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ब्रह्मपुत्र पर चीन का ‘सुपर डैम’: भारत के लिए क्या हैं खतरे और विकल्प?

ब्रह्मपुत्र पर चीन का ‘सुपर डैम’: भारत के लिए क्या हैं खतरे और विकल्प?

चर्चा में क्यों? (Why in News?):

हाल के दिनों में चीन द्वारा ब्रह्मपुत्र नदी (तिब्बत में यारलुंग सांगपो) के निचले इलाकों में एक ‘सुपर डैम’ के निर्माण की योजना ने भारत की चिंताएं बढ़ा दी हैं। यह परियोजना न केवल अपनी विशालता (कुछ अनुमानों के अनुसार 14 लाख करोड़ रुपये से अधिक की लागत) और तकनीकी जटिलता के लिए उल्लेखनीय है, बल्कि यह भू-राजनीतिक, पर्यावरणीय और जल सुरक्षा के संदर्भ में भी गंभीर निहितार्थ रखती है। चीन की यह महत्वाकांक्षी योजना ब्रह्मपुत्र नदी के बहाव को नियंत्रित करने की क्षमता रखती है, जिससे भारत के पूर्वोत्तर राज्यों और बांग्लादेश पर दूरगामी प्रभाव पड़ने की आशंका है। यह लेख इस बांध परियोजना के विभिन्न पहलुओं, भारत के लिए चुनौतियों और उससे निपटने की संभावित रणनीतियों पर एक गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

ब्रह्मपुत्र नदी: जीवनदायिनी और भू-राजनीतिक धुरी

ब्रह्मपुत्र नदी, जिसे तिब्बत में यारलुंग सांगपो, अरुणाचल प्रदेश में सियांग और असम में ब्रह्मपुत्र के नाम से जाना जाता है, एशिया की एक प्रमुख ट्रांसबाउंड्री नदी है। यह कैलाश पर्वत श्रृंखला के चेमायुंगदुंग ग्लेशियर से निकलती है और तिब्बत, भारत और बांग्लादेश से होकर बहती है। भारत के लिए, ब्रह्मपुत्र सिर्फ एक नदी नहीं, बल्कि जीवनदायिनी है। यह पूर्वोत्तर राज्यों की अर्थव्यवस्था, कृषि, मत्स्य पालन और पारिस्थितिकी तंत्र की रीढ़ है।

  • कृषि और जल सुरक्षा: ब्रह्मपुत्र घाटी का उपजाऊ मैदान कृषि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह लाखों लोगों के लिए सिंचाई और पेयजल का मुख्य स्रोत है।
  • पारिस्थितिकी और जैव विविधता: यह नदी तंत्र अद्वितीय जैव विविधता का घर है, जिसमें अनेक लुप्तप्राय प्रजातियां और संवेदनशील आर्द्रभूमि शामिल हैं।
  • आजीविका: नदी के किनारे रहने वाले समुदायों के लिए मछली पकड़ना, नौकायन और पर्यटन आजीविका के प्रमुख साधन हैं।
  • भू-राजनीतिक महत्व: इसका उद्गम चीन में होने के कारण, यह भारत और चीन के बीच जल कूटनीति का एक संवेदनशील बिंदु बन गई है।

चीन, नदी के ऊपरी तट पर स्थित होने के कारण, जल प्रवाह को नियंत्रित करने की क्षमता रखता है, जो भारत और बांग्लादेश जैसे निचले तटवर्ती देशों के लिए चिंता का विषय है।

चीन की ‘सुपर डैम’ परियोजना क्या है?

चीन की ‘सुपर डैम’ परियोजना यारलुंग सांगपो के ‘ग्रेट बेंड’ (मेडक काउंटी, निंगची शहर के पास) पर केंद्रित है, जहाँ नदी लगभग 3000 मीटर की ऊँचाई से तेजी से नीचे उतरती है, जिससे विशाल जलविद्युत क्षमता उत्पन्न होती है।

  • स्थान: यह बांध तिब्बत के मेडोग (मोतुओ) काउंटी में यारलुंग सांगपो के “ग्रेट बेंड” के पास प्रस्तावित है, जो भारतीय सीमा के काफी करीब है।
  • उद्देश्य: इस परियोजना का प्राथमिक उद्देश्य विशाल जलविद्युत ऊर्जा का उत्पादन करना है। चीनी अधिकारियों का दावा है कि यह बांध चीन की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण योगदान देगा। कुछ अनुमानों के अनुसार, इसकी उत्पादन क्षमता चीन के सबसे बड़े थ्री गॉर्जेस डैम से तीन गुना अधिक हो सकती है, जो 60 गीगावाट (GW) से अधिक होगी।
  • पैमाना और लागत: यह दुनिया का सबसे बड़ा जलविद्युत परियोजना बनने की उम्मीद है। इसकी अनुमानित लागत 14 लाख करोड़ रुपये (लगभग 200 अरब डॉलर) बताई जा रही है। इसका निर्माण चीन के ’14वें पंचवर्षीय योजना’ (2021-2025) का हिस्सा है।
  • तकनीकी चुनौती: यह क्षेत्र भूकंपीय रूप से सक्रिय और भूगर्भीय रूप से अस्थिर है, जिससे इतनी बड़ी संरचना का निर्माण और संचालन अत्यधिक जटिल और जोखिम भरा हो जाता है।
  • पहले के बांध: चीन पहले से ही ब्रह्मपुत्र की मुख्यधारा पर कई जलविद्युत परियोजनाएं चला रहा है, जिनमें ज़ांगमू (पूर्ण), डागु, जिचा और लेंगडा (निर्माणाधीन) शामिल हैं। ‘सुपर डैम’ इन सभी से कहीं अधिक बड़ा और शक्तिशाली होगा।

“चीन की यह महत्वाकांक्षी परियोजना केवल ऊर्जा उत्पादन से कहीं बढ़कर है। यह बीजिंग को निचले तटवर्ती देशों, विशेषकर भारत पर, एक रणनीतिक लाभ प्रदान कर सकती है, जिससे जल सुरक्षा और भू-राजनीतिक समीकरण प्रभावित होंगे।”

भारत की चिंताएं क्या हैं?

चीन के ‘सुपर डैम’ परियोजना से भारत के लिए कई गंभीर चिंताएं उत्पन्न होती हैं, जो बहुआयामी हैं:

1. जल सुरक्षा का खतरा (Threat to Water Security)

  • जल प्रवाह में कमी: बांध जल प्रवाह को नियंत्रित करेगा, जिससे निचले इलाकों में पानी की उपलब्धता कम हो सकती है। यह असम और अरुणाचल प्रदेश में कृषि, सिंचाई और पेयजल पर सीधा नकारात्मक प्रभाव डालेगा।
  • पर्यावरणीय सूखा: कम जल प्रवाह नदी के पारिस्थितिकी तंत्र को बाधित कर सकता है, जिससे आर्द्रभूमि सूख सकती हैं और स्थानीय जैव विविधता को नुकसान हो सकता है।

2. बाढ़ का खतरा (Flood Risk)

  • जल का अचानक छोड़ा जाना: आपात स्थिति या जानबूझकर पानी छोड़ने पर निचले इलाकों में अचानक और विनाशकारी बाढ़ आ सकती है, जैसा कि अतीत में चीन द्वारा यारक्लूंग सांगपो से पानी छोड़ने पर अरुणाचल प्रदेश में देखा गया है।
  • डेटा साझाकरण का अभाव: चीन के साथ वास्तविक समय के जल डेटा को साझा करने के लिए कोई व्यापक और बाध्यकारी समझौता नहीं है, जिससे भारत के लिए बाढ़ की चेतावनी प्रणाली स्थापित करना मुश्किल हो जाता है।

3. पर्यावरणीय प्रभाव (Environmental Impact)

  • भूकंपीय संवेदनशीलता: यह क्षेत्र भूकंपीय रूप से बेहद सक्रिय है। एक विशाल बांध के निर्माण से ‘जलाशय-प्रेरित भूकंपीयता’ (Reservoir-Induced Seismicity – RIS) का खतरा बढ़ सकता है, जिससे बांध की संरचना और निचले इलाकों दोनों के लिए विनाशकारी परिणाम हो सकते हैं।
  • अवसाद प्रवाह में बाधा: बांध नदी के प्राकृतिक अवसाद (गाद) प्रवाह को बाधित करेगा। यह गाद निचले इलाकों में मिट्टी की उर्वरता के लिए महत्वपूर्ण है और डेल्टा क्षेत्रों के निर्माण में सहायक होती है। इसकी कमी से भूमि का कटाव बढ़ सकता है।
  • जैव विविधता पर प्रभाव: बांधों के निर्माण से मछली के प्रवास पैटर्न बाधित होते हैं, जिससे स्थानीय जलीय जैव विविधता को खतरा होता है। ब्रह्मपुत्र में कई अनूठी प्रजातियां पाई जाती हैं।
  • जलवायु परिवर्तन: जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर पिघलने की दर बढ़ने से ऊपरी बेसिन में अधिक पानी आ सकता है, लेकिन भविष्य में जल स्रोत सूखने का भी खतरा है, जिससे बांध का दीर्घकालिक प्रभाव और अनिश्चित हो जाएगा।

4. राष्ट्रीय सुरक्षा और सामरिक चिंताएं (National Security and Strategic Concerns)

  • ‘जल को हथियार बनाना’ (Water as a Weapon): चीन को पानी का एक रणनीतिक हथियार के रूप में उपयोग करने की क्षमता मिलेगी। वह सूखे या बाढ़ के माध्यम से भारत पर दबाव डाल सकता है।
  • सैन्य निहितार्थ: बांध का निर्माण LAC के करीब एक रणनीतिक क्षेत्र में चीनी उपस्थिति और बुनियादी ढांचे को बढ़ाएगा, जिससे भारत के लिए सैन्य चुनौती बढ़ सकती है।
  • राजनीतिक दबाव: जल सुरक्षा पर निर्भरता चीन को भारत के साथ अन्य द्विपक्षीय मुद्दों पर बातचीत में ऊपरी हाथ दे सकती है।

5. अंतर्राष्ट्रीय कानून और सहयोग का अभाव (Lack of International Law and Cooperation)

  • दुनिया की कई ट्रांसबाउंड्री नदियों के विपरीत, ब्रह्मपुत्र के लिए चीन, भारत और बांग्लादेश के बीच कोई व्यापक और बाध्यकारी जल-साझाकरण संधि नहीं है।
  • चीन ‘ऊपरी तटवर्ती देश’ होने के नाते, अक्सर अंतर्राष्ट्रीय जल कानूनों और प्रथाओं का पालन करने में आनाकानी करता है। वह ऐतिहासिक रूप से अपनी संप्रभुता का हवाला देते हुए जल साझाकरण समझौते करने से बचता रहा है।

भारत की संभावित रणनीतियाँ और निपटने की योजना

चीन के ‘सुपर डैम’ से उत्पन्न चुनौतियों का सामना करने के लिए भारत को एक बहु-आयामी और सक्रिय दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है:

1. कूटनीतिक पहल (Diplomatic Initiatives)

  • द्विपक्षीय वार्ता: चीन के साथ निरंतर और उच्च-स्तरीय द्विपक्षीय वार्ता, जिसमें जल डेटा साझाकरण, बांध सुरक्षा प्रोटोकॉल और संयुक्त पर्यावरण आकलन पर जोर दिया जाए।
  • बहुपक्षीय मंच: संयुक्त राष्ट्र, ब्रिक्स (BRICS), शंघाई सहयोग संगठन (SCO) और अन्य प्रासंगिक बहुपक्षीय मंचों पर ट्रांसबाउंड्री नदियों के लिए अंतर्राष्ट्रीय जल कानूनों और बाध्यकारी समझौतों की वकालत करना।
  • बांग्लादेश के साथ समन्वय: ब्रह्मपुत्र पर निचले तटवर्ती देश बांग्लादेश के साथ मजबूत समन्वय और संयुक्त रणनीति बनाना, क्योंकि वह भी चीन के बांधों से प्रभावित होगा। एक संयुक्त मोर्चा अधिक प्रभावी हो सकता है।
  • अंतर्राष्ट्रीय जनमत: अंतर्राष्ट्रीय समुदाय, विशेषकर जल-समृद्ध देशों और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों को इस मुद्दे की गंभीरता से अवगत कराना और चीन पर दबाव बनाने का प्रयास करना।

2. जल प्रबंधन और बुनियादी ढाँचा (Water Management & Infrastructure)

  • भारत में बांध निर्माण: ब्रह्मपुत्र की सहायक नदियों और मुख्यधारा पर भारत के भीतर जलविद्युत परियोजनाओं और भंडारण बांधों का निर्माण करना। इससे चीन द्वारा पानी रोकने की स्थिति में जल सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकेगी और बाढ़ नियंत्रण में मदद मिलेगी। उदाहरण के लिए, अरुणाचल प्रदेश में सियांग (Siang), सुबनसिरी (Subansiri) और दिबांग (Dibang) पर बांधों की योजना।
  • बेहतर बाढ़ चेतावनी प्रणाली: ब्रह्मपुत्र बेसिन में अत्याधुनिक बाढ़ पूर्वानुमान और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली स्थापित करना, जिसमें उपग्रह डेटा और मौसम संबंधी पूर्वानुमानों का उपयोग किया जाए।
  • जल संसाधनों का अनुकूलन: वर्षा जल संचयन, कुशल सिंचाई तकनीकों और भूजल पुनर्भरण के माध्यम से जल संसाधनों का बेहतर प्रबंधन करना।
  • नदी जोड़ो परियोजना: यद्यपि विवादास्पद, ब्रह्मपुत्र के पानी को अन्य जल-कमी वाले बेसिनों में स्थानांतरित करने की ‘नदी जोड़ो’ परियोजना की संभावनाओं का मूल्यांकन करना।

3. कानूनी और संस्थागत तंत्र (Legal and Institutional Mechanisms)

  • राष्ट्रीय जल नीति: एक व्यापक राष्ट्रीय जल नीति विकसित करना जो ट्रांसबाउंड्री नदियों के प्रबंधन और उनसे संबंधित सुरक्षा चिंताओं को संबोधित करे।
  • अंतर्राष्ट्रीय जल कानून का उपयोग: अंतर्राष्ट्रीय जल कानूनों और समझौतों, जैसे कि ‘संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन ऑन द लॉ ऑफ द नॉन-नेविगेशनल यूजेस ऑफ इंटरनेशनल वाटरकोर्सेज, 1997’ (UN Convention on the Law of the Non-Navigational Uses of International Watercourses, 1997) का संदर्भ देकर चीन पर दबाव बनाना। हालाँकि, चीन इस पर हस्ताक्षरकर्ता नहीं है।

4. तकनीकी समाधान और अनुसंधान (Technological Solutions & Research)

  • उपग्रह निगरानी: चीन के ऊपरी इलाकों में नदी गतिविधियों और बांध निर्माण की उपग्रह इमेजरी और रिमोट सेंसिंग के माध्यम से निरंतर निगरानी करना।
  • हाइड्रोलॉजिकल मॉडलिंग: नदी के जल विज्ञान पर बांधों के संभावित प्रभावों का सटीक अनुमान लगाने के लिए उन्नत हाइड्रोलॉजिकल मॉडलिंग और सिमुलेशन का उपयोग करना।
  • आपदा प्रबंधन में नवाचार: नदी बेसिन के लिए अत्याधुनिक आपदा प्रबंधन प्रोटोकॉल और प्रौद्योगिकियों को लागू करना।

5. सार्वजनिक जागरूकता और हितधारक भागीदारी (Public Awareness & Stakeholder Participation)

  • स्थानीय समुदायों, विशेषज्ञों और नागरिक समाज संगठनों को इस मुद्दे के बारे में शिक्षित करना और उनकी भागीदारी सुनिश्चित करना, विशेषकर पर्यावरण आकलन और शमन रणनीतियों में।

6. आर्थिक और सुरक्षा संबंधी पहलू (Economic and Security Aspects)

  • विविधीकृत जल स्रोत: जल स्रोतों को विविधीकृत करने के लिए वैकल्पिक तकनीकों में निवेश करना, जैसे कि अलवणीकरण (desalination) या अपशिष्ट जल उपचार, यदि भविष्य में आवश्यक हो।
  • सीमावर्ती बुनियादी ढाँचे का सुदृढ़ीकरण: अरुणाचल प्रदेश और असम में सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़क, पुल और अन्य महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे को मजबूत करना ताकि किसी भी आपात स्थिति से निपटा जा सके।

अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य और मिसालें (International Perspective and Precedents)

ट्रांसबाउंड्री जल विवादों का प्रबंधन कोई नई बात नहीं है। दुनिया भर में कई नदियों पर ऐसे संघर्ष और सहयोग के उदाहरण मिलते हैं:

  • नील नदी: नील नदी के पानी पर मिस्र, इथियोपिया और सूडान के बीच ऐतिहासिक विवाद रहा है, विशेष रूप से इथियोपिया के ग्रैंड रेनेसां डैम (GERD) के निर्माण के बाद। यहां भी ऊपरी और निचले तटवर्ती देशों के अधिकारों और जरूरतों के बीच संतुलन खोजने की चुनौती है।
  • मेकांग नदी: चीन द्वारा मेकांग नदी (जो लाओस, थाईलैंड, कंबोडिया और वियतनाम से होकर बहती है) पर कई बांधों का निर्माण भी निचले तटवर्ती देशों के लिए चिंता का विषय रहा है। डेटा साझाकरण और सहयोग के लिए मेकांग नदी आयोग (MRC) जैसा मंच मौजूद है, लेकिन चीन इसका पूर्ण सदस्य नहीं है।
  • सिंधु जल संधि: भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) एक सफल उदाहरण है कि कैसे दो विरोधी देश भी जल साझाकरण पर एक स्थायी समझौता कर सकते हैं, हालाँकि इसमें भी समय-समय पर चुनौतियां आती हैं।

इन मिसालों से पता चलता है कि ट्रांसबाउंड्री जल प्रबंधन में डेटा साझाकरण, पारदर्शिता, विश्वास-निर्माण और एक बाध्यकारी कानूनी ढांचा कितना महत्वपूर्ण है। चीन के साथ ब्रह्मपुत्र के लिए भी ऐसे ही एक व्यापक और पारदर्शी ढांचे की आवश्यकता है।

आगे की राह (Way Forward)

चीन के ‘सुपर डैम’ के निर्माण से उत्पन्न चुनौती बहुआयामी और जटिल है, जिसका कोई त्वरित या आसान समाधान नहीं है। भारत को एक समग्र और दूरदर्शी दृष्टिकोण अपनाना होगा:

  1. सक्रिय कूटनीति: भारत को चीन के साथ जल-साझाकरण समझौते के लिए सक्रिय रूप से दबाव जारी रखना चाहिए। इस प्रक्रिया में वैज्ञानिक आंकड़ों और अंतर्राष्ट्रीय जल कानूनों का उपयोग एक मजबूत आधार प्रदान कर सकता है। बांग्लादेश जैसे अन्य निचले तटवर्ती देशों के साथ मिलकर एक मजबूत क्षेत्रीय मोर्चा बनाना भी प्रभावी हो सकता है।
  2. आत्मनिर्भरता और बुनियादी ढाँचा: चीन के कार्यों के बावजूद, भारत को अपनी जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए घरेलू स्तर पर मजबूत जल प्रबंधन नीतियों और बुनियादी ढाँचे का निर्माण करना होगा। इसमें जल संचयन, प्रभावी सिंचाई, और भारत के भीतर भंडारण क्षमता बढ़ाना शामिल है।
  3. पर्यावरणीय आकलन: परियोजना के संभावित पर्यावरणीय प्रभावों का व्यापक और स्वतंत्र वैज्ञानिक मूल्यांकन आवश्यक है। यह न केवल भारतीय चिंताओं को बल देगा, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का ध्यान भी आकर्षित करेगा।
  4. आपदा तैयारियों को मजबूत करना: असम और अरुणाचल प्रदेश में बाढ़ और सूखे दोनों के लिए प्रभावी आपदा प्रबंधन योजनाओं और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करना प्राथमिकता होनी चाहिए।
  5. अनुसंधान और विकास: नदी बेसिन के जल विज्ञान, पारिस्थितिकी और भूगर्भीय स्थिरता पर गहन अनुसंधान करना, ताकि संभावित खतरों का सटीक आकलन किया जा सके और प्रभावी शमन रणनीतियां विकसित की जा सकें।

निष्कर्ष (Conclusion)

ब्रह्मपुत्र नदी पर चीन का ‘सुपर डैम’ एक गंभीर चुनौती है, लेकिन यह भारत के लिए अपनी जल कूटनीति, जल प्रबंधन और राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीतियों को पुनर्गठित करने का एक अवसर भी है। यह केवल एक इंजीनियरिंग परियोजना नहीं है, बल्कि एक भू-रणनीतिक खेल है जिसमें भारत को सतर्क और सक्रिय रहना होगा। सहयोग और दृढ़ता के मिश्रण के साथ, भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि ब्रह्मपुत्र, पूर्वोत्तर की जीवनदायिनी, भविष्य में भी अपनी समृद्धि और प्रवाह को बनाए रखे। यह सुनिश्चित करना कि यह महान नदी, जो कई सभ्यताओं की जीवनरेखा रही है, भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी एक साझा विरासत बनी रहे, एक सामूहिक जिम्मेदारी है।

UPSC परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न (Practice Questions for UPSC Exam)

प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) – 10 MCQs

  1. प्रश्न 1: निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:

    1. ब्रह्मपुत्र नदी तिब्बत में यारलुंग सांगपो के नाम से जानी जाती है।
    2. चीन द्वारा प्रस्तावित ‘सुपर डैम’ परियोजना थ्री गॉर्जेस डैम से अधिक बिजली उत्पादन क्षमता वाली होगी।
    3. ब्रह्मपुत्र नदी केवल भारत और बांग्लादेश से होकर बहती है।

    उपरोक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

    (A) केवल I और II

    (B) केवल II और III

    (C) केवल I

    (D) I, II और III

    उत्तर: (A)

    व्याख्या: कथन I और II सही हैं। कथन III गलत है क्योंकि ब्रह्मपुत्र नदी तिब्बत (चीन), भारत और बांग्लादेश से होकर बहती है।

  2. प्रश्न 2: चीन द्वारा प्रस्तावित ‘सुपर डैम’ परियोजना ब्रह्मपुत्र नदी के किस हिस्से पर स्थित है?

    (A) लिंकांग क्षेत्र

    (B) मेडोग काउंटी के ‘ग्रेट बेंड’ क्षेत्र

    (C) चांग्शा डेल्टा

    (D) वुहान के निकट

    उत्तर: (B)

    व्याख्या: चीन का ‘सुपर डैम’ तिब्बत में मेडोग (मोतुओ) काउंटी में यारलुंग सांगपो के “ग्रेट बेंड” के पास प्रस्तावित है।

  3. प्रश्न 3: ‘जलाशय-प्रेरित भूकंपीयता’ (Reservoir-Induced Seismicity – RIS) शब्द का सबसे अच्छा वर्णन क्या है?

    (A) ज्वालामुखी विस्फोट से उत्पन्न भूकंप।

    (B) भूस्खलन के कारण होने वाले छोटे भूकंप।

    (C) बड़े जलाशयों में पानी भरने से उत्पन्न होने वाले भूकंप।

    (D) प्लेट विवर्तनिकी के कारण होने वाले भूकंप।

    उत्तर: (C)

    व्याख्या: जलाशय-प्रेरित भूकंपीयता (RIS) एक ऐसी घटना है जहाँ बड़े जलाशयों में पानी भरने से पृथ्वी की पपड़ी पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है, जिससे पहले से ही तनावग्रस्त फॉल्ट लाइनों में भूकंपीय गतिविधि उत्पन्न हो सकती है।

  4. प्रश्न 4: निम्नलिखित में से कौन-सी नदी ब्रह्मपुत्र की एक भारतीय सहायक नदी है?

    (A) गंगा

    (B) यमुना

    (C) सुबनसिरी

    (D) नर्मदा

    उत्तर: (C)

    व्याख्या: सुबनसिरी ब्रह्मपुत्र की एक प्रमुख भारतीय सहायक नदी है। गंगा, यमुना और नर्मदा भारत की अन्य बड़ी नदियाँ हैं लेकिन ब्रह्मपुत्र की सहायक नदियाँ नहीं हैं।

  5. प्रश्न 5: भारत और चीन के बीच ब्रह्मपुत्र नदी के संबंध में मुख्य चिंता क्या है?

    (A) चीन द्वारा नदी पर पर्यटन सुविधाओं का विकास।

    चीन द्वारा जल-साझाकरण समझौते का अभाव और ऊपरी तटबंध पर बांध निर्माण।

    (C) चीन द्वारा नदी के जल का अत्यधिक प्रदूषण।

    (D) चीन द्वारा नदी के मार्ग में बदलाव।

    उत्तर: (B)

    व्याख्या: मुख्य चिंता चीन द्वारा वास्तविक समय के जल डेटा को साझा करने के लिए किसी व्यापक समझौते की कमी और उसके ऊपरी तटवर्ती बांध निर्माण की योजनाएं हैं, जो जल प्रवाह और बाढ़ नियंत्रण को प्रभावित कर सकती हैं।

  6. प्रश्न 6: निम्नलिखित में से कौन-सा देश ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन का हिस्सा नहीं है?

    (A) भूटान

    (B) नेपाल

    (C) म्यांमार

    (D) बांग्लादेश

    उत्तर: (C)

    व्याख्या: ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन में चीन (तिब्बत), भारत, बांग्लादेश और भूटान के कुछ हिस्से शामिल हैं। नेपाल सीधे ब्रह्मपुत्र बेसिन का हिस्सा नहीं है।

  7. प्रश्न 7: ब्रह्मपुत्र नदी पर चीन द्वारा निर्मित या निर्माणाधीन प्रमुख बांधों में से एक ज़ांगमू (Zangmu) बांध कहाँ स्थित है?

    (A) हुनान प्रांत

    (B) तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र

    (C) सिचुआन प्रांत

    (D) युन्नान प्रांत

    उत्तर: (B)

    व्याख्या: ज़ांगमू बांध तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र में यारलुंग सांगपो (ब्रह्मपुत्र) नदी पर स्थित है, और यह चीन के ऊपरी तटबंध पर बनाए गए शुरुआती बड़े बांधों में से एक है।

  8. प्रश्न 8: ‘संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन ऑन द लॉ ऑफ द नॉन-नेविगेशनल यूजेस ऑफ इंटरनेशनल वाटरकोर्सेज, 1997’ (UN Convention on the Law of the Non-Navigational Uses of International Watercourses, 1997) का प्राथमिक उद्देश्य क्या है?

    (A) अंतर्राष्ट्रीय समुद्री व्यापार को विनियमित करना।

    (B) अंतर्राष्ट्रीय जलमार्गों पर नेविगेशन के नियमों को स्थापित करना।

    (C) अंतर्राष्ट्रीय जलमार्गों के गैर-नौवहन उपयोगों के लिए नियमों को स्थापित करना और विवाद समाधान प्रदान करना।

    (D) केवल सीमा पार प्रदूषण को नियंत्रित करना।

    उत्तर: (C)

    व्याख्या: यह कन्वेंशन अंतर्राष्ट्रीय जलमार्गों के गैर-नौवहन उपयोगों से संबंधित राज्यों के अधिकारों और दायित्वों को निर्धारित करता है, जिसका उद्देश्य न्यायसंगत और उचित उपयोग के सिद्धांतों के आधार पर विवादों को हल करना है।

  9. प्रश्न 9: भारत द्वारा ब्रह्मपुत्र नदी पर चीन के बांधों के जवाब में अपनी जल सुरक्षा बढ़ाने के लिए प्रस्तावित संभावित कदमों में से कौन-सा शामिल नहीं है?

    (A) ब्रह्मपुत्र की सहायक नदियों पर भंडारण बांधों का निर्माण।

    (B) चीन के साथ केवल एकतरफा डेटा साझाकरण पर निर्भर रहना।

    (C) बेहतर बाढ़ पूर्वानुमान और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली स्थापित करना।

    (D) कूटनीतिक रूप से चीन पर जल-साझाकरण समझौते के लिए दबाव डालना।

    उत्तर: (B)

    व्याख्या: भारत का उद्देश्य एकतरफा डेटा साझाकरण पर निर्भर रहना नहीं, बल्कि एक व्यापक और पारदर्शी जल-साझाकरण समझौते के लिए चीन पर दबाव डालना है। अन्य विकल्प भारत की संभावित रणनीतियों का हिस्सा हैं।

  10. प्रश्न 10: मेकांग नदी आयोग (Mekong River Commission – MRC) का गठन किस उद्देश्य से किया गया था?

    (A) मेकांग बेसिन में सैन्य अभ्यास आयोजित करना।

    (B) मेकांग नदी के जल संसाधनों के स्थायी विकास और प्रबंधन को बढ़ावा देना।

    (C) मेकांग नदी बेसिन में व्यापार को बढ़ावा देना।

    (D) मेकांग नदी के लिए केवल बाढ़ नियंत्रण उपायों पर ध्यान केंद्रित करना।

    उत्तर: (B)

    व्याख्या: मेकांग नदी आयोग (MRC) मेकांग नदी के जल संसाधनों और संबंधित संसाधनों के सतत विकास और प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए गठित एक अंतर-सरकारी संगठन है।

मुख्य परीक्षा (Mains)

  1. “ब्रह्मपुत्र नदी पर चीन द्वारा एक ‘सुपर डैम’ के निर्माण की योजना भारत के लिए बहुआयामी चुनौतियों को प्रस्तुत करती है।” इस कथन का समालोचनात्मक विश्लेषण करें और बताएं कि यह भारत की जल सुरक्षा, पर्यावरण और राष्ट्रीय सुरक्षा को कैसे प्रभावित कर सकता है।

  2. चीन के ‘सुपर डैम’ के निर्माण के जवाब में भारत द्वारा अपनाई जा सकने वाली विभिन्न कूटनीतिक, तकनीकी और अवसंरचनात्मक रणनीतियों पर विस्तृत चर्चा करें। क्या ब्रह्मपुत्र नदी के लिए भारत-चीन-बांग्लादेश के बीच एक बहुपक्षीय जल-साझाकरण ढांचा बनाना संभव है? विश्लेषण करें।

  3. ट्रांसबाउंड्री नदियों के जल प्रबंधन में ‘ऊपरी तटवर्ती’ और ‘निचले तटवर्ती’ देशों के बीच हितों के टकराव को समझाएं। ब्रह्मपुत्र नदी के संदर्भ में भारत के लिए अंतर्राष्ट्रीय जल कानूनों और पूर्व दृष्टांतों (जैसे सिंधु जल संधि या मेकांग नदी आयोग) से क्या सीख ली जा सकती है?

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