तर्कसंगतकरण होता है।
- परंपरा पर अत्यधिक निर्भरता: यह आधुनिकता की विशेषता नहीं, बल्कि इसके विपरीत है।
- स्थिर सामाजिक संरचनाएँ: आधुनिक समाजों में सामाजिक परिवर्तन की उच्च दर होती है।
- सामुदायिक पहचान का प्रभुत्व: आधुनिकता अक्सर व्यक्तिगत पहचान और सार्वभौमिकता की ओर बढ़ती है।
-
भारत में ‘परिवार नियोजन’ (Family Planning) कार्यक्रम की शुरुआत किस दशक में हुई?
- 1940 के दशक
- 1950 के दशक
- 1960 के दशक
- 1970 के दशक
सही उत्तर: b
विस्तृत व्याख्या:
भारत दुनिया का पहला देश था जिसने 1952 में (1950 के दशक) एक राष्ट्रीय स्तर का परिवार नियोजन कार्यक्रम शुरू किया। इसका उद्देश्य जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करना और मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य में सुधार करना था। यह कार्यक्रम समय के साथ विकसित हुआ है, और अब इसे ‘परिवार कल्याण’ कार्यक्रम के रूप में जाना जाता है।
- अन्य विकल्प गलत हैं क्योंकि कार्यक्रम 1950 के दशक की शुरुआत में शुरू हुआ था।
-
सामाजिक शोध में ‘प्रमाणीकरण’ (Validity) से क्या तात्पर्य है?
- शोध के परिणामों की पुनरावृत्ति
- शोध उपकरण का वह मापन जो वह मापने का दावा करता है
- शोध डेटा की मात्रा
- शोधकर्ता का नैतिक आचरण
सही उत्तर: b
विस्तृत व्याख्या:
सामाजिक शोध में ‘प्रमाणीकरण’ (Validity) से तात्पर्य है कि एक शोध उपकरण वास्तव में वही माप रहा है जो वह मापने का दावा करता है। उदाहरण के लिए, यदि आप ‘खुशी’ को मापना चाहते हैं, तो आपका उपकरण वास्तव में खुशी को मापना चाहिए, न कि केवल ‘जीवन संतुष्टि’ को। यह शोध की गुणवत्ता का एक महत्वपूर्ण पहलू है।
- शोध के परिणामों की पुनरावृत्ति: यह ‘विश्वसनीयता’ (Reliability) से संबंधित है।
- शोध डेटा की मात्रा: यह डेटा के आकार से संबंधित है, वैधता से नहीं।
- शोधकर्ता का नैतिक आचरण: यह शोध नैतिकता से संबंधित है।
-
निम्नलिखित में से कौन ‘उत्तर-आधुनिकता’ (Postmodernity) की एक विशेषता है?
- महान आख्यानों (Grand Narratives) में विश्वास
- वस्तुनिष्ठ सत्य पर जोर
- संदेहवाद और विविध दृष्टिकोणों को स्वीकार करना
- स्थिर पहचान और संरचनाएँ
सही उत्तर: c
विस्तृत व्याख्या:
उत्तर-आधुनिकता (Postmodernity) एक सामाजिक-सांस्कृतिक स्थिति है जिसकी विशेषता संदेहवाद, महान आख्यानों (जैसे विज्ञान, प्रगति) में अविश्वास और विभिन्न दृष्टिकोणों तथा बहुलवाद को स्वीकार करना है। यह वस्तुनिष्ठ सत्य के दावों को खारिज करती है और मानता है कि ज्ञान संदर्भ-निर्भर और सामाजिक रूप से निर्मित होता है।
- महान आख्यानों में विश्वास: यह आधुनिकता की विशेषता है।
- वस्तुनिष्ठ सत्य पर जोर: यह आधुनिकता और सकारात्मकता की विशेषता है।
- स्थिर पहचान और संरचनाएँ: उत्तर-आधुनिकता पहचान की तरलता और सामाजिक संरचनाओं के विखंडन पर जोर देती है।
-
‘सामाजिक पूंजी’ (Social Capital) की अवधारणा किसने विकसित की?
- रॉबर्ट पुटनाम
- मैक्स वेबर
- पीटर बर्गर
- जुरगेन हेबरमास
सही उत्तर: a
विस्तृत व्याख्या:
हालांकि कई समाजशास्त्रियों ने ‘सामाजिक पूंजी’ की अवधारणा पर काम किया है (जैसे पियरे बोर्डियो और जेम्स कोलमैन), इसे लोकप्रिय बनाने और नागरिक जुड़ाव के संदर्भ में इसे व्यापक रूप से लागू करने का श्रेय रॉबर्ट पुटनाम को जाता है। सामाजिक पूंजी से तात्पर्य उन संसाधनों से है जो व्यक्तियों को उनके सामाजिक नेटवर्क के माध्यम से उपलब्ध होते हैं, जैसे विश्वास, मानदंड और नेटवर्क जो सामूहिक कार्रवाई को सुविधाजनक बनाते हैं।
- मैक्स वेबर: नौकरशाही और सामाजिक क्रिया के लिए जाने जाते हैं।
- पीटर बर्गर: सामाजिक वास्तविकता के निर्माण पर उनके कार्य के लिए जाने जाते हैं।
- जुरगेन हेबरमास: संचारशील क्रिया और सार्वजनिक क्षेत्र के लिए जाने जाते हैं।
-
भारत में ‘पंचायत राज’ व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य क्या है?
- केंद्र सरकार को मजबूत करना
- स्थानीय स्वशासन और ग्रामीण विकास
- शहरी क्षेत्रों में पुलिस बल को मजबूत करना
- न्यायपालिका को मजबूत करना
सही उत्तर: b
विस्तृत व्याख्या:
भारत में ‘पंचायत राज’ व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य स्थानीय स्वशासन और ग्रामीण विकास को बढ़ावा देना है। यह 73वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1992 के माध्यम से स्थापित किया गया था ताकि ग्रामीण स्तर पर लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण सुनिश्चित किया जा सके और स्थानीय समुदायों को अपनी समस्याओं को हल करने और अपने विकास में भाग लेने में सक्षम बनाया जा सके।
- केंद्र सरकार को मजबूत करना: पंचायत राज विकेंद्रीकरण के लिए है, केंद्र के केंद्रीकरण के लिए नहीं।
- शहरी क्षेत्रों में पुलिस बल को मजबूत करना: यह शहरी स्थानीय निकायों और कानून व्यवस्था से संबंधित है, पंचायत राज से नहीं।
- न्यायपालिका को मजबूत करना: यह न्यायपालिका की संरचना से संबंधित है।
-
‘सामाजिक तथ्य’ (Social Fact) की अवधारणा किसने प्रस्तुत की?
- मैक्स वेबर
- एमिल दुर्खीम
- कार्ल मार्क्स
- जॉर्ज सिमेल
सही उत्तर: b
विस्तृत व्याख्या:
एमिल दुर्खीम ने ‘सामाजिक तथ्य’ (Social Fact) की अवधारणा को समाजशास्त्र के अध्ययन की केंद्रीय वस्तु के रूप में प्रस्तुत किया। उनके अनुसार, सामाजिक तथ्य वे सोचने, महसूस करने और कार्य करने के तरीके हैं जो व्यक्ति से बाहरी होते हैं और उन पर एक बाध्यकारी शक्ति रखते हैं। वे व्यक्तिगत चेतना से स्वतंत्र होते हुए भी व्यक्तियों के व्यवहार को नियंत्रित करते हैं। उदाहरणों में कानून, नैतिकता, विश्वास, रीति-रिवाज आदि शामिल हैं।
- मैक्स वेबर: सामाजिक क्रिया और आदर्श प्रारूप के लिए जाने जाते हैं।
- कार्ल मार्क्स: वर्ग संघर्ष और अलगाव के लिए जाने जाते हैं।
- जॉर्ज सिमेल: रूपवादी समाजशास्त्र और सामाजिक अंतःक्रिया के लिए जाने जाते हैं।
-
‘भारत में गाँवों का समाजशास्त्र’ (Sociology of Villages in India) पर किसने विस्तृत कार्य किया?
- एस.सी. दुबे
- आंद्रे बेतेई
- डेविड हार्डीमैन
- रामचंद्र गुहा
सही उत्तर: a
विस्तृत व्याख्या:
एस.सी. दुबे (श्यामा चरण दुबे) भारतीय समाजशास्त्र के एक प्रमुख व्यक्ति थे, जिन्होंने भारत में गाँवों के विस्तृत अध्ययन, विशेषकर उनकी पुस्तक ‘इंडियन विलेज’ के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने ग्रामीण भारत की सामाजिक संरचना, संस्कृति और परिवर्तन पर गहन अंतर्दृष्टि प्रदान की।
- आंद्रे बेतेई: जाति, वर्ग और शक्ति पर उनके सैद्धांतिक कार्यों के लिए जाने जाते हैं।
- डेविड हार्डीमैन: गांधीवादी आंदोलनों और भारतीय इतिहास पर कार्य के लिए जाने जाते हैं।
- रामचंद्र गुहा: आधुनिक भारतीय इतिहास और पर्यावरण इतिहास पर उनके कार्य के लिए जाने जाते हैं।
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