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समाजशास्त्र के महत्वपूर्ण प्रश्न: अपनी वैचारिक स्पष्टता को परखें

समाजशास्त्र के महत्वपूर्ण प्रश्न: अपनी वैचारिक स्पष्टता को परखें

प्रिय उम्मीदवारों, ‘The Sociology Scholar’ के दैनिक क्विज़ में आपका स्वागत है! आज का अभ्यास सेट समाजशास्त्र की गहरी अवधारणाओं, प्रमुख विचारकों और समकालीन सामाजिक मुद्दों पर आधारित है। यह क्विज़ आपकी तैयारी को और धार देगा और आपको प्रमुख प्रतियोगी परीक्षाओं (UGC-NET, UPSC, State PSCs) में सफलता प्राप्त करने में मदद करेगा। अपनी वैचारिक स्पष्टता का परीक्षण करें और नए ज्ञान के साथ अपनी समझ को मजबूत करें।


1. प्रश्न: कार्ल मार्क्स के अनुसार, ‘अलगाव’ (Alienation) की अवधारणा का प्राथमिक कारण क्या है?

  1. उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण का अभाव
  2. राजनीतिक स्वतंत्रता का अभाव
  3. धार्मिक विश्वासों का पतन
  4. सामाजिक पहचान का नुकसान

सही उत्तर: a

विस्तृत व्याख्या:

कार्ल मार्क्स के अनुसार, ‘अलगाव’ (Alienation) पूंजीवादी व्यवस्था की एक मूलभूत विशेषता है जहाँ श्रमिक उत्पादन प्रक्रिया, उत्पाद, अपने सहकर्मियों और अपनी स्वयं की ‘प्रजाति-सार’ (species-essence) से विमुख हो जाते हैं। इसका प्राथमिक कारण उत्पादन के साधनों पर श्रमिकों का नियंत्रण न होना और उनके श्रम का शोषण होना है। श्रमिक केवल एक वस्तु बन जाता है, अपने काम में कोई खुशी या रचनात्मकता नहीं पाता। मार्क्स ने अपनी कृति ‘1844 के आर्थिक और दार्शनिक हस्तलेख’ (Economic and Philosophic Manuscripts of 1844) में इस अवधारणा को विस्तार से समझाया है।

  • a) उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण का अभाव: यह अलगाव का मूल कारण है, क्योंकि यह श्रमिकों को उनके श्रम और उसके फल से अलग करता है।
  • b) राजनीतिक स्वतंत्रता का अभाव: यद्यपि यह भी एक समस्या हो सकती है, मार्क्स के विश्लेषण में आर्थिक शोषण और उत्पादन के साधनों से अलगाव केंद्रीय है।
  • c) धार्मिक विश्वासों का पतन: मार्क्स ने धर्म को “जनता की अफीम” कहा था, लेकिन यह अलगाव का प्राथमिक कारण नहीं, बल्कि उसका एक लक्षण या परिणाम हो सकता है।
  • d) सामाजिक पहचान का नुकसान: यह अलगाव का एक परिणाम है, कारण नहीं। उत्पादन प्रक्रिया में वस्तुकरण के कारण श्रमिक अपनी मानवीय पहचान खो देते हैं।

2. प्रश्न: मैक्स वेबर द्वारा प्रतिपादित ‘तर्कसंगतता’ (Rationalization) की अवधारणा का मुख्य अर्थ क्या है?

  1. परंपरागत मूल्यों की प्रधानता
  2. तर्क और दक्षता पर आधारित सामाजिक संगठन
  3. धार्मिक अनुष्ठानों का प्रसार
  4. व्यक्तिगत भावनाओं का महत्व

सही उत्तर: b

विस्तृत व्याख्या:

मैक्स वेबर के अनुसार, ‘तर्कसंगतता’ (Rationalization) एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा आधुनिक समाज दक्षता, गणना और तर्क के आधार पर संगठित होते हैं, बजाय परंपरा, भावना या अंधविश्वास के। यह नौकरशाही, विज्ञान और पूंजीवाद के विकास में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। वेबर ने इसे पश्चिमी समाज की एक विशिष्ट विशेषता के रूप में देखा और ‘प्रोटेस्टेंट नैतिकता और पूंजीवाद की भावना’ (The Protestant Ethic and the Spirit of Capitalism) जैसी कृतियों में इस पर चर्चा की।

  • a) परंपरागत मूल्यों की प्रधानता: तर्कसंगतता परंपरा के विपरीत है।
  • b) तर्क और दक्षता पर आधारित सामाजिक संगठन: यह तर्कसंगतता का मूल है।
  • c) धार्मिक अनुष्ठानों का प्रसार: यह परंपरा से अधिक संबंधित हो सकता है, तर्कसंगतता से नहीं।
  • d) व्यक्तिगत भावनाओं का महत्व: तर्कसंगतता अक्सर भावनाओं को गौण करती है।

3. प्रश्न: दुर्खीम के अनुसार, ‘एनोमी’ (Anomie) की स्थिति तब उत्पन्न होती है जब:

  1. समाज में सामाजिक मानदंडों का अभाव या अस्पष्टता होती है।
  2. व्यक्तिगत स्वतंत्रता बहुत अधिक हो जाती है।
  3. आर्थिक समानता स्थापित हो जाती है।
  4. धार्मिक सहिष्णुता बढ़ जाती है।

सही उत्तर: a

विस्तृत व्याख्या:

एमिल दुर्खीम ने ‘एनोमी’ (Anomie) की अवधारणा को अपनी कृति ‘आत्महत्या’ (Suicide) में प्रस्तुत किया। यह एक ऐसी सामाजिक स्थिति है जिसमें सामाजिक मानदंड (norms) कमजोर, अस्पष्ट या अप्रभावी हो जाते हैं, जिससे व्यक्तियों को मार्गदर्शन की कमी महसूस होती है। यह अक्सर तीव्र सामाजिक परिवर्तन या आर्थिक संकट के समय होता है, जिसके परिणामस्वरूप सामाजिक नियंत्रण में कमी आती है और व्यक्तियों में अनिश्चितता और असंतोष बढ़ता है।

  • a) समाज में सामाजिक मानदंडों का अभाव या अस्पष्टता होती है: यह एनोमी की सटीक परिभाषा है।
  • b) व्यक्तिगत स्वतंत्रता बहुत अधिक हो जाती है: यह ‘अहंवादी आत्महत्या’ से संबंधित हो सकता है, लेकिन सीधे एनोमी से नहीं, जो मानदंडों की कमी से जुड़ा है।
  • c) आर्थिक समानता स्थापित हो जाती है: यह एनोमी का कारण नहीं है, बल्कि इसके विपरीत, सामाजिक स्थिरता में योगदान कर सकता है।
  • d) धार्मिक सहिष्णुता बढ़ जाती है: इसका एनोमी से सीधा संबंध नहीं है।

4. प्रश्न: प्रतीकात्मक अंतःक्रियावाद (Symbolic Interactionism) के प्रमुख प्रतिपादकों में से कौन हैं?

  1. टैल्कॉट पार्सन्स
  2. रॉबर्ट के. मर्टन
  3. जॉर्ज हर्बर्ट मीड
  4. अल्फ्रेड शूत्ज़

सही उत्तर: c

विस्तृत व्याख्या:

प्रतीकात्मक अंतःक्रियावाद (Symbolic Interactionism) एक समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य है जो व्यक्तियों के बीच अर्थों, प्रतीकों और अंतःक्रियाओं पर केंद्रित है। जॉर्ज हर्बर्ट मीड (George Herbert Mead) को इस सिद्धांत का जनक माना जाता है, हालांकि हर्बर्ट ब्लूमर ने ‘प्रतीकात्मक अंतःक्रियावाद’ शब्द गढ़ा। मीड ने ‘स्व’ (self) और ‘समाज’ (society) के निर्माण में भाषा और प्रतीकों की भूमिका पर जोर दिया।

  • a) टैल्कॉट पार्सन्स: संरचनात्मक-प्रकार्यवादी हैं।
  • b) रॉबर्ट के. मर्टन: संरचनात्मक-प्रकार्यवादी हैं।
  • c) जॉर्ज हर्बर्ट मीड: प्रतीकात्मक अंतःक्रियावाद के प्रमुख विचारक हैं।
  • d) अल्फ्रेड शूत्ज़: घटना-क्रिया विज्ञान (Phenomenology) से संबंधित हैं।

5. प्रश्न: ‘द सोशल कंस्ट्रक्शन ऑफ रियलिटी’ (The Social Construction of Reality) पुस्तक के लेखक कौन हैं, जो सामाजिक निर्माणवाद की अवधारणा पर केंद्रित है?

  1. पीटर बर्गर और थॉमस लकमैन
  2. इर्विंग गॉफमैन
  3. हेरोल्ड गारफिन्केल
  4. अल्बर्टो मेलुची

सही उत्तर: a

विस्तृत व्याख्या:

‘द सोशल कंस्ट्रक्शन ऑफ रियलिटी: अ ट्रीटीज इन द सोशियोलॉजी ऑफ नॉलेज’ (The Social Construction of Reality: A Treatise in the Sociology of Knowledge) पीटर बर्गर (Peter L. Berger) और थॉमस लकमैन (Thomas Luckmann) द्वारा 1966 में लिखी गई एक प्रभावशाली पुस्तक है। यह पुस्तक ज्ञान के समाजशास्त्र में एक मौलिक कार्य है, जिसमें तर्क दिया गया है कि वास्तविकता का निर्माण सामाजिक अंतःक्रियाओं के माध्यम से होता है और इसे व्यक्तिपरक अर्थों से भरा जाता है।

  • a) पीटर बर्गर और थॉमस लकमैन: सामाजिक निर्माणवाद के प्रमुख प्रतिपादक।
  • b) इर्विंग गॉफमैन: नाटकीयता (Dramaturgy) और कुल संस्थाओं (Total Institutions) पर उनके काम के लिए जाने जाते हैं।
  • c) हेरोल्ड गारफिन्केल: लोक-पद्धति विज्ञान (Ethnomethodology) के जनक हैं।
  • d) अल्बर्टो मेलुची: नए सामाजिक आंदोलनों पर अपने काम के लिए जाने जाते हैं।

6. प्रश्न: ‘स्ट्रक्चरल फंक्शनलिज्म’ (Structural Functionalism) परिप्रेक्ष्य के अनुसार, समाज को कैसे देखा जाता है?

  1. शक्ति संघर्षों का क्षेत्र
  2. आपसी अंतःक्रियाओं का योग
  3. परस्पर जुड़े हुए भागों की एक जटिल प्रणाली
  4. व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मंच

सही उत्तर: c

विस्तृत व्याख्या:

संरचनात्मक प्रकार्यवाद (Structural Functionalism) एक समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य है जो समाज को एक जटिल प्रणाली के रूप में देखता है जिसके भाग परस्पर जुड़े हुए हैं और प्रत्येक का अपना एक विशिष्ट कार्य है जो पूरे समाज की स्थिरता और निरंतरता में योगदान देता है। एमाइल दुर्खीम, टैल्कॉट पार्सन्स और रॉबर्ट के. मर्टन इसके प्रमुख विचारक हैं।

  • a) शक्ति संघर्षों का क्षेत्र: यह संघर्ष परिप्रेक्ष्य (Conflict Perspective) से संबंधित है।
  • b) आपसी अंतःक्रियाओं का योग: यह प्रतीकात्मक अंतःक्रियावाद (Symbolic Interactionism) से अधिक संबंधित है।
  • c) परस्पर जुड़े हुए भागों की एक जटिल प्रणाली: यह संरचनात्मक प्रकार्यवाद का मुख्य विचार है।
  • d) व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मंच: यह व्यक्तिवाद से संबंधित है, समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य से नहीं।

7. प्रश्न: भारत में ‘डिजिटल डिवाइड’ (Digital Divide) का मुख्य कारण क्या है?

  1. इंटरनेट की उपलब्धता का अभाव
  2. तकनीकी साक्षरता का अभाव
  3. आर्थिक असमानता
  4. उपरोक्त सभी

सही उत्तर: d

विस्तृत व्याख्या:

भारत में ‘डिजिटल डिवाइड’ (Digital Divide) या ‘डिजिटल असमानता’ का अर्थ सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (ICT) तक पहुंच, उपयोग और ज्ञान में मौजूद अंतर से है। इसके कई अंतर्निहित कारण हैं, जिनमें ग्रामीण-शहरी विभाजन, आय असमानता, शिक्षा का स्तर, लिंग भेद, आयु और शारीरिक अक्षमता शामिल हैं।

  • a) इंटरनेट की उपलब्धता का अभाव: ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में इंटरनेट कनेक्टिविटी और बुनियादी ढांचे की कमी एक बड़ा कारण है।
  • b) तकनीकी साक्षरता का अभाव: डिजिटल उपकरणों का उपयोग करने और ऑनलाइन जानकारी तक पहुंचने के लिए आवश्यक कौशल और ज्ञान की कमी।
  • c) आर्थिक असमानता: स्मार्टफोन, कंप्यूटर और इंटरनेट सेवाओं की उच्च लागत के कारण निम्न-आय वर्ग के लोग इन तक पहुंच नहीं पाते।
  • d) उपरोक्त सभी: ये सभी कारक मिलकर भारत में डिजिटल डिवाइड को बढ़ावा देते हैं, जिससे एक बड़ा सामाजिक मुद्दा बनता है जो शिक्षा, रोजगार और सूचना तक पहुंच को प्रभावित करता है।

8. प्रश्न: ग्रामीण समाजशास्त्र (Rural Sociology) में ‘जेमिनशाफ्ट’ (Gemeinschaft) और ‘गेज़ेलशाफ्ट’ (Gesellschaft) की अवधारणाएं किसने प्रस्तुत कीं?

  1. फर्डिनेंड टोनिस
  2. हेनरी मेन
  3. रॉबर्ट रेडफील्ड
  4. एस.सी. दुबे

सही उत्तर: a

विस्तृत व्याख्या:

फर्डिनेंड टोनिस (Ferdinand Tönnies) ने अपनी कृति ‘गेमिनशाफ्ट और गेज़ेलशाफ्ट’ (Gemeinschaft und Gesellschaft, 1887) में इन दो अवधारणाओं का प्रतिपादन किया। ‘जेमिनशाफ्ट’ समुदाय-आधारित, व्यक्तिगत संबंधों, परंपरा और साझा मूल्यों वाले छोटे, घनिष्ठ समाजों को संदर्भित करता है (जैसे ग्रामीण समुदाय)। ‘गेज़ेलशाफ्ट’ इसके विपरीत, बड़े, शहरी, अवैयक्तिक और तर्कसंगत-अनुबंध-आधारित समाजों को संदर्भित करता है।

  • a) फर्डिनेंड टोनिस: इन अवधारणाओं के जनक।
  • b) हेनरी मेन: स्थिति (Status) से अनुबंध (Contract) के समाज के संक्रमण के सिद्धांत के लिए जाने जाते हैं।
  • c) रॉबर्ट रेडफील्ड: लोक-शहरी सातत्य (Folk-Urban Continuum) पर अपने काम के लिए जाने जाते हैं।
  • d) एस.सी. दुबे: भारतीय गांवों के अध्ययन के लिए जाने जाते हैं।

9. प्रश्न: ‘घोषित कार्य’ (Manifest Function) और ‘अघोषित कार्य’ (Latent Function) की अवधारणा किसने विकसित की?

  1. डेविड एमिल दुर्खीम
  2. रॉबर्ट के. मर्टन
  3. टैल्कॉट पार्सन्स
  4. लेविस कोसर

सही उत्तर: b

विस्तृत व्याख्या:

रॉबर्ट के. मर्टन (Robert K. Merton) ने संरचनात्मक प्रकार्यवाद में योगदान करते हुए ‘घोषित कार्य’ (Manifest Function) और ‘अघोषित कार्य’ (Latent Function) की अवधारणाओं को विकसित किया। घोषित कार्य वे उद्देश्यपूर्ण और मान्यता प्राप्त परिणाम होते हैं जो सामाजिक क्रियाओं या संस्थाओं से अपेक्षित होते हैं। अघोषित कार्य वे अनपेक्षित और अक्सर अनजाने परिणाम होते हैं जो इन क्रियाओं या संस्थाओं से उत्पन्न होते हैं। उदाहरण के लिए, शिक्षा का घोषित कार्य ज्ञान प्रदान करना है, जबकि उसका अघोषित कार्य सामाजिक संपर्क और डेटिंग के अवसर प्रदान करना हो सकता है।

  • a) डेविड एमिल दुर्खीम: प्रकार्यवाद के संस्थापक, लेकिन विशेष रूप से इन अवधारणाओं के लिए मर्टन जाने जाते हैं।
  • b) रॉबर्ट के. मर्टन: इन अवधारणाओं के प्रतिपादक।
  • c) टैल्कॉट पार्सन्स: एक अन्य प्रमुख प्रकार्यवादी विचारक।
  • d) लेविस कोसर: संघर्ष सिद्धांतकार हैं।

10. प्रश्न: भारत में ‘जाति व्यवस्था’ (Caste System) की प्रमुख विशेषता क्या नहीं है?

  1. जन्म आधारित सदस्यता
  2. पेशे का वंशागत निर्धारण
  3. अंतर्विवाह (Endogamy)
  4. सामाजिक गतिशीलता की पूर्ण अनुपस्थिति

सही उत्तर: d

विस्तृत व्याख्या:

जाति व्यवस्था भारतीय समाज की एक स्तरीकृत प्रणाली है जिसमें व्यक्तियों को जन्म से एक विशिष्ट समूह में रखा जाता है। इसकी मुख्य विशेषताओं में पदानुक्रम, अंतर्विवाह (अपने ही जाति समूह में विवाह), पेशे का वंशागत निर्धारण और खान-पान, सामाजिक मेलजोल पर प्रतिबंध शामिल हैं। यद्यपि यह एक कठोर प्रणाली है, आधुनिक संदर्भों और इतिहास में भी पूर्ण सामाजिक गतिशीलता की अनुपस्थिति का दावा करना गलत होगा। ‘संस्कृतिकरण’ (Sanskritization) जैसी प्रक्रियाओं ने कुछ हद तक गतिशीलता दिखाई है।

  • a) जन्म आधारित सदस्यता: यह जाति व्यवस्था की एक मूल विशेषता है।
  • b) पेशे का वंशागत निर्धारण: पारंपरिक जाति व्यवस्था में पेशे अक्सर वंशानुगत होते थे।
  • c) अंतर्विवाह (Endogamy): अपनी ही जाति के भीतर विवाह करना जाति व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण नियम है।
  • d) सामाजिक गतिशीलता की पूर्ण अनुपस्थिति: यह दावा पूर्णतः सही नहीं है। भले ही गतिशीलता सीमित और धीमी हो, लेकिन आधुनिकता और संस्कृतिकरण जैसी प्रक्रियाओं के कारण पूर्ण अनुपस्थिति कहना अतिशयोक्ति होगी।

11. प्रश्न: ‘प्रच्छन्न बेरोजगारी’ (Disguised Unemployment) का अर्थ क्या है?

  1. जब लोग जानबूझकर काम नहीं करते हैं।
  2. जब अधिक लोग काम में लगे होते हैं, जबकि कम लोग भी वही उत्पादन कर सकते हैं।
  3. जब लोग अपनी योग्यता से कम स्तर का काम करते हैं।
  4. जब मौसमी कारणों से लोग बेरोजगार होते हैं।

सही उत्तर: b

विस्तृत व्याख्या:

प्रच्छन्न बेरोजगारी (Disguised Unemployment) तब होती है जब किसी काम में आवश्यकता से अधिक लोग लगे होते हैं, और यदि उनमें से कुछ को हटा दिया जाए तो भी कुल उत्पादन पर कोई फर्क नहीं पड़ता। यह अक्सर कृषि क्षेत्र में देखा जाता है जहाँ एक ही खेत पर पूरे परिवार के सदस्य काम करते हैं, जबकि वास्तव में उतने लोगों की आवश्यकता नहीं होती। यह एक प्रकार की अदृश्य बेरोजगारी है।

  • a) जब लोग जानबूझकर काम नहीं करते हैं: यह स्वैच्छिक बेरोजगारी है।
  • b) जब अधिक लोग काम में लगे होते हैं, जबकि कम लोग भी वही उत्पादन कर सकते हैं: यह प्रच्छन्न बेरोजगारी की सटीक परिभाषा है।
  • c) जब लोग अपनी योग्यता से कम स्तर का काम करते हैं: यह अल्प-रोजगार (Underemployment) है।
  • d) जब मौसमी कारणों से लोग बेरोजगार होते हैं: यह मौसमी बेरोजगारी है।

12. प्रश्न: समाजशास्त्र में ‘पॉजिटिविज्म’ (Positivism) के संस्थापक के रूप में किसे जाना जाता है?

  1. कार्ल मार्क्स
  2. एमिल दुर्खीम
  3. ऑगस्ट कॉम्टे
  4. मैक्स वेबर

सही उत्तर: c

विस्तृत व्याख्या:

ऑगस्ट कॉम्टे (Auguste Comte) को ‘समाजशास्त्र का जनक’ और ‘पॉजिटिविज्म’ (प्रत्यक्षवाद) का संस्थापक माना जाता है। उन्होंने तर्क दिया कि समाज का अध्ययन प्राकृतिक विज्ञानों के समान वैज्ञानिक तरीकों का उपयोग करके किया जाना चाहिए, जिसमें अवलोकन, प्रयोग और तुलना शामिल है, ताकि सामाजिक घटनाओं के सार्वभौमिक नियमों की खोज की जा सके। उनकी कृति ‘कोर्स ऑफ पॉजिटिव फिलॉसफी’ (Course of Positive Philosophy) इस विचार को प्रस्तुत करती है।

  • a) कार्ल मार्क्स: संघर्ष सिद्धांतकार हैं।
  • b) एमिल दुर्खीम: प्रकार्यवाद के प्रमुख विचारक, जिन्होंने समाजशास्त्र को एक अकादमिक अनुशासन के रूप में स्थापित किया, लेकिन पॉजिटिविज्म के संस्थापक कॉम्टे हैं।
  • c) ऑगस्ट कॉम्टे: पॉजिटिविज्म के संस्थापक।
  • d) मैक्स वेबर: व्याख्यात्मक समाजशास्त्र (Interpretive Sociology) पर जोर दिया।

13. प्रश्न: भारतीय समाज में ‘संस्कृतिकरण’ (Sanskritization) की अवधारणा किसने प्रस्तुत की?

  1. एम.एन. श्रीनिवास
  2. आंद्रे बेतेई
  3. जी.एस. घुरिये
  4. योगेंद्र सिंह

सही उत्तर: a

विस्तृत व्याख्या:

एम.एन. श्रीनिवास (M.N. Srinivas) ने ‘संस्कृतिकरण’ (Sanskritization) की अवधारणा को अपनी पुस्तक ‘रिलीजन एंड सोसाइटी अमंग द कुर्ग्स ऑफ साउथ इंडिया’ (Religion and Society Among the Coorgs of South India) में प्रस्तुत किया। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा निचली जाति या जनजाति के सदस्य उच्च जाति, विशेषकर ब्राह्मण जाति, के अनुष्ठानों, रीति-रिवाजों और जीवन शैली को अपनाकर अपनी सामाजिक स्थिति को ऊंचा उठाने का प्रयास करते हैं। यह भारतीय समाज में सामाजिक गतिशीलता का एक रूप है।

  • a) एम.एन. श्रीनिवास: संस्कृतीकरण के जनक।
  • b) आंद्रे बेतेई: जाति, वर्ग और शक्ति पर अपने काम के लिए जाने जाते हैं।
  • c) जी.एस. घुरिये: भारतीय समाजशास्त्र के एक संस्थापक, जिन्होंने जाति पर व्यापक काम किया।
  • d) योगेंद्र सिंह: आधुनिकीकरण और सामाजिक परिवर्तन पर अपने काम के लिए जाने जाते हैं।

14. प्रश्न: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ‘एल्गोरिथमिक बायस’ (Algorithmic Bias) का क्या अर्थ है, जैसा कि हाल ही में रिपोर्ट किया गया है कि टिकटॉक ने चुनावों के दौरान दक्षिणपंथी सामग्री का पक्ष लिया?

  1. एल्गोरिदम द्वारा उत्पन्न त्रुटियाँ
  2. एल्गोरिदम का जानबूझकर एक निश्चित प्रकार की सामग्री को प्राथमिकता देना
  3. उपयोगकर्ता की प्राथमिकताओं के आधार पर सामग्री का अनुकूलन
  4. एल्गोरिदम का अप्रभावी होना

सही उत्तर: b

विस्तृत व्याख्या:

‘एल्गोरिथमिक बायस’ (Algorithmic Bias) तब होता है जब एक कंप्यूटर एल्गोरिदम व्यवस्थित और अनुचित तरीके से एक समूह के पक्ष में या उसके विरुद्ध परिणाम उत्पन्न करता है। हालिया रिपोर्टों में यह चिंता जताई गई है कि टिकटॉक जैसे प्लेटफॉर्म के सिफारिशी एल्गोरिदम चुनावों के दौरान एक निश्चित राजनीतिक विचारधारा (जैसे दक्षिणपंथी सामग्री) को प्राथमिकता दे सकते हैं। यह समस्या केवल राजनीतिक सामग्री तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह लिंग, जाति या धर्म के आधार पर भी पूर्वाग्रह दिखा सकती है, जिससे सामाजिक असमानताएं और ध्रुवीकरण बढ़ सकता है। यह डिजिटल समाजशास्त्र और मीडिया अध्ययन का एक महत्वपूर्ण विषय है।

  • a) एल्गोरिदम द्वारा उत्पन्न त्रुटियाँ: ये केवल तकनीकी त्रुटियाँ हो सकती हैं, बायस नहीं।
  • b) एल्गोरिदम का जानबूझकर एक निश्चित प्रकार की सामग्री को प्राथमिकता देना: यह एल्गोरिथमिक बायस का सटीक विवरण है, चाहे वह जानबूझकर हो या डेटा में निहित पूर्वाग्रहों के कारण।
  • c) उपयोगकर्ता की प्राथमिकताओं के आधार पर सामग्री का अनुकूलन: यह अनुकूलन है, बायस नहीं, जब तक कि उपयोगकर्ता की प्राथमिकताएं ही किसी पूर्वाग्रह से प्रेरित न हों।
  • d) एल्गोरिदम का अप्रभावी होना: यह प्रदर्शन का मुद्दा है, बायस नहीं।

15. प्रश्न: ‘गिग इकोनॉमी’ (Gig Economy) में श्रमिकों के अधिकारों को लेकर बढ़ती चिंताएँ किस समाजशास्त्रीय क्षेत्र से संबंधित हैं?

  1. ग्रामीण समाजशास्त्र
  2. पर्यावरण समाजशास्त्र
  3. श्रम समाजशास्त्र
  4. परिवार का समाजशास्त्र

सही उत्तर: c

विस्तृत व्याख्या:

‘गिग इकोनॉमी’ (Gig Economy) एक श्रम बाजार को संदर्भित करती है जिसमें अस्थायी या अल्पकालिक नौकरियों को प्राथमिकता दी जाती है और कंपनियां स्वतंत्र श्रमिकों के साथ अल्पकालिक अनुबंध करती हैं। इसमें उबर ड्राइवर, फ़ूड डिलीवरी कर्मी जैसे लोग शामिल होते हैं। श्रमिकों के अधिकारों (न्यूनतम मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य लाभ) को लेकर बढ़ती चिंताएं ‘श्रम समाजशास्त्र’ (Sociology of Labor) के केंद्रीय विषयों में से एक हैं, जो कार्यस्थल पर शक्ति संबंधों, असमानताओं और सामाजिक न्याय का अध्ययन करता है।

  • a) ग्रामीण समाजशास्त्र: ग्रामीण क्षेत्रों और समुदायों का अध्ययन करता है।
  • b) पर्यावरण समाजशास्त्र: मानव और पर्यावरण के बीच संबंधों का अध्ययन करता है।
  • c) श्रम समाजशास्त्र: कार्य, रोजगार, श्रमिकों के अधिकार और श्रम संबंधों का अध्ययन करता है।
  • d) परिवार का समाजशास्त्र: परिवार, विवाह और रिश्तेदारी का अध्ययन करता है।

16. प्रश्न: जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाला ‘प्रवासन’ (Climate-change-driven Migration) किस समाजशास्त्रीय उप-क्षेत्र के तहत आता है?

  1. जनसंख्या समाजशास्त्र
  2. पर्यावरण समाजशास्त्र
  3. आपदा समाजशास्त्र
  4. उपरोक्त सभी

सही उत्तर: d

विस्तृत व्याख्या:

जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाला ‘प्रवासन’ (Climate-change-driven Migration) एक जटिल सामाजिक घटना है जो कई समाजशास्त्रीय उप-क्षेत्रों के दायरे में आती है।

  • जनसंख्या समाजशास्त्र: यह जनसंख्या गतिशीलता, प्रवास पैटर्न और इसके सामाजिक-आर्थिक प्रभावों का अध्ययन करता है।
  • पर्यावरण समाजशास्त्र: यह मानव समाजों और प्राकृतिक पर्यावरण के बीच संबंधों, पर्यावरणीय समस्याओं के सामाजिक कारणों और परिणामों का अध्ययन करता है। जलवायु प्रवासन सीधे पर्यावरणीय समस्याओं से जुड़ा है।
  • आपदा समाजशास्त्र: जलवायु परिवर्तन अक्सर चरम मौसम घटनाओं और प्राकृतिक आपदाओं को बढ़ावा देता है, जिसके परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर विस्थापन होता है।
  • उपरोक्त सभी: ये सभी उप-क्षेत्र जलवायु-प्रेरित प्रवासन के विभिन्न आयामों को समझने में मदद करते हैं, जैसे कि लोगों का विस्थापन, नए स्थानों पर उनके समायोजन, सांस्कृतिक प्रभाव और नीतिगत प्रतिक्रियाएं।

17. प्रश्न: अनुसंधान विधियों में ‘एथनोग्राफी’ (Ethnography) का क्या अर्थ है?

  1. बड़े पैमाने पर सर्वेक्षण द्वारा डेटा एकत्र करना
  2. सांख्यिकीय विश्लेषण के माध्यम से डेटा का अध्ययन
  3. एक विशिष्ट समूह या संस्कृति का गहन, प्रत्यक्ष अवलोकन अध्ययन
  4. प्रयोगात्मक डिजाइन का उपयोग करके कारण-प्रभाव संबंधों की जांच करना

सही उत्तर: c

विस्तृत व्याख्या:

‘एथनोग्राफी’ (Ethnography) गुणात्मक अनुसंधान विधि है जिसमें शोधकर्ता एक विशिष्ट सामाजिक समूह या संस्कृति के सदस्यों के साथ लंबे समय तक रहकर, उनके दैनिक जीवन में भाग लेकर (प्रतिभागी अवलोकन), और उनके अनुभवों को समझकर गहन डेटा एकत्र करता है। इसका लक्ष्य उस समूह के दृष्टिकोण से सामाजिक दुनिया की विस्तृत और समृद्ध समझ प्राप्त करना है। ब्रोनिस्लाव मैलिनोव्स्की और फ्रैंज बोस जैसे मानवविदों ने इसे लोकप्रिय बनाया।

  • a) बड़े पैमाने पर सर्वेक्षण द्वारा डेटा एकत्र करना: यह मात्रात्मक अनुसंधान विधि है।
  • b) सांख्यिकीय विश्लेषण के माध्यम से डेटा का अध्ययन: यह डेटा विश्लेषण का एक पहलू है, विधि का प्रकार नहीं।
  • c) एक विशिष्ट समूह या संस्कृति का गहन, प्रत्यक्ष अवलोकन अध्ययन: यह एथनोग्राफी की सटीक परिभाषा है।
  • d) प्रयोगात्मक डिजाइन का उपयोग करके कारण-प्रभाव संबंधों की जांच करना: यह प्रायोगिक अनुसंधान (Experimental Research) है।

18. प्रश्न: ‘पैट्रिआर्की’ (Patriarchy) शब्द का सबसे अच्छा वर्णन क्या है?

  1. स्त्रियों और पुरुषों के बीच समानता
  2. एक सामाजिक प्रणाली जिसमें पुरुष प्राथमिक शक्ति रखते हैं और प्रभुत्व रखते हैं
  3. एक सामाजिक प्रणाली जिसमें स्त्रियाँ प्राथमिक शक्ति रखती हैं
  4. एक व्यक्तिगत विश्वास प्रणाली

सही उत्तर: b

विस्तृत व्याख्या:

‘पैट्रिआर्की’ (Patriarchy) एक सामाजिक प्रणाली को संदर्भित करती है जिसमें पुरुषों को प्राथमिक शक्ति प्राप्त होती है और वे राजनीतिक नेतृत्व, नैतिक अधिकार, सामाजिक विशेषाधिकार और संपत्ति के नियंत्रण की भूमिकाओं में प्रभावी होते हैं। यह सामाजिक संगठन का एक रूप है जहाँ पुरुष महिलाओं पर हावी होते हैं, और परिवार, समाज और अर्थव्यवस्था में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। नारीवादी समाजशास्त्र इस प्रणाली का गहन विश्लेषण करता है।

  • a) स्त्रियों और पुरुषों के बीच समानता: यह समतावाद (Egalitarianism) है, पितृसत्ता नहीं।
  • b) एक सामाजिक प्रणाली जिसमें पुरुष प्राथमिक शक्ति रखते हैं और प्रभुत्व रखते हैं: यह पितृसत्ता की सटीक परिभाषा है।
  • c) एक सामाजिक प्रणाली जिसमें स्त्रियाँ प्राथमिक शक्ति रखती हैं: यह मातृसत्ता (Matriarchy) है, जो दुर्लभ है।
  • d) एक व्यक्तिगत विश्वास प्रणाली: पितृसत्ता एक व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था है, न कि केवल एक व्यक्तिगत विश्वास।

19. प्रश्न: भारत में ‘संयुक्त परिवार’ (Joint Family) की प्रमुख विशेषता क्या है?

  1. माता-पिता और उनके अविवाहित बच्चे शामिल होते हैं।
  2. सामान्य निवास, सामान्य रसोई और सामान्य संपत्ति।
  3. बच्चों की शादी के बाद तुरंत अलग हो जाना।
  4. यह केवल शहरी क्षेत्रों में पाया जाता है।

सही उत्तर: b

विस्तृत व्याख्या:

भारत में ‘संयुक्त परिवार’ (Joint Family) एक ऐसी पारिवारिक संरचना है जहाँ कई पीढ़ियों के सदस्य (जैसे माता-पिता, उनके विवाहित बच्चे और उनके बच्चे) एक साथ एक ही छत के नीचे रहते हैं, एक ही रसोई में खाना खाते हैं, और सामान्य संपत्ति और धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते हैं। यह पश्चिमी ‘नाभिकीय परिवार’ (Nuclear Family) के विपरीत है और भारतीय ग्रामीण और शहरी दोनों समाजों में इसका महत्व रहा है।

  • a) माता-पिता और उनके अविवाहित बच्चे शामिल होते हैं: यह नाभिकीय परिवार की विशेषता है।
  • b) सामान्य निवास, सामान्य रसोई और सामान्य संपत्ति: ये संयुक्त परिवार की परिभाषित विशेषताएँ हैं।
  • c) बच्चों की शादी के बाद तुरंत अलग हो जाना: यह नाभिकीय परिवार के गठन की ओर इशारा करता है।
  • d) यह केवल शहरी क्षेत्रों में पाया जाता है: यह ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में पाया जाता है, हालांकि शहरीकरण के कारण इसमें परिवर्तन आ रहे हैं।

20. प्रश्न: समाजशास्त्र में ‘सामाजिकरण’ (Socialization) की प्रक्रिया का प्राथमिक उद्देश्य क्या है?

  1. आर्थिक लाभ प्राप्त करना
  2. व्यक्ति को समाज के मानदंडों और मूल्यों को सिखाना
  3. शारीरिक विकास को बढ़ावा देना
  4. प्रौद्योगिकी का उपयोग करना सीखना

सही उत्तर: b

विस्तृत व्याख्या:

‘सामाजिकरण’ (Socialization) वह आजीवन चलने वाली प्रक्रिया है जिसके माध्यम से व्यक्ति समाज के मानदंडों, मूल्यों, विश्वासों और व्यवहारों को सीखते हैं और आंतरिक बनाते हैं, जिससे वे समाज के कार्यात्मक सदस्य बन पाते हैं। यह व्यक्तित्व विकास और सामाजिक व्यवस्था दोनों के लिए आवश्यक है। परिवार, स्कूल, मित्र समूह और मीडिया सामाजिककरण के महत्वपूर्ण वाहक (Agents) हैं।

  • a) आर्थिक लाभ प्राप्त करना: यह सामाजिकरण का सीधा उद्देश्य नहीं है।
  • b) व्यक्ति को समाज के मानदंडों और मूल्यों को सिखाना: यह सामाजिकरण का केंद्रीय उद्देश्य है।
  • c) शारीरिक विकास को बढ़ावा देना: यह जैविक प्रक्रिया है, सामाजिकरण नहीं।
  • d) प्रौद्योगिकी का उपयोग करना सीखना: यह सामाजिकरण का एक विशिष्ट उप-उत्पाद या पहलू हो सकता है, लेकिन प्राथमिक उद्देश्य नहीं।

21. प्रश्न: ‘प्राइमेट्स ऑफ पार्क्स’ (Primatism of Parts) की अवधारणा किस समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य से संबंधित है, जो मानता है कि व्यक्तिगत हितों से सामाजिक व्यवस्था बनती है?

  1. प्रकार्यवादी परिप्रेक्ष्य
  2. संघर्ष परिप्रेक्ष्य
  3. प्रतीकात्मक अंतःक्रियावादी परिप्रेक्ष्य
  4. विनिमय सिद्धांत (Exchange Theory)

सही उत्तर: d

विस्तृत व्याख्या:

‘विनिमय सिद्धांत’ (Exchange Theory) का आधार ‘प्राइमेट्स ऑफ पार्क्स’ (Primacy of Parts) की अवधारणा है, जिसका अर्थ है कि व्यक्तिगत क्रियाएं और हित सामाजिक संरचनाओं और व्यवस्थाओं के निर्माण का आधार हैं। जॉर्ज होमैन्स और पीटर ब्लॉ जैसे समाजशास्त्रियों ने इस सिद्धांत को विकसित किया। यह मानता है कि सामाजिक व्यवहार व्यक्तियों के बीच लागत और लाभ के तर्कसंगत गणना पर आधारित होता है, और सामाजिक संबंध प्रतिफल (rewards) और दंड (costs) के विनिमय से बनते हैं।

  • a) प्रकार्यवादी परिप्रेक्ष्य: यह मानता है कि समग्र सामाजिक व्यवस्था व्यक्तियों पर हावी होती है।
  • b) संघर्ष परिप्रेक्ष्य: यह शक्ति और असमानता पर केंद्रित है।
  • c) प्रतीकात्मक अंतःक्रियावादी परिप्रेक्ष्य: यह अर्थ और प्रतीकों पर केंद्रित है।
  • d) विनिमय सिद्धांत (Exchange Theory): यह मानता है कि व्यक्ति अपने हितों को आगे बढ़ाते हुए सामाजिक संबंध बनाते हैं, जो ‘प्राइमेट्स ऑफ पार्क्स’ को दर्शाता है।

22. प्रश्न: समाजशास्त्र में ‘विचलन’ (Deviance) का क्या अर्थ है?

  1. सामाजिक मानदंडों का पालन करना
  2. सामाजिक मानदंडों से हटना या उनका उल्लंघन करना
  3. कानूनी नियमों का हमेशा पालन करना
  4. समाज द्वारा स्वीकार्य व्यवहार करना

सही उत्तर: b

विस्तृत व्याख्या:

‘विचलन’ (Deviance) समाजशास्त्र में उन व्यवहारों, विश्वासों या विशेषताओं को संदर्भित करता है जो सामाजिक मानदंडों या अपेक्षाओं से हटकर होते हैं और जिनके लिए नकारात्मक प्रतिक्रिया या प्रतिबंध (sanctions) मिल सकते हैं। विचलन की परिभाषा समाज और संदर्भ के अनुसार भिन्न हो सकती है। दुर्खीम, मर्टन और बेकर जैसे समाजशास्त्रियों ने विचलन के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन किया है।

  • a) सामाजिक मानदंडों का पालन करना: यह अनुरूपता (Conformity) है।
  • b) सामाजिक मानदंडों से हटना या उनका उल्लंघन करना: यह विचलन की सटीक परिभाषा है।
  • c) कानूनी नियमों का हमेशा पालन करना: कानूनी नियम सामाजिक मानदंड का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन विचलन केवल कानूनी उल्लंघनों तक ही सीमित नहीं है (उदाहरण के लिए, एक अजीबोगरीब फैशन भी विचलित हो सकता है)।
  • d) समाज द्वारा स्वीकार्य व्यवहार करना: यह अनुरूपता है।

23. प्रश्न: ‘ग्राम स्वराज्य’ की अवधारणा को किसने लोकप्रिय बनाया, जो भारत में स्थानीय स्वशासन पर जोर देती है?

  1. बी.आर. अम्बेडकर
  2. महात्मा गांधी
  3. जवाहरलाल नेहरू
  4. सरदार वल्लभभाई पटेल

सही उत्तर: b

विस्तृत व्याख्या:

महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) ने ‘ग्राम स्वराज्य’ (Gram Swaraj) की अवधारणा को लोकप्रिय बनाया, जिसमें वे चाहते थे कि प्रत्येक गांव आत्मनिर्भर हो और अपने मामलों का प्रबंधन स्वयं करे। उनका मानना था कि वास्तविक भारत गांवों में बसता है, और गांवों का सशक्तिकरण ही राष्ट्र के सशक्तिकरण की कुंजी है। यह विकेन्द्रीकृत शासन और ग्रामीण विकास पर केंद्रित एक आदर्शवादी अवधारणा थी।

  • a) बी.आर. अम्बेडकर: उन्होंने दलित अधिकारों और संवैधानिक सुधारों पर जोर दिया।
  • b) महात्मा गांधी: ग्राम स्वराज्य के प्रबल समर्थक।
  • c) जवाहरलाल नेहरू: आधुनिक भारत के निर्माण में औद्योगिक विकास और मिश्रित अर्थव्यवस्था पर जोर दिया।
  • d) सरदार वल्लभभाई पटेल: रियासतों के एकीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

24. प्रश्न: समाजशास्त्रीय अनुसंधान में ‘प्राथमिक डेटा’ (Primary Data) का सबसे अच्छा उदाहरण क्या है?

  1. सरकारी जनगणना रिपोर्ट
  2. एक शोधकर्ता द्वारा साक्षात्कार और सर्वेक्षण के माध्यम से सीधे एकत्र किया गया डेटा
  3. समाचार पत्रों में प्रकाशित लेख
  4. किसी अन्य शोधकर्ता द्वारा पहले से प्रकाशित अध्ययन

सही उत्तर: b

विस्तृत व्याख्या:

‘प्राथमिक डेटा’ (Primary Data) वह डेटा है जिसे शोधकर्ता स्वयं पहली बार किसी विशिष्ट शोध उद्देश्य के लिए सीधे स्रोतों से एकत्र करता है। इसमें सर्वेक्षण, साक्षात्कार, अवलोकन, फोकस समूह और प्रयोगों के माध्यम से एकत्र की गई जानकारी शामिल हो सकती है। यह डेटा मूल और अप्रसंस्कृत होता है।

  • a) सरकारी जनगणना रिपोर्ट: यह द्वितीयक डेटा है।
  • b) एक शोधकर्ता द्वारा साक्षात्कार और सर्वेक्षण के माध्यम से सीधे एकत्र किया गया डेटा: यह प्राथमिक डेटा का सटीक उदाहरण है।
  • c) समाचार पत्रों में प्रकाशित लेख: यह द्वितीयक डेटा है।
  • d) किसी अन्य शोधकर्ता द्वारा पहले से प्रकाशित अध्ययन: यह द्वितीयक डेटा है।

25. प्रश्न: ‘सामाजिक स्तरीकरण’ (Social Stratification) का क्या अर्थ है?

  1. समाज में व्यक्तियों का यादृच्छिक वितरण
  2. समाज में व्यक्तियों और समूहों का पदानुक्रमित वर्गीकरण
  3. व्यक्तियों के बीच सामाजिक समानता
  4. सामाजिक समूहों के बीच सहयोग

सही उत्तर: b

विस्तृत व्याख्या:

‘सामाजिक स्तरीकरण’ (Social Stratification) समाजशास्त्र में व्यक्तियों और समूहों को सामाजिक पदानुक्रम में विभाजित करने की एक प्रणाली को संदर्भित करता है, जिसके परिणामस्वरूप असमान शक्ति, धन, प्रतिष्ठा और अवसरों का वितरण होता है। जाति, वर्ग, लिंग और नस्ल सामाजिक स्तरीकरण के सामान्य रूप हैं। यह केवल असमानता नहीं है, बल्कि समाज की संरचनात्मक असमानता है जो पीढ़ियों तक बनी रह सकती है।

  • a) समाज में व्यक्तियों का यादृच्छिक वितरण: स्तरीकरण यादृच्छिक नहीं, बल्कि संरचित है।
  • b) समाज में व्यक्तियों और समूहों का पदानुक्रमित वर्गीकरण: यह सामाजिक स्तरीकरण की सटीक परिभाषा है।
  • c) व्यक्तियों के बीच सामाजिक समानता: स्तरीकरण असमानता को संदर्भित करता है।
  • d) सामाजिक समूहों के बीच सहयोग: सहयोग स्तरीकरण का प्रत्यक्ष अर्थ नहीं है, हालांकि स्तरीकृत समाजों में भी सहयोग होता है।

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