मध्य पूर्व का ‘पागलपन’: सीरिया में इज़राइल के हवाई हमलों पर अमेरिका क्यों है खफा?
चर्चा में क्यों? (Why in News?):
हाल के दिनों में, एक चौंकाने वाली खबर ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में हलचल मचा दी है। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के प्रशासन के कुछ शीर्ष अधिकारियों ने सीरिया में इज़राइल के आक्रामक हवाई हमलों को लेकर इज़राइली प्रधानमंत्री को ‘पागल’ तक कह डाला। व्हाइट हाउस ने इन कार्रवाइयों पर अपनी गहरी निराशा और हताशा व्यक्त की है। यह घटनाक्रम न केवल मध्य पूर्व की जटिल भू-राजनीति को उजागर करता है, बल्कि अमेरिका और उसके सबसे करीबी सहयोगी इज़राइल के बीच संबंधों में बढ़ते तनाव का भी संकेत देता है। यह लेख इस पूरे मामले की तह तक जाएगा, इसके कारणों, प्रभावों और भविष्य की राहों का विश्लेषण करेगा, जो UPSC उम्मीदवारों के लिए एक समग्र समझ प्रदान करेगा।
पृष्ठभूमि (Background):
किसी भी अंतरराष्ट्रीय घटना को समझने के लिए, उसके ऐतिहासिक और भू-राजनीतिक संदर्भ को समझना अत्यंत आवश्यक है। मध्य पूर्व का क्षेत्र सदियों से संघर्ष, शक्ति संतुलन और बाहरी हस्तक्षेपों का केंद्र रहा है। सीरिया और इज़राइल के बीच का संबंध भी इसी जटिल ताने-बाने का हिस्सा है।
सीरियाई गृहयुद्ध का संक्षिप्त इतिहास: एक अनसुलझी पहेली
2011 में ‘अरब स्प्रिंग’ की लहर के साथ शुरू हुआ सीरियाई गृहयुद्ध, आज भी क्षेत्र की सबसे बड़ी त्रासदी बना हुआ है। यह केवल एक आंतरिक संघर्ष नहीं रहा, बल्कि विभिन्न क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियों के लिए एक ‘प्रॉक्सी वॉर’ का मैदान बन गया है।
- असद शासन: सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल-असद का शासन, जो अल्पसंख्यक अलावियों द्वारा समर्थित है, को अपने अस्तित्व के लिए ईरान और रूस का मजबूत समर्थन प्राप्त है।
- विपक्षी और विद्रोही समूह: शुरुआती दिनों में सरकार विरोधी प्रदर्शनों से शुरू हुआ यह आंदोलन, बाद में कई सशस्त्र विद्रोही समूहों में बिखर गया, जिनमें से कुछ पश्चिमी देशों और खाड़ी राज्यों द्वारा समर्थित थे।
- इस्लामिक स्टेट (ISIS): इस संघर्ष में ISIS जैसे आतंकवादी संगठनों का उदय हुआ, जिसने क्षेत्र और विश्व के लिए एक नया खतरा पैदा किया।
- बाहरी हस्तक्षेप:
- रूस: असद का सबसे बड़ा समर्थक, जिसने 2015 से सीधे सैन्य हस्तक्षेप करके युद्ध का रुख बदल दिया। रूस का उद्देश्य भूमध्य सागर में अपनी सैन्य उपस्थिति बनाए रखना और एक रणनीतिक सहयोगी को बचाना है।
- ईरान: असद का एक और महत्वपूर्ण सहयोगी, जिसने हिज़्बुल्लाह जैसे प्रॉक्सी समूहों और अपनी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) के माध्यम से सीरिया में अपनी पकड़ मजबूत की है। ईरान का लक्ष्य ‘शिया क्रिसेंट’ (शिया-बहुल देशों का चाप) बनाना और इज़राइल विरोधी मोर्चे को मजबूत करना है।
- अमेरिका: शुरू में ISIS से लड़ने और असद को सत्ता से हटाने पर केंद्रित, अमेरिका की नीति समय के साथ बदलती रही। ट्रम्प प्रशासन ने सीरिया से अमेरिकी सैनिकों की वापसी पर जोर दिया।
- तुर्की: अपनी सीमा पर कुर्दिश मिलिशिया (YPG) के प्रभाव को रोकने और सीरियाई विद्रोहियों का समर्थन करने में तुर्की की अपनी रणनीतिक प्राथमिकताएँ हैं।
यह गृहयुद्ध एक जटिल ‘चौराहा’ बन गया है, जहाँ हर खिलाड़ी अपने हित साधने में लगा है, जिससे स्थायी शांति की उम्मीदें धूमिल होती जा रही हैं।
इज़राइल की सुरक्षा चिंताएँ: अस्तित्व का संघर्ष
इज़राइल एक ऐसे क्षेत्र में स्थित है जहाँ उसके चारों ओर शत्रुतापूर्ण ताकतें मौजूद हैं। उसकी सुरक्षा सिद्धांत ‘न्यूनतम गहराई’ (minimal depth) पर आधारित है, जिसका अर्थ है कि उसके पास रणनीतिक गहराई (strategic depth) नहीं है, और इसलिए उसे किसी भी खतरे को अपनी सीमाओं से दूर ही नष्ट करना पड़ता है।
- ईरान का बढ़ता प्रभाव: इज़राइल के लिए ईरान सबसे बड़ा क्षेत्रीय खतरा है। सीरिया में ईरान की सैन्य उपस्थिति (ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स और प्रॉक्सी मिलिशिया) इज़राइल की ‘लाल रेखा’ (red line) है। इज़राइल का मानना है कि ईरान सीरिया को एक ऐसे अड्डे के रूप में उपयोग कर रहा है जिससे वह इज़राइल पर हमला कर सकता है या हिज़्बुल्लाह जैसे समूहों को उन्नत हथियार पहुंचा सकता है।
- हिज़्बुल्लाह: लेबनान स्थित हिज़्बुल्लाह एक शक्तिशाली शिया आतंकवादी समूह और राजनीतिक दल है, जिसे ईरान का समर्थन प्राप्त है। इज़राइल इसे एक गंभीर खतरा मानता है, खासकर इसके पास रॉकेट और मिसाइलों का विशाल जखीरा होने के कारण। सीरियाई क्षेत्र का उपयोग अक्सर हिज़्बुल्लाह को हथियार पहुंचाने के लिए एक गलियारे के रूप में किया जाता है।
- उन्नत हथियार हस्तांतरण: इज़राइल को डर है कि ईरान सीरिया के रास्ते हिज़्बुल्लाह और अन्य प्रॉक्सी समूहों को सटीक निर्देशित मिसाइलें (PGMs) और हवाई रक्षा प्रणालियाँ भेज सकता है, जिससे उसकी सुरक्षा को गंभीर खतरा पैदा होगा।
- रासायनिक हथियार: हालांकि सीरिया ने रासायनिक हथियारों को नष्ट करने का वादा किया है, लेकिन इज़राइल अभी भी इस क्षमता के पुनरुत्थान को लेकर चिंतित रहता है।
इन चिंताओं के कारण, इज़राइल ने सीरिया में ईरानी सैन्य ठिकानों, हथियार डिपो और हिज़्बुल्लाह के काफिलों पर लगातार हवाई हमले किए हैं।
अमेरिका-इज़राइल संबंध: एक जटिल गठजोड़
अमेरिका और इज़राइल के बीच संबंध ऐतिहासिक रूप से मजबूत रहे हैं, जो रणनीतिक हितों, साझा लोकतांत्रिक मूल्यों और एक शक्तिशाली यहूदी लॉबी द्वारा समर्थित हैं। अमेरिका इज़राइल को हर साल अरबों डॉलर की सैन्य सहायता प्रदान करता है और संयुक्त राष्ट्र में इज़राइल का एक मजबूत समर्थक रहा है।
हालांकि, ट्रम्प प्रशासन के तहत ये संबंध एक अद्वितीय मोड़ पर थे। ट्रम्प ने इज़राइल को अभूतपूर्व समर्थन दिया, जैसे यरूशलेम को इज़राइल की राजधानी के रूप में मान्यता देना और अमेरिकी दूतावास को तेल अवीव से यरूशलेम ले जाना। उन्होंने इज़राइल-फिलिस्तीनी शांति प्रक्रिया में पारंपरिक अमेरिकी मध्यस्थ की भूमिका को भी त्याग दिया। लेकिन, इसके बावजूद, सीरिया में इज़राइल की सैन्य कार्रवाइयों को लेकर आंतरिक रूप से तनाव था, खासकर जब ये कार्रवाइयाँ अमेरिकी हितों या क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित करती दिखती थीं।
“एक रिश्ते में, विश्वास दोतरफा सड़क होता है। जब एक सहयोगी की कार्रवाई दूसरे के लिए अनपेक्षित परिणाम पैदा करती है, तो तनाव स्वाभाविक है।”
इज़राइल के सीरियाई हवाई हमले: ‘क्यों’ और ‘क्या’ (Israel’s Syrian Air Strikes: ‘Why’ and ‘What’):
इज़राइल की सीरिया में सैन्य कार्रवाइयाँ कोई नई बात नहीं हैं। वे एक दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा हैं जिसे इज़राइल ‘युद्धों के बीच युद्ध’ (War Between Wars – मबाम या MABAM, हिब्रू में) कहता है।
उद्देश्य: ‘लाल रेखाओं’ की रक्षा
इज़राइल के सीरियाई हमलों के प्राथमिक उद्देश्य निम्नलिखित हैं:
- ईरानी सैन्य घुसपैठ को रोकना: इज़राइल का मुख्य लक्ष्य सीरिया में ईरान की स्थायी सैन्य उपस्थिति को रोकना है। इज़राइल नहीं चाहता कि ईरान उसकी उत्तरी सीमा पर एक नया मोर्चा स्थापित करे।
- उन्नत हथियार हस्तांतरण को रोकना: हिज़्बुल्लाह को ईरान से मिलने वाले सटीक निर्देशित मिसाइलों (PGMs) और अन्य उन्नत हथियारों के शिपमेंट को रोकना। ये हथियार इज़राइल के शहरों और रणनीतिक ठिकानों पर हमला करने की हिज़्बुल्लाह की क्षमता को नाटकीय रूप से बढ़ा देंगे।
- ‘लाल रेखाओं’ को बनाए रखना: इज़राइल ने कई ‘लाल रेखाएं’ निर्धारित की हैं, जैसे कि सीरियाई धरती से इज़राइल पर कोई भी हमला, हिज़्बुल्लाह को उन्नत हथियारों का हस्तांतरण, या सीरिया में ईरानी सैन्य बुनियादी ढांचे का निर्माण। इन रेखाओं का उल्लंघन होने पर इज़राइल सैन्य कार्रवाई करता है।
- गुणात्मक सैन्य लाभ (QME) बनाए रखना: अमेरिका की मदद से, इज़राइल मध्य पूर्व में अपना गुणात्मक सैन्य लाभ बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है। इसका मतलब है कि उसके पास अपने संभावित विरोधियों पर एक तकनीकी और रणनीतिक श्रेष्ठता होनी चाहिए।
रणनीति: ‘युद्धों के बीच युद्ध’ (MABAM)
यह इज़राइल की एक सक्रिय रणनीति है जिसका उद्देश्य बड़े पैमाने पर युद्ध छिड़ने से पहले ही खतरों को बेअसर करना है। इसमें शामिल हैं:
- लगातार खुफिया निगरानी: सीरिया में ईरानी गतिविधियों और हथियार हस्तांतरण मार्गों पर गहन खुफिया जानकारी एकत्र करना।
- लक्षित हवाई हमले: सटीक और सीमित हवाई हमलों का उपयोग करके विशिष्ट लक्ष्यों को नष्ट करना, जैसे हथियार डिपो, अनुसंधान केंद्र, मिसाइल उत्पादन साइटें, और ईरान-संबद्ध मिलिशिया के ठिकाने।
- जोखिम प्रबंधन: इन हमलों को इस तरह से अंजाम देना कि यह एक पूर्ण युद्ध में न बदल जाए, खासकर रूस या सीरियाई वायु रक्षा प्रणालियों के साथ सीधे टकराव से बचना।
हमलों का प्रभाव: एक दोधारी तलवार
इन हमलों के कई प्रभाव हुए हैं:
- ईरानी महत्वाकांक्षाओं पर अंकुश: इज़राइल का दावा है कि उसके हमले सीरिया में ईरान की सैन्य निर्माण की गति को धीमा करने में सफल रहे हैं।
- क्षेत्रीय अस्थिरता: ये हमले निश्चित रूप से सीरिया में तनाव बढ़ाते हैं और ईरान या उसके प्रॉक्सी द्वारा जवाबी कार्रवाई का खतरा पैदा करते हैं, जिससे क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ सकती है।
- मानवीय प्रभाव: सीधे तौर पर नागरिकों को निशाना न बनाने के बावजूद, ये हमले संघर्ष को बढ़ाते हैं और सीरियाई आबादी के लिए एक और संकट का कारण बन सकते हैं।
- अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया: अंतर्राष्ट्रीय समुदाय अक्सर इन हमलों को सीरिया की संप्रभुता का उल्लंघन मानता है, हालांकि इज़राइल इसे अपनी आत्मरक्षा का अधिकार बताता है।
अमेरिका की प्रतिक्रिया: ‘हताशा’ क्यों? (US Reaction: Why ‘Frustration’?):
जब एक करीबी सहयोगी की कार्रवाइयाँ, जैसे कि इज़राइल की सीरिया में, अमेरिका को परेशान करती हैं, तो यह कूटनीतिक संबंधों की जटिलता को दर्शाता है। ट्रम्प प्रशासन के अधिकारियों की हताशा के कई कारण थे।
ट्रम्प प्रशासन की सीरिया नीति: विरोधाभासों का मिश्रण
ट्रम्प के सीरियाई नीति में एक स्पष्ट विरोधाभास था। एक ओर, उन्होंने सीरिया से अमेरिकी सैनिकों को वापस बुलाने की वकालत की, जिसमें ISIS के खिलाफ लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले कुर्द सहयोगियों को छोड़ना भी शामिल था। उनका मुख्य ध्यान ISIS को हराना और फिर अमेरिकी सैनिकों को घर लाना था। दूसरी ओर, उन्होंने ईरान के खिलाफ ‘अधिकतम दबाव’ अभियान भी चलाया।
इस विरोधाभास ने एक विचित्र स्थिति पैदा की: अमेरिका सीरिया से बाहर निकलना चाहता था, लेकिन इज़राइल सीरिया में ईरान के प्रभाव को कम करने के लिए सक्रिय रूप से शामिल था।
इजरायली कार्रवाइयों पर अमेरिकी आपत्ति: संतुलन की तलाश
अमेरिका की आपत्तियाँ निम्नलिखित बिंदुओं पर केंद्रित थीं:
- वृद्धि का जोखिम: इज़राइल के लगातार हमलों से ईरान, हिज़्बुल्लाह, या यहां तक कि सीरियाई/रूसी बलों की जवाबी कार्रवाई हो सकती थी, जिससे एक बड़ा क्षेत्रीय संघर्ष छिड़ने का खतरा था। अमेरिकी अधिकारी चिंतित थे कि इज़राइल की कार्रवाइयाँ उन्हें एक ऐसे युद्ध में खींच सकती हैं जिससे वे बचना चाहते थे।
- अमेरिकी प्रयासों को कमजोर करना: अमेरिका सीरिया में अपनी सीमित उपस्थिति के साथ स्थिरता बनाए रखने की कोशिश कर रहा था, खासकर ISIS के पुनरुत्थान को रोकने के लिए। इज़राइल के हमलों को अक्सर इन प्रयासों के लिए विघटनकारी माना जाता था, क्योंकि वे क्षेत्र को और अस्थिर कर सकते थे।
- अमेरिकी सैनिकों पर प्रभाव: सीरिया में अभी भी अमेरिकी सैनिक मौजूद थे, हालांकि उनकी संख्या कम थी। यदि इज़राइल के हमलों से क्षेत्र में तनाव बढ़ता, तो इन सैनिकों की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती थी।
- कूटनीतिक उलझन: जब इज़राइल ऐसे हमले करता था, तो अमेरिका को अक्सर कूटनीतिक रूप से अपनी स्थिति स्पष्ट करनी पड़ती थी, जिससे उसकी वैश्विक साख प्रभावित होती थी।
“युद्ध शतरंज के खेल की तरह है; हर चाल का दूरगामी परिणाम होता है। इज़राइल अपनी चालें चलता रहा, लेकिन अमेरिका को इस बात की चिंता थी कि कहीं ये चालें पूरे बोर्ड को ही न पलट दें।”
ट्रम्प-नेतन्याहू संबंधों का तनाव: पर्दे के पीछे की सच्चाई
सार्वजनिक रूप से, डोनाल्ड ट्रम्प और बेंजामिन नेतन्याहू एक मजबूत और करीबी रिश्ता साझा करते थे। ट्रम्प ने नेतन्याहू को कई राजनीतिक उपहार दिए (जैसे यरूशलेम दूतावास, गोलान हाइट्स पर इज़राइली संप्रभुता को मान्यता)। हालांकि, पर्दे के पीछे, ट्रम्प के “अमेरिका फर्स्ट” दृष्टिकोण और सीरिया से निकलने की उनकी इच्छा ने इज़राइल की क्षेत्रीय आक्रामक रणनीति के साथ संघर्ष किया। ट्रम्प के अधिकारियों ने महसूस किया कि नेतन्याहू अपने राष्ट्रीय सुरक्षा हितों को अमेरिकी नीति पर वरीयता दे रहे थे, जिससे वाशिंगटन में हताशा बढ़ रही थी। ‘एक पागल’ जैसे शब्द इस हताशा के चरम को दर्शाते हैं।
क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय निहितार्थ (Regional and International Implications):
सीरिया में इज़राइल के हवाई हमलों और अमेरिकी प्रतिक्रिया के दूरगामी क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय निहितार्थ हैं।
ईरान की प्रतिक्रिया: धैर्य और प्रतिकार
ईरान ने इज़राइल के हमलों पर अक्सर सीधे और बड़े पैमाने पर सैन्य प्रतिक्रिया देने से परहेज किया है। इसकी मुख्य रणनीति अपने प्रॉक्सी समूहों (जैसे हिज़्बुल्लाह) को मजबूत करना और इज़राइल की सुरक्षा को लगातार चुनौती देना है। ईरान जानता है कि इज़राइल के साथ सीधा युद्ध महंगा हो सकता है, इसलिए वह ‘धैर्यपूर्वक’ काम करता है, धीरे-धीरे सीरिया में अपनी स्थिति मजबूत करता है, और मौका मिलने पर जवाबी कार्रवाई करता है। हालांकि, इज़राइली हमलों की बढ़ती आवृत्ति और तीव्रता के साथ, ईरानी प्रतिक्रियाओं का जोखिम हमेशा बना रहता है।
रूस की भूमिका: एक जटिल संतुलन साधने वाला
रूस सीरिया में असद शासन का सबसे महत्वपूर्ण समर्थक है और उसकी अपनी सैन्य उपस्थिति है। उसके पास एस-300 और एस-400 जैसी उन्नत हवाई रक्षा प्रणालियाँ हैं। सैद्धांतिक रूप से, रूस इज़राइली विमानों को रोक सकता था, लेकिन उसने अक्सर ऐसा नहीं किया है। इसकी वजह यह है कि रूस एक जटिल संतुलन साध रहा है:
- वह ईरान का सहयोगी है, लेकिन इज़राइल के साथ भी सुरक्षा समन्वय बनाए रखना चाहता है ताकि आकस्मिक टकराव से बचा जा सके।
- रूस सीरिया में अपनी सैन्य उपस्थिति को मजबूत करना चाहता है और उसे इस बात का भी डर है कि इज़राइल के अत्यधिक हमले सीरिया को पूरी तरह अस्थिर कर सकते हैं।
- रूस की इज़राइल के साथ एक ‘डी-कंफ्लिक्शन’ लाइन (De-confliction Line) है, जिसके माध्यम से वे हवाई हमलों से पहले समन्वय करते हैं ताकि रूसी और इज़राइली सेनाओं के बीच कोई अप्रत्याशित घटना न हो।
यह दिखाता है कि मध्य पूर्व में कोई भी खिलाड़ी एक आयामी नहीं है; सबके अपने हित, मजबूरियाँ और जटिल संबंध हैं।
तुर्की की स्थिति: स्वयं के हितों का पीछा
तुर्की की अपनी सीरिया नीति है, जो मुख्य रूप से कुर्दिश मिलिशिया (YPG) को नियंत्रित करने और सीरियाई विद्रोहियों का समर्थन करने पर केंद्रित है। इज़राइल के हमलों पर तुर्की की प्रतिक्रिया अक्सर सीमित होती है, क्योंकि उसके हित इज़राइल के हितों से सीधे टकराव में नहीं हैं, बल्कि सीरिया में उसके अपने प्रतिद्वंद्वी हैं। हालांकि, तुर्की भी क्षेत्र में अस्थिरता नहीं चाहता, क्योंकि इसका असर उसकी सीमाओं पर पड़ता है।
संयुक्त राष्ट्र और अंतर्राष्ट्रीय कानून: संप्रभुता का सवाल
अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत, किसी भी देश की संप्रभुता का उल्लंघन निंदनीय है। इज़राइल के सीरिया में हवाई हमलों को अक्सर संयुक्त राष्ट्र और कई देशों द्वारा सीरिया की संप्रभुता का उल्लंघन माना जाता है। हालांकि, इज़राइल अपनी कार्रवाइयों को आत्मरक्षा के अधिकार के तहत सही ठहराता है, यह तर्क देते हुए कि वह ईरान द्वारा पैदा किए गए तात्कालिक खतरे को निष्क्रिय कर रहा है। यह अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत ‘आत्मरक्षा’ की अवधारणा की एक जटिल व्याख्या प्रस्तुत करता है, खासकर जब खतरा किसी राज्य के बजाय एक गैर-राज्य अभिनेता से आ रहा हो, जिसे किसी अन्य राज्य द्वारा समर्थन प्राप्त हो।
“अंतर्राष्ट्रीय कानून एक जंगल है जिसमें सभी राज्य अपने हितों के अनुसार रास्ता बनाते हैं। संप्रभुता का सिद्धांत एक मार्गदर्शक सितारा है, लेकिन अक्सर भू-राजनीतिक वास्तविकताओं की धुंध में खो जाता है।”
चुनौतियाँ और आगे की राह (Challenges and Way Forward):
सीरियाई संघर्ष और इज़राइल के आक्रामक रुख ने मध्य पूर्व के लिए कई गंभीर चुनौतियाँ पैदा की हैं। भविष्य की राह इन चुनौतियों का समाधान करने में निहित है।
सीरिया में स्थिरता की चुनौती: एक टूटे हुए राष्ट्र का पुनर्निर्माण
सीरिया एक खंडित देश है, जिसका एक बड़ा हिस्सा असद शासन के नियंत्रण में है, लेकिन अन्य हिस्सों पर कुर्द, तुर्की-समर्थित विद्रोही, और अभी भी ISIS के अवशेषों का नियंत्रण है। देश का पुनर्निर्माण, शरणार्थियों की वापसी, और राजनीतिक समाधान की तलाश एक अत्यंत कठिन कार्य है। इज़राइल के हमले इस प्रक्रिया को और जटिल बनाते हैं, क्योंकि वे मौजूदा शक्ति संतुलन को हिलाते हैं।
इज़रायल की सुरक्षा बनाम क्षेत्रीय शांति: एक बारीक संतुलन
इज़रायल का अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता देना स्वाभाविक है, लेकिन उसकी आक्रामक नीति क्षेत्रीय शांति के लिए खतरा पैदा कर सकती है। चुनौती यह है कि इज़रायल अपनी सुरक्षा चिंताओं को कैसे दूर करे, बिना एक बड़े क्षेत्रीय संघर्ष को भड़काए। इसके लिए एक ऐसी रणनीति की आवश्यकता है जो सैन्य कार्रवाइयों के साथ-साथ कूटनीतिक प्रयासों को भी प्राथमिकता दे।
अमेरिका की भूमिका का पुनर्मूल्यांकन: घटता प्रभाव?
सीरिया से अमेरिकी सैनिकों की वापसी और मध्य पूर्व में उसकी घटती प्रतिबद्धता ने एक शक्ति निर्वात पैदा किया है। रूस और ईरान इस निर्वात को भरने की कोशिश कर रहे हैं। अमेरिका को अपनी मध्य पूर्व नीति का पुनर्मूल्यांकन करना होगा: क्या वह एक विश्वसनीय सहयोगी बना रहेगा? क्या वह क्षेत्र में स्थिरता के लिए एक सकारात्मक शक्ति बन सकता है, या केवल अपने हितों को प्राथमिकता देगा? ट्रम्प प्रशासन की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति ने सहयोगियों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या अमेरिका उनके साथ खड़ा रहेगा जब उन्हें उसकी सबसे ज्यादा जरूरत होगी।
कूटनीतिक समाधान की आवश्यकता: संवाद ही कुंजी है
सीरियाई संकट और इज़राइल-ईरान प्रॉक्सी युद्ध का कोई सैन्य समाधान नहीं है। एक टिकाऊ शांति के लिए निम्नलिखित की आवश्यकता है:
- क्षेत्रीय संवाद: ईरान, इज़राइल, तुर्की, सऊदी अरब और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों के बीच सीधा संवाद, ताकि एक दूसरे की चिंताओं को समझा जा सके और गलतफहमियों को दूर किया जा सके।
- अंतर्राष्ट्रीय सहयोग: संयुक्त राष्ट्र और अन्य बहुपक्षीय मंचों का उपयोग करके एक व्यापक राजनीतिक समाधान खोजना।
- सीरिया के भीतर सुलह: सीरियाई सरकार और विभिन्न विद्रोही समूहों के बीच एक समावेशी राजनीतिक प्रक्रिया को बढ़ावा देना।
- आतंकवाद के खिलाफ संयुक्त मोर्चा: ISIS और अन्य आतंकवादी समूहों के खतरे से लड़ने के लिए निरंतर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग।
निष्कर्ष (Conclusion):
सीरिया में इज़राइल के हवाई हमले और उन पर अमेरिकी अधिकारियों की तीव्र प्रतिक्रिया मध्य पूर्व की उबलती हुई स्थिति का एक ज्वलंत उदाहरण है। यह क्षेत्र एक जटिल भू-राजनीतिक शतरंज बोर्ड बन गया है, जहाँ हर खिलाड़ी अपने हितों की रक्षा और विस्तार के लिए हर संभव चाल चल रहा है। इज़राइल अपनी सुरक्षा चिंताओं से प्रेरित है, ईरान अपनी क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं से, रूस अपनी रणनीतिक पकड़ से, और अमेरिका अपनी बदलती प्राथमिकताओं से। ‘एक पागल’ जैसे कड़े शब्द भले ही तात्कालिक हताशा को दर्शाते हों, लेकिन वे यह भी बताते हैं कि इस क्षेत्र में निर्णय लेने की प्रक्रिया कितनी तनावपूर्ण और अप्रत्याशित हो सकती है।
UPSC उम्मीदवारों के लिए, यह घटना मध्य पूर्व में शक्ति संतुलन, प्रॉक्सी युद्धों, अंतर्राष्ट्रीय कानून की चुनौतियों और प्रमुख शक्तियों के बीच संबंधों की जटिलताओं को समझने का एक उत्कृष्ट केस स्टडी है। जब तक क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी संवाद और कूटनीति का रास्ता नहीं अपनाते, तब तक इस ‘पागलपन’ के जारी रहने और इसके विनाशकारी परिणामों का सामना करने का जोखिम बना रहेगा। मध्य पूर्व एक बार फिर चौराहे पर खड़ा है, और इसका भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि उसके नेता बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता के साथ कौन सा रास्ता चुनते हैं।
UPSC परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न (Practice Questions for UPSC Exam)
प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) – 10 MCQs
-
प्रश्न 1: निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- सीरिया में असद शासन को मुख्य रूप से रूस और ईरान का समर्थन प्राप्त है।
- इज़राइल की ‘लाल रेखाओं’ में से एक सीरिया में ईरानी सैन्य उपस्थिति का निर्माण है।
- हिज़्बुल्लाह एक शिया आतंकवादी समूह और राजनीतिक दल है जो इज़राइल के खिलाफ ईरान द्वारा समर्थित है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
A) केवल (i) और (ii)
B) केवल (ii) और (iii)
C) केवल (i) और (iii)
D) (i), (ii) और (iii)उत्तर: D) (i), (ii) और (iii)
व्याख्या: सभी तीनों कथन सत्य हैं। सीरियाई गृहयुद्ध में रूस और ईरान असद शासन के प्रमुख समर्थक रहे हैं। इज़राइल सीरिया में ईरान की सैन्य उपस्थिति को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा मानता है, जिसे वह ‘लाल रेखा’ कहता है। हिज़्बुल्लाह लेबनान-स्थित एक शक्तिशाली समूह है जिसे ईरान का समर्थन प्राप्त है और इज़राइल इसे एक आतंकवादी संगठन मानता है। -
प्रश्न 2: इज़राइल की ‘वार बिटवीन वार्स’ (MABAM) रणनीति का प्राथमिक उद्देश्य क्या है?
A) सीरिया में मानवीय सहायता पहुँचाना।
B) एक बड़े पैमाने पर युद्ध से पहले ही उत्पन्न होने वाले खतरों को बेअसर करना।
C) सीरिया के साथ शांति संधि पर हस्ताक्षर करना।
D) क्षेत्र में तेल संसाधनों पर नियंत्रण स्थापित करना।उत्तर: B) एक बड़े पैमाने पर युद्ध से पहले ही उत्पन्न होने वाले खतरों को बेअसर करना।
व्याख्या: ‘वार बिटवीन वार्स’ (MABAM) इज़राइल की एक सैन्य रणनीति है जिसका उद्देश्य बड़े संघर्षों में बदलने से पहले खतरों को लक्षित हवाई हमलों और खुफिया अभियानों के माध्यम से निष्क्रिय करना है, विशेष रूप से सीरिया में ईरानी सैन्य निर्माण और हथियार हस्तांतरण को रोकना। -
प्रश्न 3: सीरियाई गृहयुद्ध में निम्नलिखित में से कौन-सा देश कुर्दिश मिलिशिया (YPG) के खिलाफ एक प्रमुख भूमिका निभा रहा है?
A) ईरान
B) इज़राइल
C) तुर्की
D) रूसउत्तर: C) तुर्की
व्याख्या: तुर्की कुर्दिश मिलिशिया (YPG) को अपनी सीमा पर एक आतंकवादी समूह मानता है और सीरिया में उनके खिलाफ कई सैन्य अभियान चलाए हैं, जबकि YPG को पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका द्वारा ISIS के खिलाफ लड़ाई में समर्थन मिला है। -
प्रश्न 4: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य देशों में से कौन-सा देश सीरिया में असद शासन का मुखर समर्थक है?
A) संयुक्त राज्य अमेरिका
B) यूनाइटेड किंगडम
C) फ्रांस
D) रूसउत्तर: D) रूस
व्याख्या: रूस संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में असद शासन का सबसे मजबूत समर्थक रहा है, जिसने सीरिया से संबंधित कई प्रस्तावों को वीटो किया है और सीधे सैन्य हस्तक्षेप भी किया है। -
प्रश्न 5: ‘गुणात्मक सैन्य लाभ (QME)’ शब्द अक्सर किस देश के संदर्भ में प्रयोग किया जाता है, जिसका अर्थ है कि उसके पास अपने विरोधियों पर एक तकनीकी और रणनीतिक श्रेष्ठता होनी चाहिए?
A) सऊदी अरब
B) ईरान
C) इज़राइल
D) मिस्रउत्तर: C) इज़राइल
व्याख्या: गुणात्मक सैन्य लाभ (QME) एक अवधारणा है जो संयुक्त राज्य अमेरिका के कानूनों में निहित है और इज़राइल की सुरक्षा से संबंधित है। इसका अर्थ है कि इज़राइल को अपने संभावित क्षेत्रीय विरोधियों पर एक सैन्य तकनीकी और रणनीतिक श्रेष्ठता बनाए रखनी चाहिए। -
प्रश्न 6: इजरायल ने अपनी आत्मरक्षा के अधिकार का दावा करते हुए किस क्षेत्र पर संप्रभुता को मान्यता देने के अमेरिकी फैसले का स्वागत किया, जो सीरिया से जुड़ा है?
A) वेस्ट बैंक
B) गाजा पट्टी
C) गोलान हाइट्स
D) सिनाई प्रायद्वीपउत्तर: C) गोलान हाइट्स
व्याख्या: डोनाल्ड ट्रम्प के प्रशासन ने गोलान हाइट्स पर इज़राइली संप्रभुता को औपचारिक रूप से मान्यता दी, जो सीरियाई क्षेत्र का हिस्सा है और 1967 के युद्ध के बाद से इज़राइल के कब्जे में है। -
प्रश्न 7: निम्नलिखित में से कौन-सा संगठन सीरिया में प्रमुख रूप से सक्रिय रहा है और जिसके खिलाफ अंतरराष्ट्रीय गठबंधन ने सैन्य अभियान चलाए हैं?
A) अल-कायदा
B) इस्लामिक स्टेट (ISIS)
C) बोको हराम
D) लश्कर-ए-तैयबाउत्तर: B) इस्लामिक स्टेट (ISIS)
व्याख्या: इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया (ISIS) ने सीरिया और इराक के बड़े हिस्सों पर कब्जा कर लिया था, और इसके खिलाफ अमेरिका के नेतृत्व में एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय गठबंधन ने सैन्य अभियान चलाए। -
प्रश्न 8: अमेरिका और इज़राइल के बीच ‘डी-कंफ्लिक्शन लाइन’ का मुख्य उद्देश्य क्या है, खासकर सीरिया के संदर्भ में?
A) दोनों देशों के बीच व्यापार संबंधों को बढ़ावा देना।
B) सीरिया में उनकी सैन्य गतिविधियों के दौरान आकस्मिक टकराव से बचना।
C) संयुक्त सैन्य अभ्यास आयोजित करना।
D) आतंकवाद के खिलाफ एक संयुक्त रणनीति बनाना।उत्तर: B) सीरिया में उनकी सैन्य गतिविधियों के दौरान आकस्मिक टकराव से बचना।
व्याख्या: ‘डी-कंफ्लिक्शन लाइन’ एक संचार चैनल है जिसका उपयोग विभिन्न सैन्य ताकतों (जैसे रूस और इज़राइल) द्वारा अपने अभियानों को समन्वित करने और अप्रत्याशित या आकस्मिक टकराव से बचने के लिए किया जाता है, विशेष रूप से एक जटिल हवाई क्षेत्र जैसे सीरिया में। -
प्रश्न 9: सीरियाई संघर्ष के कारण मध्य पूर्व में किस देश से सबसे अधिक शरणार्थी पलायन कर रहे हैं?
A) इराक
B) यमन
C) सीरिया
D) लेबनानउत्तर: C) सीरिया
व्याख्या: सीरियाई गृहयुद्ध के कारण दुनिया में सबसे बड़ा शरणार्थी संकट पैदा हुआ है, लाखों सीरियाई नागरिकों को अपने घरों से भागना पड़ा है, और वे पड़ोसी देशों जैसे तुर्की, लेबनान, जॉर्डन और यूरोप में शरण ले रहे हैं। -
प्रश्न 10: निम्नलिखित में से कौन-सा क्षेत्र ईरान की ‘शिया क्रिसेंट’ रणनीति का हिस्सा माना जाता है?
A) मिस्र और सूडान
B) इराक, सीरिया और लेबनान
C) यमन और ओमान
D) सऊदी अरब और कुवैतउत्तर: B) इराक, सीरिया और लेबनान
व्याख्या: ‘शिया क्रिसेंट’ एक अवधारणा है जो ईरान के संभावित क्षेत्रीय प्रभाव को दर्शाती है, जो इराक, सीरिया और लेबनान के शिया-बहुल क्षेत्रों से होते हुए भूमध्य सागर तक फैली हुई है। यह क्षेत्र ईरान के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।
मुख्य परीक्षा (Mains)
-
सीरिया में इज़राइल के आक्रामक हवाई हमलों और उन पर अमेरिकी हताशा ने मध्य पूर्व की भू-राजनीति की जटिल परतों को उजागर किया है। इस कथन के आलोक में, सीरियाई गृहयुद्ध में विभिन्न क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियों के परस्पर विरोधी हितों का विश्लेषण कीजिए और इसके क्षेत्रीय स्थिरता पर पड़ने वाले प्रभावों की विवेचना कीजिए। (250 शब्द)
-
इज़राइल की ‘वार बिटवीन वार्स’ (MABAM) रणनीति क्या है? अंतर्राष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों और राष्ट्रीय सुरक्षा के अधिकारों के बीच संतुलन साधने में यह रणनीति किस प्रकार की चुनौतियाँ प्रस्तुत करती है? विस्तार से समझाइए। (250 शब्द)
-
ट्रम्प प्रशासन के तहत अमेरिका-इज़राइल संबंध एक अद्वितीय गतिशीलता प्रदर्शित करते थे। ट्रम्प द्वारा इज़राइल को दिए गए अभूतपूर्व समर्थन के बावजूद, सीरियाई हमलों पर अमेरिकी अधिकारियों की हताशा के अंतर्निहित कारणों का परीक्षण कीजिए। क्या यह घटनाक्रम वैश्विक शक्ति संतुलन में अमेरिका की बदलती भूमिका को दर्शाता है? (250 शब्द)