उथल-पुथल भारत: उपराष्ट्रपति का अप्रत्याशित कदम, भीषण वर्षा और बढ़ता राजनीतिक उबाल
चर्चा में क्यों? (Why in News?):**
हाल के दिनों में भारत ने एक साथ कई महत्वपूर्ण घटनाक्रम देखे हैं, जिन्होंने देश के राजनीतिक, सामाजिक और पर्यावरणीय परिदृश्य पर अपनी गहरी छाप छोड़ी है। एक तरफ जहाँ अचानक हुए उपराष्ट्रपति के इस्तीफे ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है, वहीं दूसरी ओर कई राज्यों में मानसून की भीषण बारिश ने जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है। इसी बीच, उत्तर प्रदेश की सड़कों पर कांग्रेस का विरोध प्रदर्शन लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति के महत्व और राजनीतिक दलों की भूमिका को एक बार फिर रेखांकित कर रहा है। ये तीनों घटनाएँ, भले ही ऊपरी तौर पर अलग-अलग लगें, लेकिन वे भारत के शासन, आपदा प्रबंधन, संवैधानिक नैतिकता और लोकतांत्रिक लचीलेपन की क्षमता पर महत्वपूर्ण प्रकाश डालती हैं। यह लेख इन घटनाक्रमों का गहराई से विश्लेषण करेगा, इनके निहितार्थों को समझेगा, और यूपीएससी उम्मीदवारों के लिए एक व्यापक मार्गदर्शिका प्रस्तुत करेगा।
खंड 1: उपराष्ट्रपति का अचानक इस्तीफा – संवैधानिक और राजनीतिक निहितार्थ
भारत के उपराष्ट्रपति का पद संवैधानिक व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह पद न केवल राष्ट्रपति के बाद देश का दूसरा सर्वोच्च संवैधानिक पद है, बल्कि यह राज्यसभा के पदेन सभापति के रूप में विधायिका में भी केंद्रीय भूमिका निभाता है। हाल ही में हुए अचानक इस्तीफे ने इस पद की गरिमा और इससे जुड़ी संवैधानिक परंपराओं पर एक नई बहस छेड़ दी है।
उपराष्ट्रपति का पद: संवैधानिक प्रावधान और भूमिका
भारतीय संविधान का भाग V उपराष्ट्रपति से संबंधित प्रावधानों का वर्णन करता है, विशेष रूप से अनुच्छेद 63 से 71 तक।
- अनुच्छेद 63: भारत का एक उपराष्ट्रपति होगा।
- अनुच्छेद 64: उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होगा और लाभ का कोई अन्य पद धारण नहीं करेगा।
- अनुच्छेद 65: राष्ट्रपति के पद में आकस्मिक रिक्ति के दौरान, या जब राष्ट्रपति अनुपस्थिति, बीमारी या किसी अन्य कारण से अपने कार्यों का निर्वहन करने में असमर्थ हो, तब उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के रूप में कार्य करेगा या उसके कार्यों का निर्वहन करेगा।
योग्यताएँ:
उपराष्ट्रपति पद के लिए निम्नलिखित योग्यताएँ आवश्यक हैं:
- भारत का नागरिक हो।
- 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।
- राज्यसभा का सदस्य निर्वाचित होने की योग्यता रखता हो।
- किसी लाभ के पद पर न हो।
चुनाव प्रक्रिया:
उपराष्ट्रपति का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से एक निर्वाचक मंडल (Electoral College) द्वारा किया जाता है, जिसमें संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) के सभी सदस्य (निर्वाचित और मनोनीत) शामिल होते हैं। यह चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अनुसार एकल संक्रमणीय मत (Single Transferable Vote) द्वारा होता है और मतदान गुप्त होता है।
कार्यकाल और पदच्युति:
- उपराष्ट्रपति का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है।
- वह राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपने पद से इस्तीफा दे सकता है।
- उसे राज्यसभा द्वारा पारित एक प्रस्ताव द्वारा पद से हटाया जा सकता है, जिसे लोकसभा द्वारा अनुमोदित किया जाना चाहिए। इस प्रस्ताव को प्रस्तुत करने से कम से कम 14 दिन पहले नोटिस देना अनिवार्य है। हटाने का कोई विशेष आधार संविधान में वर्णित नहीं है।
रिक्ति की स्थिति:
उपराष्ट्रपति का पद निम्नलिखित स्थितियों में रिक्त हो सकता है:
- 5 वर्ष का कार्यकाल समाप्त होने पर।
- उनके इस्तीफा देने पर।
- उनके पदच्युति पर।
- उनकी मृत्यु पर।
- उनके चुनाव को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा शून्य घोषित किए जाने पर।
अचानक इस्तीफे के निहितार्थ
किसी भी संवैधानिक पद से अचानक इस्तीफा कई तरह के सवाल खड़े करता है।
- संवैधानिक परंपराएँ: उपराष्ट्रपति के पद से इस्तीफा अपेक्षाकृत दुर्लभ है। ऐसे कदम से संवैधानिक परंपराओं पर बहस छिड़ सकती है, खासकर यदि इसके पीछे स्पष्ट सार्वजनिक कारण न बताए गए हों।
- राजनीतिक अटकलें: तत्काल राजनीतिक गलियारों में विभिन्न तरह की अटकलें शुरू हो जाती हैं – क्या यह सरकार के भीतर किसी असहमति का परिणाम है? क्या उन्हें किसी अन्य, शायद अधिक महत्वपूर्ण, भूमिका के लिए तैयार किया जा रहा है? या क्या यह किसी व्यक्तिगत कारण से संबंधित है? ये अटकलें राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बना सकती हैं।
- सरकार पर प्रभाव: उपराष्ट्रपति का पद भले ही कार्यकारी शक्ति का केंद्र न हो, लेकिन राज्यसभा के सभापति के रूप में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है। उनका इस्तीफा संसदीय कार्यवाही पर अल्पकालिक प्रभाव डाल सकता है, खासकर यदि नए चुनाव में समय लगे।
- पद की गरिमा: संवैधानिक पदों से जुड़े हर फैसले का उस पद की गरिमा और संस्थागत अखंडता पर असर पड़ता है। पारदर्शिता और स्पष्टता ऐसे समय में और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
क्या आप जानते हैं? भारतीय इतिहास में यह पहला मौका नहीं है जब किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति ने इस्तीफा दिया हो। पूर्व में भी विभिन्न पदों पर आसीन व्यक्तियों ने अलग-अलग कारणों से इस्तीफे दिए हैं, जो कभी राजनीतिक तो कभी व्यक्तिगत कारणों से प्रेरित थे। इन घटनाओं का अध्ययन हमें भारतीय राजनीति की गतिशीलता को समझने में मदद करता है।
यूपीएससी के लिए महत्व:
यूपीएससी उम्मीदवारों के लिए यह घटना भारतीय राजव्यवस्था, विशेषकर संवैधानिक पदों, उनकी शक्तियों, कार्यों और पदच्युति/इस्तीफे की प्रक्रियाओं को समझने का एक उत्कृष्ट अवसर है। छात्रों को न केवल अनुच्छेदों को याद करना चाहिए, बल्कि उनके पीछे की भावना, संवैधानिक नैतिकता और राजनीतिक परंपराओं को भी समझना चाहिए।
खंड 2: कई राज्यों में बारिश का कहर – जलवायु परिवर्तन, आपदा प्रबंधन और सतत विकास
एक ओर जहाँ राजनीतिक उथल-पुथल देश का ध्यान खींच रही है, वहीं दूसरी ओर प्रकृति का कहर कई राज्यों में जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर रहा है। मानसून की भारी और अनियमित वर्षा ने बाढ़, भूस्खलन और कृषि-संबंधी चुनौतियों को जन्म दिया है, जो भारत की आपदा प्रबंधन क्षमताओं और जलवायु परिवर्तन के प्रति उसकी भेद्यता को उजागर करती हैं।
वर्तमान स्थिति और क्षति
भारत के कई राज्य, विशेषकर पहाड़ी और तटीय क्षेत्र, इस वर्ष मानसून की अप्रत्याशित और तीव्र बारिश से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं।
- जान-माल की क्षति: बाढ़ और भूस्खलन के कारण कई लोगों की जान गई है, और हजारों लोग विस्थापित हुए हैं।
- बुनियादी ढाँचा: सड़कें, पुल और अन्य महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे को व्यापक नुकसान पहुँचा है, जिससे कनेक्टिविटी बाधित हुई है।
- कृषि पर प्रभाव: फसलों को भारी नुकसान हुआ है, जिससे किसानों की आजीविका पर सीधा असर पड़ा है और खाद्य सुरक्षा को लेकर चिंताएँ बढ़ी हैं।
- शहरी बाढ़: कई बड़े शहरों में भारी बारिश के कारण शहरी बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हुई है, जिससे सामान्य जनजीवन ठप हो गया है।
कारण: मानसून पैटर्न में बदलाव और जलवायु परिवर्तन
भारत में बारिश का यह कहर केवल एक मौसमी घटना नहीं है, बल्कि यह बड़े पैमाने पर जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापन से जुड़ा हुआ है।
- चरम मौसमी घटनाएँ: जलवायु परिवर्तन के कारण चरम मौसमी घटनाओं (जैसे अत्यधिक वर्षा या लंबे समय तक सूखा) की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ रही है।
- मानसून में परिवर्तन: मानसून के पैटर्न में बदलाव देखा जा रहा है – कम समय में अधिक तीव्र वर्षा, और वर्षा के दिनों की संख्या में कमी। यह ‘भारी वर्षा दिवस’ (Heavy Rainfall Days) की बढ़ती संख्या के रूप में भी सामने आता है।
- अल नीनो और ला नीना: प्रशांत महासागर में होने वाली अल नीनो और ला नीना जैसी प्राकृतिक घटनाएँ भी भारतीय मानसून को प्रभावित करती हैं, हालांकि जलवायु परिवर्तन इनका प्रभाव भी बदल रहा है।
आपदा प्रबंधन की चुनौतियाँ और तैयारी
भारत में एक मजबूत आपदा प्रबंधन तंत्र है, जिसमें राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) और राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDRMA) महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- NDMA की भूमिका: यह आपदा प्रबंधन के लिए नीतियाँ, योजनाएँ और दिशानिर्देश तैयार करता है।
- SDRF/NDRF: राज्य और राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (SDRF/NDRF) त्वरित प्रतिक्रिया और राहत कार्यों के लिए प्रशिक्षित और सुसज्जित हैं।
- पूर्व चेतावनी प्रणाली: भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और अन्य एजेंसियाँ मौसम संबंधी चेतावनियाँ जारी करती हैं।
हालांकि, इन सबके बावजूद कई चुनौतियाँ बनी हुई हैं:
- शहरी नियोजन का अभाव: अनियोजित शहरीकरण, अतिक्रमण, और अपर्याप्त जल निकासी प्रणाली शहरी बाढ़ को बढ़ाती हैं।
- पर्यावरण क्षरण: वनों की कटाई, आर्द्रभूमि (wetlands) का अतिक्रमण और नदी के किनारों पर निर्माण भूस्खलन और बाढ़ के जोखिम को बढ़ाते हैं।
- बुनियादी ढाँचा: कई क्षेत्रों में बुनियादी ढाँचा चरम मौसमी घटनाओं का सामना करने के लिए पर्याप्त मजबूत नहीं है।
- जागरूकता और क्षमता निर्माण: निचले स्तरों पर आपदा तैयारी और प्रतिक्रिया में अभी भी क्षमता निर्माण की आवश्यकता है।
आगे की राह: लचीलापन और सतत विकास
बारिश के कहर से निपटने और भविष्य के लिए तैयार रहने हेतु एक बहु-आयामी दृष्टिकोण आवश्यक है:
- जलवायु अनुकूल बुनियादी ढाँचा: सड़कों, पुलों और इमारतों का निर्माण इस तरह से किया जाए जो बदलते मौसम पैटर्न का सामना कर सकें।
- बेहतर शहरी नियोजन: जल निकासी प्रणाली में सुधार, आर्द्रभूमियों का संरक्षण और हरित स्थानों को बढ़ावा देना।
- कृषि में लचीलापन: जलवायु-स्मार्ट कृषि प्रथाओं को अपनाना, जैसे सूखा-प्रतिरोधी फसलें, जल-कुशल सिंचाई और फसल विविधीकरण।
- प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों का सुदृढ़ीकरण: अधिक सटीक और स्थानीयकृत चेतावनियाँ प्रदान करना।
- सामुदायिक भागीदारी: स्थानीय समुदायों को आपदा तैयारी और प्रतिक्रिया में शामिल करना।
- वनरोपण और पर्यावरण संरक्षण: पारिस्थितिक संतुलन को बहाल करना और प्राकृतिक बफर बनाना।
सोचिए: क्या जलवायु परिवर्तन केवल एक पर्यावरणीय मुद्दा है, या इसका सीधा संबंध आर्थिक विकास, सामाजिक न्याय और आंतरिक सुरक्षा से भी है? यूपीएससी के दृष्टिकोण से, इन अंतर-संबंधों को समझना महत्वपूर्ण है।
यूपीएससी के लिए महत्व:
यह खंड भूगोल (मानसून, जलवायु), पर्यावरण (जलवायु परिवर्तन, चरम घटनाएँ), आपदा प्रबंधन (संस्थाएँ, नीतियाँ, चुनौतियाँ), और अर्थशास्त्र (कृषि पर प्रभाव) के साथ-साथ सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) से संबंधित है। यह आपको सरकार की नीतियों, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और सामुदायिक भागीदारी के महत्व को समझने में मदद करेगा।
खंड 3: यूपी में कांग्रेस का विरोध प्रदर्शन – लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति और राजनीतिक परिदृश्य
एक जीवंत लोकतंत्र की पहचान उसमें नागरिकों को अपनी बात रखने और सरकार की नीतियों का विरोध करने की स्वतंत्रता से होती है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का हालिया विरोध प्रदर्शन इस लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति का एक उदाहरण है, जो देश के राजनीतिक परिदृश्य और विपक्ष की भूमिका पर प्रकाश डालता है।
विरोध प्रदर्शन का कारण और महत्व
राजनीतिक दल अक्सर सरकार की नीतियों, आर्थिक मुद्दों (महंगाई, बेरोजगारी), सामाजिक असमानताओं या विशिष्ट स्थानीय समस्याओं के विरोध में प्रदर्शन करते हैं। यूपी में कांग्रेस का विरोध प्रदर्शन भी इन्हीं में से किसी एक या अधिक मुद्दों पर केंद्रित होगा, जिसका उद्देश्य सरकार का ध्यान आकर्षित करना, जनमत को प्रभावित करना और अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करना है।
लोकतंत्र में विरोध का महत्व:
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19): भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(ए) नागरिकों को बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 19(1)(बी) शांतिपूर्ण और निहत्थे सम्मेलन का अधिकार प्रदान करता है। विरोध प्रदर्शन इन अधिकारों का एक स्वाभाविक विस्तार है।
- चेक एंड बैलेंस: विरोध प्रदर्शन सरकार पर दबाव बनाने और उसे जवाबदेह ठहराने का एक महत्वपूर्ण साधन है। यह विपक्ष को सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने और वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करने का मंच प्रदान करता है।
- जनमत निर्माण: विरोध प्रदर्शन जनता के मुद्दों को सामने लाते हैं और उन पर सार्वजनिक बहस को बढ़ावा देते हैं, जिससे जनमत प्रभावित होता है।
- नीतिगत बदलाव: कई बार सशक्त और निरंतर विरोध प्रदर्शन सरकार को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करने या उनमें बदलाव करने के लिए मजबूर करते हैं।
- अधिकारों का दावा: हाशिए पर पड़े और वंचित समूह अक्सर विरोध प्रदर्शनों के माध्यम से अपने अधिकारों का दावा करते हैं और समाज में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं।
चुनौतियाँ और प्रबंधन
हालांकि विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र का एक अभिन्न अंग हैं, लेकिन वे कुछ चुनौतियाँ भी पेश करते हैं:
- कानून-व्यवस्था: विरोध प्रदर्शनों के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती होती है, खासकर जब वे हिंसक हो जाएँ या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाएँ।
- हिंसा का खतरा: शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों का हिंसक झड़पों में बदलना, पुलिस और प्रदर्शनकारियों दोनों के लिए जोखिम पैदा करता है।
- सार्वजनिक असुविधा: सड़कों को अवरुद्ध करना या सार्वजनिक परिवहन को बाधित करना आम जनता के लिए असुविधा का कारण बन सकता है।
- फेक न्यूज़ और दुष्प्रचार: सोशल मीडिया के दौर में, विरोध प्रदर्शनों के बारे में गलत सूचना या दुष्प्रचार फैलने का खतरा रहता है, जिससे स्थिति और बिगड़ सकती है।
प्रशासन की भूमिका:
लोकतंत्र में प्रशासन को विरोध प्रदर्शनों को दबाने के बजाय उन्हें सुगम बनाने का प्रयास करना चाहिए, बशर्ते वे शांतिपूर्ण हों। इसमें शामिल है:
- शांतिपूर्ण सभाओं की अनुमति देना।
- सुरक्षा सुनिश्चित करना और अनावश्यक बल प्रयोग से बचना।
- असामाजिक तत्वों की पहचान करना और उन्हें नियंत्रित करना।
- संवाद के माध्यम से मुद्दों को हल करने का प्रयास करना।
राजनीतिक निहितार्थ और विपक्ष की भूमिका
यह विरोध प्रदर्शन भारत के राजनीतिक परिदृश्य में विपक्ष की भूमिका को भी रेखांकित करता है। एक मजबूत और प्रभावी विपक्ष लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। यह सरकार की नीतियों की आलोचना करता है, उसे जवाबदेह ठहराता है, और नागरिकों के मुद्दों को संसद और सार्वजनिक मंच पर उठाता है। यह घटना आगामी चुनावों के संदर्भ में भी राजनीतिक दलों की रणनीति और जनसंपर्क प्रयासों को दर्शाती है।
आगे की राह: रचनात्मक विरोध और संवाद
एक परिपक्व लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शनों को रचनात्मक होना चाहिए। इसका अर्थ है:
- शांतिपूर्ण और अहिंसक: गांधीवादी सिद्धांतों पर आधारित विरोध जो हिंसा से दूर रहे।
- स्पष्ट उद्देश्य: विरोध का एक स्पष्ट और तर्कसंगत उद्देश्य होना चाहिए।
- संवाद का मार्ग: विरोध के साथ-साथ सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच संवाद और बातचीत के मार्ग खुले रहने चाहिए ताकि मुद्दों का समाधान निकल सके।
केस स्टडी: भारत में कई ऐतिहासिक आंदोलन और विरोध प्रदर्शन हुए हैं, जिन्होंने समाज और सरकार में बड़े बदलाव लाए हैं (जैसे जेपी आंदोलन, भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन)। इन आंदोलनों ने दिखाया है कि कैसे लोकतांत्रिक विरोध समाज को आकार दे सकता है।
यूपीएससी के लिए महत्व:
यह खंड भारतीय राजव्यवस्था (मौलिक अधिकार, लोकतंत्र, सरकार की जवाबदेही), आंतरिक सुरक्षा (कानून-व्यवस्था, भीड़ नियंत्रण), और सामाजिक न्याय (विरोध का अधिकार, वंचितों की आवाज) से संबंधित है। यह आपको एक लोकतांत्रिक समाज में विरोध की भूमिका, उसके प्रबंधन और विपक्ष के महत्व को समझने में मदद करेगा।
तीनों घटनाओं का अंतर्संबंध: भारत की शासन, लचीलापन और लोकतांत्रिक यात्रा
उपराष्ट्रपति का इस्तीफा, भीषण बारिश का कहर और कांग्रेस का विरोध प्रदर्शन – ये तीनों घटनाएँ ऊपरी तौर पर भले ही अलग दिखें, लेकिन ये सभी भारत के शासन की गुणवत्ता, उसकी संस्थागत लचीलापन और एक राष्ट्र के रूप में चुनौतियों से निपटने की उसकी क्षमता के व्यापक सूचक हैं।
- शासन की चुनौती: संवैधानिक पदों से जुड़े मुद्दों (जैसे उपराष्ट्रपति का इस्तीफा) से लेकर आपदा प्रबंधन (बारिश का कहर) और कानून-व्यवस्था (विरोध प्रदर्शन) तक, ये घटनाएँ सरकार की प्रशासनिक क्षमता, नीति निर्माण और कार्यान्वयन की अग्निपरीक्षा हैं।
- संस्थागत लचीलापन: भारत का संविधान और उसकी संस्थाएँ इन चुनौतियों का सामना करने के लिए कितनी तैयार हैं? उपराष्ट्रपति का इस्तीफा संवैधानिक प्रक्रियाओं के तहत होता है, आपदा प्रबंधन तंत्र सक्रिय होता है, और लोकतांत्रिक अधिकार (विरोध का) सुनिश्चित किए जाते हैं। यह भारत के लोकतांत्रिक ढाँचे की मजबूती को दर्शाता है।
- नागरिक और राज्य का संबंध: इन घटनाओं में नागरिकों और राज्य के बीच का संबंध भी उभर कर आता है। चाहे वह सरकार की नीतियों पर प्रतिक्रिया हो, आपदा में नागरिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी हो, या विरोध के माध्यम से अपनी आवाज बुलंद करना हो, यह संबंध लगातार विकसित हो रहा है।
- भविष्य की राह: ये घटनाएँ भारत को अपनी प्राथमिकताओं पर फिर से विचार करने का अवसर देती हैं। क्या हम अपने संवैधानिक मूल्यों को बनाए रख रहे हैं? क्या हम जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न होने वाली नई वास्तविकताओं के लिए तैयार हैं? क्या हमारा लोकतंत्र इतना परिपक्व है कि वह असहमति को समायोजित कर सके और रचनात्मक समाधान खोज सके?
निष्कर्ष (Conclusion)
भारत एक गतिशील राष्ट्र है, जो लगातार बदलती परिस्थितियों और चुनौतियों का सामना करता रहता है। उपराष्ट्रपति का अचानक इस्तीफा, कई राज्यों में बारिश का कहर और राजनीतिक विरोध प्रदर्शन, ये सभी मिलकर एक जटिल तस्वीर पेश करते हैं। यह तस्वीर न केवल भारत के संवैधानिक और राजनीतिक परिदृश्य की गहराई को दर्शाती है, बल्कि हमें जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक चुनौतियों के प्रति हमारी भेद्यता और एक जीवंत लोकतंत्र में विरोध की शक्ति की भी याद दिलाती है।
यूपीएससी उम्मीदवारों के रूप में, इन घटनाओं को केवल ‘खबर’ के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। हमें इनके पीछे के संवैधानिक सिद्धांतों, सामाजिक-आर्थिक प्रभावों, और शासन के निहितार्थों को समझना होगा। यह हमें न केवल एक सूचित नागरिक बनने में मदद करेगा, बल्कि एक बेहतर प्रशासक बनने की दिशा में भी मार्गदर्शन करेगा जो देश के सामने आने वाली बहुआयामी चुनौतियों को समझ सके और उनका प्रभावी ढंग से समाधान कर सके। भारत की यात्रा निरंतर विकास, अनुकूलन और लचीलेपन की यात्रा है, और ये घटनाएँ इसी यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव हैं।
UPSC परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न (Practice Questions for UPSC Exam)
प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) – 10 MCQs
(निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें और उनकी व्याख्या पढ़ें)
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भारत के उपराष्ट्रपति के संबंध में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- वह राज्यसभा के पदेन सभापति होते हैं।
- उनके चुनाव में संसद के दोनों सदनों के केवल निर्वाचित सदस्य भाग लेते हैं।
- उन्हें राज्यसभा द्वारा पारित एक प्रस्ताव द्वारा पद से हटाया जा सकता है, जिसे लोकसभा द्वारा अनुमोदित किया जाना चाहिए।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(A) केवल a और b
(B) केवल b और c
(C) केवल a और c
(D) a, b और c
उत्तर: (C)
व्याख्या: कथन (a) और (c) सही हैं। कथन (b) गलत है क्योंकि उपराष्ट्रपति के चुनाव में संसद के दोनों सदनों के सभी सदस्य (निर्वाचित और मनोनीत) भाग लेते हैं, जबकि राष्ट्रपति के चुनाव में केवल निर्वाचित सदस्य भाग लेते हैं।
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निम्नलिखित में से कौन-सा अनुच्छेद भारत के उपराष्ट्रपति के पद से संबंधित नहीं है?
(A) अनुच्छेद 63
(B) अनुच्छेद 64
(C) अनुच्छेद 65
(D) अनुच्छेद 72
उत्तर: (D)
व्याख्या: अनुच्छेद 72 राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति से संबंधित है। अनुच्छेद 63 (उपराष्ट्रपति का पद), अनुच्छेद 64 (उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति), और अनुच्छेद 65 (राष्ट्रपति के पद में रिक्ति के दौरान उपराष्ट्रपति का कार्य) उपराष्ट्रपति से संबंधित हैं।
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आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत, भारत में आपदा प्रबंधन के लिए शीर्ष निकाय कौन सा है?
(A) राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF)
(B) राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA)
(C) केंद्रीय गृह मंत्रालय
(D) भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD)
उत्तर: (B)
व्याख्या: राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत भारत में आपदा प्रबंधन के लिए शीर्ष वैधानिक निकाय है, जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते हैं।
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भारत में भारी वर्षा और बाढ़ के पीछे निम्नलिखित में से कौन से कारक संभावित रूप से जिम्मेदार हो सकते हैं?
- मानसून पैटर्न में बदलाव।
- अल नीनो और ला नीना का प्रभाव।
- अनियोजित शहरीकरण और जल निकासी प्रणालियों का अभाव।
- बड़े पैमाने पर वनों की कटाई।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
(A) केवल 1 और 2
(B) केवल 2, 3 और 4
(C) केवल 1, 3 और 4
(D) 1, 2, 3 और 4
उत्तर: (D)
व्याख्या: ये सभी कारक भारत में भारी वर्षा और बाढ़ की घटनाओं के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं। मानसून पैटर्न में बदलाव और अल नीनो/ला नीना जलवायु संबंधी कारक हैं, जबकि अनियोजित शहरीकरण और वनों की कटाई मानवीय गतिविधियों से संबंधित हैं जो आपदाओं की गंभीरता को बढ़ाते हैं।
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भारतीय संविधान का कौन-सा अनुच्छेद “शांतिपूर्ण और निहत्थे सम्मेलन” के अधिकार की गारंटी देता है?
(A) अनुच्छेद 14
(B) अनुच्छेद 19(1)(b)
(C) अनुच्छेद 21
(D) अनुच्छेद 32
उत्तर: (B)
व्याख्या: अनुच्छेद 19(1)(b) सभी नागरिकों को शांतिपूर्ण और निहत्थे सम्मेलन का अधिकार प्रदान करता है, जो विरोध प्रदर्शनों का एक महत्वपूर्ण संवैधानिक आधार है। अनुच्छेद 14 समानता के अधिकार से, अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से, और अनुच्छेद 32 संवैधानिक उपचारों के अधिकार से संबंधित है।
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निम्नलिखित में से कौन-सा कथन ‘क्लाइमेट-स्मार्ट कृषि’ के संदर्भ में सही नहीं है?
(A) यह कृषि उत्पादकता और आय को स्थायी रूप से बढ़ाने पर केंद्रित है।
(B) यह जलवायु परिवर्तन के लिए कृषि प्रणालियों को अनुकूल बनाने में मदद करता है।
(C) इसका मुख्य उद्देश्य ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना है।
(D) इसमें केवल सूखा-प्रतिरोधी फसलों का उपयोग शामिल है, अन्य तकनीकों का नहीं।
उत्तर: (D)
व्याख्या: क्लाइमेट-स्मार्ट कृषि (CSA) एक एकीकृत दृष्टिकोण है जिसमें सूखा-प्रतिरोधी फसलों के उपयोग के अलावा जल-कुशल सिंचाई, फसल विविधीकरण, बेहतर भूमि प्रबंधन और अन्य तकनीकों का एक संयोजन शामिल होता है। इसका उद्देश्य उत्पादकता बढ़ाना, अनुकूलन करना और उत्सर्जन कम करना है।
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उपराष्ट्रपति अपना इस्तीफा किसे संबोधित करते हैं?
(A) भारत के मुख्य न्यायाधीश को
(B) लोकसभा अध्यक्ष को
(C) भारत के राष्ट्रपति को
(D) प्रधानमंत्री को
उत्तर: (C)
व्याख्या: उपराष्ट्रपति अपना इस्तीफा भारत के राष्ट्रपति को संबोधित करते हैं।
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आपदा जोखिम न्यूनीकरण (Disaster Risk Reduction – DRR) के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से स्तंभ शामिल है/हैं?
- आपदा के कारणों को समझना।
- प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करना।
- आपदा के बाद राहत और पुनर्वास।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
(A) केवल 1
(B) केवल 1 और 2
(C) केवल 2 और 3
(D) 1, 2 और 3
उत्तर: (D)
व्याख्या: आपदा जोखिम न्यूनीकरण (DRR) एक व्यापक अवधारणा है जिसमें आपदा के कारणों को समझना, जोखिम का आकलन करना, प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करना, शमन के उपाय करना और आपदा के बाद राहत व पुनर्वास सभी शामिल हैं। यह एक समग्र दृष्टिकोण है।
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भारतीय संसदीय प्रणाली में, विपक्ष की भूमिका के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सबसे उपयुक्त है?
(A) विपक्ष का मुख्य कार्य केवल सरकार की हर नीति का विरोध करना है।
(B) विपक्ष सरकार पर अंकुश लगाने और उसे जवाबदेह ठहराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
(C) विपक्ष केवल चुनावी अभियानों के दौरान सक्रिय रहता है।
(D) विपक्ष का कोई संवैधानिक आधार नहीं होता है।
उत्तर: (B)
व्याख्या: विपक्ष सरकार पर अंकुश लगाने, उसे जवाबदेह ठहराने, वैकल्पिक नीतियाँ प्रस्तुत करने और सार्वजनिक मुद्दों को उठाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिससे लोकतंत्र मजबूत होता है। हालांकि वे विरोध करते हैं, लेकिन उनका कार्य केवल विरोध करना नहीं है।
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भारत में शहरी बाढ़ के प्रमुख कारणों में शामिल हो सकते हैं:
- अनियोजित शहरी विकास।
- जल निकासी प्रणालियों का अवरुद्ध होना।
- झरनों और आर्द्रभूमियों का अतिक्रमण।
- सतह का पक्का होना (Impervious surfaces)।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
(A) केवल 1 और 2
(B) केवल 2, 3 और 4
(C) केवल 1, 3 और 4
(D) 1, 2, 3 और 4
उत्तर: (D)
व्याख्या: ये सभी कारक शहरी बाढ़ के प्रमुख कारण हैं। अनियोजित विकास से अनियंत्रित निर्माण होता है, जल निकासी प्रणालियाँ अक्सर कचरे और अतिक्रमण से अवरुद्ध हो जाती हैं। आर्द्रभूमियाँ प्राकृतिक स्पंज का काम करती हैं, जिनके अतिक्रमण से पानी का अवशोषण कम होता है। पक्की सतहें पानी को मिट्टी में रिसने से रोकती हैं, जिससे बहाव बढ़ जाता है।
मुख्य परीक्षा (Mains)
(निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर लगभग 250-400 शब्दों में दें)
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भारत के उपराष्ट्रपति का पद संवैधानिक रूप से कितना महत्वपूर्ण है? हाल ही में हुए इस्तीफे के संभावित निहितार्थों पर चर्चा करें और बताएं कि यह घटना भारतीय राजनीति में उपराष्ट्रपति की भूमिका को कैसे प्रभावित कर सकती है।
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“जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों के कारण भारत में चरम मौसमी घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ रही है।” इस कथन के आलोक में, भारत में आपदा प्रबंधन की वर्तमान चुनौतियों का विश्लेषण करें और इस संदर्भ में एक लचीली और सतत विकास रणनीति के महत्व पर प्रकाश डालें।
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एक जीवंत लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शनों का क्या महत्व है? लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रयोग और सार्वजनिक व्यवस्था के रखरखाव के बीच संतुलन बनाए रखने में राज्य की भूमिका का आलोचनात्मक मूल्यांकन करें।
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हाल के घटनाक्रम – एक प्रमुख संवैधानिक पद का इस्तीफा, देश के कई हिस्सों में जलवायु जनित आपदाएँ, और प्रमुख राजनीतिक दलों द्वारा सार्वजनिक विरोध – भारत के शासन, समाज और पर्यावरण के बीच के अंतर्संबंधों को किस प्रकार दर्शाते हैं? भारत के लिए इन बहुआयामी चुनौतियों से निपटने हेतु आगे की राह सुझाएँ।
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