न्यायपालिका के लिए महाभियोग का अग्निपरीक्षा: एक न्यायाधीश पर 100 सांसदों का प्रस्ताव और आगे क्या?
चर्चा में क्यों? (Why in News?):
हाल ही में केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू के एक बयान ने न्यायपालिका के भीतर एक गंभीर चर्चा छेड़ दी है। उन्होंने संकेत दिया है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ कदाचार के आरोपों को लेकर महाभियोग का प्रस्ताव संसद में लाया जा सकता है। यह प्रस्ताव तब आता है जब कथित तौर पर 100 से अधिक सांसदों ने इस पर हस्ताक्षर कर दिए हैं, जिससे यह प्रक्रिया शुरू करने के लिए आवश्यक समर्थन मिल गया है। यह मामला एक न्यायाधीश के घर से नकद राशि मिलने के आरोपों से जुड़ा है, जो न्यायिक ईमानदारी पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है। यह घटनाक्रम भारतीय न्यायपालिका की जवाबदेही, न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया और न्यायिक स्वतंत्रता की नाजुक प्रकृति को एक बार फिर केंद्र में ले आया है।
न्यायिक स्वतंत्रता का आधार: न्यायपालिका का महत्व
भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में न्यायपालिका का स्वतंत्र और निष्पक्ष होना अपरिहार्य है। यह संविधान का संरक्षक है, नागरिकों के मौलिक अधिकारों का रक्षक है, और विधायिका तथा कार्यपालिका पर नियंत्रण रखता है। एक स्वतंत्र न्यायपालिका ही ‘कानून का शासन’ सुनिश्चित करती है, जहाँ कोई भी व्यक्ति, पद या सत्ता कानून से ऊपर नहीं होती।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए संविधान ने कई प्रावधान किए हैं, जैसे:
- न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया।
- उनके कार्यकाल की सुरक्षा (वे केवल महाभियोग द्वारा हटाए जा सकते हैं)।
- उनके वेतन और भत्तों का संचित निधि पर भारित होना।
- न्यायालय की अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति।
- न्यायाधीशों के आचरण पर संसद में चर्चा पर प्रतिबंध।
लेकिन, जैसा कि हर स्वतंत्रता के साथ जवाबदेही भी आती है, न्यायाधीशों को उनके पद से हटाने के लिए एक कठोर और जटिल प्रक्रिया भी निर्धारित की गई है – महाभियोग। यह प्रक्रिया न्यायिक स्वतंत्रता को बनाए रखने और न्यायाधीशों को मनमाने ढंग से हटाने से रोकने के लिए डिज़ाइन की गई है, साथ ही यह सुनिश्चित करती है कि गंभीर कदाचार या अक्षमता के मामलों में उन्हें जवाबदेह ठहराया जा सके।
न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया: महाभियोग
भारत में सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश को केवल ‘सिद्ध कदाचार’ (Proved Misbehaviour) या ‘अक्षमता’ (Incapacity) के आधार पर संसद द्वारा महाभियोग की प्रक्रिया के माध्यम से ही हटाया जा सकता है। यह प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 124(4) और अनुच्छेद 217/218 के साथ-साथ न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 (Judges (Inquiry) Act, 1968) द्वारा नियंत्रित होती है।
महाभियोग की विस्तृत प्रक्रिया (Step-by-step Process of Impeachment):
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प्रस्ताव की शुरुआत (Initiation of Motion):
- किसी न्यायाधीश को हटाने का प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में शुरू किया जा सकता है – लोकसभा या राज्यसभा।
- यदि प्रस्ताव लोकसभा में पेश किया जाता है, तो उसे कम से कम 100 सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित होना चाहिए।
- यदि प्रस्ताव राज्यसभा में पेश किया जाता है, तो उसे कम से कम 50 सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित होना चाहिए।
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पीठासीन अधिकारी का निर्णय (Decision by Presiding Officer):
- हस्ताक्षरित प्रस्ताव प्राप्त होने पर, लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) या राज्यसभा सभापति (Chairman) उस प्रस्ताव को स्वीकार (Admit) कर सकते हैं या अस्वीकार (Reject) कर सकते हैं।
- पीठासीन अधिकारी का यह निर्णय विवेकाधीन होता है, लेकिन आमतौर पर गंभीर आरोपों पर विचार किया जाता है।
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जांच समिति का गठन (Constitution of Inquiry Committee):
- यदि प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है, तो पीठासीन अधिकारी आरोपों की जांच के लिए एक तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन करते हैं।
- इस समिति में निम्नलिखित सदस्य होते हैं:
- भारत के मुख्य न्यायाधीश या सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश।
- किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश।
- एक प्रख्यात न्यायविद् (Distinguished Jurist)।
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जांच समिति की रिपोर्ट (Report of the Inquiry Committee):
- यह समिति आरोपों की गहन जांच करती है। न्यायाधीश को अपना बचाव प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाता है।
- यदि समिति न्यायाधीश को ‘सिद्ध कदाचार’ या ‘अक्षमता’ का दोषी पाती है, तो वह इसकी रिपोर्ट संबंधित सदन को प्रस्तुत करती है।
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संसदीय विचार (Parliamentary Consideration):
- यदि समिति न्यायाधीश को दोषी पाती है, तो सदन (जिसमें प्रस्ताव शुरू किया गया था) इस रिपोर्ट पर विचार करता है।
- यदि रिपोर्ट में न्यायाधीश को दोषी पाया जाता है, तो सदन को न्यायाधीश को हटाने के प्रस्ताव पर मतदान करना होता है।
- यह प्रस्ताव सदन की कुल सदस्यता के बहुमत (अर्थात 50%+1) और उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से पारित होना चाहिए। इसे ‘विशेष बहुमत’ कहते हैं।
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दूसरे सदन में अनुमोदन (Approval by the Other House):
- यदि एक सदन में प्रस्ताव विशेष बहुमत से पारित हो जाता है, तो इसे दूसरे सदन में भेजा जाता है।
- दूसरा सदन भी इसे कुल सदस्यता के बहुमत और उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से पारित करेगा।
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राष्ट्रपति का आदेश (President’s Order):
- दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होने के बाद, इसे राष्ट्रपति के पास प्रस्तुत किया जाता है।
- राष्ट्रपति तब न्यायाधीश को हटाने का आदेश जारी करते हैं। इसके साथ ही न्यायाधीश अपने पद से हट जाता है।
यह प्रक्रिया इतनी जटिल और कठोर इसलिए बनाई गई है ताकि न्यायाधीशों को राजनीतिक दबाव या प्रतिशोध के कारण आसानी से न हटाया जा सके। यह न्यायिक स्वतंत्रता के सिद्धांत को मजबूत करती है, जबकि यह भी सुनिश्चित करती है कि गंभीर कदाचार के मामलों में जवाबदेही तय हो सके।
न्यायाधीशों को हटाने के ऐतिहासिक/उल्लेखनीय मामले
भारत के इतिहास में, किसी भी न्यायाधीश को महाभियोग द्वारा पद से हटाया नहीं गया है। हालांकि, कई न्यायाधीशों के खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही शुरू की गई है, या तो वे असफल रहे हैं या न्यायाधीश ने कार्यवाही पूरी होने से पहले इस्तीफा दे दिया है।
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न्यायमूर्ति वी. रामास्वामी (1991): सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति वी. रामास्वामी के खिलाफ कदाचार के आरोप लगे थे। लोकसभा में महाभियोग का प्रस्ताव पेश किया गया था और एक जांच समिति ने उन्हें दोषी पाया था। हालांकि, 1993 में जब लोकसभा में प्रस्ताव पर मतदान हुआ, तो यह विशेष बहुमत प्राप्त करने में विफल रहा क्योंकि सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी ने मतदान से परहेज किया था। यह महाभियोग का पहला और सबसे महत्वपूर्ण प्रयास था।
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न्यायमूर्ति सौमित्र सेन (2009): कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सौमित्र सेन के खिलाफ धन के दुरुपयोग का आरोप लगा था। राज्यसभा में महाभियोग प्रस्ताव पारित हो गया था, लेकिन इससे पहले कि लोकसभा में इस पर विचार किया जाता, न्यायमूर्ति सेन ने इस्तीफा दे दिया।
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न्यायमूर्ति पी.डी. दिनकरण (2011): सिक्किम उच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति पी.डी. दिनकरण के खिलाफ भ्रष्टाचार और भूमि अतिक्रमण सहित विभिन्न आरोप लगे थे। राज्यसभा के सभापति ने आरोपों की जांच के लिए एक समिति का गठन किया था, लेकिन न्यायमूर्ति दिनकरण ने समिति की जांच रिपोर्ट आने से पहले ही इस्तीफा दे दिया।
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न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला (2015): गुजरात उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला के खिलाफ कथित रूप से “जातिगत टिप्पणी” करने के लिए महाभियोग का प्रस्ताव लाया गया था। हालांकि, यह मामला आगे नहीं बढ़ा।
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न्यायमूर्ति सी.वी. नागार्जुन रेड्डी (2016): आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति सी.वी. नागार्जुन रेड्डी के खिलाफ एक दलित न्यायिक अधिकारी को प्रताड़ित करने का आरोप लगा था। राज्यसभा में 61 सांसदों द्वारा महाभियोग का नोटिस दिया गया था, लेकिन अंततः यह प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ा और खारिज कर दिया गया।
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वर्तमान मामला (न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा): अब इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ कथित कदाचार (घर से कैश मिलने का मामला) के आरोप लगे हैं और 100 से अधिक सांसदों ने महाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि यह मामला किस दिशा में आगे बढ़ता है।
महाभियोग की चुनौतियाँ और आलोचनाएँ
महाभियोग की प्रक्रिया, हालांकि न्यायिक स्वतंत्रता के लिए एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच है, इसकी अपनी चुनौतियाँ और आलोचनाएँ भी हैं:
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अत्यधिक जटिल और समय लेने वाली प्रक्रिया: न्यायाधीशों (जांच) अधिनियम, 1968 द्वारा निर्धारित प्रक्रिया बहुत लंबी और विस्तृत है, जिसमें काफी समय लगता है। यह न्याय में देरी के बराबर हो सकता है, जबकि आरोपी न्यायाधीश अपने पद पर बने रहते हैं।
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राजनीतिकरण की संभावना: चूंकि महाभियोग की प्रक्रिया संसद के माध्यम से चलती है, इसलिए इसमें राजनीतिकरण का खतरा हमेशा बना रहता है। न्यायाधीशों को राजनीतिक प्रतिशोध का लक्ष्य बनाया जा सकता है, जिससे न्यायिक स्वतंत्रता खतरे में पड़ सकती है।
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‘सिद्ध कदाचार’ की अस्पष्ट परिभाषा: संविधान या किसी भी कानून में ‘सिद्ध कदाचार’ या ‘अक्षमता’ की स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई है। यह अस्पष्टता मनमानी व्याख्या या दुरुपयोग का मार्ग खोल सकती है।
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जनता का विश्वास: जब किसी न्यायाधीश के खिलाफ ऐसे गंभीर आरोप लगते हैं, तो इससे जनता का न्यायपालिका में विश्वास हिलता है। लंबी प्रक्रिया और अंततः कार्यवाही का असफल होना इस विश्वास को और कम कर सकता है।
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मीडिया ट्रायल: न्यायाधीश के खिलाफ आरोपों के सार्वजनिक होने से मीडिया ट्रायल की संभावना बढ़ जाती है, जिससे निष्पक्ष जांच और न्याय के सिद्धांतों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
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विरले उपयोग: प्रक्रिया की कठोरता और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण, महाभियोग का उपयोग बहुत विरले ही होता है, भले ही गंभीर कदाचार के मामले सामने आएं।
न्यायिक जवाबदेही बनाम न्यायिक स्वतंत्रता: एक नाजुक संतुलन
न्यायिक स्वतंत्रता और न्यायिक जवाबदेही एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक मजबूत लोकतंत्र के लिए दोनों ही आवश्यक हैं।
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न्यायिक स्वतंत्रता: यह सुनिश्चित करती है कि न्यायाधीश बिना किसी भय या पक्षपात के, निष्पक्ष रूप से निर्णय ले सकें। यह संविधान के संरक्षक के रूप में न्यायपालिका की भूमिका के लिए महत्वपूर्ण है। अगर न्यायाधीशों को आसानी से हटाया जा सके, तो वे कार्यपालिका या विधायिका के दबाव में आ सकते हैं।
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न्यायिक जवाबदेही: यह सुनिश्चित करती है कि न्यायाधीश भी कानून और नैतिकता के दायरे में रहें। किसी भी संस्था को असीमित शक्ति नहीं मिलनी चाहिए। जवाबदेही न्यायिक अखंडता और जनता के विश्वास को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है। अगर न्यायाधीश कदाचार में लिप्त होते हैं और उन्हें जवाबदेह नहीं ठहराया जाता है, तो यह न्याय प्रणाली को कमजोर करता है।
महाभियोग की प्रक्रिया इन दोनों के बीच संतुलन बनाने का एक संवैधानिक प्रयास है। यह न्यायाधीशों को आसानी से हटाने से रोकती है (स्वतंत्रता की रक्षा), लेकिन गंभीर कदाचार के मामलों में उन्हें जवाबदेह भी ठहराती है (जवाबदेही सुनिश्चित करना)।
जवाबदेही के अन्य तंत्र:
महाभियोग के अलावा, न्यायिक जवाबदेही के कुछ अन्य तंत्र भी मौजूद हैं, हालांकि वे कम औपचारिक या आंतरिक प्रकृति के हैं:
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हाउस प्रक्रिया (In-House Procedure): सर्वोच्च न्यायालय ने एक ‘इन-हाउस’ प्रक्रिया विकसित की है जहाँ सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतों की जांच कर सकते हैं। यह प्रक्रिया अनौपचारिक है और न्यायाधीशों के इस्तीफे का कारण बन सकती है, लेकिन इसमें महाभियोग जितनी कानूनी शक्ति नहीं होती।
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मुख्य न्यायाधीश की भूमिका: संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की भूमिका न्यायाधीशों के आचरण की निगरानी करने में महत्वपूर्ण होती है।
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नैतिक संहिता: हालांकि भारत में न्यायाधीशों के लिए कोई औपचारिक ‘आचार संहिता’ नहीं है, लेकिन समय-समय पर विभिन्न प्रस्तावों और न्यायिक निर्णयों के माध्यम से नैतिक दिशानिर्देश जारी किए गए हैं, जो न्यायाधीशों से उच्च नैतिक मानकों का पालन करने की अपेक्षा करते हैं।
आगे की राह (Way Forward)
न्यायिक जवाबदेही को मजबूत करने और न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा करने के लिए निम्नलिखित कदमों पर विचार किया जा सकता है:
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‘सिद्ध कदाचार’ की स्पष्ट परिभाषा: न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 में ‘सिद्ध कदाचार’ और ‘अक्षमता’ जैसे शब्दों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाना चाहिए। इससे प्रक्रिया में मनमानी की गुंजाइश कम होगी और आरोपों की जांच अधिक उद्देश्यपूर्ण तरीके से हो सकेगी।
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राष्ट्रीय न्यायिक आयोग (National Judicial Commission): न्यायिक नियुक्तियों और कदाचार के मामलों से निपटने के लिए एक स्थायी, स्वतंत्र राष्ट्रीय न्यायिक आयोग (NJC) की स्थापना पर पुनर्विचार किया जा सकता है। ऐसा आयोग राजनीतिक प्रभाव से मुक्त होकर न्यायिक कदाचार की शिकायतों की जांच कर सकता है और आवश्यक कार्रवाई की सिफारिश कर सकता है। (हालांकि, पूर्व में NJAC को SC ने असंवैधानिक करार दिया था)।
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न्यायिक जवाबदेही कानून: एक व्यापक न्यायिक जवाबदेही कानून लाने पर विचार किया जा सकता है जो न्यायाधीशों के लिए आचार संहिता, कदाचार की परिभाषा और शिकायतों के निवारण के लिए एक प्रभावी तंत्र स्थापित करे।
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आंतरिक जवाबदेही तंत्र को मजबूत करना: न्यायपालिका के भीतर मौजूदा ‘इन-हाउस’ प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, समयबद्ध और प्रभावी बनाया जाना चाहिए। शिकायतों के निपटान के लिए एक स्पष्ट और सार्वजनिक रूप से ज्ञात प्रोटोकॉल होना चाहिए।
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नैतिक शिक्षा और जागरूकता: न्यायाधीशों के लिए नियमित नैतिक शिक्षा कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए ताकि उन्हें न्यायिक आचरण के उच्चतम मानकों के बारे में जागरूक रखा जा सके।
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सार्वजनिक पारदर्शिता: न्यायिक कदाचार के आरोपों से निपटने की प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता लाई जानी चाहिए, जिससे जनता का विश्वास बना रहे, लेकिन साथ ही न्यायाधीश की गोपनीयता और सम्मान का भी ध्यान रखा जाए।
निष्कर्ष
न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव की पहल भारतीय न्यायपालिका के लिए एक महत्वपूर्ण क्षण है। यह न केवल एक व्यक्तिगत न्यायाधीश के आचरण पर सवाल उठाता है, बल्कि न्यायिक स्वतंत्रता और जवाबदेही के बीच के शाश्वत संतुलन पर भी बहस छेड़ता है। भारत के संविधान निर्माताओं ने न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया को जानबूझकर कठोर बनाया ताकि न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनी रहे। हालांकि, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि गंभीर कदाचार के मामलों में न्यायाधीशों को जवाबदेह ठहराया जा सके। यह घटना भारतीय न्यायिक प्रणाली को अपनी आंतरिक प्रक्रियाओं का मूल्यांकन करने और यह सुनिश्चित करने का अवसर प्रदान करती है कि न्याय का मंदिर अपनी पवित्रता और जनता के विश्वास को बनाए रखे। न्यायिक संस्थाओं को स्वयं को मजबूत करना होगा, ताकि राजनीतिक हस्तक्षेप की आवश्यकता कम से कम हो, और न्यायपालिका वास्तव में एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और जवाबदेह स्तंभ के रूप में अपनी भूमिका निभा सके।
UPSC परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न (Practice Questions for UPSC Exam)
प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) – 10 MCQs
निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को केवल सिद्ध कदाचार या अक्षमता के आधार पर हटाया जा सकता है।
2. महाभियोग का प्रस्ताव केवल लोकसभा में ही शुरू किया जा सकता है।
3. किसी न्यायाधीश को हटाने के लिए महाभियोग प्रस्ताव को संबंधित सदन की कुल सदस्यता के बहुमत और उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से पारित होना चाहिए।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
a) केवल 1 और 2
b) केवल 1 और 3
c) केवल 2 और 3
d) 1, 2 और 3
उत्तर: b)
व्याख्या: कथन 1 सही है। संविधान के अनुच्छेद 124(4) के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को केवल सिद्ध कदाचार या अक्षमता के आधार पर हटाया जा सकता है। कथन 2 गलत है। महाभियोग का प्रस्ताव लोकसभा या राज्यसभा दोनों में से किसी भी सदन में शुरू किया जा सकता है। कथन 3 सही है। न्यायाधीश को हटाने के लिए महाभियोग प्रस्ताव को दोनों सदनों में विशेष बहुमत (कुल सदस्यता का बहुमत और उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत) से पारित होना आवश्यक है।
2. भारत में किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया के संबंध में, निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है?
a) यह प्रक्रिया न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 द्वारा शासित होती है।
b) यदि प्रस्ताव लोकसभा में पेश किया जाता है, तो उसे कम से कम 100 सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित होना चाहिए।
c) जांच समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश या सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश, किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और एक प्रख्यात न्यायविद् शामिल होते हैं।
d) राष्ट्रपति सीधे किसी न्यायाधीश को हटा सकते हैं यदि उनके खिलाफ गंभीर शिकायतें हों।
उत्तर: d)
व्याख्या: कथन d गलत है। राष्ट्रपति सीधे किसी न्यायाधीश को नहीं हटा सकते। हटाने की प्रक्रिया में संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित करना और फिर राष्ट्रपति द्वारा आदेश जारी करना शामिल है। अन्य सभी कथन सही हैं।
3. भारत में महाभियोग की प्रक्रिया के तहत हटाए गए पहले और एकमात्र सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश कौन हैं?
a) न्यायमूर्ति वी. रामास्वामी
b) न्यायमूर्ति सौमित्र सेन
c) न्यायमूर्ति पी.डी. दिनकरण
d) कोई नहीं
उत्तर: d)
व्याख्या: भारत के इतिहास में आज तक किसी भी न्यायाधीश को महाभियोग द्वारा पद से हटाया नहीं गया है। न्यायमूर्ति वी. रामास्वामी के खिलाफ प्रस्ताव पारित नहीं हो पाया था, और न्यायमूर्ति सौमित्र सेन व पी.डी. दिनकरण ने कार्यवाही पूरी होने से पहले ही इस्तीफा दे दिया था।
4. न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत, यदि राज्यसभा में महाभियोग का प्रस्ताव पेश किया जाता है, तो उसे कम से कम कितने सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित होना चाहिए?
a) 50
b) 100
c) 75
d) 25
उत्तर: a)
व्याख्या: न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के अनुसार, यदि प्रस्ताव राज्यसभा में पेश किया जाता है, तो उसे कम से कम 50 सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित होना चाहिए। यदि लोकसभा में, तो 100 सदस्य।
5. न्यायाधीशों के महाभियोग के संदर्भ में, जांच समिति की संरचना के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. इसमें सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश शामिल होने चाहिए।
2. इसमें एक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश शामिल होने चाहिए।
3. इसमें भारत के अटॉर्नी जनरल शामिल होने चाहिए।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
a) केवल 1
b) केवल 1 और 2
c) केवल 2 और 3
d) 1, 2 और 3
उत्तर: b)
व्याख्या: जांच समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश या सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश, किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और एक प्रख्यात न्यायविद् शामिल होते हैं। अटॉर्नी जनरल इसमें शामिल नहीं होते।
6. भारतीय संविधान का कौन-सा अनुच्छेद सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया से संबंधित है?
a) अनुच्छेद 123
b) अनुच्छेद 124(4)
c) अनुच्छेद 125
d) अनुच्छेद 126
उत्तर: b)
व्याख्या: अनुच्छेद 124(4) सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया से संबंधित है।
7. ‘सिद्ध कदाचार’ (Proved Misbehaviour) शब्द, जो न्यायाधीशों को हटाने का आधार है, की परिभाषा किसमें दी गई है?
a) भारत का संविधान
b) न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968
c) सर्वोच्च न्यायालय के नियमों द्वारा
d) किसी में भी स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं है।
उत्तर: d)
व्याख्या: ‘सिद्ध कदाचार’ या ‘अक्षमता’ शब्द संविधान या न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 में स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं हैं। यह इसकी आलोचनाओं में से एक है।
8. भारत में न्यायाधीशों के महाभियोग की प्रक्रिया में पीठासीन अधिकारी (लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति) की क्या भूमिका होती है?
a) वे स्वयं आरोपों की जांच करते हैं।
b) वे महाभियोग प्रस्ताव को सीधे राष्ट्रपति के पास भेजते हैं।
c) वे महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं और एक जांच समिति का गठन कर सकते हैं।
d) वे केवल प्रस्ताव पर मतदान का संचालन करते हैं।
उत्तर: c)
व्याख्या: पीठासीन अधिकारी प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार करने और आरोपों की जांच के लिए एक तीन सदस्यीय समिति का गठन करने का अधिकार रखते हैं।
9. निम्नलिखित में से किस न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव राज्यसभा में पारित हो गया था, लेकिन उन्होंने लोकसभा में विचार से पहले इस्तीफा दे दिया था?
a) न्यायमूर्ति वी. रामास्वामी
b) न्यायमूर्ति सौमित्र सेन
c) न्यायमूर्ति पी.डी. दिनकरण
d) न्यायमूर्ति सी.वी. नागार्जुन रेड्डी
उत्तर: b)
व्याख्या: न्यायमूर्ति सौमित्र सेन के खिलाफ राज्यसभा में महाभियोग प्रस्ताव पारित हो गया था, लेकिन उन्होंने लोकसभा में विचार से पहले इस्तीफा दे दिया था।
10. न्यायिक स्वतंत्रता के महत्व के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों का रक्षक है।
2. यह ‘कानून के शासन’ को सुनिश्चित करता है।
3. यह विधायिका और कार्यपालिका पर नियंत्रण रखता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
a) केवल 1 और 2
b) केवल 1 और 3
c) केवल 2 और 3
d) 1, 2 और 3
उत्तर: d)
व्याख्या: तीनों कथन सही हैं। एक स्वतंत्र न्यायपालिका लोकतंत्र के इन सभी महत्वपूर्ण पहलुओं को सुनिश्चित करती है।
मुख्य परीक्षा (Mains)
1. “न्यायिक स्वतंत्रता लोकतंत्र का आधार है, लेकिन असीमित स्वतंत्रता जवाबदेही की कमी पैदा कर सकती है।” भारत में न्यायिक स्वतंत्रता और जवाबदेही के बीच नाजुक संतुलन को महाभियोग की प्रक्रिया के संदर्भ में विश्लेषण करें।
2. न्यायाधीशों को हटाने की महाभियोग प्रक्रिया की कठोरता ने इसकी प्रभावशीलता को कैसे प्रभावित किया है? ‘सिद्ध कदाचार’ की अस्पष्ट परिभाषा के आलोक में इसकी चुनौतियों का समालोचनात्मक परीक्षण करें और संभावित सुधारों का सुझाव दें।
3. क्या आप मानते हैं कि भारत में न्यायिक कदाचार से निपटने के लिए एक राष्ट्रीय न्यायिक आयोग (NJC) जैसे एक स्वतंत्र तंत्र की आवश्यकता है? न्यायिक स्वतंत्रता पर इसके संभावित प्रभावों पर चर्चा करते हुए अपने तर्क का समर्थन करें।
4. भारत में न्यायिक जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए महाभियोग के अलावा अन्य कौन-से तंत्र मौजूद हैं? इन तंत्रों की प्रभावशीलता का मूल्यांकन करें और न्यायिक अखंडता को बनाए रखने के लिए आगे की राह सुझाएं।